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कविता

कृषक : अर्पित है फूल-मन
प्रभुनारायण पटेल


किसी भी मंत्र के ओंकार से
कम नहीं,
हल-बखर में जुते
बैलों के घंटियों की रुनझुन।
ये मेरे प्राणों की पूजा है,
कृषक हूँ,
श्रम-स्वेद की बूँदें
मुझे
पाषाण मंडित देवता
के चरणामृत से
कुछ कम नहीं लगती,
ये मेरे मनु-धर्म की
पूर्णाहुति है,
मेरी भक्ति है,
जीवन शक्ति है,
और है आराधन,
इसे ही अर्पित है
मेरा फूल मन
 


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