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कविता

उसके खिलौनों में घुसा एक मामूली सा चूहा
प्रफुल्ल शिलेदार


खूब खेलती रही वह
और सो गई चुपचाप थक कर
उसके तमाम खिलौने बिखरे पड़े हैं पूरे कमरे में
अब तो खिलौने भी सो चुके होंगे
रात हो जाने पर जैसे सो जाती है पूरी दुनिया
उसका बस्ता पड़ा है बीचोंबीच
सारा सामान बिखरा पड़ा है इर्द-गिर्द
उसमें एक कंपास में है
खूब सारी टूटी हुई पेंसिलें
स्केल पट्टी रबड़ 
रंग-बत्तियों का डिब्बा है अलग
अक्षरों की नहीं है अभी उसे सही पहचान
इसके बावजूद उसके पास हैं
ढेरों किताबें रंग-बिरंगे चित्रों की
प्राणियों की और बारहखड़ी की
इस सारे पसारे से परे
उठ कर वह चली गई
सुख निंदिया की गोद में
मुझे पता है
इस बिखरे हुए खेल का नक्शा
पक्के तौर पर बसा हुआ है उसके जेहन में
और जब उठेगी सोकर
उसे चाहिए होगा सब कुछ
जहाँ का तहाँ जस का तस
उसके खिलौनों में आ घुसा
एक मामूली सा चूहा
वह अपनी लुकलुकाती आँखों से
रंगीन खिलौनों को देखता हुआ
पसारे में घूम रहा है
उसके बदन के रोओं से
उसके शिशु होने की लुनाई झलकने के बावजूद
उसके दाँत नुकीले हैं
उसकी आँखें और दाँत मुस्तैदी से जुट गए हैं काम में
अपने पैने दाँतों से कुतर कर देख रहा है
खिलौने वाले बैट की टनक
बार्बी के सफेद जूतों में
उसने गड़ा कर देखे दाँत
हाथी की घुमावदार सूँड़ को
वह आसानी से कर सकता है टुकड़े-टुकड़े
बाघ की दुम इसलिए बच सकती है
क्योंकि पहले से ही वह दबी हुई है
एंबुलेंस के टायर लेकिन
जख्मी होकर ही रहेंगे
टुच्चे बर्तनों में उसे नहीं है दिलचस्पी
धीरे-धीरे वह बढ़ रहा है किताबों की ओर
वह कुतरेगा
उसकी बारहखड़ी की किताब के मूलाक्षर
इस तरह हिम्मत बढ़ने पर
वह उसकी भाषा पर भी बोल सकता है हल्ला
जिसकी जुड़ाई अभी तक कच्ची है
अभी तक उसने प्राणियों को (इनसानों तक)
किताब के रंगबिरंगे चित्रों के जरिए ही देखा-समझा है
जो की रंगों में डुबकी लगा कर
भाषा का बुरका पहन कर
किताबों में समा गए है
अभी भी उसका सजीव प्राणियों से रूबरू होना बाकी है
यही वजह है वह पूरे यकीन के साथ
अपनी सारी दुनिया खुली छोड़ कर
सो गई है बेफिक्र

और उसकी दुनिया के सिरजनेवाले खिलौनों को
कुतरने लगा है
एक सचमुच का मामूली सा चूहा।

(मराठी से हिंदी अनुवाद स्वयं कवि के द्वारा)
 


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