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कहानी

बहत्तर धड़कनें तिहत्तर अरमान
आकांक्षा पारे काशिव


अभय शुक्ला ने देखा एक ख्वाब

हवा में न नमी है न खुनक। जो भी थोड़ी-बहुत हवा बह रही है वह अपने साथ जगह-जगह जल रहे टायरों की दुर्गंध को पीठ पर लादे-लादे घूम रही है। आवाज के नाम पर सिर्फ सायरन का शोर है। पूरा शहर जल रहा है और मेरे आँसू भी उस आग को बुझाने में नाकामयाब हैं। आखिर हमने किसी का क्या बिगाड़ा हैं। बस हम दोनों साथ ही तो रहना चाहते हैं। दो लोग प्यार से साथ रहें तो तीसरे को तकलीफ क्यों होना चाहिए। मैं चीखना चाहता हूँ। चिल्ला-चिल्ला कर सभी को कहना चाहता हूँ, प्यार करना गुनाह नहीं है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि इनसान कहाँ और किस धर्म में पैदा हुआ है। वह बड़ा हो कर क्या बनता है इस पर ध्यान देने की जरूरत है। हम दोनों की आड़ में लड़ना बंद करो। शहर फिर वैसा कर दो। किसी के मन में किसी के लिए डर या शक मत पनपने दो। मुझे अभी भी उससे प्यार है। बावजूद इसके कि मेरा घर जल गया है। मैं अभी भी अपने माँ-पापा को खोज रहा हूँ, मेरे छोटे भाई की जान का खतरा है और मेरी बहन को हमने किसी रिश्तेदार के यहाँ छुपा दिया है।

इस भयानक ख्वाब के बाद जब बिस्तर पर कुनमुनाते हुए जब मेरी नींद अचानक खुल गई तो कमरे में वही हल्की नीली रोशनी थी। नौरीन की पसंद नीली रोशनी। मैं पसीने-पसीने हो रहा था और नौरीन वहाँ नहीं थी। नौरीन को गए आज तीसरा दिन था और उस दिन से लगभग मैं ऐसे ही सपने देख रहा था। मैंने पानी पिया और दोबारा पलंग पर लेट गया। सपना सच में भयानक था। खराब बातें आपके जीवन में नहीं घटना चाहिए। पर उस वक्त मुझे लगा, काश यह सपना ही मेरी हकीकत होती। इतना सब होने के बाद भी यदि नौरीन मेरे पास होती तो मुझे कोई परेशानी नहीं होती।

नौरीन ख्वाब नहीं देखती

मुझे लगता है माँ-बाप को लड़की के अठारह साल की होने पर शादी कर देनी चाहिए। कोई जरूरत नहीं है उन्हें पढ़ाने-लिखाने की। पढ़-लिख कर कौन सा तीर मार लेती हैं। अपनी मर्जी की चलाती हैं सो अलग। और यदि वो अपनी मनमर्जी की चलाएँ तो कान पकड़ कर उल्टा लटका देना चाहिए और दो झापड़ रसीद कर वही कराना चाहिए जो माँ-बाप चाहते हैं। माँ-बाप पहले तो बच्चों को कुछ कहते नहीं। फिर कुछ गलत हो जाए तो कहते हैं, हम तो पहले ही कह रहे थे ऐसा मत करो। अरे ऐसा मत करो से क्या मतलब। पता नहीं क्यों कुछ माँ-बाप को लिबरल होने का चोगा पहनने का बड़ा शौक रहता है। जैसे मेरे अब्बू को है। अम्मी को हालाँकि ऐसा शौक उनसे कम है। पर दोनों डॉक्टर जो ठहरे। सोसाइटी में पढ़े-लिखे लोगों में गिने जाते हैं। अरे तो क्या पढ़े-लिखे लोग जिद्दी नहीं होते क्या। माता-पिता को तो अपने फैसले पर अटल रहना आना ही चाहिए। और हाँ उन्हें बच्चों को भूल से भी नहीं कहना चाहिए कि बेटा जो भी करना सोच समझ कर करना। लो अब कर लिया। भुगतो। खुद भी और हम भी। बच्चों को क्या अक्ल होती है फैसले लेने की। बस बच्चों ने कुछ कहा नहीं कि तुरंत पूरा कर दिया। अब्बू तो जैसे बचपन से तैयार ही बैठे रहते थे कि अब मैं कुछ कहूँ और वह मेरी बात मान लें। जब मैं इतना बड़ा फैसला सुना रही थी तब भी बस ठंडी साँस ले कर इतना ही कहा, अब जब तुमने सोच ही लिया है तो ठीक होगा। अरे ठीक क्या खाक होगा। पूछना तो चाहिए था, ऐसे कैसे तय कर लिया। हमारे होते हुए यह नहीं हो सकता। अगर तुम ऐसा करोगी तो तुम्हें हमारी लाश पर से हो कर गुजरना पड़ेगा। खबरदार जो तुमने इस कमरे से बाहर पैर रखा तो, टाँगें तोड़ देंगे। अपने घर की इज्जत का कुछ तो खयाल करो। मजहब इसकी इजाजत कभी नहीं देगा। अरे ऐसे डायलॉग न मारते कम से कम विरोध तो करते। कुछ नहीं तो यह तो समझाते कि दोनों परिवारों की सोच में जमीन-आसमान का अंतर है। दोनों परिवारों की संस्कृति बिलकुल अलग है। तुम लड़का देख कर शादी कर रही हो। उसका परिवार भी तो देखो। एक लड़की की शादी सिर्फ लड़के से नहीं होती, उसके पूरे परिवार और सारे रीति-रिवाजों से होती है। पर नहीं तब तो इकलौती लड़की के कहने पर आँख-मुँह बंद किए रहे और अब बिसूर रहे हैं। अरे एक बार तो कहते बेटा, प्यार-व्यार तो सब ठीक है लेकिन शादी बहुत अलग चीज होती है। शादी में बहुत से समझौते करने पड़ते हैं। कोई कुछ भी कहे लेकिन शादी निभानी ही पड़ती है। अपने लोगों में रहोगी तो थोड़ी सुविधा होगी। पर नहीं जी, खुद को भी तो कहलाना था, लिबरल और मॉडर्न। अब नतीजा सामने है। ख्वाब और हकीकत में कितना अंतर है यह अब समझ में आ रहा है।

मन की बातें अभय की

देखो तो चेहरे पर कोई शिकन नहीं है। न आँखों में कोई दुख। मुझे यकीन ही नहीं हो रहा कि यह उसी नौरीन की आँखें हैं जो कभी मेरी जिंदगी का सबब हुआ करती थीं। वह मेरे बगल से गुजर गई, बिलकुल अजनबी की तरह। उसके काले बाल वैसे ही खुले हैं जैसे मुझे नापसंद हैं। जरूर मुझे चिढ़ाने के लिए बाल खोल कर आई है। वरना उसे अच्छी तरह पता है मुझे उसकी गुँथी हुई चोटी ज्यादा अच्छी लगती है। बलखाती। किसी नागिन की तरह। और यह क्या। फिर यह सफेद चूड़ीदार पाजामे पर हरे रंग का कुरता पहन कर आ गई। यह कुरता तो उस पर बिलकुल अच्छा नहीं लगता। इसका यह नारंगी रंग का बैग तो मुझसे बिलकुल सहन नहीं होता। उफ्फ कितनी बार समझाया है उसे, यह नारंगी बैग ले कर न चला करे। बिलकुल बेकार लगता है। एक तो सफेद चूड़ीदार पर हरा कुरता पहन लेगी और नारंगी बैग ले लेगी। चलता-फिरता तिरंगा लगने लगती है। पर उसने किसी की मानना कहाँ सीखा है। पंद्रह अगस्त-छब्बीस जनवरी के आसपास यह कपड़े पहने तो ठीक भी है। कोई सोचेगा चलो देशभक्ति में पहन लिया होगा। पर यह दिसंबर के महीने में तिरंगा बन कर घूमने का क्या तुक है। मुझे क्या इसे जो करना है करे। अब मुझे इससे लेना-देना भी क्या जो मैं इसके पहनावे और बैग के रंग पर कोफ्त करूँ। और देखो बन कितना रही है। अच्छी खासी ठंडक में भी बिना स्वेटर चली आई है। अब कल-परसों तक नाक बहेगी और फिर गला दर्द हो कर बुखार आ जाएगा। हर बार यही होता है। पर नहीं शॉल पहन कर आने से तो उसकी स्टाइल खराब हो जाती है न। स्वेटर से तो खैर पता नहीं क्या बैर है। कँपकँपाती रहेगी पर स्वेटर नहीं पहनेगी। हुँह। अगर अभी टोक दूँगा तो कहेगी, तुम्हारी तरह बोरी की तरह बंद रहना मुझे पसंद नहीं। अब सर्दिंयों में भी क्या आदमी इसकी तरह खुला-खुला घूमे। खैर मुझे क्या। एकाध बार और मिलना है फिर इसे जो करना है करे। रोज यह सड़ा हुआ नारंगी बैग ले कर घूमे। और भरी सर्दी में स्लीवलेस पहने।

नौरीन ने भी सोचा मन में

हाय राम। कितनी दफा कहा है, कम सर्दी में हाफ स्वेटर पहन लिया करो। जरा सी ठंडी हवा आई नहीं कि इसका यह तोते के रंग का जैकेट फट से बाहर आ जाता है। माँ ने तीस साल के लड़के को भी ननमुन बना के रखा हुआ है। आज तो कितना अच्छा मौसम है। कितने दिनों की उमस के बाद मौसम खुशगवार हुआ है। और यह चला आया अपनी तोतई जैकेट में। मुझे तो लगता है मुझे चिढ़ाने के लिए ही यह जैकेट पहन कर आया है। उसे अच्छी तरह पता है कि मुझे न यह जैकेट पसंद है न ही उसका यह रंग। और इतनी जल्दी जैकेट पहनने वालों से तो मुझे वैसे भी सख्त चिढ़ है। मैं तो गलती से, जल्दी-जल्दी में यह ऑरेंज बैग ले आई। याद ही नहीं रहा कि इसे यह बैग पसंद नहीं। अब यह पक्के से सोच रहा होगा कि मैं इसे चिढ़ाने के लिए बैग लाई हूँ। पहले तो ऐसे बातें करता था कि मेरे सिवाय इसके जीवन में कुछ है ही नहीं और अब देखो। मेरे इतने पास खड़े हो कर भी अपनी माँ से ऐसे बतिया रहा है जैसे कुंभ में बिछड़ कर बस अभी मिली हों। जैसे अगर अभी बात नहीं करेगा तो फिर शायद मौका ही न मिले। हुँह। मेरा क्या। मैं कौन सा उससे बात करने के लिए मरी जा रही हूँ।

न ख्वाब न फसाना

दोस्तों कहते हैं कहानियाँ कहने के लिए होती हैं और जीवन जीने के लिए। लेकिन यदि जीवन ही कहानी बन जाए तो क्या किया जाए। मैं जानता हूँ अब लोग हमारे बारे में बात करते हैं और हमारी कहानी सुनाते हैं। सुनाते पहले भी थे। मगर तब तरीका अलग था। अब तरीका बिलकुल बदल गया है। अब कहानी सुनाने में कुछ मुझे दोष देते हैं तो कुछ उसे। लेकिन सही मायनों में देखा जाए तो दोष किसी का नहीं है। किसी का भी नहीं। न मेरा न उसका। मुझे कभी-कभी लगता है यह हमारे जीवन का मध्यांतर है। एक दिन ऐसा जरूर आएगा जब हमारी फिल्म का अगला भाग आएगा और आखिर में द एंड के वक्त इसकी हैप्पी एंडिंग होगी। कॉलेज के दिनों में जब हम मिलते थे तो वह कहती थी, यह तो ट्रेलर है बाबू... आगे-आगे देखिए होता है क्या। तो जब वह ट्रेलर था तो यह यकीनन मध्यांतर ही होगा। काश ऐसा ही हो। पर जब मैं यह बोल देता हूँ तो मन खुद ही दोबारा पूछता है, क्या वाकई मैं ऐसा चाहता हूँ। क्या वह वाकई ऐसा चाहती है। हमारे चाहने या न चाहने से ऐसा कैसे होगा। पर हुआ तो हमारे चाहने से ही था न। और अब जो हम कर रहे हैं वह भी हमारे चाहने से ही हो रहा है।

एक आम लड़के-लड़की की तरह हम दोनों ने कॉलेज में पढ़ने के लिए एडमिशन लिया था। हम दोनों बहुत सी बातें कॉमन थीं। दोनों का पढ़ने में मन कम हिंदी फिल्में देखने में ज्यादा लगता था। हम दोनों ही बोलने की बीमारी थी जिसकी वजह से कभी-कभी हमें सुनने की बारी रखनी पड़ती थी। हम दोनों ही बात-बात पर तुनक जाते थे। बस वह एक कदम आगे थी। वह तब तक हार नहीं मानती थी जब तक मैं यह न कह दूँ कि मैं उससे हार गया हूँ। तमाम अच्छाइयों-बुराइयों के साथ हमने फिर भी एक-दूसरे को दिल दे दिया और उसकी वजह से मैंने केमेस्ट्री में एमएससी किया। वरना मैं एमबीए करना चाहता था। हालाँकि बाद में मैंने यह किया भी। फिर मुझे एक फार्मेसी में नौकरी मिल गई और हमने शादी का फैसला कर लिया।

फैसला क्या हमें लगा शादी कर लेनी चाहिए और मैंने अपनी पंडितानी माँ को और उसने अपनी धर्मपारायण माँ को बता दिया। सच कहूँ तो थोड़ी खींचा-तानी तो हुई थी। एकदम से कोई तैयार नहीं हुआ पर फिर वह सुर्ख लाल गरारा पहने हमारे यहाँ आ ही गई।

अब असली कहानी तो यहीं से शुरू होती है। जब वह आई तो मुझे लगा कॉलेज में बहस करना आसान है, बहस में कोई अच्छा लगने लगे यह भी आसान है लेकिन वही बहस जब घर में शुरु हो जाए तो बड़ा मुश्किल है। खींचातानी तब शुरू हुई जब हमारी शादी के सात महीने बाद रमजान आया। नौरीन ने बड़े चाव से रोजे रखे। हमारे घर का माहौल बिलकुल बदल गया। अब रोज सुबह चार बजे से ही रसोई में खटर-पटर शुरू हो जाती। शाम को खजूर और तरबूज आते। माँ बहुत आगे-पीछे तो नहीं घूमती थीं लेकिन उन्होंने मेरी बहन को कह दिया था कि वह ध्यान रखे कि नौरीन को कोई परेशानी न हो। चलो जी ऐसे ही करते-कराते एक महीना बीत गया और हमारे घर में पहली बार ईद मनी। सेवइयाँ बनी और नौरीन के तीनों भाई हमारे यहाँ खाना खाने आए। अब जी कुछ एक या डेढ़ महीने बाद माँ का एक व्रत आया। हरतालिका तीज नाम का। इसमें भी सुबह से पानी नहीं पीते हैं और पूजा के बाद रात को बारह बजे पानी पीते हैं। माँ ने एक दिन पहले ही नौरीन को समझाया कि कल उसे भी व्रत रखना है सो आज ही हाथों पर मेहँदी लगा ले और रात को ठीक से खा ले और रात बारह बजे तक पानी भी पी ले। फिर चौबीस घंटे पानी नहीं मिलेगा। नौरीन ने मेहँदी तो लगा ली लेकिन जी व्रत रखने से मना कर दिया। उसने कहा, हमारे धर्म में नहीं होता और फिर वह पूरे दिन भूखी-प्यासी नहीं रह पाएगी। अब आप ही बताइए माँ को तो बुरा लगेगा ही न। भई रमजान भी तो उसके यानी मेरी माँ के धर्म में नहीं होता है। और यह व्रत भी सेम टू सेम, डिट्टो रोजे की तरह था। पर नौरीन नहीं मानी तो नहीं मानी। माँ ने सुहाग का भी हवाला दिया। अरे सुहाग यानी मैं। मैं नौरीन का सुहाग ही तो हूँ। हाँ तो माँ ने कहा यह व्रत सुहाग के लिए होता है। उसने फिर भी कोई ध्यान नहीं दिया। माँ ने अकेले पूजा की और पड़ोसियों को कहा, नौरीन की तबीयत ठीक नहीं सो वह इस बार यह व्रत नहीं करेगी। खैर।

दिन तो कट ही रहे थे। तनाव तो रोज का ही था। बस एक ही बात अच्छी थी कि घर में किचकिच नहीं होती थी। यानी कोई ऊँची आवाज का झगड़ा कभी नहीं हुआ। माँ दुखी होती तो मुझसे कह लेती कि देख वह ऐसा नहीं करती और नौरीन दादागिरी से मुझ से कहती, देखो तुम्हारी माँ के ये चोंचले मुझसे नहीं होते। पर दोनों की पीठ सुनती है जी दोनों कभी ऐसे नहीं झगड़ी कि मुहल्ला इकट्ठा हो जाए। वैसे हम कॉलोनी में रहते हैं। हाँ तो एक दिन इसी बात पर दोनों ने खाना नहीं खाया कि माँ चाहती थीं नौरीन बिंदी लगाए, बिछिया पहने, गले में मंगलसूत्र पहने, माँग भरे। यानी नौरीन की भाषा में सदा सुहागन का रोल निभाए हमेशा। नौरीन ऐसा करवाचौथ लुक नहीं चाहती थी। माँ इसके लिए उस पर दवाब बनाती थी। लेकिन अंततः जीत नौरीन की ही हुई। यह बात सेटल हुई ही थी कि सच्ची वाला करवाचौथ आ गया। वही बिना पानी पीने वाला व्रत। हे भगवान एक तो मैं ये बिना पानी वाले व्रतों से उबर ही नहीं पाता। तब नौरीन ने कहा, तुम्हारे यहाँ तो हर दूसरे-तीसरे महीने ऐसी नौटंकी चलती रहती है। मैं क्या-क्या करूँ। पर इस बार माँ का रुख काफी शांतिपूर्ण रहा। नौरीन एलओसी का उल्लंघन करती रही और माँ भारत की तरह चुपचाप तमाशा देखती रही।

लेकिन यह शांति ज्यादा दिन कायम नहीं रह सकी। जब दीवाली आई तो माँ ने एक बार फिर द्विपक्षीय वार्ता की शुरुआत की और नौरीन को कहा कि चूँकि शादी के बाद पहली दीवाली है इसलिए पूजा पर उसे मेरा साथ बैठना है। यानी मुख्य पूजा हम दोनों करें। लो जी वार्ता का एजेंडा नौरीन को इतना नागवार गुजरा कि उसने सीज फायर की धज्जियाँ उड़ाते हुए भयंकर गोलीबारी शुरू कर दी। एक तो दीवाली का दिन। ऊपर से इतने आने-जाने वाले। बाहर पटाखों का शोर और अंदर नौरीन का। उसने ऐन पूजा के वक्त शाम को कहा कि चाहे जो हो जाए वह बुतपरस्ती नहीं करेगी। माँ भी इस बार हार मानने के मूड में नहीं थी। उन्होंने भी कह दिया कि यदि वह आज पूजा पर नहीं बैठी तो इस घर में कल से वह नमाज नहीं पढ़ पाएगी।

अब नौरीन सब कुछ कर सकती है पर नमाज पढ़ना नहीं छोड़ सकती। वो तो कॉलेज में भी लाइब्रेरी में जा कर नमाज पढ़ती थी। यह अतिश्योक्ति लग सकती है पर भगवान की कसम वो ऐसा करती थी। जब उसने छह महीने एक प्राइवेट फर्म में काम किया था तो उसने जॉइनिंग से पहले ही बता दिया था कि वो जुमे की नमाज दफ्तर में ही पढ़ेगी।

अरे विषयांतर हो गया। चलो खैर। हाँ तो वैसे तो उस दिन राजा राम अयोध्या पधारे थे। लेकिन माँ और नौरीन ने उसकी भौगोलिक स्थिति को अयोध्या की बजाय कुरुक्षेत्र में तब्दील कर दिया। राजा राम बेचारे यानी मेरे पापा चुपचाप थे और हमने उस दिन इतनी जबानी आतिशबाजी देख ली कि बस जी भर गया। लक्ष्मी जी फोटो में चुपचाप खड़े हुए सिक्के बरसाती रहीं और मैं उनके वाहन की तरह आँखें मूँदे बैठा रहा।

हाँ तो इतनी राम कहानी सुनाने का तात्पर्य ये है कि आज हम दोनों अदालत में मिले हैं। अदालत क्या वही फैमिली कोर्ट। उस दिन नौरीन घर से चली गई और उसने दो टूक फैसला सुना दिया कि उससे गलती हो गई है इसलिए अब वह तलाक लेगी। मैंने उसे समझाया पर उसने कहा कि वह चिकन मिस करती है, हलीम खाने के लिए उसे हर बार अपनी माँ के यहाँ दौड़ना पड़ता है इसलिए बेहतर होगा कि हम-दोनों अलग-अलग रहें। उसके मम्मी पापा का स्टैंड वही है जो शादी से पहले था। वही, तुम देख लो बेटा। पर मुझे पता है अंदर ही अंदर वो दोनों बहुत खुश होंगे कि बेटी घर आ रही है। उसके भाई भी कुछ कम नहीं हैं। कभी समझाते ही नहीं हैं अपनी बहन को। हालाँकि माँ ने देखिए बहन जी के राग के साथ थोड़ी शिकायत करने की कोशिश की थी लेकिन उसकी अम्मी ने कुछ खास तवज्जो नहीं दी। अब हालात यहाँ तक आ पहुँचे हैं कि हम अपनी साल भर पुरानी शादी को खत्म करने के लिए अदालत में खड़े हैं। चूँकि तलाक रजामंदी से हो रहा है। हाँ मैंने भी यही सोचा है कि हमें अलग हो जाना चाहिए तो आज के बाद छह महीने बाद फिर से हमें बुलाया जाएगा। अगर उस वक्त तक भी हमारे फैसले यही रहे तो हम फिर अपनी-अपनी दुनिया में लौट जाएँगे। बस तभी से मैं तरह-तरह की बातें सोचता रहता हूँ। मुझे लगता है हम उस प्यार का हिस्सा नहीं बन सके जिसे मीडिया बड़े चाव से दिखाता। किसी आमिर खान टाइप प्रोग्राम में मैं और नौरीन साथ-साथ जाते। फिर डींगे हाँकते, हमने परिवार का बहुत विरोध सहा फिर भी हम एक-दूजे के लिए थे इसलिए साथ हैं। बैकग्राउंड में कोई अच्छा सा गाना बजता। हमारी क्लिपिंग दिखाई जातीं। हमारी वजह से शहर में दंगे नहीं हुए। हमें घर भी नहीं छोड़ना पड़ा। किसी पंडित ने हमें जात बाहर नहीं किया, किसी ने फतवा जारी नहीं किया। हमें कहीं छुपते-छुपाते अपने दिन नहीं गुजारने पड़े। हिंदू-मुस्लिम होते हुए भी हमारी शादी में कोई रोमांच नहीं रहा। शायद यही वजह है कि हम आम मियाँ-बीवी की तरह रहे, लड़े और अब अलग हो रहे हैं।

पहले जब मैंने अपने दोस्तों को बताया था तो उन्हें यह किस्सा बहुत रोमांचकारी लगा था। लेकिन अब सब टाँय-टाँय फिस्स हो गया। एक हिंदू लड़का और एक मुस्लिम लड़की की इतनी साधारण दास्तान तो कहीं भी बिकाऊ नहीं है। एक बार जब मैं नौरीन की फरमाइशों और शिकायतों से तंग आ गया था तो मैंने उससे कहा था, दिल भी एक बार में बहत्तर बार ही धड़कता है, पर तुम्हारी फरमाइशें तो उससे भी आगे हैं। उसने पलट कर तुनक कर जवाब में कहा था, बहत्तर ही पूरी कर दो। क्योंकि तिहत्तरवीं फरमाइश हो सकता है तुम्हें भारी पड़े।


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