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कविता

अक्टूबर की हथेली पर...
प्रतिभा कटियार


अक्टूबर की हथेली पर
शरद पूर्णिमा का चाँद रखा है
रखी है बदलते मौसम की आहट
और हवाओं में घुलती हुई ठंड के भीतर
मीठी सी धूप की गर्माहट रखी है
मीर की गजल रखी है
अक्टूबर की हथेली पर
और ताजा अँखुआए कुछ ख्वाब रखे हैं
मूँगफली भुनने की खुशबू रखी है
आसमान से झरता गुलाबी मौसम रखा है
बेवजह आस-पास मँडराती
मुस्कुराहटें रखी हैं
अक्टूबर की हथेली पर
परदेसियों के लौटने की मुरझा चुकी शाख पर
उग आई है फिर से
इंतजार की नन्हीं कोंपलें
अक्टूबर महीने ने थाम ली है कलाई फिर से
कि जीने की चाहतें रखी हैं
उसकी हथेली पर
धरती को फूलों से भर देने की
तैयारी रखी है
बच्चों की शरारतों का ढेर रखा है
बड़ों की गुम गई ताकीदें रखी हैं
उतरी चेन वाली साइकिल रखी है एक
और सामने से गुजरता
न खत्म होने वाला रास्ता रखा है
अपनी चाबियाँ गुमा चुके ताले रखे हैं कुछ
और मुरझा चुके ‘गुमान’ भी रखे हैं
अक्टूबर की हथेली पर
पड़ोसी की अधेड़ हो चुकी बेटी की
शादी का न्योता रखा है
कुछ बिना पढ़े न्यूज पेपर रखे हैं
मोगरे की खुशबू की आहटें रखी हैं
और भी बहुत कुछ रखा है
अक्टूबर की हथेली में
बस कि तुम्हारे आने का कोई वादा नहीं रखा...
 


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