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कविता

किसी निर्माणी का प्राणी
प्रभुनारायण पटेल


किसी निर्माण का
कथित मानव प्राणी,
दिनभर से ज्यादा
करता हुआ काम,
थका मादा
अब साढ़े छह बजे शाम,
सायरन का स्वर पड़ते ही कान,
गेट 7 से शुरू मराथान,
वह लंबी रेस का घोड़ा,
साइकिल सरपट दौड़ा,
कहीं थोड़ा, नहीं रुकता,
नहीं मुड़ता,
फ्लाइंग सिख मिल्खाशिंग सा उड़ता,
उड़ाता आकाश में ऊँची धूल,
दिनभर के, निर्माण के अंदर के,
रिश्ते नाते सब भूल,
जब नापता है रास्ता घर का,
तो चेतना में बिंब उभर आता है
जो गाँव में गोधूलि में गोखुर का।
पर वह धूल धूसरित आकाश
अचानक कर उठता है अट्टहास,
छोडता हुआ व्यंग्यबाण -
बकरे की अम्मा को कब तक त्राण?
कहो, पेरोल पर छूटे कैदी!
किसने रात भर की आजादी दे दी?
कैसे दम दबाकर भागे?
किस जनम  के अभागे?
कहाँ अब संध्या-वंदन ,चंदन, आरती, दीपदान
सब कर दिए दान?
ट्यूब लाइट, लिपिस्टिक के इस्तहारों को,
“ये कौन थे, क्या हो गए”
सोचने समय कहाँ बेचारों को!
बचे जो होश अभी आ जाएँगे ठिकाने,
बीवी जब देगी बाद में चाय पहले ताने!
वह टाँक रही छटे बेटे का फटा बस्ता,
कल छोड़ने जाना है शिशुमंदिर,
जानती नहीं कानवेंट।
आज की पिछड़ी, पुरातन पंथी, “क्रीत-दासी”,
सुलाकर बच्चों को नींद खासी, अब अकेली भूखी-प्यासी
उनके आने का देखती रहती है रस्ता,
वहाँ करती महँगाई की मार,
और, अब प्रीतम को आया भी देख द्वार,
वो घटाओं में घिरा चाँद
हँसता भी तो क्या हँसता!
पर, ताजी रोटी खाने,
जनाब जाते हैं घर, सर छुपाने।
साढे नौ बजे तक देखने टीव्ही,
इनके भी हैं बच्चे बीवी,
पर रात चौथा पहर होते ही,
बच्चों को छोड़ घर सोते ही,
ले रूखी रोटियाँ, आलू थोड़े प्रतिदिन,
बीवी थमा देती है टिन का टिफिन,
ये भगोड़े से, ले दौड़े दौड़े से,
रात मुँह अँधेरे में
हाजिर हो जाते हैं
फैक्टरी के घेरे में।
 


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