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कहानी

कंट्रोल+अल्ट+शिफ्ट = डिलीट
आकांक्षा पारे काशिव


मैंने कुछ नहीं किया। मैं बस गेम जीतने ही वाला था। काउंटर स्ट्राइ के तीन ग्रेड पूरे होने आए थे। मेरा कंसोल मेरे बस में नहीं था। लेफ्ट-राइट कीज मूव करते हुए मैं खुद भी उसी गति से दाएँ-बाएँ हो रहा था। आप जान भी नहीं सकते कि कंसोल को कंट्रोल करना कितना मुश्किल होता है। लेकिन वह... वह मूर्ख मेरे कंट्रोल से बाहर होती जा रही थी। स्क्रीन पर धड़ाधड़ यूएस सोल्जर टेरेरिस्टों का सफाया कर रहे थे। अगर साउंड लाउड न हो तो, गेम में एक्साइटमेंट लाना इंपासिबल है। वह लगातार चीख रही थी, 'आवाज कम करो, लैपी बंद कर दो, पिछले छह घंटे से तुमने घर में शोर-शराबा कर रखा है।' पूरे एक हफ्ते से ऑफिस के लंच टाइम में, ऑफिस खत्म होने के बाद, छुट्टी के दिन, पूरी-पूरी रात जाग कर मैंने काउंटर स्ट्राइक गेम खेलना सीखा था। मेरा कुलीग वी. प्रकाश मुझसे तीन हफ्ते से इस गेम में जीत रहा था। मैंने पूरे चौबीस गेम उससे हारे थे। कल किसी भी सूरत में मुझे उसे काउंटर स्ट्राइक गेम में हराना था। वह जीत की कीमत ही नहीं समझती थी। उसे पता था कि हम दोनों की ही टीम के पास कोई नया प्रोजेक्ट नहीं था। हम दोनों ही बेंच पर थे। बेंच पर यानी किसी नए प्रोजेक्ट आने के इंतजार में। यानी कंपनी में ही बेकार की हैसियत से अपना टाइम पास करते रहना। मैंने उसे 'म्यूट' करने की बहुत कोशिश की। लेकिन वह बहुत लाउड हो रही थी। डॉल्बी साउंड की तरह हर कोने से वह मुझे बार-बार लैपी बंद कर देने के लिए दबाव बना रही थी। मेरे कंसोल के बटन ने आखिरी सोल्जर के हाथ में गन थमाई और... आखिरी टेरेरिस्ट बस खत्म होने को था उसने मेरे हाथ से कंसोल छीन लिया। आप समझ रहे हैं? समझ रहे हैं आप... मैं गेम जीत रहा था। और उसने कंसोल छीन लिया। वह लैपी शट डाउन करने के लिए झपटी, उसे म्यूट करने की सारी कोशिश के बीच मैंने... सिर्फ कंप्यूटर में फाइल हटाने का परमानेंट आप्शन यूज किया, शिफ्ट+डिलीट।

जी हाँ। वह मेरा कुलीग था और हम एक ही प्रोजेक्ट पर कम कर रहे थे। सेम डेस्क शेयर करते थे। बात वह कम ही करता था। ज्यादातर तो वह फेसबुक पर ही रहता था। पर हमारे यहाँ तो यह सब नार्मल है। सभी फेसबुक पर चैट करते रहते हैं। हम लोग तो अपने ग्रुप को लंच पर चलने के लिए भी 'व्हॉट्स एप' पर ही बुलाते हैं। अगर किसी को कुछ कहना हो तो भी इंट्रा नेट पर मैसेज देते हैं। वैसे हर डेस्क पर इंटरकॉम है पर जब सभी की चैट ऑन हो तो रिंग कौन करे। बाकी तो मैं उसके बारे में ज्यादा नहीं जानता। उसकी वाइफ से मैं कभी मिला नहीं। वह ज्यादा सोशल नहीं था। वह कभी कंपनी की आउटिंग में भी नहीं आया। बस मुझे तो इतना ही पता है।

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सुदीप मलिक! हाँ मैं उसका बैचमेट हूँ। हम इंडियन टेक्निकल इंस्टीट्यूट में साथ ही पढ़ते थे। पहले मैं और वह एक ही कंपनी में थे। लेकिन फिर मुझे नेट साल्यूशंस में जॉब मिल गई तो मैं यहाँ चला आया। मुझे वैसे भी सॉफ्टवेयर बनाने से ज्यादा नेटवर्किंग में दिलचस्पी थी। फेसबुक पर कभी-कभी वह मेरे स्टेटस लाइक करता था। वैसे कॉलेज में मेरी दोस्ती उससे सेकंड सैम के भी बाद हुई थी। वैसे अच्छा लड़का था लेकिन थोड़ा खब्ती थी। मेरा मतलब... पागल नहीं था। जब वह आया था खूब बातें करता था। खूब मूवी देखने जाते थे। लेकिन धीरे-धीरे वह कंप्यूटर की दुनिया में इतना इनवॉल्व होता गया कि किसी से बात ही नहीं करता था। हमेशा बस कंप्यूटर लैब में ही बैठा रहता था। 'ऊप्स' का तो वह बेहतरीन बंदा था। 'ऊप्स?' ओह ऑपरेटिंग सिस्टम को हम यही बोलते हैं। थर्ड सैम में था हमको यह सब्जेक्ट। हमारी क्लास में ऊप्स का एक बेहतरीन बंदा था शांतनु भट्टाचार्य। वो दोनों शर्त लगा कर लिगो फ्लैग एंड्स खेलते थे। लेकिन सुदीप को तो कोई हरा ही नहीं पाया आज तक। दोनों जब देखो कंप्यूटर लैब में ही रहते थे। शांतनु से दोस्ती के बाद सुदीप भी सबसे कटता चला गया। बस इतना ही जानता हूँ मैं उसे। बाकी कल पेपर में पढ़ा तो पता चला। सैड। अनुप्रिया हमसे दो बैच जूनियर थी। वैसे वो भी खत्री थी पक्का नहीं पता कि उन दोनों की लव मैरिज थी या अरेंज। मुझे शादी का कार्ड नहीं आया था तो मैं गया नहीं था।

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ओह वह 'गीक' मलिक। हम तो उसे इसी नाम से पुकारते थे। एक बार उसने डेटा स्ट्रक्चर के पेपर को फोड़ दिया था। आई मीन ट्वेंटी आउट ऑफ ट्वेंटी लेकर आया था। क्या कमांड थी बंदे की सब्जेक्ट पर। 'कंप्यूटर वर्म' था वह। ऐसे लोगों को गीक कहा जाता है। यू नो टेक्नीकल लैंग्वेज में। कोई नया गेम चाहिए, कंप्यूटर मलिक। कोई नया प्रोग्राम लिखना है, गीक मलिक। किसी प्रोग्रोम को डीकोड करना है, मलिक। यानी हर मर्ज की दवा था मलिक। सॉरी मैं आपको समझा नहीं रहा पर मुझे लगा पुलिस से कुछ भी छुपाना नहीं चाहिए इसलिए मैं आपको एक एक डीटेल दे रहा हूँ। आप हमारे बैच के किसी भी लड़के से पूछिए वह यही कहेगा कि गीक मलिक के हाथ हवा की रफ्तार से कीबोर्ड पर चलते थे। मैंने बिना माउस की मदद कीबोर्ड से काम करना दरअसल उसी से सीखा था। क्या गजब स्पीड थी उसकी कीबोर्ड पर। कभी माऊस को हाथ ही नहीं लगाता था। क्या एक से एक गेम डाउनलोड करता था वो नेट से। उसका लैपी तो भरा रहता था गेम से। साले से मैं कभी भी 'वर्ल्ड ऑफ वॉर क्राफ्ट' गेम नहीं जीत पाया। जब से कॉलेज छोड़ा तब से तो मैंने कंप्यूटर पर कोई गेम खेला ही नहीं है। वैसे वह हेल्पफुल था। जब बेंगलौर में मैंने स्फ्टि सॉफ्टवेयर जॉइन की थी तो तीन-चार दिन मैं उसी के घर पर रुका था। मैंने फेसबुक पर मैसेज पोस्ट किया था कि मुझे दो-तीन दिन रहने की जगह चाहिए। पोस्ट पर उसी ने सबसे पहले रिप्लाय किया और अपने यहाँ रहने का ऑफर दिया था। उसकी वाइफ भी अच्छी थी। पर दोनों में बात कम ही होती थी। मैं जितने दिन उनके साथ रहा वह अपने लैपी पर काम करता रहता था और उसकी वाइफ बरामदे में अकेली बैठी रहती थी तो कभी अकेले शॉपिंग पर निकल जाती थी। बट स्ट्रेंज। लगता नहीं कि सुदीप ने ऐसा किया होगा।

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अरे मेरी तो रोज बात होती थी उससे फेसबुक पर। एक बार मेरी यूएस की फ्लाइट थी। ऑन साइड जा रहा था मैं तीन महीने के लिए। फ्लाइट डिले थी सो मैंने अपने स्मार्ट फोन से ट्वीट किया। कमीना रात के तीन बजे भी अपने लैपी पर लगा हुआ था। तुरंत व्हॉट्स एप पर मैसेज किया, 'जाते ही नए गेम की सीडी भेजियो।' मैंने कहा, देखूँगा तो बोला किसी डीकोडिंग में फँसेगा तो फिर सोच लेना। जब मैंने उससे वादा किया तब जा कर माना कि मेरी मदद करेगा। वैसे हमारे पूरे ग्रुप में कोई भी कहीं फँसता था तो वही हमें उससे निकालता था। कोड क्रेक करने में तो उसका जवाब नहीं था। पर वह किसी का सिर क्रेक करेगा... ओह गॉड मैं तो सोचना भी नहीं चाहता।

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आप रामास्वामी सर से भी मिले थे? गीक मलिक की तो उनसे कभी नहीं पटी। वैसे क्या बताया उन्होंने? सुदीप तो उनको 'पी जीरो प्रोसेसर' कहता था। ओह गॉड। जब उसने रामास्वामी सर को ये नाम दिया था तो हम लोग तो हँसते-हँसते पागल हो गए थे। वह थे भी ऐसे ही। पी वन प्रोसेसर की तरह स्लो। अब तो पी फाइव का जमाना है लेकिन वह अब भी प्रोसेसर वन की तरह ही बिहेव करते हैं। सुदीप को तो पी फाइव की तरह चीजें पसंद थीं। फास्ट। रामास्वामी सर को 'नर्ड' स्टूडेंट पसंद थे। 'नर्ड्स' यानी वही चश्मा लगाने वाले, स्टूडियस से। किताबों के अलावा जिन्हें कुछ सूझता ही नहीं। जो हॉस्टल के कमरे से लेक्चर रूम में और लेक्चर रूम से हॉस्टल आ जाते हैं। हमारे हॉस्टल में तो नर्ड्स और गीक दोनों के अलग-अलग ग्रुप थे। नर्ड्स चिरकुटों की दुनिया हमेशा बायनरी में ही चलती थी। बायनरी यानी जीरो-वन। यानी यस या नो। यानी कम पढ़ाई या ज्यादा पढ़ाई। मैं आपको बोर तो नहीं कर रहा न? मुझे लगा डीटेलिंग देने से आपको शायद ज्यादा मदद मिले। मैं आपको एक मजेदार किस्सा सुनाता हूँ, एक बार ऐसे ही एक नर्ड की हम रैगिंग ले रहे थे। हमने उससे कहा, गाना सुनाओ, उसने कहा नहीं आता। हमने कहा, अच्छा डांस कर के दिखाओ, उसने कहा नहीं आता। हमने कहा, कोई फिल्म का डायलॉग ही सुना दे, पता है वह क्या बोला? 'मैंने आज तक कोई फिल्म देखी ही नहीं।' तब हमने कहा चल जो तेरे को आता है वोई कर दे। तो उसने एक पीजे (पूअर जोक) मारा। हमने पूछा, ये कहाँ सुना बे। तो बोला, 'मैथ्स टुडे में छपा था सर।' सुदीप हँसा और बोला साला 80.85 माइक्रोप्रोसेसर तू तो हमेशा पी जीरो प्रोसेसर का प्यारा रहेगा रे। और बताऊँ हुआ भी यही। अभी तो उसने एक मस्त नया टैब खरीदा था। उसका प्लान था, आई फोन-5 लॉन्च होते ही वह उसे भी खरीद लेगा। ही इज क्रेजी अबाउट गैजेट्स।

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देखिए सर, जहाँ तक सुदीप मलिक की बात है वह हमारे और एंपलॉई जैसा ही था। हमारे यहाँ लगभग सात हजार एंपलॉई हैं। हम किसी भी एंपलॉई का उतना ही रेकॉर्ड रखते हैं जितना जरूरी होता है। बाकी की पसर्नल लाइफ से हमें क्या करना है सर। हमारी कंपनी साढ़े सात एकड़ में फैली है। लश ग्रीन कैंपस। पूरे बेंगलौर में इससे अच्छा कैंपस किसी कंपनी का नहीं है। हमने यहाँ एंपलॉइज के लिए सारी सुविधाएँ दी हुई हैं सर। यहाँ स्वीमिंग पूल है, इनडोर गेम फेसेलिटी है, कैंटीन हैं, एक शानदार कैफेटेरिया है, जिम है, योगा सेंटर है, थिएटर है... आप यह मत सोचिए मैं कंपनी का प्रचार कर रहा हूँ। लेकिन आप मेरे साथ चलिए, मैं आपको दिखाता हूँ। हर फ्लोर पर टी-कॉफी मशीन्स हैं, पूरी बिल्डिंग सेंट्रली एयरकंडीशंड है। यहाँ तक की टॉयलेट और कॉरीडोर भी। हर डेस्क पर एपल मैक सिस्टम हैं सर। सभी को कंपनी की तरफ से लैपी भी दिए गए हैं। ताकि वक्त पड़ने पर ये लोग वर्क एट होम कर सकते हैं।

लेकिन फिर भी सर ये टैकीज सिवाय कैंटीन में जाने के और कहीं नहीं जाते। हमारे डायरेक्टर सर कई बार एड्रेस कर चुके हैं सर कि सब अपना काम खत्म कर वक्त पर घर जाएँ। लेकिन ये लोग देर रात यहीं रहते हैं सर। कहते हैं, कंपनी का प्रोजेक्ट है, डेडलाइन पास में है इसलिए प्रोग्राम लिख रहे हैं। पर मैं एक बात बताऊँ सर अगर ये लोग चाहें न तो सुबह नौ से शाम छह बजे तक आराम से काम कर सकते हैं। लेकिन करते ही नहीं हैं। इन लोगों को न सर कंप्यूटर पर बैठे रहने की लत लग गई है। मस्त एसी में बैठते हैं, दिन भर आमंड, लैमन, तुलसी फ्लेवर की चाय पीते हैं और रात को खूब गेम और फिल्में डाउनलोड करते रहते हैं। यहाँ 5 एमबीपीएस की स्पीड से डेटा ट्रांसफर कर सकते हैं सर! 5 एमबीपीएस! घर पर ये सुविधा कहाँ मिलेगी सर। सर्वर वालों ने कई बार शिकायत भी की है कि पूरा लैन सिस्टम गेम और फिल्मों से भर जाता है, पर इन लोगों से पूछे कौन। इनका टीम लीड भी यही सब करता रहता है तो अपनी टीम से क्या कहेगा। यदि किसी के पास फॉरेन क्लाइंट का असाइनमेंट है तो वह तो रुकेगा पर उसके साथ दो-चार ऐसे ही फालतू में रुक जाते हैं। अब वो मिस्टर मलिक के बारे में तो आप उसकी टीम के लीडर से पूछेंगे तो ज्यादा पता चलेगा सर।

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मैं उस कॉलेज में डेटा स्ट्रक्चर पढ़ाता था। अभी तीन साल पहले ही रिटायर्ड हुआ हूँ। मुझे अफसोस है कि हम अपने छात्रों को सिस्टम आपरेट करना तो सिखाते हैं लेकिन सिस्टम भी उन्हें ऑपरेट करेगा यह सिखाने की हमारे पास कोई व्यवस्था नहीं है। हमारे कॉलेज की शानदार बिल्डिंग है, बड़ा खेल का मैदान है। इनडोर-आउटडोर दोनों तरह के गेम के लिए अच्छी सुविधाएँ हैं। फिर भी मैदान खाली पड़े रहते हैं। ज्यादातर स्टूडेंट भारी परदों से ढकी उस कंप्यूटर लैब में अपना समय गुजारते हैं, जहाँ पता ही नहीं चलता कब दिन ढला, कब बारिश हुई, कब खूबसूरत शाम बीत गई। लैब में हर स्टूडेंट अपनी दुनिया में गाफिल है। उसे अपने आस-पड़ोस से भी कुछ लेना देना नहीं है। कॉलेज के चारों हॉस्टल वाई-फाई हैं। रही-सही कसर यहाँ पूरी हो जाती है। कंप्यूटर स्क्रीन के अलावा वे दुनिया को किसी और माध्यम से समझना ही नहीं चाहते।

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रोबोट इनसानों की तरह बनाए जा रहे हैं और इनसान रोबोट बनता जा रहा है। रोबोट इनसान की तरह लगें इसके लिए दुनिया भर में नए-नए प्रयोग चल रहे हैं। एक मनोचिकित्सक की हैसियत से मैं जो सोचता हूँ वह यही है कि मशीनों के बीच रहना, मशीनों के बीच ही खाना, उन्हीं के कल-पुर्जों से गपशप करना वहीं सो जाना ही ऐसी समस्या की जड़ है। एक युवा कंप्यूटर इंजीनियर ने जब अपनी पत्नी की हत्या कर दी तो हम सब जागे हैं। यह मामला ठंडा हो जाएगा और हम फिर अपने-अपने काम में इस किस्से को भूल जाएँगे। आप किसी और कार्यक्रम की एंकरिंग में व्यस्त हो जाएँगी। अखबार किसी और विषय पर फीचर या खबर लिखेंगे और हमारी बातों को चार लाइन के कोट में खत्म कर दिया जाएगा। लेकिन मूल समस्या तब भी वहीं की वहीं रहेगी। कोई समझना ही नहीं चाहता कि समस्या की जड़ कहाँ है। कार्ल मार्क्स चाहते थे कि समाज डी-क्लास हो। पर ये कंप्यूटर की दुनिया ने तो क्लास क्या सामाजिकता ही खत्म कर दी है। और...

आप देख रहे थे हमारी विशेष पेशकश, मशीनी मानव (!) हमारे स्टूडियो में थे प्रसिद्ध मनोविज्ञानी प्रकाश दलाल और इंडियन टेक्निकल इंस्टीट्यूट के प्रोफेसर जी.के. बक्षी। हम यहाँ लेंगे छोटा सा ब्रेक और ब्रेक के बाद जुड़ेगे सीधे बेंगलौर से जहाँ हमारे संवाददाता बताएँगे सुदीप मलिक केस की आज की छानबीन के बारे में। जाइएगा नहीं... हम बस अभी हाजिर हुए।

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आपको जिसने भी कहा है कि मेरा उससे अफेयर था। बिलकुल गलत कहा है। हाँ, वह मुझे अच्छा लगता था। वह और लड़कों की तरह लड़कियों से फ्लर्ट नहीं करता था न ही उन्हें कॉफी पीने के लिए इनवीटेशन देता फिरता था। मेरे मन में उसके लिए सॉफ्ट कॉर्नर था। बेंगलौर शिफ्ट होने से पहले वह पूना में ही मेरी कंपनी में जॉब करता था। लेकिन तब तक मैं उससे बात करना बंद कर चुकी थी। कैंपस सिलेक्शन में उसका और मेरा सिलेक्शन एक साथ एक ही कंपनी में हुआ था। लेकिन बाद में उसे बेंगलौर में अच्छा ऑफर मिला तो वह वहाँ चला गया। कॉलेज की बात अलग थी। फिफ्थ सैम के तुरंत बाद की बात है, सैम ब्रेक में वह घर नहीं जा रहा था। मैंने भी तीन दिन बाद का रिजर्वेशन लिया था। मुझे लग रहा था शायद फोर्थ सैम में मेरा एक पेपर रुक जाएगा। इसलिए रिजल्ट देखने के लिए मैं रुक गई थी। टाइम पास के लिए मैं उसके साथ वर्ल्ड ऑफ वॉर क्राफ्ट खेल रही थी। इस गेम में खूब सारे फाइटर्स होते हैं। आपको जितने ज्यादा पॉइंट मिलते जाएँगे आप उतने ही ज्यादा वैपन ले सकते हैं। जिसके पास ज्यादा वैपन, जाहिर सी बात है वो गेम जीत जाएगा। हम दोनों मजे-मजे में वह गेम खेल रहे थे। मैं गेम जीत रही थी। जैसे ही मेरे एट पॉइंट हुए मैं उठ गई। यह सोच कर कि बहुत देर से कमरे में बैठे हैं। लेकिन वह अचानक मुझ पर झपट पड़ा। मैं बुरी तरह डर गई। उसने मुझसे कहा मैं तब तक कमरे से बाहर नहीं जा सकती जब तक वह यह गेम दोबारा खेल कर जीत नहीं जाता। मुझे कमरे में घुटन हो रही है, मैंने कहा। लेकिन उसने मुझे नहीं जाने दिया। उसके कमरे में हमेशा गहरे रंग के परदे खिंचे रहते थे। वह अक्सर अपने कमरे में ही रहता था। मैं भागना चाहती थी। पर उसने मेरी एक नहीं सुनी। मैंने जल्दी से जानबूझ कर वह गेम हारा और दौड़ती हुई वहाँ से निकल गई। उसके बाद मैं उसके कमरे में कभी नहीं गई न मैंने उससे बात की। मुझे लगता था कि वह मुझसे प्यार करता है, क्योंकि पूरी क्लास में वह सिर्फ मुझ से ही बात करता था। लेकिन धीरे-धीरे मैंने समझा वह बस अपने कंप्यूटर से ही प्यार कर सकता है। लैन सिस्टम से मूवी कॉपी करना और देखना, नए गेम डाउनलोड करना और नए प्रोग्राम लिखना बस वह इसके अलावा कुछ करना नहीं चाहता था। वह लाइब्रेरी से कभी बुक इशू नहीं कराता था। हमेशा ई-बुक डाउनलोड कर के ही पढ़ता था। एक बार वह क्लास में नोट्स की कॉपी के पन्ने पलटने के बजाय उसे उँगली से स्क्रोल कर रहा था। वह अपनी कॉपी के साथ टच पैड की तरह बर्ताव कर रहा था। तब मैं समझ गई की इससे दूर रहना ही ठीक है। जब मैं उससे कुछ कहना चाहती थी, तो वह कहता था, अभी मुझे बिलकुल डिस्टर्ब मत करो।

अक्सर हमारी लड़ाई हो जाया करती थी। मैं कहती थी, जब देखो यह प्लास्टिक पीटा करते हो। स्क्रीन से सिर उठा कर कभी मेरी शक्ल भी देख लिया करो। अरे मैं तुमसे बोल रही हूँ। सुन रहे हो। मैं बक नहीं रही। जब देखो लैपटॉप में सिर दिए बैठे रहते हो। लेकिन उसे कोई फर्क नहीं पड़ता था। धीरे-धीरे मैंने उससे बात करना कम कर दी लेकिन उसने कोई परवाह नहीं की। मुझे आश्चर्य हुआ था जब मैंने सुना था कि वह शादी कर रहा है। अनुरीता हमारी जूनियर थी। बहुत ही हँसमुख लड़की थी। उसे बाहर घूमना, लोगों से बात करना, दोस्ती करना पसंद था। सुदीप इसके बिलकुल उलट था। मुझे आश्चर्य होता है कैसे अनुरीता सुदीप के झांसे में आ गई और शादी कर ली। अनुरीता कई बार अपनी कुलीग को बताती थी कि कैसे सुदीप पूरा-पूरा दिन कमरे से बाहर नहीं निकलता। कैसे वह उसे हमेशा इग्नोर करता है। मुझे यह सब इसलिए मालूम है क्योंकि मैं उसकी कुलीग को जानती हूँ। मुझे कोई आश्चर्य नहीं कि उसने बेसबॉल बैट से अनुरीता का सिर फोड़ दिया। फिर उसके टुकड़े कर डीप फ्रीजर में बंद कर ताला लगा कर चल दिया। और अपने स्मार्ट फोन से फेसबुक पर मैसेज पोस्ट करता रहा, ट्वीट करता रहा। वह इतना बेरहम, वहशी हो सकता है। बिलकुल हो सकता है।

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तमाम बयानों, गवाहों, सबूतों और मुजरिम के इकबालिया बयान से यह सिद्ध होता है कि मुलजिम सुदीप मलिक ने ही अपनी पत्नी अनुरीता सिंह की बेसबॉल बैट से हत्या की और उसके छोटे-छोटे टुकड़े काट कर प्लास्टिक में बाँध कर उन्हें डीप फ्रीजर में रख दिया। मुलजिम के मेडिकल परीक्षण में ऐसी कोई मानसिक बीमारी का लक्षण दिखाई नहीं दिया जिससे उसकी सजा में कमी की जाए। सिवाय इसके कि उसे कंप्यूटर पर खेले जाने वाले हिंसक खेल खेलने की लत है। जिसमें उसे किसी की भी दखलंदाजी ना-काबिले बर्दाश्त है। मुलजिम समाज से बिलकुल कट चुका है और उसे अपने किए पर कोई पछतावा भी नहीं है। उसने इस कत्ल में जिस बेरहमी का परिचय दिया है वह क्षमा योग्य नहीं है। लिहाजा कोर्ट इस नतीजे पर पहुँची है कि उसे ताजीराते हिंद दफा 302 के तहत फाँसी की सजा दी जाती है।

उसका ध्यान जज की बात सुनने के बजाय कोने में लटक रही मकड़ी पर अटका था। मकड़ी लटक कर छत पर जाती और फिर झूल कर दोबारा छत पर पहुँच रही थी। जितनी बार मकड़ी ऐसा करती उतनी बार उसकी ऊँगलियाँ टेबल पर एक विशेष अंदाज से ऊपर या नीचे ऊठ रही थीं। इस करतब से महीन तारों का एक छोटा सा जाला दीवार पर हल्की रोशनी में चमकी रहा था। किसी की भी ओर बिना देखे उसने कहा, 'वर्ल्ड वाइड वेब।'


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