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कविता

पनहारी
प्रभुनारायण पटेल


संसृति-सृजित कूप परिपूरित
जगहित-सलिल सुधा है,
कल-कल रव, अतिमंद निनादित
ज्ञान कूप वसुधा है,
रज्जु प्रयत्न प्रति प्रत्यावर्तित,
मानव उर शुचि गागर,
कूप सलिल भरने को केवल
मनुज जिंदगी पनहारी।
 


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