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कविता

उनकी दुनिया का काला घना आकाश
प्रफुल्ल शिलेदार


घर की छत तो
दीवार तक आकर थम जाती है
लेकिन सामने का मिट्टी का आँगन भी
घर का ही हिस्सा है
घर से आँगन लाँघ कर बाहर निकल कर
जहाँ भी जाओ
थोड़ा न थोड़ा घर साथ आ ही जाता है
आँगन से घर में आने पर
आँगन साथ नहीं आता घर के भीतर
झाड़-झंखाड़ मिट्टी पत्थर र्इंट समेत
बाहर जैसे रखवाली करता रहता है
जल्दबाजी में आँगन से गुजरते वक्त
आँगन का ही अंग बन चुके एक र्इंट की
ठेंस लगी
तिलमिला कर बैठ गया
देखने लगा वह र्इंट
इस पर यकीन ही नहीं हुआ
कभी लाल और करारी झाँवाँ हुआ करती थी वह
उसने आसपास की मिट्टी और घास से
तजुर्बेदार आदमी की तरह घुल-मिल कर 
काला हरा रंग ओढ़ लिया था
वक्त बीतने के साथ उसका नुकीलापन
खत्म हो चुका था
हालाँकि वह भी अन्य की तरह ही थी
ठेंस लगने के कारण
टिक गई थी उस पर नजर
पाँव का टीसता अँगूठा
गीली सर्द मिट्टी में धँसा कर
मैं हाथ से हटाने लगा र्इंट
तभी फिसल गई उँगलियाँ
उसकी बगल में उगा एक कुकुरमुत्ता
टूट कर गिर गया
एक तो बारिश में काई ने उस पर
अच्छी पकड़ बना ली थी
दूसरे अगल-बगल की मिट्टी से
उसका घरौंदा बन चुका था
आखिर जोर लगा कर
हिकमत से उठा ही ली वह र्इंट
र्इंट की जगह मिट्टी में
र्इंट के आकार का गड्ढा
जहाँ हवा रोशनी वगैरह
घुस आए आगंतुक की तरह
पर इससे वहाँ से र्इंट के उठाए जाने का एहसास
जरा भी कम नहीं हो रहा था
गड्ढे में काली चींटियों की उमड़ पड़ी थी भीड़
थियानमेन चौक की तरह मच गया घमासान
बेहाल भागा भागी
उसमें से रास्ता निकाल कर
कुछ चींटे सरपट भागने लगे गड्ढे के सिरों की ओर
काली गोल पीठ वाले अदने कीड़े
धीरे-धीरे आगे-पीछे सरकने लगे बौराए हुए
एक केंचुआ असहनीय धूप से बेदम
छटपटाता बिलबिलाने लगा गड्ढे में
कोने में लंबे काले कीड़े ने
खुद को सिकोड़ कर अपने अंग गोल कर लिए
लपकती हुई एक जोंक
अपनी बेशुमार टाँगों से रेंगती
एक बारीक बिल से बाहर आई
और आँखें चौंधियाती तेज रोशनी देख
चट से उल्टे पाँव लौट गई
र्इंट को उलट कर देखा तो
उसकी भीतरी खाँचों में
नन्हें तिलचट्टों का डेरा था
मूँछों से एक दूजे की पूछ-परख करते
अनगिन जीवों की अल्टा-पल्टी
बगल के पत्थर के नीचे से सिर निकाल कर
ताकती है एक बिस्तुइया
बेहद कोफ्त हुई
एक र्इंट के उखाड़े जाने भर से
एक भरी पूरी दुनिया में
आ गया था भूचाल
अपने आप में परिपूर्ण एक संसार
उलट कर धर दिया था एक दरिंदी ताकत ने
ढा दी थी भारी तबाही
सैंकड़ो के सिर से छिन गई थी छत
बेकाबू होकर भीतर घुसी थी हवा
उस गड्ढे में आया एक पानी का रेला
तो विनाशकारी बाढ़ भी आ गई
अब अगर हाथ की र्इंट
गड्ढे में वापस रख भी दूँ
तो नहीं हो सकेगा पहले जैसा सब कुछ
आँगन की मिट्टी तो
समा लेगी र्इंट को अपने में
लेकिन अपनी दुनिया का काला घना आकाश
कभी भी उड़ सकता है सिर से
इस डर की भारी भरकम र्इंट
अब आ गई है
हर एक के सिर पर।


(मराठी से हिंदी अनुवाद स्वयं कवि के द्वारा)

 


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