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कविता

निर्वासन
प्रफुल्ल शिलेदार


जेट के विशाल पेट में
मैं विचरता हूँ
जमीन से बारह हजार मीटर ऊँचाई पर
उसकी तल पर बिछा नरम कालीन
मुझे जमीन जैसा सहारा देता है
जैसे धरती पर चलते हुए
घास से भरा मैदान
उसके विशाल पंख
राजहंस की शान से
हवा काट रहे हैं
हालाँकि उसके कठिन कवच से
भीतर की गरमाहट बनी हुई है
कितना अबोध होकर
निश्चिंत होकर दूरियाँ लाँघ रहा है
मेरे सारे रिश्ते नातों के साथ
मुश्किलों और दुविधाओं के साथ और
मैं उसके पेट में विचरता हूँ
नदी के चमचमाते धागे से सिली हुई
अनगिनत टुकड़ों को जोड़कर बनी हुई
पूरी पृथ्वी पर ढकी गुदड़ी देख रहा हूँ
नीचे झाँक कर
जेट के विशाल पेट में बैठा मैं
निर्वासित हो रहा हूँ
बंदूक के खौफ के बिना
सत्व गँवाने का समय न आते हुए भी
सत्ता से अपमानित होकर
कुंठित न होते हुए भी
मैं निर्वासित होता जा रहा हूँ
जा रहा हूँ अपनी जड़ों के साथ
उखड़ा सा अधटूटा सा
साथ में हो सके उतनी मिट्टी लेकर
न लौटने का भय सिर पर ढोकर
काले घने बरसते बादलों को
और उससे भीगती जमीन को
बहुत नीचे छोड़कर जा रहा हूँ
चमकीले सूरज की ओर जा रहा हूँ
जेट के पेट में मैं पिघल रहा हूँ
जेट की गति हो रहा हूँ।  


(मराठी से हिंदी अनुवाद स्वयं कवि के द्वारा)
 


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