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किशोरीलाल गोस्वामी
गरिमा श्रीवास्तव

अनुक्रम 3. अध्याय दो : किशोरीलाल गोस्वामी का उपन्यास संसार पीछे     आगे

हिंदी के प्रारंभिक उपन्यासकारों में किशोरीलाल गोस्वामी अग्रणी हैं। गोस्वामी जी ने उस समय उपन्यास लेखन प्रारंभ किया, जिस समय हिंदी में उपन्यास लेखन के नाम पर अनुवाद हो रहा था, उस समय वे मौलिक उपन्यासों के साथ इस क्षेत्र में आए। उन्होंने लिखा - 'बड़े क्षोभ का विषय है कि हिंदी के रसिकों के अभाव के कारण हिंदी-भाषा में भी अभी तक उपन्यास का पूरा अभाव ही समझा जाना चाहिए। उसका एक यह भी प्रमाण हो सकता है कि आज तक हमने दस-पंद्रह उपन्यास हिंदी में लिखे हैं, पर दो-एक के अतिरिक्त अभी सब के सब पड़े हैं।' किशोरीलाल गोस्वामी के इस वक्तव्य से स्पष्ट है कि वे सोद्देश्य ही उपन्यास-लेखन में प्रवृत्त हुए थे, यद्यपि उन्होंने नाटक और काव्य विधा में भी अपनी कलम चलाई लेकिन उपन्यास के क्षेत्र में उनका विशेष मन रमा और उन्होंने छोटे-बड़े लगभग 65 उपन्यास लिख डाले। किशोरीलाल गोस्वामी को हिंदी में ऐतिहासिक रोमांसों की परंपरा का जन्मदाता माना जाता है। इन्होंने लगभग 12 ऐतिहासिक रोमांसों की रचना की थी। (1.) हृदयहारिणी वा आदर्श रमणी (1890); (2.) लवंगलता वा आदर्शबाला (1890); (3.) गुलबहार वा आदर्श भ्रातृ प्रेम (1902); (4) तारा वा क्षात्र कुल कमलिनी (1902);(5.) कनक कुसुम वा मस्तानी (1904);(6.) हीराबाई वा बेहयायी का बोरका (1904); (7.) सुलताना रज़िया बेगम वा रंग महल में हलाहल (1904); (8.) मल्लिका देवी वा बंग सरोजिनी (1905); (9.) लखनऊ की कब्र वा शाही महलसरा (1906-1916); (10.) सोना और सुगंध वा पन्नाबाई (1909); (11.) लाल कुँवर वा शाही रंगमहल (1909) तथा (12 .) गुप्त गोदना (1922-23)

गोस्वामी जी को प्रेमचंद पूर्व उपन्यासकारों में एकमात्र ऐसा उपन्यासकार माना गया, जिनकी कृतियों में एक साथ अनेक औपन्यासिक प्रवृत्तियों के रंग मिलते हैं - उनके उपन्यासों में सामाजिकता, आदर्शवादिता, ऐतिहासिकता, कल्पनाशीलता के साथ तिलिस्म और ऐयारी का मायाजाल भी मिलता है। ''ऐतिहासिक उपन्यासों में वे ऐतिहासिक तथ्यों के साथ-साथ कल्पनाशीलता को समन्वित करते चलते हैं तो सामाजिक उपन्यासों में वे यथार्थ के साथ-साथ मनोवैज्ञानिक डोर को थामते हुए काल्पनिक छटाएँ भी बिखेरते चलते हैं'' (हिंदी के निर्माता, कुमुद शर्मा; प्रकाशक भारतीय ज्ञानपीठ : 76)।

गोस्वामीजी के उपन्यासों को ब्रजरत्नदास ने तीन श्रेणियों-तिलिस्मी, ऐतिहासिक तथा सामाजिक-में विभक्त करते हुए लिखा है - ''इनके ऐतिहासिक उपन्यासों में नाम-मात्र को इतिहास का आधार लिया गया है और वे वास्तव में किसी शुद्ध ऐतिहासिक घटना को लेकर नहीं चले। इनके सामाजिक उपन्यास भी इसी प्रकार रोमांचकारी घटनाओं तथा साधारण वासनामय प्रेम को लेकर ही निर्मित हुए हैं और वे कोई शुद्ध सामाजिक तथ्य या उद्देश्य को लेकर नहीं लिखे गए हैं। इनके उपन्यासों में कुछ तिलस्मी करामात तथा साधारण ऐयारी का भी समावेश हुआ है। तात्पर्य यह है कि इनके उपन्यासों में कोरा घटना घटाटोप ही नहीं है, प्रत्युत कुछ अच्छे चित्ताकर्षक वर्णन भी हैं। कुछ चरित्रचित्रण का भी प्रयास तथा समाज के वासनामय सजीव चित्र भी हैं। यद्यपि गोस्वामी जी ने नायक-नायिकाओं के प्रेम, उनके मिलन की बाधाओं तथा अंत में मिलनेवाली पुरानी परंपरा ही को प्रधान रूप से ग्रहण किया है पर तब भी यह उसके बाहर विस्तृत संसार के अन्य वर्ण्य वस्तुओं की ओर भी झुके हैं और इनका समावेश भी अपने उपन्यासों में इतस्ततः किया है पर वह गौण ही रह गया है।

गोस्वामीजी ने जिस प्रेम का विवरण प्रायः अपने सभी उपन्यासों में दिया है वह शुद्ध सात्विक प्रेम नहीं है जो सारी सृष्टि का पोषक तथा सभी उच्च साहित्य तथा कलाओं का प्राण है। इनका प्रेम आसक्ति-वासना की निम्नतम कोटि तक पहुँच गया है और इसी का इन्होंने शोख रंगों में चित्रण किया है। इनकी नायिकाओं में से एक भी कुलवधू के उच्च संयत तथा शुद्ध प्रेम को नहीं पहुँच सकी है प्रत्युत ऐसा ज्ञात होता है कि वे वास्तविक प्रेम को जानती ही नहीं। उनमें यौवनकालीन अदमनीय तथा उच्छृंखलता वासनामय आसक्ति मात्र है जो दूसरों को केवल आकर्षित कर सकती है। उनमें स्थायित्व हो नहीं सकता। ऐसे वर्णनों का नवयुवक पाठकों पर अच्छा प्रभाव नहीं पड़ता। गोस्वामीजी ने न मालूम किस अशुभ साइत में किस कुविचार से चपला लिखना आरंभ किया था कि वह ऐसी बन पड़ी है कि सभी उसकी ओर संकेत कर उसे अपठनीय बतला देते हैं। गोस्वामीजी को अपने समय के समाज का, भला या बुरा, पूरा ज्ञान तथा अनुभव था और वह सभी में सम्मिलित भी होते थे इसलिए इन्होंने उसका वर्णन बहुत अच्छा किया है पर निम्न पक्ष ही का विशेष रूप से। बातचीत कथापकथन में वह स्वयं अत्यंत पटु थे और बनारसी बोली में उनकी बातचीत अत्यंत सरस तथा वक्रतावूर्ण होती थी। ऐसी अवस्था में इनको अपने उपन्यासों के कथोपकथन में बहुत सफलता मिली है।

ऐतिहासिक उपन्यासों के लिखने में कोरा इतिहास-ज्ञान ही अपेक्षित नहीं है। इतिहास केवल सुशृंखलित रूप में घटनाक्रम, वंशपरंपरा आदि का विवरण उपस्थित करता है और उपन्यास में केवल इतने ज्ञान से काम नहीं चलता। उपन्यास के पात्र सजीव, चलते-फिरते, दुख-सुख उठाते हुए चित्रित करने पड़ते हैं, जिससे उनके समय के खान-पान, वस्त्र व सवारी आदि का उनकी सामाजिक स्थिति के अनुकूल ज्ञान रखन बहुत आवश्यक हो जाता है। इस सबके लिए तत्कालीन अनेक ग्रंथों का अध्ययन विशेष परिश्रम-साध्य है और इसका गोस्वामीजी में नितांत अभाव है। यही कारण है कि इनके ऐतिहासिक उपन्यास असफल रहे। कह सकते हैं कि इनमें नाम मात्र इतिहास से लिए गए हैं पर वे ऐतिहासिक नहीं हैं।''

यह टिप्पणी गोस्वामी जी के साहित्य को परखने की भोथरी दृष्टि की परिचायक है। दरअसल जिस समय गोस्वामी जी उपन्यास लेखन के क्षेत्र में आए उस समय सिर्फ देवकीनंदन खत्री ही ऐसे रचनाकार थे, जिन्होंने उपन्यास लेखन को अति-गंभीरता से लिया था। खत्री जी और किशोरीलाल गोस्वामी दोनों ही उपन्यास के पाठकों के निर्माण का कार्य कर रहे थे। खत्री जी द्वारा संपादित 'उपन्यास लहरी' और गोस्वामी जी का 'उपन्यास' शीर्षक मासिक पत्र इस दिशा में चिंतन के परिणाम थे। 'उपन्यास' शीर्षक मासिक पत्र में वे उपन्यासों का धारावाहिक प्रकाशन किया करते थे। उपन्यासों की ओर आकर्षित करने का उनका अपना ही ढंग था। 'उपन्यास' को मासिक पुस्तक कहते हुए वे उपन्यासों का विज्ञापन करते थे। मसलन 1890 में प्रकाशित 'लवंगलता वा आदर्शबाला' तथा 'हृदयहारिणी वा आदर्शरमणी' के संदर्भ में उन्होंने जो विज्ञप्ति निकाली वह इस प्रकार है -

''...जिन उपन्यास-प्रेमियों को इस ''मासिक पुस्तक का ग्राहक होना हो, वे शीघ्र ही दो रुपये भेज कर ग्राहक बन जाएँ। और जो नमूना देखना चाहें, वे चार आने का टिकट भेजें। हाँ इतना ध्यान रहेगा कि जो महाशय चार आने भेज कर नमूना मँगावेंगे वे यदि पीछे ग्राहक हो जाएँगे, तो उनसे चार आने मुजरे देकर पौने दो रुपये ही लिए जाएँगे। वी.पी. का खर्च एक आना ग्राहकों को ही देना होगा। हाँ, डाक महसूल कुछ नहीं लगेगा। इस विषय की चिट्ठी-पत्री आदि नीचे लिखे ठिकाने से भेजना चाहिए।

श्री किशोरीलाल गोस्वामी
संपादक ''उपन्यास मासिक-पुस्तक
श्री सुदर्शन प्रेस'' वृंदावन (मथुरा) यू.पी.''

इसी तरह 'माधव-माधवी वा मदन-मोहिनी' के मुखपृष्ठ के पीछे छपी विज्ञप्ति में यह बताया गया है कि 'उपन्यास' मासिक पुस्तक क्या है? रंगीले, सजीले, भड़कीले, चटकीले, अनूठे, अनोखे जानदार और शानदार बेजोड़ उपन्यासों की यह बहुत पुरानी और बढ़िया मासिक पुस्तक है जो लगभग पिछले सोलह बरसों से निकल रही है। इस मासिक पुस्तक में हर महीने चुहचुहाते और फड़कते हुए चित्र-विचित्र घटनाओं से भरे हुए नए-नए उपन्यास छपा करते हैं जिनका हर पेज दिलचस्पी, तर्बीयतदारी, रोचकता और मनोहरता से लबालब भरा रहता है।'' (माधव-माधवी-वा मदनमोहिनी, दूसरा सं. 1916, पृ. 175)

'प्रणयिनी परिणय' गोस्वामी जी का पहला उपन्यास था जो 1887 में लिखा गया परंतु 1890 में प्रकाशित हो पाया। सुदर्शन प्रेस, वृंदावन से किशोरीलाल गोस्वामी ने अपने 32 उपन्यासों का मुद्रण किया जिनकी कीमत डिमाई अठपेजी आकार के 24 से 28 पृष्ठों की दो आने, 100 पृष्ठों तक के उपन्यास की आठ आने तथा 450 पृष्ठों तक के उपन्यास की दो रुपये रखी गई। पाठकों की सुविधा के लिए 32 उपन्यासों (लगभग पाँच हजार पृष्ठ) के सेट का मूल्य मात्र 26 रुपये 3 आने रखा गया। आगे चलकर 1909 के आस-पास कानूनी अड़चनों के कारण उपन्यास मासिक पुस्तक बंद हो गई। 1913 में वृंदावन मथुरा में 'स्वकीय प्रेस' की स्थापना कर उन्होंने अपने उपन्यासों का पुनर्मुद्रण प्रारंभ किया। 1915 ई. में 'उपन्यास मासिक' का प्रकाशन फिर से शुरू हुआ। 'उपन्यास मासिक' लगभग 40 पृष्ठों की पत्रिका थी। डाक व्यय सहित इसका वार्षिक शुल्क मात्र दो रुपये था। उसमें उपन्यास निरंतर धारावाहिक रूप में छपते रहते थे। ज्ञानचंद जैन के अनुसार, 'उनके इस पत्र ने ग्राहकों को दो रुपये में घर बैठे 480 पृष्ठों के उपन्यास सुलभ कर के उपन्यास को हिंदी की सब से लोकप्रिय विधा बना देने में महत्वपूर्ण योगदान किया। उनके बहुत से बहुचर्चित उपन्यास इसी पत्र में धारावाहिक रूप में छपे।

किशोरीलाल गोस्वामी की रुचि इतिहास में थी, रचना में कल्पना और इतिहास का सम्मिश्रण करना उनका रचनात्मक वैशिष्टय था, इस संबंध में अपने दृष्टिकोण को स्पष्ट करते हुए इन्होंने लिखा है, ''हमने अपने बनाए उपन्यासों में ऐतिहासिक घटना को गौण और अपनी कल्पना को मुख्य रक्खा है; और कहीं-कहीं तो कल्पना के आगे इतिहास को दूर ही से नमस्कार कर दिया है।'' अधिकांश उपन्यासों का संबंध मुस्लिम शासन-काल से है। गुलाम वंश की सुल्ताना रज़िया (तेरहवीं शताब्दी) से लेकर नवाबों के पतन तक के लेखक क्योंकि मुसलमान थे; अतः गोस्वामी जी का विचार था कि उन्होंने अपनी जाति के शासकों के पक्ष में हिंदुओं को नीचा दिखाने के लिए घटनाओं को तोड़ा-मरोड़ा है और अनेक प्रकार की काल्पनिक तथा झूठी कथाएँ गढ़कर भर दी है। इसी से इन्होंने योरोपीय लेखकों की सामग्री से सहायता लेने का निश्चय किया। लेकिन दूसरों पर आरोप लगाना जितना सरल है, स्वयं निष्पक्ष रहकर काम करना उससे भी अधिक कठिन। कहने का तात्पर्य यह कि गोस्वामी जी ने ऐतिहासिक घटनाओं का अपने संस्कारों के अनुरूप ढालने में काम प्रयत्न नहीं किया है। हिंदुओं पर कुछ मुसलमान शासकों के अत्याचार से किसका मन क्षुब्ध नहीं होता? इनमें से कुछ लोग स्वभाव से विलासी थे। दूसरी ओर राजपूतों की वीरता और उनके चरित्र की उच्चता में भी किसी को संदेह नहीं है। लेकिन गोस्वामी जी ने बादशाहों और नवाबों की लंपटता, क्रूरता और कायरता तथा उनकी बेगमों और बाँदियों की विलासिता, चरित्रहीनता और छल-कपट का जैसा वर्णन किया है, वह निश्चित रूप से अन्यायपूर्ण और अतिरंजित है। मुस्लिम संस्कृति के किसी शुभ पक्ष की ओर इनकी दृष्टि गई ही नहीं। साथ ही इनके उपन्यासों में कहीं-कहीं काल-दोष भी पाया जाता है। पंडितराज जगन्नाथ सत्रहवीं शताब्दी के कवि थे और शाहजहाँ के शासन-काल में जीवित थे, यहाँ तक कि 'पंडितराज' की उपाधि उन्हें शाहजहाँ से ही प्राप्त हुई थी; लेकिन किशोरीलाल गोस्वामी ने उन्हें अपने उपन्यास 'सोना और सुगंध वा पन्नाबाई' में अकबर के दरबार में दिखाया है।

बीसवीं शताब्दी के पहले दशक में लगभग 26 उपन्यास लिखे, जिनमें ग्यारह ऐतिहासिक, आठ सामाजिक, दो तिलिस्मी-ऐयारी, तीन जासूसी तथा दो अनुवाद थे। उनके बारह निम्नलिखित बहुचर्चित सामाजिक तथा ऐतिहासिक उपन्यासों का प्रकाशन 'उपन्यास मासिक पुस्तक में धारावाहिक रूप में हुआ -

1. कुसुमकुमारी 2. राजकुमारी 3. लीलावती 4. चपला 5. माधवी-माधव 6. तारा 7. सुल्ताना रज़िया बेगम 8. हृदयहारिणी 9. लवंगलता 10. मल्लिका देवी 11. पन्नाबाई 12. लखनऊ की कब्र

गोस्वामी जी द्वारा लिखे गए ऐतिहासिक उपन्यासों में 'तारा वा क्षात्रकुल कमलिनी' बहुचर्चित उपन्यास था। इससे पहले वे चार छोटे और मँझोले ऐतिहासिक उपन्यास लिख चुके थे। 'तारा' के निवेदन में उन्होंने ऐतिहासिक उपन्यास लेखन के संबंध में दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हुए लिखा - ''जैसे 'इतिहास की मूल भित्ति सत्य है, वैसे ही 'उपन्यास की मूल भित्ति कल्पना है।' सत्य घटना बिना जैसे इतिहास 'इतिहास' नहीं, वैसे ही योग्य कल्पना बिना उपन्यास भी 'उपन्यास' नहीं कहला सकता। इतिहास में जैसे वास्तविक घटना बिना काम नहीं चलता, वैसे ही उपन्यास में भी कल्पना का आश्रय लिए बिना प्रबंध नहीं लिखा जा सकता। ऐसी अवस्था में 'ऐतिहासिक' उपन्यास लिखने के लिए इतिहास के सत्यांश के साथ तो कल्पना की थोड़ी ही आवश्यकता पड़ती है।'' आगे वे लिखते हैं 'पर जहाँ इतिहास की घटना जटिल, सत्याभास मात्र और कपोल कल्पित भासती है, वहाँ लाचार हो, इतिहास को बाँधकर कल्पना ही अपना पूरा अधिकार फैला लेती है।' उनका तर्क था कि यदि लेखक को ऐतिहासिक सत्य जटिल और कल्पित लगे तो उसे इतिहास का दामन छोड़ कर अपनी कल्पना का पूरा साम्राज्य फैला लेने का अधिकार है।

गोस्वामी जी ने 'तारा वा क्षात्र कुल-कमलिनी के निवेदन में बता दिया कि उन्होंने ऐतिहासिक घटना को 'गौण' और कल्पना को 'मुख्य' रक्खा है और कहीं-कहीं तो कल्पना के आगे 'इतिहास' को दूर से ही नमस्कार भी कर दिया है। इस उपन्यास का प्रकाशन सन 1902 में हुआ और इसके तीन संस्करण छपे। आलोचकों ने 'तारा' पर 'लंदन रहस्य' के लेखक रेनाल्ड साहब के उपन्यास की गहरी छाया मानी थी। उपन्यास का कथानक इस प्रकार है-तारा जोधपुर के महाराज गजसिंह के पुत्र राणा अमरसिंह की पुत्री थी। गजसिंह ने किसी बात पर अप्रसन्न होकर जब अमरसिंह को राज्य से निकाल दिया, तो वे शाहजहाँ से मिले और उसके विश्वासपात्र बन गए। यह बात बादशाह के खजाँची सलावतखाँ को बुरी लगी और वह उससे ईर्ष्या करने लगा। शाहजहाँ की संतानों में राजनीतिक दाँव-पेच चलने वालों में एक ओर औरंगजेब और रोशनआरा थे, दूसरी ओर दारा की सहेली थी। पिता ने उसका विवाह उदयपुर के युवराज राजसिंह के साथ निश्चित कर दिया था। लेकिन उसके रूप के कारण दारा और सलावतखाँ दोनों ही उसे अपने अधिकार में करना चाहते थे। तारा अपनी सहेली रंभा की सहायता से आगरे के किले से निकल भागने का प्रयत्न करती है। सलावतखाँ इसमें बाधा पहुँचाता है। सहसा सलावतखाँ की हत्या भरे दरबार में अमरसिंह के हाथ से होती है। उसी घटना में अमरसिंह भी मारे जाते हैं। अंत में राजसिंह तारा का उद्धार करते हैं और दोनों विवाह के सूत्र में बँध जाते हैं।

यह उपन्यास ऐतिहासिक घटनाओं पर आधारित है। गोस्वामी जी ने टाड के 'राजस्थान' के अतिरिक्त योरोपीय इतिहासकारों और लेखकों से अपने उपन्यास के लिए सामग्री जुटाई है। रोशनआरा और जहानआरा दोनों ही, राजनीति की बागडोर को अपने हाथ में लेने के लिए कूटनीति से काम लेती हैं। वे शक्ति की उपासिका ही नहीं, विलास की पुतलियाँ भी हैं और नौकरों तक से प्रेम प्रदर्शित करने में संकोच का अनुभव नहीं करतीं। आगरे का किला, राजनीति का ही नहीं, भोग-विलास और प्रणय की चंचल क्रीड़ाओं का भी अखाड़ा बना हुआ है। उपन्यास के कथानक में जासूसी और ऐयारी के लिए भी लेखक ने अवकाश निकाल लिया है।

इतिहास के इस अंश को लेकर बंगला के प्रसिद्ध उपन्यासकार बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने भी थोड़े हेर-फेर के साथ 'राजसिंह' नाम से एक ऐतिहासिक उपन्यास की रचना की थी जिसका प्रकाशन गोस्वामी जी के उपन्यास से बहुत पहले सन 1882 में हुआ था। ऐसी कल्पना की जा सकती है कि गोस्वामी जी को इस ग्रंथ से प्रेरणा मिली होगी।

शाहजहाँ के जीवन-काल में मुगल शाहजादों और शाहजादियों को लेकर जिस वातावरण का चित्रण गोस्वामी जी ने किया है, वह शक्ति की लिप्सा, छल-प्रपंच और उद्दाम वासना से पूर्ण है। उज्ज्वल नैतिकता के लिए वहाँ कोई स्थान नहीं। इसके विपरीत हिंदू राज-पुरुषों में वीरता और राजकुमारियों में सतीत्व की दृढ़ता का प्रदर्शन हुआ है। इसमें संदेह नहीं कि लेखक की विशेष सहानुभूति उपन्यास की नायिका के प्रति है। शाही महल के वातावरण का वह वर्णन जिसमें दूतियों और कुटनियों की चालों, भ्रष्टा स्त्रियों की रीतिकालीन अदाओं, गर्भपात और हत्याओं का विवरण है, यथार्थवादी होते हुए भी कुछ अति-नाटकीय लगता है, जिसके लिए गोस्वामी जी की स्वच्छंद रसीली कल्पना भी कम उत्तरदायी नहीं।

'तारा' उपन्यास की आलोचना बहुत हुई। 'भारतमित्र' के संपादक बालमुकुंद गुप्त ने 1903 ई. में 'तारा' की अत्यंत प्रखर समालोचना करते हुए नागरी प्रचारिणी सभा को सावधान किया कि 'यदि सचमुच वह हिंदी की उन्नति चाहती है, तो सब से पहले 'तारा' पढ़े और गोस्वामीजी महाराज को उनकी पुस्तक के गुण-दोष समझावे कि वह कैसा गंदा और भयानक काम कर रहे हैं।' चंद्रधर शर्मा गुलेरी ने भी 'समालोचक' पत्रिका के अगस्त 1903 के अंक में गोस्वामी जी के उपन्यासों में दांपत्य प्रेम के विशद चित्रणों के आधिक्य की तीखी आलोचना की थी। लेकिन 'तारा' उपन्यास से किशोरीलाल गोस्वामी ने अपनी अलग पहचान बनाई। 'तारा' गोस्वामी जी की नाट्यप्रतिभा को अभिव्यक्त करने वाला है, इसकी कथावस्तु अध्यायों में विभक्त है, जो नाटक की तर्ज पर कार्यकारण की शृंखला से जुड़ी हुई है। गोस्वामी जी देवकीनंदन खत्री की भाँति अपने बड़े उपन्यासों को छोटे-छोटे भागों में बाँट देते थे ताकि प्रत्येक भाग की कीमत साधारण पाठक की क्रय-शक्ति के दायरे में ही हो। 'तारा' उपन्यास लगभग 275 पृष्ठों का था, जिसे उन्होंने तीन भागों में बाँट दिया था। अन्य उपन्यासों की भाँति 'तारा' में भी प्रेम का प्राबल्य, प्रणय की उन्मत्तता, यौवन का उद्दाम प्रवाह, लालसा का मदोन्मत्त वेग, रस की वेगवती धारा, विश्वासघात, छल-कपट, धूर्तता, चालाकी, स्वार्थपरता, प्रतिहिंसा, प्रतिशोध आदि भावों का चित्रण मिलता है। श्रृंगार रसपरक, विशेष रूप से संयोग श्रृंगार-परक दृश्यों का वर्णन तथा प्रेम-प्रसंगों में चुहल भरे दृश्यों का संयोजन तो उनके उपन्यासों की विशेषता थी। गोस्वामी जी द्वारा किए गए संयोग चित्रण और प्रेम वर्णन अनेक स्थानों पर उनके काल में पारसी स्टेज पर खेले जाने वाले नाटकों और नौटंकियों की तर्ज पर लिखे प्रतीत होते हैं।

गोस्वामी जी ने 1904 ई. में 'सुल्ताना रज़िया बेगम वा रंगमहल' में हलाहल शीर्षक लोकप्रिय ऐतिहासिक उपन्यास लिखा। यह भी 'उपन्यास मासिक पुस्तक' में छपा, जो 225 पृष्ठों में दो भागों में था। इसमें इतिहास गौण और कल्पना मुख्य है। 'सुल्ताना रज़िया बेगम व रंगमहल में हलाहल' उपन्यास में रज़िया की कहानी है जो गुलाम वंश के तीसरे सुल्तान शम्सुद्दीन अल्तुतमिश की पुत्री थी। गुलाम बादशाह अल्तुतमिश अपने पुत्रों से भी अधिक अपनी बेटी रज़िया को योग्य समझता था और अपने जीवन-काल में ही उसे अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर दिया था। सुलतान की मृत्यु के उपरांत सन 1236 में रज़िया दिल्ली के सिंहासन पर बैठी। राज्य के तुर्क अमीरों को जो बड़े प्रभावशाली थे, यह बात पसंद न थी। वे एक स्त्री के अधीन रहना अपमान की बात समझते थे; अतः उसके विरुद्ध षड्यंत्र होने लगे। रज़िया ने पर्दे का परित्याग किया और पुरुषों के वेश में दरबार में आने लगी। वह घोड़े पर सवार होकर रणक्षेत्र में जाती थी और सेना का संचालन करती थी। धीरे-धीरे यह बात फैलाई गई कि याकूब नाम का एक गुलाम हब्शी जो उसे घोड़े पर चढ़ाते समय हाथ और कंधे का सहारा देता था, उसका विशेष कृपापात्र था। पहले लाहौर के शासक कबीर खाँ ने उसके विरुद्ध विद्रोह किया। रज़िया ने वहीं जाकर उसे परास्त किया। जब वह दिल्ली लौट कर आई, तो भटिंडा के शासक अल्तूनिया ने विद्रोह का झंडा खड़ा किया। रज़िया एक सेना लेकर फिर चल पड़ी। इस बार वह कैद कर ली गई। लेकिन संयोग की बात है कि अल्तूनिया उसके रूप पर मुग्ध हो गया और उसने उससे विवाह कर लिया। इधर तुर्कों ने रज़िया के भाई बहराम को दिल्ली के सिंहासन पर बिठा दिया। अल्तूनिया और रज़िया दोनों बहराम की सेना से हार गए और अपने प्राणों की रक्षा के लिए जंगलों में भाग गए। वहाँ सन 1240 में डाकुओं ने उनकी हत्या कर दी।

ये कुछ ऐतिहासिक घटनाएँ हैं जो रज़िया के संबंध में प्राप्त हैं, लेकिन किशोरीलाल गोस्वामी ने उपन्यास में उसके शासकीय गुणों की तुलना में व्यक्तिगत जीवन की घटनाओं पर अधिक बल दिया है। वह यौवन में मदमाती एक महिला है जो अपने अस्तबल के दारोगा याकूब पर प्राण-न्यौछावर किए बैठी है, लेकिन याकूब है कि उसकी सहेली सौसत के प्रति आसक्त है और रज़िया के प्रेम-निवेदन को ठुकरा देता है। जीवन की रंगीनी को दिखाने और पाठक को गुदगुदाने के लिए इसमें याकूब के शिष्य अयूब का रज़िया की सहेली गुलशन के साथ प्रेम-व्यापार चित्रित किया गया है। उपन्यास में पंजाब का शासक अयाज रज़िया के विरुद्ध विद्रोह करता है। याकूब की हत्या कर दी जाती है और रज़िया को अल्तूनिया की कैद में रखा जाता है। अल्तूनिया दिल्ली का शासक बनने के स्वप्न में रज़िया से विवाह करता है और अंत में बहराम का सामना करते हुए दोनों मारे जाते हैं।

उपन्यास दो भागों में है और जैसा कि इसके शीर्षक से प्रकट है इसमें नारी के हृदय की वासना को उसके जीवन का विष ठहराया गया है। सुल्ताना रज़िया जैसी शासिका का पतन इसीलिए हुआ। रज़िया सुल्ताना का अंत दुखद हुआ। इस संदर्भ में गोस्वामी जी की टिप्पणी है - 'पाठक! देखा आपने! रज़िया के इश्क का नतीजा देखा आपने! अफसोस, उस बेचारी ने अपनी जवानी मुफ्त खो दी और न उसने सल्तनत का मजा उठाया और न जवानी का।'

'रज़िया' के लिए गोस्वामी जी ने बाबू श्यामसुंदर दास के साथ-साथ शिव प्रसाद सितारेहिंद के 'इतिहास तिमिर नाशक', भारतेंदु हरिश्चंद्र के 'बादशाह दर्पण' तथा नगेंद्रनाथ गुप्त कृत 'रज़ियाबेगम' से सामग्री ली थी। इससे यह पता चलता है कि गोस्वामी जी इतिहास के प्रति उतने गैर-जिम्मेदार नहीं है, जितने समझे जाते हैं। सुल्ताना रज़िया बेगम के कथ्य पर गोपाल राय ने हिंदी उपन्यास का इतिहास में 'रोमांस पाठक और उपन्यास' शीर्षक प्रकरण में विस्तृत टिप्पणी करते हुए लिखा है - ''रज़िया बेगम में कल्पित पात्र स्वामी ब्रह्मानंद के माध्यम से लेखक ने अपने राष्ट्रीय विचारों को अभिव्यक्ति दी है। स्वामी ब्रह्मानंद अल्तमश की मृत्यु के बाद भारत की स्वाधीनता का स्वप्न देखते हैं। उन्हें यह सोचते दिखाया गया है कि, ''दिल्ली की सल्तनत बिलकुल कमजोर हो रही है। इस समय यवनों के पैर एक प्रकार से उखड़ गए हैं और गुलाम बादशाह शमशुद्दीन अल्त्मश के शाही खानदान में घोर गृह विवाद उपस्थित हुआ है। ऐसी अवस्था में एक स्त्री (रज़िया) पर विजय पाना और अपने देश की विलुप्त स्वाधीनता का पुनः उद्धार करना बहुत ही सहज और सुखसाध्य है।'' (रज़ियाबेगम, भाग-2, पृ. 70) किंतु स्वामी ब्रह्मानंद का यह सपना सच नहीं हो पाता। वे राजस्थान के राजाओं में एकता पैदा करने और उनहें किसी एक राजा को अपना सम्राट बना कर दिल्ली के तख्त को उलट देने हेतु समझाने में सफल नहीं हो पाते। वे अपने शिष्य हरिहर शर्मा से कहते हैं, ''हा! अत्यंत खेद का विषय है कि यहाँ के नरेशों की अब भी आँख नहीं खुलती और अपने हित अनहित के पहचानने में उनकी बुद्धि तनिक भी काम नहीं देती। अभी तक यहाँ के राजे-महाराजे अपनी डेढ़ चावल की खिचड़ी पकाते हुए, एक दूसरे से अकारण ही डाह करते और घमंड के मारे अपने आगे दूसरों को अति तुच्छ समझते हैं। ...यह विधि की प्रतिकूलता नहीं तो क्या है कि यहाँ के नरेश अपने में से ही किसी को अपना सम्राट मानकर और परस्पर मैत्री पाश में बद्ध होकर एक दूसरे की सहायता करने को तो पाप समझते हैं, परंतु यवन पददलित होने पर भी अपने देश, धर्म, समाज, राजपद और मानमर्यादा की रक्षा की ओर भूल कर भी ध्यान नहीं देते।'' (वही, पृ.9) स्वामी ब्रह्मानंद की यह चिंता स्वयं लेखक की चिंता जान पड़ती है। 'यवन' शब्द केवल मुसलमानों को ही नहीं, अँग्रेजों को भी इंगित करता है। स्वामी ब्रह्मानंद की हताशा में सन 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम की विफलता से उत्पन्न हताशा की गूँज भी सुनाई पड़ती है।

गोस्वामी जी प्रायः को मुसलमान विरोधी लेखक समझा जाता है। पर रज़िया बेगम में उनका उदार सांप्रदायिक दृष्टिकोण भी अभिव्यक्त हुआ है। स्वामी ब्रह्मानंद रज़िया से कहते हैं, ''खुदा के सामने हिंदू और मुसलमान दोनों बराबर हैं। हिंदू उसे राम कह कर पूजते हैं और मुसलमान खुदा कह कर। हिंदू उसकी मूरत बना कर पूजते हैं और मुसलमान बगैर मूरत रक्खे ही उसका ध्यान करते हैं। लेकिन खुदा हिंदू और मुसलमान दोनों का एक ही है और वह दोनों की परस्तिश से एक सा खुश होता है। मजहबी तअस्सुव को बिलकुल छोड़ कर हिंदू और मुसलमान को एक-सा समझना ही उस बादशाह के हक में बिहतर होगा, जो हिंदुस्तान की सल्तनत की बागडोर अपने हाथ में लेकर उसे बराबर कायम रखना चाहे।'' (वही, पृ. 11) उपन्यास में यह भी दिखाया गया है कि रज़िया स्वामी ब्रह्मानंद की प्रेरणा से एक मंदिर का ध्वंस नहीं होने देती। वह उन मुसलमानों को सजा देती है जो मंदिर को ध्वस्त करने तथा वहाँ एकत्र हिंदुओं को मार डालने पर आमादा थे। मुसलमान मंदिर की गोशाला से जो गायें खोल ले गए थे उन्हें भी वह वापस दिला देती है। वह मंदिर की देवमूर्ति के लिए मूल्यवान पन्ने का हार भी भेंट करती है। सांप्रदायिक उदारता से पूर्ण इन विचारों तथा प्रसंगों को देखते हुए गोस्वामी जी को 'मुसलमान विरोधी' कहने में झिझक होती है। रज़िया बेगम में एक स्थान पर ब्रिटिश शासन की तुलना में मुसलमानी शासन की न्याय व्यवस्था को श्रेष्ठ बताया गया है, ''इतना सुभीता उस समय अवश्य था कि न इतना स्टांपों का खर्च था, न वकील मुख्तारों की खेंचातानी थी, न मुद्दत तक मुकद्दमा झूला करता था और न मुद्दई मुद्दालह को आजकल की भाँति अत्यंत कष्ट उठाना पड़ता था, या सर्वस्व खोना पड़ता था। उस समय घूस भी अवश्य चलती थी और न्याय का अन्याय भी प्रायः होता था, पर सच्चा न्याय भी अवश्य होता था। ...आज की तरह खर्च इतना बढ़ा-चढ़ा न था कि लोगों को अखरता, या तबाह कर डालता।'' (रज़िया बेगम, पहला भाग, पृ. 44) समकालीन ब्रिटिश शासन की इससे अधिक कड़ी आलोचना उस युग में संभव नहीं थी। 'सुल्ताना रज़िया बेगम वा रंगमहल में हलाहल' गोस्वामी जी के सबसे उल्लेखनीय उपन्यासों में गिना जाता है। गोस्वामी जी स्वयं को वाल्टर स्काट, विलियम थैकरे, बंकिमचंद्र की श्रेणी में रखे जाने के लिए प्रयासरत थे, उन्होंने स्वयं को 'हिंदी रसिकों का अनुगामी' कहकर अपने पूर्ववर्ती रचनाकारों के प्रति कृतज्ञता भी ज्ञापित की। 'सुल्ताना रज़िया बेगम' के उपोद्घात में गोस्वामी जी ने उपन्यास लेखन के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए लिखा - ''हम इस उपन्यास में रजिया बेगम का हाल लिखते हैं, इसलिए हमें उसी के राजत्व काल का इतिहास-मात्र लिखना था, किंतु हमने स्वाधीन भारतवर्ष पर पश्चिमवालों की चढ़ाई के आदि से लेकर गुलाम खानदान तक का हाल, जिसमें रज़िया पैदा हुई थी, इसलिए लिख दिया है कि जिसमें इतिहास के सिलसिले में कोई गड़बड़ न हो और पढ़ने वाले उपन्यास के साथ ही साथ कुछ इतिहास का भी आनंद लें, जिसमें लोगों की रुचि केवल उपन्यास ही पर न रहकर इतिहास की ओर भी झुके, जिससे हिंदी भाषा में जो इतिहास का बिल्कुल अभाव है, वह मिटे।'' (सुल्ताना रज़िया बेगम वा रंगमहल में हलाहल, प्र. सं. संवत 1940, उपोद्घात)।

सन 1904 में किशोरीलाल गोस्वामी का उपन्यास 'कनककुसुम वा मस्तानी' छपा जिसमें बाजीराव पेशवा जो सन 1721 में गद्दी पर बैठा था उसका मस्तानी के साथ प्रेम वर्णित है। तत्कालीन हिंदू और मुसलमान दोनों तरह के पाठकों की रुचि को ध्यान में रखते हुए गोस्वामी जी ने लोकप्रचलित प्रेमगाथाओं को अपने उपन्यासों के कथानक का आधार बनाया। गोपालराय गोस्वामी जी द्वारा ऐतिहासिक रोमांसों की रचना के पीछे पाठकों की इतिहास-विषयक रुचि को संतुष्ट करना बताते हुए लिखते हैं - "लगता है गोस्वामी जी अपने समकालीन हिंदी पाठकों की, जो कौतूहलजनक घटनाओं के अतिरिक्त और कुछ पढ़ने के अभ्यस्त नहीं थे, पठन रुचि का परिष्कार करना भी चाहते थे। इतिहास में साधारण पाठकों की अरुचि होती है, इसलिए गोस्वामी जी ने ऐतिहासिक घटनाओं के आधार पर रूमानी कथाओं की रचना कर तत्कालीन हिंदी पाठकों की पठन रुचि के परिष्कार का प्रयत्न किया है।' (हिंदी कथा साहित्य और उसके विकास पर पाठकों की रुचि का प्रभाव, गोपाल राय, ग्रंथ निकेतन, पटना पृ. 316)

'मल्लिकादेवी वा बंग सरोजिनी' उपन्यास सन 1905 में छपा। 'जिनका हृदय प्रेम का नवविकसित कानन है उनके लिए उपन्यास हृदय-मणि के तुल्य है' ऐसा विचार रखने वाले गोस्वामी जी ने युद्ध और प्रेम की पृष्ठभूमि पर इस उपन्यास की रचना की जिसमें भागलपुर के युवराज नरेंद्र सिंह से मल्लिका और मालती का प्रेम वर्णित है, दूसरी ओर मालती की सहायता से तुगरिल की पुत्री शीरीं का बलबन के पुत्र बुगराखाँ से विवाह होता है। नरेंद्र सिंह और तुगरिल के बीच संघर्ष का मुख्य कारण यह मल्लिकादेवी ही थी, जो इस उपन्यास की नायिका है। मालती भागलपुर के मंत्री यदुनाथ सिंह की पुत्री थी।

'हृदयहारिणी वा आदर्श रमणी (1890) में रंगपुर के राजा नरेंद्र सिंह की प्रेमिका कुसुमकुमारी की कथा वर्णित है। उस समय सिराजुद्दौला बंगाल का नवाब था। उपन्यास में नवाब एक धूर्त और दुराचारी व्यक्ति के रूप में चित्रित किया गया है। गोस्वामी जी ने उसकी तुलना रावण से की है। सिराजुद्दौला के अतिरिक्त इसमें क्लाइव, मीरजाफर, सेठ अमीचंद तथा जगतसेठ ऐतिहासिक पात्र हैं।

'लवंगलता वा आदर्श बाला' (1890) की लवंग नरेंद्रसिंह की बहन है। सिराजुद्दौला ने उसे पकड़वाकर 'हीरा झील' नामक महल में कैद करा दिया था, जहाँ से उसके प्रेमी मदनमोहन ने उसका उद्धार किया। इस उपन्यास में प्लासी के युद्ध (1757) का वर्णन मिलता है।

'गुलबहार वा भ्रातृस्नेह' (1916) में बंगाल के नवाब मीरकासिम की पुत्री 'गुल' और उसके पुत्र 'बहार' के जीवन का करूण अंत चित्रित है। उपन्यास में अँग्रेजों और मीरकासिम के बीच उस युद्ध का वर्णन है जो बक्सर की लड़ाई (1764) के नाम से प्रसिद्ध है। नवाब के दोनों बच्चों की अँग्रेजों द्वारा हत्या कराई जाती है और मीरकासिम आत्म-हत्या कर लेता है।

'लखनऊ की कब्र वा शाही महलसरा' (1917) किशोरीलाल गोस्वामी का एक बड़ा उपन्यास है जो सात भागों में धीरे-धीरे समाप्त हुआ। वह विशेष रूप से लखनऊ के नवाब नसीरुद्दीन हैदर के चरित्र पर प्रकाश डालने के लिए लिखा गया। कथानक के विभिन्न भागों को जोड़ने वाले दो पात्र हैं - एक यूसुफ नाम का चित्रकार और दूसरी आसमान नाम की कुटनी। इसमें शाहीमहल में रहने वाले नवाबों और बेगमों के वैभव और भोग-विलास का जी खोलकर वर्णन किया गया है। यह एक जटिल कथानक वाला उपन्यास है। इसमें इतिहास, रोमांस और तिलिस्म के संयोग से रहस्यमय लोक की सृष्टि की गई है। 'राजकुमारी' (1902) शीर्षक उपन्यास की तरह इसमें भी प्रेम और नियति का संबंध खूब दिखाया गया है। इन दोनों उपन्यासों में महलों की रहस्य लीला का बखूबी वर्णन किया गया है। कौतूहल की सृष्टि के लिए कथा को बहुत अधिक रहस्यमय बना दिया गया है। वातावरण का निर्माण करने में गोस्वामी जी की दृष्टि तिलिस्मी और चमत्कार-पूर्ण वर्णन की ओर ही अधिक रही है। गोपाल राय ने इसे गोस्वामी जी का सर्वश्रेष्ठ ऐतिहासिक उपन्यास माना है, जिसकी उल्लेखनीय विशेषता उसका आत्मकथात्मक शिल्प है, जिससे 'कथा की प्रस्तुति में विश्वसनीयता का हलका रंग तो अवश्य पैदा हुआ है, पर कथा की मूल प्रविधि वही है, जिसमें किस्सागो एक के बाद एक घटनाओं का वर्णन करता है, पाठकों को संबोधित करता है, कुछ रहस्यपूर्ण सूचनाओं को रोक कर उन्हें बाद में धीरे-धीरे प्रकट करता है, नए रहस्यों की सृष्टि कर पाठकों को उन्हें बाद में खोलने का आश्वासन देता है तथा कथाओं को युगपत रूप में आगे बढ़ाता है।'

सन 1905 में ही प्रकाशित 'तरुण तपस्विनी' और सन 1909 में प्रकाशित 'सोना और सुगंध' की कथावस्तु ऐतिहासिक नहीं है लेकिन इनमें यथार्थ और कल्पना का अनमेल गठबंधन है। मुगल शासकों के दरबार और महलों के वैभव का वर्णन अत्यंत सजीव बन पड़ा है। 'कटे मूड़ की दो-दो बातें' शीर्षक उपन्यास तिलिस्मी घटनाओं का पुंज है जो ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन-काल की घटनाओं पर आधारित है - जिसमें भोपाल के नवाब द्वारा निर्मित तिलिस्मी शीशमहल पर एक डाकू कब्जा कर लेता है और खूबसूरत लड़कियों को बरगलाता है। जासूस उसका पता लगाने आते हैं तो कैद कर लिए जाते हैं। शीशमहल की सीढि़यों, सुरंगों आदि का वर्णन विश्वसनीय है। इसी उपन्यास में ऐतिहासिक, तिलिस्मी, जासूसी और ठगी के विविध रंग पाठकों को लुभा ले जाते हैं।

सामाजिक उपन्यासों की श्रेणी में गोस्वामी जी ने 1890 में एक लघु उपन्यास 'त्रिवेणी वा सौभाग्यश्रेणी' की रचना की जिसका प्रकाशन सन 1907 में ही हो पाया। इसी तरह 1901 ई. में 'लीलावती वा आदर्श सती' शीर्षक सामाजिक उपन्यास का प्रकाशन हुआ। यह उपन्यास पाश्चात्य शिक्षा के दुष्परिणामों को दिखाने के लिए लिखा गया। पाश्चात्य सभ्यता भारतीय स्त्री के चरित्र को दूषित कर देती है यही विचार इस उपन्यास के मूल में है। 'लीलावती वा आदर्श सती' में लीलावती और दूर के संबंध की उसकी एक बहिन कलावती के चरित्रों का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। लीलावती और कलावती दोनों दो विरोधी स्वभाव की बहनें हैं। लीलावती भारतीय आदर्शों में पली गंभीर मनोवृत्ति की सती स्त्री है। वह अपने प्रेमी ललितकिशोर को पति रूप में प्राप्त करती है और अंत में आर्थिक दृष्टि से संपन्न और पुत्रवती बनकर सुख का जीवन व्यतीत करती है। कलावती रोमांटिक स्वभाव की एक युवती है जो चरित्रहीन बालकृष्ण के प्रति आकृष्ट होकर उससे सिविल मैरिज करती है और फिर एक के बाद दूसरे व्यक्ति के साथ भाग जाती है। परिणाम यह होता है कि वह भीख माँगने को विवश होती है। उसके समस्त शरीर से कोढ़ फूट निकलता है और अंत में यमुना नदी में डूब कर मर जाती है।

इस उपन्यास में लीलावती और कलावती जीवन के सुख-दुख तो अपने कर्मों के कारण उठाती हैं, लेकिन पाश्चात्य सभ्यता की तुलना में भारतीय सभ्यता श्रेष्ठ है, इस मत की स्थापना करने में लेखक सफल हुआ है। कलावती के पतन के मूल में अँग्रेजी सभ्यता के अनुकरण का भी बहुत बड़ा हाथ है। वे अँग्रेजी सभ्यता के अनुकरण प्रभाव को अच्छी दृष्टि से नहीं देखते थे। उन्होंने 'लीलावती' में लिखा -''स्त्री समाज की अधिष्ठात्री देवी है। सतीत्व उस देवी की जाज्वल्यमयी प्रभा है और उस प्रभा के प्रकाश से ही भारतवर्ष भूमंडल का आदर्श गुरु रहा है, किंतु जब स्त्रियों में अवैध स्वाधीनता, अयोग्य शिक्षा का प्रचार होगा तब भारत के महिला कुल के इस सतीत्व और उसकी प्रभा संपूर्ण विनाश हो जाएगी। तब यह देश घोर दुर्गति के गर्त में पड़कर सदैव के लिए मृतक हो जाएगा। अतएव, देश के नेता-जन स्त्रियों की रक्षा, उनके सतीत्व की रक्षा और समाज की रक्षा में विलायत वालों का अनुकरण कदापि न करें।'' समाज की उन्नति अशिक्षित जनों से संभव नहीं है। साहित्य का यह दायित्व है कि वह सिर्फ तत्वज्ञान नहीं बल्कि अपने पाठकों को वस्तुस्थिति का ज्ञान भी कराए। किशोरीलाल गोस्वामी ने अपने लेखन का यह प्रयोजन स्वीकार भी किया है। समाज सुधार एक ओर रीति रिवाजों में परिवर्तन एवं सुधार द्वारा संभव है तो दूसरी ओर आर्थिक-सामाजिक समृद्धि भी अनिवार्य है।

सन 1903 ई. में प्रकाशित 'चपला वा नव्य समाज चित्र' में गोस्वामी जी ने आर्थिक उन्नति पर बल देते हुए लिखा है - ''...वरन एक दीन-हीन परिवार की शोचनीय स्थिति के साथ वर्तमान, शिथिल, उच्छृंखल और बंधनविहीन समाज-चित्र इस इच्छा से यथावत चित्रित किया गया है कि हमारे आर्य भ्राता लोग इस विशृंखल समाज को सुशृंखलाबद्ध करने के लिए मनसा, वाचा, कर्मणा, प्रयत्न करने में तत्पर हों और केवल नौकरी ही पर निर्भर न रहकर विद्योपार्जनपूर्वक, शिल्प, वाणिज्य, कला-कौशलादि के विस्तार से रसातलगत दीन भारत का उद्धार करें।'' (चपला वा नव्य समाज चित्र (चौथा भाग), निवेदन 1906 ई. में प्रकाशित) इस उपन्यास के कथानक में गोरखपुर के राजा राधिकाकिशोर के दो पुत्रों का चित्रण है कमलकिशोर और ब्रजकिशोर। इनमें बड़ा भाई दुष्ट स्वभाव का था, छोटा सज्जन। दूसरी ओर बाबू हरप्रसाद के तीन बहिनें थीं - कामिनी, चपला और कादंबिनी। इन युवक-युवतियों के जीवन के ताने-बाने से ही 'चपला वा नव्य समाज चित्र' का कथानक बुना गया है।

तीनों बहिनों में से कादंबिनी का अनुराग ब्रजकिशोर के प्रति है। अंत में दोनों वैवाहिक बंधन में बँधते हैं। चपला घनश्याम नाम के एक व्यक्ति को प्रेम करती है; लेकिन उसकी सुंदरता से आकृष्ट होकर कमलकिशोर इस प्रेम में व्याघात उत्पन्न करता है। वह चरित्रहीन व्यक्ति है और अनेक स्त्रियों का जीवन नष्ट कर चुका है। उसके इस नीच कर्म में उसकी नौकरानी पत्ती और नौकर सिंधु उसकी बराबर मदद करते हैं। घनश्याम अपने आदमियों की सहायता से चपला को रात में उठवाकर एक तिलस्मी मकान में बंद कर देता है। ऐसा ही व्यवहार वह घनश्याम के साथ करता है। चपला को लोभ तथा भय दिखाकर, साथ ही भ्रम में डालकर, वह अपने वश में करना चाहता है; लेकिन सफल नहीं हो पाता। अंत में पुलिस उसे गिरफ्तार करती है और चपला घनश्याम से मिलती है। कमलकिशोर का जीवन अनेक प्रकार के नीच कर्मों से पूर्ण है - व्यभिचार उसका एक अंश है। उसके जीवन के चित्रण में उपन्यास के अनेक अंश अश्लील हो गए हैं। लेखक का उद्देश्य आधुनिक जीवन की विकृतियों को यथार्थवादी ढंग से चित्रित करने का रहा है।

1907 ई. में प्रकाशित 'पुनर्जन्म वा सौतिया डाह' शीर्षक उपन्यास में प्रेम और अनमेल विवाह की समस्या को उठाया गया है। जिसमें स्त्री के प्रेम और सपत्नीत्व का आदर्श उपस्थित किया गया है। इसकी कथावस्तु में रोचकता है और लेखक ने स्त्रियों के रूप-सौंदर्य के चित्रण में कोई कसर नहीं छोड़ी है, उदाहरण के लिए गोस्वामी जी लिखते हैं - ''सुंदरी का यौवन संपुटित कमल के समान अपने सौंदर्य को भीतर ही छिपाए हुए था, और सुशीला का यौवन खिले गुलाब की तरह रोम-रोम से अपनी छवि छिटका रहा था।''

देवदासी प्रथा पर एक बहुत महत्वपूर्ण उपन्यास 'स्वर्गीय कुसुम' की रचना गोस्वामी जी ने 1889 ई. में की, जिसका प्रकाशन 1901 ई. में और फिर 1916 ई. में हुआ। यह उपन्यास सत्य घटना पर आधारित है। इसमें 1857 ई. के आरा-जगदीशपुर के सामंती जीवन के यथार्थ चित्र प्रस्तुत किए गए हैं, जिसमें देवदासी प्रथा के विरोध में आवाज भी उठाई गई है। गोस्वामी जी लिखते हैं - ''अब इस घोर कलिकाल में यह सत्यानाशिनी प्रथा बंद हो जाए तो अच्छा है क्योंकि धर्म की व्यवस्था देश, काल और पात्र के अनुसार ही की जाती है।'' उपन्यास की केंद्रीय पात्र कुसुम को, उसके पिता द्वारा मंदिर की सेवा में अर्पित कर दिया जाता है जिसे छ-सात वर्ष की उम्र में ही एक वेश्या खरीद लेती है और नृत्य-संगीत इत्यादि की शिक्षा देकर वेश्यावृत्ति करवाने लगती है। कुसुम असंतुष्ट है क्योंकि उसके अनुसार, ''संसार में यदि सचमुच किसी का जीना मरने से करोड़ दर्जे बुरा होता है तो वह वेश्याओं का है।'' जब उसे इस घृणित वृत्ति से बाहर निकलने का मार्ग दीखता है तब वह वसंत कुमार से गांधर्व विवाह कर वेश्यावृत्ति को हमेशा के लिए छोड़ देने का निर्णय लेती है। लेकिन समाज में गांधर्व-विवाह की स्वीकृति न मिल पाने की पीड़ा उसे सालती रहती है और वह अपने प्रेमी पति को दूसरा विवाह करने को बाध्य करती है। कुसुम इस प्रथा के विरुद्ध सशक्त आवाज उठाते हुए अपने पिता से प्रश्न करती है - ''जिस प्रथा से व्यभिचार और वेश्यावृत्ति की दिन-दूनी और रात-चौगुनी बढ़वार हुई जा रही है, उस प्रथा को धर्म का अंग मानना - यह कैसा विचार है?'' इसके बाद उसके पिता, राजा कर्ण सिंह, देवदासी प्रथा का नामो-निशान मिटा देने की प्रतिज्ञा करते हैं।

यद्यपि, गोस्वामी जी के अधिकांश उपन्यासों में रसिक पाठकों को रिझाने के लिए रति प्रसंगों का ब्यौरेवार वर्णन मिलता है। जिनकी आलोचना समय-समय पर की भी जाती रही है लेकिन 'स्वर्गीय कुसुम' में कुसुम और वसंत की मधुरात्रि के प्रसंग में गोस्वामी जी की टिप्पणी द्रष्टव्य है - ''बस इसके आगे हमें और कुछ लिखने का या पाठकों को सुनने का अधिकार नहीं है; इसलिए हम अपने प्रेमी पाठकों के साथ कुसुम के शयन मंदिर से बाहर निकलते हैं और अपने पाठकों को यह बात समझाए देते हैं कि आज के पहिले कुसुम और वसंत में सिवाय प्रेम और पाक मुहब्बत के स्त्री-पुरुष का सरोकार नहीं हुआ था, जैसा कि आज हुआ।'' (स्वर्गीय कुसुम, दूसरा सं. पृ. 69)

किशोरीलाल गोस्वामी के अन्य उपन्यासों में लीलावती (1901) चंद्रिका वा जड़ाऊ चंपाकली (1904) चंद्रावली वा कुलटा कुतूहल (1904) तरुण तपस्विनी वा कुटीर वासिनी (1905) इंदुमती वा बनविहंगिनी (1906) माधवीमाधव वा मदनमोहिनी (1909 ई.) को देखा जा सकता है। इनमें से 'इंदुमती' का कहानी के रूप में 1901 ई. में सरस्वती पत्रिका में पहली बार प्रकाशन हुआ था। बाद में इसमें 15 पन्ने और जोड़कर इस 1906 में 'इंदुमती वा वनविहंगिनी' शीर्षक उपन्यास के रूप में प्रकाशित किया गया। आकार की दृष्टि से लीलावती, चपला, तपस्विनी, माधवी माधव और अँगूठी का नगीना उपन्यास श्रेणी में रखे जा सकते हैं लेकिन चंद्रावली, चंद्रिका और पुनर्जन्म क्रमशः दस से पंद्रह हजार शब्दों की कहानियाँ हैं। इन रचनाओं की प्रकृति पर टिप्पणी करते हुए गोपाल राय लिखते हैं - ''इन उपन्यासों की प्रकृति में कोई विशेष अंतर नहीं है। सस्ते रूमानी प्रेम-प्रसंग, अविश्वसनीय घटनाओं का जाल, ऐयारी और तिलिस्म के चमत्कार, रहस्य-रोमांच का सृजन, नखशिख सौंदर्य, विरह-मिलन और प्रकृति के परंपरागत वर्णन इनमें भी प्राप्त होते हैं। फरवरी, 1908 की 'सरस्वती' में लीलावती की एक समीक्षा प्रकाशित हुई थी जिसमें कहा गया था, ''इसमें हैं भी कितने ही गोरखधंधे की बातें। जालफरेब की भी बातें हैं, आशिक माशूकों की भी बातें हैं, भागने और भगा ले जाने की भी बातें है, अमीरी-गरीबी की भी बातें हैं, साधुता और असाधुता की भी बातें हैं, बिछुड़े हुओं का मिलाप है, प्रेमियों की मनोरथ सिद्धि है, कुल-कलंकिनियों के किए का कुफल है और लीलावती का आदर्श सतीत्व है। सारांश यह कि उपन्यास पढ़ने वालों के मनोरंजन के लिए इस पुस्तक में बहुत कुछ सामग्री है।'' इस समीक्षा से लीलावती की प्रकृति का पता चल जाता है। चपला के मुखपृष्ठ पर उसे 'रहस्यपूर्ण सामाजिक उपन्यास' और चंद्रावली के मुखपृष्ठ पर उसे 'सामाजिक तूफान' की संज्ञा दी गई है। (हिंदी उपन्यास का इतिहास; गोपाल राय : 103)

किशोरीलाल गोस्वामी के उपन्यासों में भारतेंदु हरिश्चंद्र तथा राजा शिवप्रसाद सितारेहिंद दोनों की गद्य शैली का प्रभाव लक्षित होता है। भारतेंदु की गद्य शैली का प्रभाव 'माधवी-माधव' तथा 'अँगूठी का नगीना' तथा राजा शिवप्रसाद सितारेहिंद की गद्य शैली का प्रभाव 'तारा वा क्षात्र कुल कमलिनी', 'सुल्ताना रज़िया बेगम' तथा 'लखनऊ की कब्र' में दिखाई देता है। किशोरीलाल गोस्वामी की गणना परवर्ती भारतेंदु युग और द्विवेदी युग के प्रतिनिधि उपन्यासकार के रूप में होती है। जहाँ देवकीनंदन खत्री ने हिंदी उपन्यास के लिए पाठक-वर्ग का निर्माण किया वहीं किशोरीलाल गोस्वामी ने विपुल उपन्यास लेखन से पाठकों की क्षुधा को तृप्त करने का प्रयास किया। इस प्रक्रिया में उन्होंने नखशिख, विरह और प्रकृति के काव्यात्मक विवरणों के प्रस्तुतीकरण के साथ नई तरह की पाठकीय अभिरुचि के निर्माण का प्रयास किया। बालकृष्ण भट्ट ने 1905 में 'हिंदी प्रदीप' में किशोरीलाल गोस्वामी द्वारा 'हृदयहारिणी' उपन्यास के दसवें परिच्छेद में किए 'नखशिख वर्णन की प्रशंसा करते हुए उसे 'गोस्वामी जी की प्रौढ़ लेखनी का बड़ा उत्तम नमूना बताया था। गोस्वामी जी नखशिख-वर्णन में सिद्धहस्त थे और मध्यकालीन साहित्य की तर्ज पर उपन्यासों में इसे शामिल करना उनकी उपलब्धि थी। उनके उपन्यासों के मुखपृष्ठ तथा परिच्छेदों का प्रारंभ संस्कृत के कवित्वपूर्ण, नीतिविषयक श्लोकों से होता था जो उनकी सुरुचि और संस्कृति ज्ञान का परिचय देने के लिए पर्याप्त हैं। भाषा के स्तर पर गोस्वामी जी अपनी राह स्वयं बनाते दीखते हैं। अपने पूर्ववर्ती देवकीनंदन खत्री की भाषा-शैली का अनुकरण करते वे नहीं दीख पड़ते। उनके उपन्यासों में सौंदर्य, विरह एवं प्रकृति-वर्णन का बाहुल्य है-जहाँ वे संस्कृतनिष्ठ काव्यात्मक एवं अलंकृत भाषा-प्रयोग के मोह से स्वयं को मुक्त नहीं कर पाते। जगन्नाथ प्रसाद शर्मा ने उनकी भाषा पर टिप्पणी करते हुए लिखा है कि - ''गोस्वामी जी का भाषा पर अच्छा अधिकार था और यह बड़ी सजीव भाषा लिखते भी थे पर इसी अधिकार के कारण स्यात वह उससे खिलवाड़ करने लगे थे। जहाँ तक हिंदी या विशेष संस्कृत-गर्भित हिंदी का उपयोग है वहाँ तक तो कुछ गनीमत है पर जहाँ इन्होंने उर्दू को अपने उपन्यासों में धर घसीटा है वहाँ यह बेतरह फिसले हैं। यदि यह अपनी ही संयत भाषा में लिखते तो इनके उपन्यासों का साहित्यिक गौरव बढ़ता ही। यह सब होते भी गोस्वामी जी ने काफी से अधिक उपन्यास लिख डाले हैं और उपन्यासकारों की श्रेणी में इनका स्थान आदरणीय है। साहित्य के सभी अंग विकसनशील हैं इस कारण वर्तमान उपन्यास-कला को दृष्टि में रखकर पहले के उपन्यासों को साहित्य कोटि से निकाल देना उचित नहीं है। हिंदी का साहित्य भंडार अपने अर्थ में विस्तृत है, संस्कृत सा संकुचित नहीं अतः केवल रस-संसार, भावविभूति या चरित्रचित्रण की कमी या अभाव से कोई रचना साहित्य के बाहर नहीं की जा सकती। सभी का अपना-अपना क्षेत्र है और उनके अंतर्गत उनकी सफलता ही उनका परिचायक है। गोस्वामी जी के उपन्यासों का अब कम प्रचार भी देखा जाता है और उनमें से कितने ही अप्राप्त भी हो गए हैं।''

गोस्वामी जी के सभी उपन्यासों की भाषा एक-सी नहीं है। जहाँ 'हृदयहारिणी,' 'लवंगलता' उपन्यासों में संस्कृतनिष्ठ भाषा दीखती है, वहीं 'तारा', 'रज़ियाबेगम,' 'लखनऊ की कब्र', 'लाल कुँवर' में चलती उर्दू का प्रयोग किया गया है। जहाँ-जहाँ मुसलमान पात्र आते हैं - वे उनकी भाषा में उर्दू के शब्द ठूँस देते हैं इसीलिए रामचंद्र शुक्ल ने उसे उर्दू-ए-मुअल्ला कहते हुए लिखा कि ''उर्दू जबान और शेर सखुन की बेढंगी नकल से, जो असल से कभी-कभी अलग हो जाती है, उनके बहुत से उपन्यासों का साहित्यिक गौरव घट गया है।'' (हिंदी साहित्य का इतिहास पृ. 273) गोस्वामी जी पात्रानुकूल भाषा प्रस्तुत करने के प्रयास में कई बार आलोचना के पात्र भी बने। जहाँ उनके पात्र मुसलमान प्रेमी-प्रेमिका हैं वहाँ वे उर्दू-फारसी की परंपरागत शायराना शैली में संवाद करते हैं और जहाँ वे हिंदू पात्रों का अंकन करते हैं उनमें संस्कृत काव्य परंपरा के ढंग के संवाद हैं। इसीलिए 'हिंदी कथा साहित्य और पाठकों की रुचि' शीर्षक पुस्तक में गोपाल राय की स्थापना है कि ''यह भी संभव है कि गोस्वामी जी ने उर्दू काव्य के शौकीन हिंदुओं की रुचि को संतुष्ट करने के लिए मुसलमान पात्रों की भाषा में उर्दू-फारसी का रंग भरा हो।'' (पृ. 312)

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने गोस्वामी जी की रचनाओं की गणना साहित्य-कोटि में की। उन्होंने 'गद्य के द्वितीय उत्थान काल' में इन्हें ही एकमात्र उपन्यासकार माना है, क्योंकि अन्य लोग अन्य साहित्य विधाओं की सर्जना करते-करते कभी-कभी उपन्यास रचना की ओर भी उन्मुख हो जाते थे, जबकि गोस्वामी जी ने 'एक क्षेत्र अपने लिए चुन लिया और उसमें रम गए।' शुक्ल जी के मतानुसार उस युग में केवल गोस्वामी जी ही उपन्यास-कला के मर्मज्ञ थे। जिनकी गद्य शैली पर भारतेंदु और शिवप्रसाद सितारेहिंद दोनों का प्रभाव दिखाई देता है। गोस्वामी जी ने अपने उपन्यासों में प्रेम के चित्रण में बड़ी रुचि और तन्मयता दिखाई। उनके पात्र मध्यमवर्गीय समाज के प्रतिनिधि हैं, यद्यपि उनका चित्रण सामाजिक वास्तविकता की भूमि पर न होकर परंपरागत प्रेम-पद्धति की भूमि पर हुआ है। गोस्वामी जी ने ऐतिहासिक, सामाजिक, गार्हस्थ्य और काल्पनिक सभी प्रकार के उपन्यास लिखे, परंतु सब के मूल में प्रेमचर्चा ही प्रधान रूप से आ पाई। रीतिकालीन नायक-नायिका-चर्चा का यथेष्ट प्रभाव उनके उपन्यासों पर दिखाई पड़ता है। अतएव उनके उपन्यास सामाजिक जीवन की यथार्थता से दूर ही दूर रहे, और एकांतिक प्रेम-लीला को ही अपना विषय बना पाए।

यद्यपि गोस्वामी जी के साहित्य में प्रेमतत्व का चित्रण हुआ, फिर भी उनके उपन्यासों में आदर्शवादी दृष्टिकोण पर्याप्त मात्रा में विद्यमान है। उन्होंने सनातन धर्म, पुनर्जन्म, कर्मफलवाद के पक्ष में विचार व्यक्त किए हैं। गोस्वामी जी में महान लेखक की शक्ति थी, गंभीरता नहीं उनकी रुचि क्रीड़ा-कौतुक में रहती थी। वे कथा के तत्वों को अतिशयता के स्तर पर ले जाते थे। वे शायद इस बात को पूरी तरह महसूस नहीं कर सके कि कला संकेत में है। उनकी दुर्बलता उनकी रोमानी तबियत और लोकरुचि को तुष्ट करने की इच्छा का परिणाम है। उनके उपन्यास-लेखन का उद्देश्य लोक और ज्ञान रुचि को संतुष्ट करना है। यह देखना महतवपूर्ण है कि वे पाठकीय अभिरुचि का निर्माण भर नहीं कर रहे थे बल्कि कहीं न कहीं अभिरुचि को बदलने का प्रयास भी कर रहे थे, उन्होंने वेश्यावृत्ति और देवदासी प्रथा का विरोध करने के लिए कथानक रचे, समाज जिन्हें मूल्य के रूप में स्वीकार कर चुका था, उस दृष्टिकोण को बदलने का प्रयास करना अपने आप में महत्वपूर्ण था। प्रेमचंद सरीखे लेखकों की समाजदृष्टि और साहित्य दृष्टि को इससे निश्चित ही समृद्धि प्राप्त हुई होगी। रेखांकित करने योग्य बात यह भी है कि वे वेश्यावृत्ति और देवदासी जैसी कुप्रथाओं के विरोध में उपन्यास का कथानक गढ़ रहे थे, साथ ही ब्रिटिश औपनिवेशिक भारत में राष्ट्रप्रेम और जातीय गौरव की अवधारणा को समझने-समझाने के प्रयास में रत थे।

गोस्वामी जी प्रयोगधर्मी कलाकार थे। जगन्नाथ प्रसाद शर्मा ने उनकी भाषा को देवकीनंदन खत्री की कलात्मक भाषा शैली से अधिक साहित्यिक माना है। उपन्यासों में जहाँ उन्होंने प्रवाहपूर्ण शुद्ध हिंदी का प्रयोग किया है वहाँ रचना में ताजगी और रवानगी दोनों का समावेश हो जाता है।

उन्होंने शिल्प में नित नए प्रयोग किए। उनकी रचना 'लालकुँवर' में आदि-अंत जैसी कोई चीज नहीं है। उसे आरंभ, मध्य, अंत कहीं से पढ़कर आनंद प्राप्त किया जा सकता है। उन्होंने उपन्यास को नमनीय रूप देकर उसकी कलात्मक संभावना प्रकट की तथा अनेक लेखक और पाठक तैयार किए। उनके साहित्यिक जीवन के उर्वरकाल में उपन्यास साहित्य-जगत की उपेक्षित विधा थी। उनकी रचनाओं पर व्यंग्य की बौछार होती थी। ऐसी स्थिति में उन्होंने 'उपन्यास' मासिक निकाला था, भारतेंदु के 'नाटक' की भाँति उपन्यास-कला पर एक पुस्तक लिखना आरंभ किया था और आलोचकों की 'वक्रदृष्टि' की परवाह किए बिना नित नई कृतियों से कथा साहित्य की श्रीवृद्धि की थी। उनके पूर्ववर्ती लेखकों के लिए उपन्यास सुधार का अस्त्र था, जो कल्पना और भावना के लिए घातक था। उन्होंने उसे कला के रूप में अपनाया और उसके माध्यम से उसे उस ऊँचाई पर पहुँचा दिया जहाँ वह महाकाव्य की समानता कर सकता था।


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