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रचनावली

अज्ञेय रचनावली
खंड : 3
संपूर्ण कहानियाँ

अज्ञेय
संपादन - कृष्णदत्त पालीवाल

अनुक्रम हजामत का साबुन पीछे    

दुकान में घुसा तो छोटे लाला नौकर को पीट रहे थे।

लाला की दुकान से मैं तब-तब थोड़ा-बहुत सामान लेता रहता हूँ। इसलिए बड़े लाला और छोटे लाला और उनके दोनों नौकरों को पहचानता हूँ। यों लाला कहने से जो चित्र आँखों के सामने आता है उसके चौखटे में दोनों में से कोई ठीक नहीं बैठता था। मुटापा तो दोनों में इतना था कि नाम के साथ मेल खा जाए, लेकिन इससे आगे थोड़ी कठिनाई होती थी। दोनों प्रायः सूट पहनकर दुकान पर बैठते थे, दुकान का फर्नीचर लोहे का था और मेज पर काँच लगा हुआ था। दुकान में किराने से लेकर परचून तक की चीजें तो थीं ही, इसके अलावा साज-सिंगार का सामान, अँग्रेजी दवाइयाँ वगैरह भी थीं और पिछले दो-एक वर्ष से दुकान को स्पिरिट और शराब रखने का भी परमिट मिल गया था। मुझे इस तरह की बहुधन्धी दुकानों से कोई विशेष प्रेम हो, ऐसा तो नहीं है, लेकिन दुकान बस-स्टैंड के निकट पड़ती थी और दफ्तर से घर लौटते समय वहाँ से कुछ खरीद ले जाने में सुभीता था।

थोड़ी देर मैं असमंजस में खड़ा रहा। लाला पीटने में इतना व्यस्त था तो नौकर का पिटने में और अधिक व्यस्त होना स्वाभाविक था। ग्राहक की तरफ ध्यान देने की फुरसत किसी को नहीं थी। समझदारी की बात तो यही थी कि वहाँ से चल देता और जो खरीदारी दूसरे दिन तक न टल सकती, वह कहीं और से कर लेता। इससे भी बड़ी समझदारी की बात यह है कि जहाँ हाथापाई हो रही हो, वहाँ नहीं ठहरना चाहिए। लेकिन मुझमें दोनों तरह की समझदारी की कमी है और हमेशा रही है। आज से कल तक टालने की बात तो समझ में आ सकती, लेकिन आदमी का पीटता हुआ देखकर समझदारी-भरी उपेक्षा मेरे बस की नहीं है।

लाला के मोटे थुलथुल हाथ का थप्पड़ जो नौकर के गाल पर और आड़े हुए हाथ पर पड़ा तो मेरे मन में तीखी प्रतिक्रिया हुई, ओ लाले के बच्चे, क्यों पीटता है!’’

ऐसी मेरी भाषा नहीं है, गुस्से में भी नहीं। पर उस समय लाला को ‘लाला का बच्चा’ कहना ही मुझे ठीक जान पड़ा, या ऐसे कह लीजिये कि लाला के बच्चे के नाम से ही मोटे और भौंड़े रूप को मैं कोई संगति दे सका।

लाला ने फिर एक थप्पड़ मारा और चिल्लाकर, बोले, तूने मुझे टेलीफोन क्यों नहीं कर दिया?’’

मेरी मुट्ठियाँ भिंच गयीं। टेलीफोन न करने पर नौकर को मारना मुझे सहन नहीं हुआ। मुझे पूरा विश्वास हो गया कि नौकर को भी वह सहन नहीं होगा। मैंने जैसे मान लिया कि अभी-अभी नौकर भी वापस एक थप्पड़ लाला के - लाला के बच्चे के - मुँह पर जड़ देगा।

पर वह हुआ नहीं। नौकर ने वह थप्पड़ भी चुपचाप खा लिया। और उसके बाद भी मार खाता गया और लाला के बच्चे की फटकार सुनता गया।

लाला ने और चीखकर कहा, ‘‘बोलता क्यों नहीं - हीरू के बच्चे?’’

तो नौकर का नाम हीरू है। इस तरह थोड़ा-थोड़ा करके परिस्थिति मेरी समझ में आने लगी। घटना कुल जमा यह हुई थी कि छोटे लाला जब दुकान पर आये थे तो नौकर को घर पर ललाइन की सेवा में और उनके छोटे बच्चे की टहल में छोड़ आये थे। इस बीच ललाइन ने नौकर को हुक्म दिया कि दुकान से चावल ला दे। नौकर बच्चे को घर पर छोड़कर दुकान से चावल ले आया। आधे घंटे के इस अवकाश में बच्चा ललाइन के अनदेखे बाहर निकल गया और पड़ोसी लाला के घर चला गया, जिसके हम उम्र लड़के से उसकी दोस्ती थी। नौकर ने लौटकर जब बच्चे को नहीं देखा, तब उसे और उसके कहने पर ललाइन को चिन्ता हुई। कोई आधे घंटे में यह पता लग गया कि बच्चा पड़ोस के घर में ही है, लेकिन इस बीच ललाइन का घबराहट से बुरा हाल हो चुका था। दोपहर को लाला जब खाने घर गये थे तब ललाइन ने उन्हें बता दिया था कि कैसे उन्हें बड़ी घबराहट हुई थी। अब लाला दुकान पर लौटकर नौकर से जवाब तलब कर रहे थे कि अगर बच्चा नहीं मिल रहा था तो फौरन उन्हें टेलीफोन क्यों नहीं कर दिया गया कि बच्चा नहीं मिल रहा है। अगर उसको कुछ हो गया होता तो?

टेलीफोन ललाइन भी कर सकती थी-या अगर खुद नम्बर मिलाना उन्हें नहीं आता था तो टेलीफोन करने की बात उन्हें भी सूझ सकती थी, यह नौकर ने अभी तक नहीं कहा। पता नहीं उसे सूझा ही नहीं था, या कि मार का डर उसका मुँह बन्द किये हुए था।

लाला ने काँच की मेज़ पर रखे हुए टेलीफोन को उठाकर पकड़ते हुए फिर कहा, ‘‘यह साला है किसलिए? अगर तू...’’ और फिर एक थप्पड़ हीरू को जड़ दिया।

मैंने बड़ी एकाग्रता से मन में कहा, ‘‘अरे हीरू, तू भी इनसान है। मार लाला के बच्चे को एक थप्पड़ और पूछ इससे कि...’’

लेकिन हीरू ने एक और थप्पड़ खा लिया, थोड़ा-सा लड़खड़ाया और फिर ज्यों-का-त्यों हो गया।

आप रेस खेलते हैं? मैं खेलता तो नहीं, लेकिन घुड़दौड़ भी मैंने देखी है और रेस खेलनेवाले भी, इसलिए पूछता हूँ। हारते हुए घोड़े पर दाँव लगानेवाले की घुड़दौड़ देखते हुए जो हालत होती है वही हालत मेरी हो रही थी। भीतर दुस्साहस उत्तेजना और तनाव, काँपते हुए हाथ और सूखकर तालू से चिपकती जबान, और ऊपर से इतना एकाग्र, उपशमन का अंकुश कि जैसे अपने एकाग्रता के बल पर ही हारे हुए घोड़े को जिता दूँगा।

हर उत्तेजना में एक बेबसी होती है। सहसा अपने में उसका अनुभव करके मैंने अपने-आपसे कहा, ‘‘यह उत्तेजना क्यों? क्यों तुम इस सेकेड हैंड सनसनी का शिकार हुए? इतना घबड़ा क्यों रहे हो? छटपटाहट किस बात की है? अरे साहब कुत्तों की दौड़ में मेरा कुत्ता पिछड़ा जा रहा है, दूसरा कुत्ता खरगोश को लपक लेगा! ‘अरे, तुम तो कुत्ते नहीं हो, न तुम खरगोश ही हो... तुम अपने जीवन की उत्तेजना से जूझो, कुत्ते की या खरगोश की उत्तेजना से तुम्हें मतलब? बल्कि कुत्ता तो उत्तेजित भी नहीं है, वह एकाग्र होकर खरगोश के पीछे दौड़ रहा है। और वह... बिना चेतन भाव से ऐसा सोचे भी... यह जानता है कि उत्तेजना उसकी मदद नहीं करेगी बल्कि उसके काम में बाधक होगी। और खरगोश को तो और भी उत्तेजना के लिए फुरसत नहीं है... जिसके सामने जिन्दगी और मौत का सवाल हो, उसको ऐसी टुच्ची सनसनी से क्या मतलब? और तुम, तुम दौड़ देखकर छटपटा रहे हो। बल्कि तुम चाह रहे हो, मना रहे हो कि खरगोश उलटकर कुत्ते पर खिसिया उठे या कि उसे अपने जबड़ों में दबोच ले! तुम्हारा दिमाग़ खराब हो रहा है!’’

लेकिन नहीं, नौकर निरा खरगोश नहीं है। वह आदमी है। आखिर वह विरोध में कुछ कह रहा है।

‘‘मगर लालाजी, मैं तो कुक्कू लाला को बीबीजी को सौंप के चला था’’ हाँ, नौकर इनसान है। अब वह तन जाएगा। अब वह...

‘‘ऊपर से सामने जवाब देता है? उल्लू के पट्ठे, साले, सूअर के बच्चे।’’

‘‘लाला-लाला के बच्चे... हीरू का बच्चा है और तुम्हारा साला है, तो तुम कौन हो, ओ सूअर के दामाद!’’

लेकिन यह तो मैं मन में कह रहा हूँ। और मुझे लाला से मतलब नहीं है। लाला से हीरू का मतलब है। मुझे तो नौकर से मतलब है। क्योंकि नौकर जो करे - या मैं जो चाहता हूँ कि वह करे - उसके नाते में मुझे उसकी इनसानियत से मतलब है। अब हीरू, तू एक थप्पड़ तो मार दे लाला के बच्चे को। चाहे धीरे से ही - चाहे असफल ही...

नहीं, फ़िजूल है। हीरू कुछ नहीं कर रहा है। और मुझे उससे जो मतलब है और उसके नाते इनसानियत से जो मतलब है वह मेरे सामने एक बड़ी-सी गरम-गरम और ठोस ललकार के रूप में आ खड़ा हुआ है। जैसे किसी ने एक बहुत गरम निवाला मुँह में रख लिया हो और तुरन्त निगल जाना ज़रूरी हो गया हो।

‘‘मैं भी मारूँगा लाला के बच्चे को!’’ मैं बढ़कर लाला के बहुत पास आ गया

कि सहसा हीरू बोला - ऐसे स्वरों में जिसको मैं कभी पहचान सकता लेकिन जिसको तुरन्त हीरू का मान लेने को मैं चालार हूँ क्योंकि हम तीनों के अलावा चौथा व्यक्ति वहाँ है ही नहीं।

‘‘मालिक, आप माई-बाप हैं। आपका लड़का मेरे अपने बच्चे के बराबर है। और मैं उस पर जान देने को तैयार हूँ। आप...’’

लाला का फिर उठता हुआ बेडौल हाथ हवा में ही रुक गया है। उनकी चुंधी आँखों में कुछ हुआ है। जिसने मानो उनके हाथ को वहीं-का-वहीं कर जड़ दिया है। आँखों और हाथों में ऐसा सीधा क्या सम्बन्ध होता है, यह तो मैं नहीं जानता, लेकिन जैसे हठात् बिजली फेर कर जाने से किसी मशीन का उठा हुआ हथौड़ा आकाश में रुक जाए, वैसी ही हालत लाला की हो गयी है।

लाला ने धीरे-धीरे जैसे ज़बरदस्ती हाथ को नीचे झुकाकर मेज़ पर से झाड़न उठा लिया है और वह हाथ पोंछने लगा।

अब मैं कुछ नहीं कर सकता - लड़ाई तो खत्म हो गयी है। इससे पहले ही मार देता तो...

असमंजस में मैंने जल्दी की थी, उसकी कुंठा को गुस्से का रूप ले लेना तो स्वाभाविक था। लेकिन लाला का बच्चा नौकर को मारकर अब हाथ पोंछता है। चाहिए तो नौकर को जाकर नहाना कि वह इस गलीज चीज़ से छू गया है जो लाला बनी फिरती है।

‘‘हाँ, साऽब - आपको क्या चाहिए?’’

मुझे? अच्छी तश्तरी पर रखा हुआ तुम्हारा कटा हुआ सिर! ...इस दुकान से अब भी कुछ लेने का मन नहीं है। यह लाला जैसे इनसानियत के घावों पर जमा हुआ कच्चा खुरंट है, जिससे सम्पर्क में आने की बात ही घिनौनी जान पड़ती है...

मैंने कहा, ‘अब कुछ नहीं चाहिए। हुल्लड़ सुनकर रुक गया था। जो देखा, वह मुझे तो बड़ी शरम की बात लगी...’’

लाला बँगलें झाँकने लगा। फिर घिघियाता हुआ-सा बोला, ‘‘हाँ, सा’ब, शरम की बात तो है। क्या बताऊँ, मुझे गुस्सा आ गया। बच्चे की बात है, आप जानते हैं।’’ फिर कुछ रुककर अनिश्चय से, जैसे छोटे मुँहवाले कनस्तर से उँगली से खोद कर घी निकाला जा रहा हो, ‘‘वैसे यह थोड़े ही है कि मैं इस नौकर की कदर नहीं करता - उसकी लायल्टी का मुझे पूरा भरोसा है...’’ फिर सहसा व्यस्त होते हुए ‘‘लेकिन सा’ब, आप बिना कुछ लिए न जाएँ - नहीं तो मुझे बड़ा मलाल रहेगा - क्या चाहिए आपको?’’

वह क्या कहानी कभी सुनी थी - बुढ़िया बूचड़ की दुकान में गयी तो बूचड़ ने सिर पर से पैर तक उसको देखकर रुखाई से पूछा, ‘‘तुम्हें क्या चाहिए बुढ़िया?’’ गरीबिनी बुढ़िया को सवाल बड़ा अपमानजनक लगा - क्या हुआ उसे छोटा सौदा खरीदना है? तो वह बोली, ‘चाहिए? चाहिए मुझे माल रोड पर हवेली और तीन मोटरें और चन्दन का पलंग। लेकिन तुझसे, मियां बूचड़, मुझे चाहिए सिर्फ़ दो पैसे का सूखा गोश्त।’’

मैं थोड़ी देर चुपचाप लाला की तरफ़ देखता रहा। फिर जैसे मैंने भी अपने भीतर से कहीं खोदकर निकाला, ‘‘एक पैकेट चाय-छोटा पैकेट - और कोई सस्ता हजामत का साबुन है?’’

(दिल्ली, जनवरी 1959)


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