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कहानी

कैरेक्टर
रवि बुले


आज का शूट खत्म। डायरेक्टर ने 'पैक-अप' कहा और सूरज ढलने की तरफ चल दिया। सारे कलाकार इधर-उधर बिखर गए। तकनीशियन, हेल्पर और स्पॉट बॉय सामान समेटने में लग गए। आर्या नायर ने आस-पास देखा और दूर पड़ी प्लास्टिक की कुर्सियों की तरफ बढ़ गई। मुंबई होता तो वह सीधी वैनिटी वैन में समा जाती। परंतु यह एक छोटा-सा कस्बा था। उसकी आरामगाह से मीलों दूर। आर्या को याद नहीं कि कितने बरसों के बाद उसने चकाचौंध से अलग जिंदगी का चेहरा देखा है। शुरुआत में सहज-सादे क्षणों के लिए जो उत्साह पैदा हुआ था, वह जल्द ही खत्म हो गया। अब वह थकान महसूस करने लगी थी। डायरेक्टर की उम्मीदों पर वह खरी नहीं उतर पा रही थी और यह तनाव का सबब था। अभी हफ्ता भर ही गुजरा है। दो सप्ताह बाकी हैं। यह सोचकर उसका मन चटक रहा था। वह कुर्सी पर बैठ गई। गहरी साँस खींची। आस-पास कोई नहीं था। कुछ औरतें दूर खड़ी थीं। कुछ किशोर भी। वे हीरोइन को देख रहे हैं! उसने सोचा और मुस्करा दी। लेकिन इस वक्त वह कहाँ हीरोइन जैसी दिख रही है? सिलवटों से भरी सस्ती-सी सूती साड़ी और मैला-कुचैला ब्लाउज। ढीले बालों की चोटी, जिसमें लगी वेणी के फूल मुर्झा चुके हैं। लगभग बिना मेक-अप का चेहरा। रूखी त्वचा। यह रोल ही ऐसा है। इसमें कहाँ वह वैसी दिखेगी, जिसके लिए लोग उसके दीवाने हैं!

हैं या थे...?

भीतर उठे सवाल को उसने चुपचाप गुजर जाने दिया।

कार अभी तक नहीं आई! ड्राइवर को भेजा था, पास के शहर में। आर्या के ब्रांड की सिगरेट यहाँ नहीं मिलती। जो लाई थी, खत्म हो गई। ड्राइवर का नंबर लगाया तो पता चला कि मोबाइल का नेटवर्क गायब है। वह इंतजार करेगी।

कभी लोग उसका इंतजार करते थे...!!

'आर्या...' 'आर्या...'

'आर्या...' 'आर्या...'

जहाँ जाती थी, एक ही आवाज आती थी। इस बात को कहाँ ज्यादा वक्त बीता है! बस, ढाई-तीन साल। लेकिन ऐसा लगता है मानो कई दशक गुजर गए। फिल्म इंडस्ट्री में हर शुक्रवार को सितारे चमकते और बुझते हैं। उसे अटल विश्वास था कि वह सदा के लिए है। वह ग्लैमर की गुड़िया थी। सबसे कीमती। सबसे महँगी। सबका सपना। सबकी कल्पना। उसके नाम पर लोग टिकट खिड़की तक खिंचे आते थे। मगर कतार से एक के बाद एक छह फ्लॉप... और सब खत्म हो गया। लेकिन वह हार नहीं मानेगी। फिर से सब बदल देगी। उसे खुद पर भरोसा है। प्रभात पर भरोसा है।

प्रभात... यानी प्रभात देसाई। उसने देखा कि दूर वह स्क्रिप्ट राइटर के साथ बहस में लगा है। कल की तैयारी। प्रभात की कोई फिल्म आज तक फ्लॉप नहीं हुई। जिस हीरोइन के साथ उसने काम किया, उसे नेशनल अवार्ड मिला। हीरोइनें उसके निर्देशन में काम करने के लिए तरसती हैं। न फिल्म का विषय पूछती हैं और न रोल। डॉटेड लाइन पर साइन करती हैं। प्रभात हार्ड हिटिंग, रियलिस्टिक फिल्में बनाता है। वह भी वीमन सेंट्रिक। इस बार भी यही कर रहा है। छोटे शहरों में बद से बदतर जिंदगी जीने वाली वेश्याओं की कहानी। रेड : नो लाइट, ओनली डार्क। प्रभात ने उसे हीरोइन चुना है।

क्या सोचकर...?

क्या वह उसे छोटे शहर की वेश्याओं जैसी दिखती है...?

तभी दो औरतें पास से गुजरीं। आर्या ने मुड़ कर देखा। कुर्सियों से दस-पंद्रह कदम पीछे एक कतार से कच्ची मिट्टी के बने मकान थे। रंग उड़ी दीवारों में सीलन। फर्श के नीचे बहती नालियाँ। छोटी अंधेरी खोलियाँ। वेश्यावृत्ति की गवाह। आते ही आर्या घबरा गई थी। प्रभात हमेशा रीयल लोकेशनों पर शूट करता है। आर्या का मन हुआ कि लौट जाए। लेकिन कहाँ? सारे दरवाजे तो बंद हैं। सिर्फ प्रभात का सहारा है। मगर उसने ये कहाँ ला पटका? एक बार भी उसे खयाल नहीं आया कि आर्या फिल्म इंडस्ट्री की सबसे हसीन नायिका है! सिर्फ वक्त की आँखमिचौली है, बाकी सब कुछ तो वैसा का वैसा है। सुख-सुविधा-ऐश्वर्य से भरा आर्या का जीवन। बड़े-बड़े होटलों में आए दिन समारोह और पार्टियाँ। रईस और रसूखदार लोगों के बीच उठना-बैठना। देश-विदेश की लंबी यात्राएँ। महँगी शॉपिंग। फैशनेबल जिंदगी। उसके मूड स्विंग को सहने वाले दोस्त-यार-परिचित। वह आज भी फिल्म और फैशन इंडस्ट्री की 'दीवा' है। अपने सौंदर्य और भव्यता को हर तरह से प्रदर्शित करती। कुछ भी नहीं छुपाती। वह जैसी थी, सबके सामने थी। इसी बात के लोग दीवाने थे। लेकिन इन्हीं बेदिल दीवानों ने उसे आसमान से जमीन पर पटक दिया!

***

पुलिस बंदोबस्त के बीच शूटिंग का पहला दिन था। चारों तरफ भीड़ थी। शोर था। लोगों को पता लग चुका था कि रेड लाइट एरिया में शूटिंग हो रही है। सबकी नजरें हीरोइन को ढूँढ़ रही थीं। ग्लैमर गर्ल, आर्या! कोई सीटी बजा रहा था। कोई फब्तियाँ कस रहा था। कुछ आवाजें हीरोइन को सामने लाने की माँग कर रही थीं। आर्या को गुस्सा आ रहा था। कस्बाई मानसिकता वाले ओछे-बेशरम-बदतमीज लोग।

'आती क्या रे...!'

अचानक भीड़ में से एक लंपट आवाज आई।

'कोण हे रे... भड़व्या... ये समोर... तुझी आई ची...' चुनौती के संग गाली देती हुई एक औरत की भारी-कर्कश आवाज से एकाएक सन्नाटा पसर गया। सबने देखा कि नाटे कद की एक जाड़ी-काली अधेड़ औरत कमर पर दोनों हाथ रखे भीड़ के सामने आकर खड़ी हो गई। लोग अपने में सिमट गए। वह गुस्से से तमतमा रही थी। उसके गले में सोने का हार और कलाइयों में सोने के कंगन दमक रहे थे। माथे पर उसने बड़ा गोल लाल टीका लगा रखा था। कानों में सोने की बालियाँ थीं और नाक में सोने के फूलवाला काँटा। यह ठाठ बता रहा था कि यहाँ उसका सिक्का चलता है।

आर्या को मालूम चला कि सब उसे अम्मा बोलते हैं। उसकी मर्जी के बगैर यहाँ पर कोई औरत धंधा नहीं कर सकती। वह सबसे कोठरियों का किराया और ग्राहकों से हुई कमाई का एक-तिहाई हिस्सा वसूल करती। वैसे वही इन औरतों को गुंडों-ग्राहकों के जुल्मों और पुलिस की जोर-जबर्दस्ती से बचाती। कोई झगड़ा होता तो अम्मा ही निपटाती।

पिच्चर वाले लोग उसके एरिये में शूटिंग के वास्ते आए हैं, इसलिए अम्मा बहुत खुश थी। उसे फख्र महसूस हो रहा था। प्रभात ने महीने भर के लिए इलाका लिया था और मोटी रकम दी थी। प्रभात ने आर्या से कहा कि कैरेक्टर में उतरने के लिए उसे यहाँ की औरतों को समझना होगा। आर्या ने कोशिश की। उनकी मजबूरियों की कहानियाँ सुनीं। सब हालात की मारी थीं। हर धंधा करने वाली की अपनी मजबूरियाँ और जरूरतें थीं। गरीबी, अशिक्षा और भूख समान रूप से उनकी शत्रु थी। आर्या का दिल पसीजा। मगर सवाल यह कि वह किस सीमा तक इनके दुख-दर्द को महसूस करे? ज्यादा करीब जाकर झूठी-मूठी संवेदना जताकर क्या करेगी? शुरुआत में आर्या को अम्मा से नफरत हुई कि यही है मजबूर और कमजोर औरतों को धंधे के फंदे में फँसाने वाली। लेकिन बाद में उसने अम्मा के सीने में भी दिल की धड़कनों को महसूस किया।

एक दिन जब वह लंच कर रही थी तो अम्मा ने खाने की कुछ चीजें लाकर दी। अपनी जिंदगी के दुख बताए। उसे आशीर्वाद दिया। उसके गालों पर एक पप्पी भी ली। अम्मा ने उससे कहा कि वह बहुत सुंदर है। लेकिन साथ ही सवाल किया कि ऐसी दिव्य सुंदरी को क्या धंधेवाली का रोल करना शोभा देता है? तब आर्या ने समझाया कि मैं एक अभिनेत्री हूँ और हर तरह के रोल निभाना चाहती हूँ। इस पर अम्मा ने अधिकार जताते हुए उदास स्वर में कहा कि कुछ भी हो, ये ठीक नहीं लगता।

आर्या ने अम्मा से तर्क किया कि क्या तुम लोगों की कहानी दुनिया को नहीं दिखाई जानी चाहिए? तब अम्मा की आँखों में आँसू आ गए। बोली, 'दुख-दर्द की क्या कहानी... ये तो दिल को चीर देने वाली सच्चाई है। एक-एक की आपबीती पर एक-एक पिच्चर बन सकती है। कोई भी औरत ये धंधा करना चाहती क्या? जिंदगी मरी का भरोसा नहीं... इनसान सोचता कुछ है और हो कुछ जाता है।' कहते-कहते अम्मा का स्वर भीग गया। आर्या समझ गई कि उसका अनुभव बोल रहा है। आर्या का भी अभिनेत्री बनने का कोई इरादा नहीं था। वह मास कम्युनिकेशंस की पढ़ाई करने के बाद एक स्किनकेयर प्रोडक्ट्स कंपनी के पीआर डिपार्टमेंट में काम कर रही थी। तभी एक फोटोग्राफर ने उसे देखा और कुछ तस्वीरें खींच ली। फिर अपने फिल्म निर्देशक दोस्त को भेजीं। वह बन गई एक्ट्रेस! जीवन रंगमंच है, जिसकी हम सब कठपुतलियाँ हैं... उसे याद आया। अम्मा ने उसकी ठुड्डी को छुआ और बोली, 'जब थैटर में पिच्चर लगेगी तो मुझे बताना कि लोग मेरी इस कठपुतली को देख के क्या बोले!' आर्या का दिल भर आया।

***

प्रभात देसाई फिल्म में हकीकत दिखाने वाला था कि महाराष्ट्र के जिन इलाकों में बरसों से सूखे की मार पड़ रही है, वहाँ की अनेक औरतें किस तरह देह व्यापार में धकेल दी गईं। कहाँ गए मददगार एनजीओ? कहाँ गई जिम्मेदार सरकार? वैसे सरकारी अधिकारियों और पुलिस का कहना था कि यह समस्या बड़े पैमाने पर नहीं है। कुछ मामले हुए हों यह संभव है। प्रभात आत्महत्या करने वाले एक किसान की पत्नी की सच्ची कहानी से प्रेरित था। जिसकी मजबूरी का फायदा उठाते हुए कुछ लोगों ने उसे देह मंडी के दलालों को बेच दिया। जबकि उसका पाँच साल का एक बच्चा था। आर्या किसान की पत्नी की भूमिका निभा रही थी, जो देह व्यापार के दलदल में फँसने के बाद किसी ग्राहक के कारण एड्स जैसी जानलेवा बीमारी की चपेट में आ जाती है। यह माँ अब परेशान है कि उसके बाद अनाथ हो जाने वाले बेटे का क्या होगा?

स्क्रिप्ट सुन कर आर्या कुछ बेचैन हो गई। उसे लगा था कि वह सिर्फ ग्लैमर गर्ल नहीं है। उसके अंदर संवेदनाएँ हैं। जैसी एक सच्ची अभिनेत्री के भीतर होनी चाहिए। क्या माँ की ममता भी उसमें हैं? यह पेचीदा सवाल था। उसे पर्दे पर दिखने के लिहाज से ही तैयारी नहीं करनी थी, मानसिक रूप से भी तैयार होना था। यह वाकई चुनौतीपूर्ण भूमिका थी।

आर्या जब कैमरे के सामने पहुँची तो तमाम तैयारियों के बावजूद उसका अभिनय नौसिखिए के जैसा लगा। प्रभात को उससे लगभग देहाती किस्म की वेश्या के अभिनय की दरकार थी। प्रभात ने कहा, 'सबसे पहले तो जैसे हम खड़े होते हैं, पढ़े-लिखे लोग, ये औरतें वैसी खड़ी नहीं होती।' आर्या ने कुछ दूर खड़ी उन औरतों को देखा। वे वैसी नहीं थीं। दुखी-लाचार-छली-सताई। जैसी उसने अपने दिमाग में छवि बना रखी थी। वह हैरान रह गई। वे एकदम बिंदास थीं। आँखें नचा कर, हाथ मटका कर बातें करतीं। गहरा मेक-अप लगाए, वे जोर-जोर से बोल रही थीं। बिना आस-पास के लोगों की परवाह किए। उनकी भाषा में नंगे शब्द थे। साड़ी पहने हुए भी कुछ की पैंटी कमर से ऊपर दिख रही थी और जिनके ब्लाउज काफी नीचे तक आ गए उन्हें इसकी कोई परवाह नहीं थी! आर्या पर्दे पर इससे ज्यादा अंग प्रदर्शन करती थी। मगर इन औरतों की अदाएँ और निर्लज्जता देख कर उसके मन में जाने कैसी शर्म पैदा हुई। उसे ऐसी दिखना होगा...? इन गिरी हुई औरतों की तरह। उसके मन में यही खयाल आया, गिरी हुई औरतें। उसे भी गिरना होगा...!! आर्या ने देखा कि कुछ को-आर्टिस्ट उन औरतों के साथ उन्हीं के अंदाज में खड़ी थीं। उनसे बतियाती-हँसती। आर्या को आश्चर्य हुआ कि उस झुंड में कलाकार लड़कियों और धंधा करने वालियों को अलग-अलग पहचान पाना लगभग असंभव था!

जब कैमरा फिर से ऑन हुआ तो आर्या निराशा से भर उठी। उसे प्रभात पर गुस्सा आने लगा। उसे खुद पर गुस्सा आने लगा। तभी प्रभात ने उसके पास आकर कहा कि साड़ी इस तरह पहननी है कि तन दिखे। उसने अपने हाथ से सीने पर फैला हुआ पल्लू समेट कर कंधे के एक तरफ कर दिया। उसके उभार दिखने लगे। खुले में खुद को इस तरह पाकर आर्या सकपका गई और बोली, 'छोड़ो ना प्रभात...।'

अचानक प्रभात का स्वर बदल गया, 'व्हाट नॉनसेंस आर्या... वाय आर यू नॉट ट्राइंग टू गैट इनटू द स्किन ऑफ द कैरेक्टर...? डोंट यू नो हाऊ आई वर्क... यू नो ना दिस इज योर लास्ट चांस... डू यू वांट टू बी डंप्ड फॉरएवर इनटू द गारबेज बिन... डैमन।' आर्या एक पल को डर गई। उसने सिर्फ सुना था कि प्रभात मुँहफट और तुनक मिजाज है। वह समझ नहीं पाई कि कैसे रिएक्ट करे। अपनी बात खत्म होते ही प्रभात पलट कर चल दिया।

तभी कुछ दूर पर खड़ी हुई एक औरत आर्या के सामने आ गई। उसने पल्लू को लिया और बारीक समेट कर दोनों उभारों के बीच से निकाल कंधे के एक तरफ डाल दिया। बोली, 'ऐसा करने से 200 का भाव डबल हो जाता है। अच्छे से समझ ले... हमारा धंधा दिखाने पर टिका है। जितना ज्यादा दिखाएँगी उतना ज्यादा खुद को बेच पाएँगी।' उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं था। आर्या चौंकी। औरत ने कहना जारी रखा, 'हम लोगों में कंपीटीशन होता है कि उसका कस्टमर मेरे पास आना चाहिए। उसके पास चार आते हैं तो मेरे पास पाँच आने चाहिए। उसके पास पाँच आते हैं तो मेरे पास छह आने चाहिए। उसके पास मैकेनिक आता है तो मेरे पास इंजीनियर आना चाहिए। हमारा कंपीटीशन पैसा नहीं होता। हमारा कंपीटीशन है कस्टमर। ...और कस्टमर उधर ही आएँगा, जिधर माल अच्छा दिखेंगा। समझी।' आर्या उसका मुँह देखती रही।

इसके बाद आर्या जब-जब सैट पर पहुँचती, यह बातें उसके कानों में गूँजती। वह ग्लैमर गर्ल की तरह कैमरे के सामने खड़ी होती और देखते-देखते एक लगभग देहाती किस्म की वेश्या में तब्दील हो जाती! आखिरकार वह उन औरतों के नजदीक गई। उन्हें ध्यान से देखा। उनका उठना-बैठना। उनका सोचना-बोलना। उनका रहन-सहन। उनका चाल-चलन। उनका सोच-विचार। वह उनमें ज्यादा से ज्यादा घुलने-मिलने की कोशिश करती। कभी ऐसा भी कोई क्षण आ जाता कि वह खुद को उन्हीं में से एक पाती। वह हैरान होती कि क्या प्रभात ने कैमरे के पीछे से उसका यह रूप देख लिया है! यही तो चाहता है वह उससे!! उसे प्रभात की नजरें चुभने लगती। वह देखती कि जितनी फिल्म आगे बढ़ रही है, जितना वह अपने काम में डूब रहा है, उतनी ही उसकी नजरें भी बदल रही हैं!! क्या वह कैरेक्टर में उतरने लगी है...?

आर्या को आश्चर्य होता कि यह कैसा सिनेमा है, जिसमें पर्दे पर वेश्या के रूप में वह दिखेगी और उसे इस तरह से दिखाने का पूरा श्रेय और प्रशंसा प्रभात के हिस्से में जाएगी। क्या आर्या के साथ कोई डायरेक्टर ऐसा कर सकता है? कहाँ खो गई वह ग्लैमर गर्ल? क्या उसका श्रेय और उसकी प्रशंसा कोई डायरेक्टर छीन सकता है? कभी नहीं। उसे फिर से शिखर को छूने की बेताबी है, जहाँ पहुँचने की शायद यही एक राह है!

***

आर्या ने ध्यान से देखा। मोबाइल के नेटवर्क से फिर निराशा मिली। ड्राइवर को अब तक तो आ जाना चाहिए। उसका मुँह कसैला-सा हो रहा था। जमीन से आसमान तक सारे रंग धूसर हो चुके थे। हर चीज अपनी छाया मात्र रह गई थी। तभी उसकी नजर कुछ दूर खड़ी एक औरत पर पड़ी। शायद वह भी किसी का इंतजार कर रही है। आर्या अकेली बैठी-बैठी उकताने लगी थी। उसने औरत को पास बुलाया। बोली, 'बैठ...।' औरत खड़ी रही। लेकिन आर्या ने फिर जोर देकर कहा तो बैठ गई। कुछ बोली नहीं। खामोशी पसरी रही। आर्या को सिर्फ इतनी तसल्ली हुई कि इस सन्नाटे में अब वह अकेली नहीं है। वह फिर खयालों में खो गई। थोड़ी देर बाद एक आदमी उधर निकल आया। औरत ने उसे देखा और उठ कर चली गई। आर्या दोनों को जाते हुए देखती रही। वह फिर अकेली रह गई। उसका अकेलापन बढ़ गया। मगर दस मिनट भी नहीं बीते कि वह औरत आकर वापस उसके बगल में बैठ गई।

आर्या चौंकी, 'क्या हुआ?'

'वो आया था...'

'कौन...'

'वो... ये दे के गया...' उसने ब्लाउज के अंदर से सौ का नोट निकाल कर दिखाया।

'ये क्या है...'

'क्या मैडम... आपको पता नहीं क्या...'

आर्या उसका चेहरा गौर से देखने लगी।

उसने कहा, 'गिराक था...'

आर्या को जैसे चक्कर आ गया। बोली, 'यहाँ रहती हो...'

'...और क्या! आप पहचानी नहीं ना मुझको।'

आर्या कुछ देर चुप रही। फिर पूछा, 'तुम्हारे घरवाले को पता है...?'

'नहीं तो क्या छुपा के रखा मैडम...? वो गया है सुबै से काम पे। गाड़ियों की रिपेरिंग करता है। शॉप में। तीन हज्जार रुपै मिलते उसको। मेरी सास को भी पता है। हम वहाँ रहते हैं सामने वाली वाड़ी में। मेरा छोटा बच्चा है। सास ही सँभालती है। हम लोग को भी अपनी खोली लेनी है मैडम...। खोली तीस हज्जार में आती है। जब तीन हज्जार में गिरस्ती में कुछ नहीं होता तो तीस हज्जार कैसे जमा होंगे...? सोचो। उसी के वास्ते कर रही हूँ...।'

इससे पहले कि आर्या कुछ बोल पाती, वह औरत उठी और कुछ कदम आगे जाकर गुम हो गई। आर्या को बेखयाली में उस औरत से नफरत हुई, इतना गिरा दे ऐसी मजबूरी...!! तभी खयाल कौंधा कि कभी उसे इतनी मजबूर होना पड़ जाए तो...? वह डर गई। तन में हल्का-सा कंपन हुआ तो उसने मन को मजबूत किया। तीस हजार रुपये के लिए वह औरत मजबूर हो सकती है, मगर आर्या नायर के लिए क्या हैं तीस हजार! मेक-अप का थोड़ा-सा सामान, दोस्तों के साथ फाइव स्टार होटल में नाश्ते-खाने का बिल, कुछ ब्रांडेड अधोवस्त्र, एक-दो हवाई यात्राओं का टिकट, किसी को मोहब्बत में दिया गिफ्ट, पीआर/प्रमोशन की एक मीटिंग का खर्चा या महीने भर में महँगी शराब के घूँट और सिगरेटों का धुआँ...!!

उसके भीतर सिगरेट की जबर्दस्त तलब उठी। गहराई से। अंदर किसी अंधे कुएँ में चुंबकीय तरंगे उठने लगीं हो जैसे। इन तरंगों में आर्या का अस्तित्व खो रहा था। आर्या का दिमाग सुन्न होने लगा। उसे लगा कि वह अनंत गहराई में डूब कर खो रही है। उसे होश नहीं रहा। सब कुछ धूसर-काले रंग में खो चुका था। तभी एक छाया दिखी... जिसके होठों में दबी सिगरेट का सुलगता हुआ सुर्ख लाल सिरा चमक रह था। अचानक आर्या ने अपना हाथ ऊपर उठाया। उसके मुँह से निकल पड़ा, 'देता क्या...'

आवाज आई, 'आ...'

आर्या जैसे किसी तिलस्म के पाश में बँधी थी। वह उठी और उस छाया के साथ चल दी। वे एक कोठरी के सामने रुके। अंदर गए। उसने नर्म अँगुलियों से उन होठों में दबी सिगरेट निकाली और अपनी जिंदगी का सबसे गहरा कश खींचा। सिगरेट में भरी तंबाकू तड़प उठी। कड़वा और गाढ़ा धुआँ उसके फेफड़ों में उतर गया। एक राहत देने वाली बेहोशी उसके भीतर पसर गई। उसकी बेचैनी को जैसे जन्नत का सुकून मिला। उसने दीवार से पीठ टिका दी। ब्लाउज ऊपर उठा। साड़ी ऊपर उठी। वह सिगरेट के गहरे कश खींचती रही। उसकी आँखें मुँदी हुई थीं। उसका अस्तित्व पिघल कर तरंगों में तब्दील हो चुका था। वह धुएँ के साथ एकमेक होकर हवा में घुल रही थी। उस हवा में हल्की आवाजें थीं। सूखे पत्तों के गिरने की, ताजा कलियों के चटखने की, मीठे पानी की बूँदों के टूटने की। वहाँ एक गहरा-अँधेरा कुआँ बन गया था और उसमें ये आवाजें गूँजती हुईं नशा पैदा कर रही थीं। देर तक वह इन अनसुनी आवाजों के सुरूर में खोई रही। इन आवाजों के नशीले संगीत की बारिश में अंततः उसका जिस्म भुरभुरी मिट्टी की तरह बिखर गया। सिगरेट राख हो चुकी थी। अचानक जैसे गहरी नींद में चल रहा सपना टूटा...!!

उसने जिस्म पर रेंगते हुए हाथों को अपने दोनों हाथों में थाम लिया।

वे हल्के-से काँपे... फिर दो पल को उसकी छाती पर कस गए।

उसने अपने आप को सँभाला।

वह छाया थोड़ी लड़खड़ाई... और दरवाजे से बाहर निकल गई।

उसके जाते ही सन्नाटा गाढ़ा हो गया।

वह घबराई, मगर धीरे-धीरे खुद को सहेजा और कोठरी से बाहर निकली। ब्लाउज के भीतर उसे चुभन-सी महसूस हुई। हाथ डाला तो कागज के पुर्जे जैसा कुछ निकला। खोलकर ध्यान से देखा। सौ का नोट था।


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हिंदी समय में रवि बुले की रचनाएँ