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कविता

कभी-कभी
संजीव ठाकुर


कभी-कभी
मन करता है
लौटा लूँ वह धारा
जो मेरी धमनियों से होकर बही है
और पा लूँ वह खुशी
जो कभी
मेरे कदमों में झुकी रहती थी।

कभी-कभी मन करता है
सारी शिकवा-शिकायत
ताख पर रखकर
करने लग जाऊँ फिर से तुमसे प्यार,
बहा दूँ
तुम्हारे फेंके सारे पत्थर
गंगा में।

कभी-कभी मन करता है
पड़ा रहूँ
अपने ही हाल पर।
 


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