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कविता

गीता का गीत गा दो
प्रभुनारायण पटेल


कल
केवल एक छल
वह कल कभी नहीं आएगा
मेरे दोस्त,
तुम्हारी यह आजादी
कुँआरी ही बूढ़ी हो गई है,
पलपल
तरसी है
एकल सिंदूरी किरण के लिए।
हर गली नुक्कड़ पर
उन भुक्कड़ बोटबाजों के
धड़ल्ले से चलते रहे चकर-चोचले,
तुम भैंस के गले में
घंटियाँ बाधते रहे कविराज,
यहाँ अब आज
दरिंदे ये तीरंदाज
खून की मचाकर कीच,
ठहाका मारकर हँसते हैं
हम आपके बीच,
तो काँपती है करुणा,
वेदना के आँसू झरते हैं,
मानवता कराह उठती है
जब जब निरीह मरते हैं,
फिर..
ब्याजे ही बढ़ते हैं बेकारी, भूख, भृष्टाचार,
चतुर्दिक चीत्कार!
सुनो वक्त की पुकार,
अब किसका इंतजार?

वे नामी गिरामी
दलाल, गुरुघंटाल,
तो बिच्छू तक का
मंत्र नहीं जानते
और साँप के बिल में
हाथ डालने की जल्दी,
पर तुम्हारा तो
आज के समर कुरुक्षेत्र में
कृष्णार्जुन का रिश्ता है
तुम्हारे तो इन हाथों में सुदर्शन है,
नहीं हल्दी,
तो बजा दो रणभेरी,
इस सोते सिंह को जगा दो,
वक्त की तरन्नुम में
गीता का गीत गा दो,
तुम, करिश्मा कुछ जो कर सकते हो
तो करो,
अन्यथा आज
बच गए जो जिंदा
तो सुक्का जिंदा के हाथों
कल मरो।
हाँ, तो फिर मंत्रोद्दीप्त करो -
लेखनी के वे तिमिर-भेदी अग्निबाण,
इस आतंक की अमावस के बस हरलों प्राण ।
धरा के दग्ध उर में जब
आज भी उड़ती हैं उल्काएँ,
आज भी प्रकीर्णित हैं जब
दिनकर की प्राची में विजय-पताकाएँ,
आज भी सव्यशाची के जब
आलोकित हैं वही आख्यान,
तो क्यों तुम्हें
तुम्हारे अस्तित्व की नहीं है पहचान।
तुम जागो हे जनता-जनार्दन!
आज के समर के कृष्णार्जुन!
 


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