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किशोरीलाल गोस्वामी
गरिमा श्रीवास्तव

अनुक्रम 5. परिशिष्ट पीछे     आगे

एक

उपन्यास : ' माधवी-माधव वा मदनमोहिनी'

मेरी काशी यात्रा

''सर्वपापविमुत्तर्थं मूढ़ मानव।
गच्छ काशीं पुरीश्रेष्ठां शंकर पालिताम्।।

मुझे देखकर बाबूजी ने शांतभाव से कहा - ''आओ, माधव प्रसाद! आओ देवता! विराजो!!'' अस्तु, मैं उनका इशारा पाकर उनके पास ही गद्दी के दाहिनी तरफ बैठ गया और मेरे बैठने पर उन्होंने कहा - ''सब कागज-पत्तर समझा-बुझाकर वह हरामजादा यहाँ से काला मुँह कर गया!''

मैंने बोला - ''हाँ, वह गया?''

वे बोले - ''हाँ, अभी वह चला जा रहा है।''

मैंने पूछा - ''क्यों साहब! क्या उसे इतनी तौफीक है कि वह आपके साठ हजार रुपये दे सकेगा?''

यह सुनकर बाबूजी जरा-सा हँसे और कहने लगे - ''उससे रुपये वसूल करने के लिए तो वह इकरारनामा लिखवाया ही नहीं गया है!''

मैंने अब समझा और कहा - ''ठीक है, यह कार्रवाई सिर्फ उसे जलील करने के लिए ही की गई है!''

उन्होंने कहा - ''बस, अब तुम हमारा मकसद समझ गए।''

मैंने फिर पूछा - ''तो भी तो उसे खाने-पीने का ठिकाना जरूर होगा!''

वे बोले - ''हाँ, उसके पास दो-तीन कित्ता मकान हैं, बाग है और तीन सौ रुपये महीने की आमदनी का गाँव भी है; लेकिन ये सब किस काम के, जबकि वह कमबख्त निस्संतान है और उसके आगे-पीछे कोई भी नहीं है!''

मैंने कहा - ''आखिर उसके बाद उसकी दौलत का मालिक कौन होगा?''

बाबूजी ने हँसकर कहा कहा - ''लावारिसों की दौलत का मालिक कौन होता है?''

मैंने कहा - गवर्नमेंट ऑफ इंडियन!''

बाबूजी ने कहा - ''बस, उसकी दौलत का भी एक न एक दिन वही परिणाम होगा!''

यह सुनकर मैं कुछ दुखी हुआ और मन में सोचने लगा कि हाँ! विश्वासघाती, स्वार्थी और पापी दीवान कुलकलंकिनी जमना को 'मँझधार' में छोड़कर चला गया और उसकी दुर्दशा पर पतित ने जरा भी विचार न किया! हाय री अभागिन जमना! तेरे पाप का यह भयंकर परिणाम हुआ! और दुराचारी दीवान! तेरे मरने पर तेरी दौलत की मालिक होगी, गवर्नमेंट ऑफ इंडियन!!!

अस्तु, मुझे इन सोच-विचारों से जल्द छुटकारा मिला, क्योंकि बाबूजी ने कहा - ''देखो, माधवप्रसाद! तुम्हारी भी यही सम्मति है और हम भी यही उचित समझते हैं कि अब नाहक देर न करनी चाहिए, सो मैं बड़ी बहू को काशी रवाने करना चाहता हूँ, इसमें तुम्हारी क्या सम्मति है?''

मैंने यह सुनते ही मन में कहा - ''हाय, इस भयंकर 'भ्रूणहत्या' के लिए काशीयात्रा!'' फिर मैं उनसे बोला - ''आपका विचार बहुत ही ठीक है, क्योंकि यदि अब वह यहाँ रहेंगी तो बड़ी बदनामी होगी, सो उनका यहाँ से कहीं बाहर भेजना ही ठीक है, पर उनके साथ होशियार और विश्वासी आदमी का जाना बहुत ही जरूरी है।''

बाबूजी ने कहा - ''हमने सब बातों का पूरा-पूरा बंदोबस्त कर लिया है। सुनो भाभी के साथ उसकी दासी झलिया जाएगी और जीजी (गंगादेई) जाएँगी, तुम्हें भी इन लोगों के साथ जाना पड़ेगा और वहाँ जाकर कामकाज के लिए नौकर-चाकरों का बंदोबस्त वहीं कर लेना होगा, जिससे यहाँ के नौकरों पर यह रहस्य न खुलने पाए।''

मैंने घबराकर कहा - ''क्या मुझे भी जाना होगा?

बाबूजी ने कहा - ''अवश्य! क्योंकि हमारे पापमय अन्न को खाकर क्या तुम हमारे पाप के भोग के भोगने से बच सकते हो! माधवप्रसाद! एक तो तुम्हीं इस रहस्य के खोलने वाले हो; दूसरे सिवा तुम्हारे और कौन ऐसा चतुर और विश्वासी आदमी हमारे पास है, जिसे हम इस नाजुक मामले में अपना साथी बनावें? अस्तु, सब बातों का प्रबंध हम कर देंगे और तुमको किसी बात की तकलीफ न होगी। बस, तुम खूब सावधानी से रहना, प्रतिदिन का समाचार हमारे पास भेजना और जिस चीज की जरूरत हो, उसका भी हाल तुरंत लिखना हम यहाँ बैठे बराबर सारा इंतजाम करते रहेंगे। और सुनो, तुम अपने मन में किसी बात का भय या चिंता न करो, क्योंकि अपनी आबरू रखने के लिए हम इस काम में खर्च की कोताही कभी न करेंगे।''

लाचार, मुझे जाना स्वीकार करना पड़ा और मैंने कहा - ''तो कब जाना होगा?

उन्होंने कहा - ''आज रविवार है, पूरब की यात्रा भी है। हमने एक कमरा फर्स्टक्लास का रिजर्व करा लिया है, उसी में तुम सब जाओगे। रात को साढ़े ग्यारह बजे के बाद पंजाब-मेल खुलती है, जो दूसरे दिन, दिन के तीन बजने के बाद मुगलसराय पहुँचेगी। वहाँ से काशी जाने के लिए तुरंत दूसरी गाड़ी तैयार मिलेगी और तुम लोग चार बजते-बजते डेरे पर पहुँच जाओगे! फर्स्टक्लास में सब बातों का आराम रहता है, इसलिए सुबह को तुम लोग अपने मामूली कामों से निबटकर मेवा वगैरह खाकर जलपान कर सकोगे। कल और मेवे का भी हमने इंतजाम कर दिया है। अच्छा, अब तुम जाकर अपनी तैयारी करो और हम हवेली में जाकर बड़ी बहू के जाने की तैयारी कराते हैं?''

मैंने कहा - ''तो उन नोटों का क्या होगा?''

वे बोले - ''नोट तुम हमारे पास रख देना, क्योंकि धर्मतः अब वे तुम्हारे ही हैं और हमारे पास जमा रहेंगे। जाओ, तुम ऊपर जाओ और मेरे भरोसे के हाथ नोटों का पुलिंदा भेज दो।''

यह सुनकर मैं उठा और ऊपर आकर नोटों का पुलिंदा मैंने भरोसे के हाथ बाबूजी के पास भेज दिया, और उसी ट्रंक में जो यहाँ आने पर बाबूजी ने मुझे दिया था, अपने कपड़े, कई पुस्तकें और कुछ रुपये रखकर तुरंत तैयार हो गया, क्योंकि मुझे तैयारी ही कितनी लंबी-चौड़ी करनी थी! सूर्यास्त होने पर सरस्वती मेरे कमरे में आई और आँसू पोंछती हुई बोली - ''आज रात ही को बड़ी बहू जाएँगी, उसके जाने की तैयारी हो रही है, और मैंने सुना है कि तुम भी जाओगे?''

मैंने कहा - ''हाँ, मुझे भी यह पाप भोगना होगा!''

उसने कहा - ''जीजाजी भी जाएँगे!''

मैंने अचरज से पूछा - ''ये, वे भी जाएँगे?''

सरस्वती - ''हाँ, बीबीजी के बहुत हठ करने से वे भी साथ जाएँगे और वहाँ का सब बंदोबस्त ठीक करके तुरंत लौट आवेंगे।''

मैंने कहा - ''चलो, यह और भी अच्छा ही हुआ।''

सरस्वती ने रोते-रोते कहा - ''क्यों भैया! यदि इस समय तुम्हारी मौसी तुम्हें कुछ दे तो क्या तुम उसके लेने से इनकार करोगे?

मैंने पूछा - ''क्या, दोगी, मौसी?''

यह सुनकर आँचल में से निकालकर उसने मेरे सामने दो सेब, दो अनार और एक पिटारी अंगूर की रख दी और कहा - माधवप्रसाद! रास्ते में जलपान करना।''

इतना कह और रोती हुई वह चली गई। मैंने समझा कि वह मेरे जाने से बहुत ही दुखी हुई है! आखिर, क्यों न होती! वह भी तो हाड़माँस ही की थी!

सचमुच उस समय मैं भी बड़ा दुखी हुआ और सोचने लगा कि हाय, मैं कहाँ था और कहाँ आ फँसा! उस समय एक-एक करके सब पिछली बातें मेरे मन में उदय होने लगीं-जब से मैंने होश सँभाल था, तब से लेकर आज तक की सारी बातें एक-एक करके मेरे मानस-नेत्र के सन्मुख आईं! माँ के मरने पर मामा के यहाँ रहना; फिर पिता के साथ लखनऊ आना; पिता का स्नेह और उनकी मृत्यु, मास्टर साहब, उनकी स्त्री और शंकर का स्नेह; फिर लखनऊ से भागकर लाला राम प्रसाद के साथ दिल्ली आना; यहाँ का आराम, सभी का स्नेह, और मदनमोहन का प्रेम; फिर सरस्वती का उत्पात और उसकी निवृत्ति; दीवान और बड़ी बहू का गुप्त रहस्या; मदनमोहन का गायब होना; दीवान का निकाला जाना और अब काशी की यात्रा! इत्यादि एक-एक करके सभी बातें मेरी आँखो के आगे नाचने लगीं और देर तक मैंने उन्हीं सोच-विचार में डूबा हुआ रोता रहा।

मैं अँधेरे ही में बैठे-बैठा रो रहा था और सरस्वती के दिए हुए फल मेरे आगे ही रखे हुए थे, कि इतने में माँ जी, अर्थात छोटी बहू उस कमरे में आई और ताज्जुब से बोली - ''ऐं, तुम अँधेरे में बैठे हुए हो।''

उन्हें देखकर मैंने झटपट अपनी आँखें पोंछ डालीं और झूठमूठ यों कहा -''दियासलाई नहीं है।''

यह सुन और बाहर छत पर निकलकर उन्होंने एक दासी को सलाई लाने का हुक्म दिया और जब तक सलाई न आई, वह बाहर छत पर टहलती रहीं। इतने में एक लौंडी सलाई लेकर आई और मैंने दीया बाला।

इतना यहाँ पर मैं कह देना उचित समझता हूँ, कि दीया बालने से पहले मैंने सरस्वती के दिए हुए फलों को अपने ट्रंक में रख दिया था।

सो, दीया बलने पर माँ जी मेरे कमरे में आई और आँखें डबडबा कर बोलीं - ''तुम आज ही जाओगे?''

मैंने कहा - ''जी हाँ! अब आप यही आशीर्वाद दीजिए कि घर की लक्ष्मी इस आफत से छूटकर जल्दी ही घर लौट आवे।''

यह सुनकर उन्होंने कहा - ''नारायण के अनुग्रह और तुम्हारे पुण्य-प्रताप से जो कुछ हो, सो हो, क्योंकि इस समय हम लोगों के भाग्य तो बड़े ही खोटे हैं।''

इतना कहते-कहते वह रोने लगीं और मैंने कहा - ''आप कुछ चिंता न करें, परमेश्वर अच्छा ही करेगा।

वह कहने लगीं - ''अच्छा तो मैं उसी दिन समझूँगी, जिस दिन मदन का मुँह देखूँगी।''

यह सुनकर मेरी आँखों में भी आँसू भर आए, पर उन्हें रोककर मैंने कहा - ''ईश्वर ने चाहा तो वह दिन भी बहुत जल्द आवेगा।''

इतने में सरस्वती भी आ गई, उसने एक हाथ में पकड़ी दो सींक की पिटारियाँ मेरे आगे रख दीं, और मेरी ओर स्नेह भरी दृष्टि से देखकर कहा - ''इनमे मिठाइयाँ और सलोने हैं, इन्हें तुम खाना।''

फिर उन्होंने चाँदी का एक बटुआ, एक थाली, एक लोटा, एक लुटिया, एक गिलास, एक कटोरा, एक कटोरी, एक चम्मच, एक तवा और एक चीमटा मेरे आगे रख दिया और कहा - ''ये बर्तन तुम्हारे बाबूजी ने तुमको दिए हैं। परदेस में तो तुम को अपनी रसोई अपने हाथ ही से बनानी पड़ेगी, सो बटुए में दाल करना, तवे पर रोटी संकना और कलछी का काम चम्मच से लेना।''

मैंने उन चाँदी के पात्रों को लेने से इनकार किया, पर उन्होंने डाँटकर कहा - ''तुम लड़के हो, इसलिए लड़के ही की तरह रहो, बस जो मैं हुक्म देती हूँ, सो करो।''

इतना कह वे दोनों बहनें चली गई और मैंने उन पात्रों को भी ट्रक में बंद कर दिया और सोचा कि चाँदी के बरतनों में रसोई बनाना या खाना मुझ जैसे निर्धन व्यक्ति के लिए खासी हिमाकत है।

उसके थोड़ी ही देर बाद ब्यालू करने के लिए मेरी बुलाहट हुई, और मैं गया भी पर चित्त अस्वस्थ रहने और रेल पर जागने की बात कहकर मैंने ब्यालू करने से इनकार किया, पर माँ जी और सरस्वती ने बड़ा हठ किया और तब मुझे झख मारकर कुछ थोड़ा बहुत खाना ही पड़ा। बाबूजी मेरे से पहले ही ब्यालू कर गए थे।

निदान, ब्यालू करने के बाद अपने ट्रंक को मैंने नीचे भेज दिया और कमरे में ताला बंद करके उसकी ताली माँ जी को सौंप दीं। मैं नीचे उतर आया और देखा कि यात्रा की पूरी तैयारी की गई है!

मुझे देखकर बाबूजी ने कहा - ''जीजी के बड़े आग्रह करने से हमें भी तुम्हारे साथ ही चलना पड़ा।''

मैंने कहा - ''यह बहुत ही अच्छा हुआ।''

वे बोले - ''सिर्फ वहाँ का इंतजाम करके हम कल या परसों ही यहाँ वापस आ जाएँगे।''

ठीक ग्यारह बजे बड़ी बहू, बुआजी और झलिया एक पालकी गाड़ी में सवार हुई और बाबूजी मेरा हाथ थामकर भीतर ले गए। वहाँ जाने पर माँ जी और सरस्वती ने मेरे माथे में रोली लगाकर टीका किया और पाँच मुहर माँ जी ने और एक सरस्वती ने मेरे हाथ पर रखीं। फिर माँ जी ने रोते-रोते कहा - ''माधव! परमेश्वर करे, तुम्हारी यह यात्रा मंगलकारिणी हो और तुम राजी खुशी बड़ी बहू और मदनमोहन के साथ लौट आओ।''

इतना कहकर वह जोर से रोने लगीं, सरस्वती को भी हिचकी बँध गई थी, इसलिए फिर वहाँ पर मैं जरा न ठहर सका और रोता हुआ बाहर निकल आया।

मेरे आने के दस मिनट बाद बाबूजी भी बाहर आए और फिटन पर सवार हुए, मैं भी सवार हुआ और दोनों गाड़ियाँ स्टेशन की ओर रवाना हुई।

अब दो फर्स्टक्लास रिजर्व करने पड़े। सो जब पंजाब मेल आई, तब एक कंपार्टमेंट में बड़ी बहू, बुआजी और झलिया सवार हुई और दूसरे में बाबूजी, मैं और भरोसे खिदमतगार। असबाब सब मर्दानी गाड़ी में रख लिए गए और पौने 12 रात को पंजाब मेल छूटी।

 

परिशिष्ट - 2

उपन्यास : मल्लिकादेवी वा बंगसरोजिनी स्थिरमंतव्य

''याद्वशी भावना यस्य सिद्धिर्भवति ताद्वशी।'' (अग्निपुराण)

आज प्रातःकाल सुविस्तृत वंगभूमि के एक प्रांत में अपूर्व दृश्य दीख पड़ता है! नवगाँव से कोई चार कोस पश्चिम सेना सागर शिविर सन्निवेशित करके पड़ा है। कहीं हाथी, कहीं घोड़े, कहीं ऊँट, कहीं खच्चर, कहीं भारवाही वृषभों में झुंड के झुंड खूँटों में बँधे परस्पर कल्लोल कर रहे हैं। निज-निज व्यापार में सैनिकगण आतुरता से लगे हैं। कहीं रसिकगण परस्पर हास-विलास कर रहे हैं। कोई अश्वों को फेरते और कोई परस्पर कृत्रिम युद्ध करते हैं। सेना-निवेश के भीतर सैकड़ों पटमंदिर (तंबू) खड़े हैं, उनके मध्य चमचमाता हुआ, सूर्य के कर से अपना कर मिला रहा है। सेना में कोलाहल से कान पड़ी नहीं सुनाई देती है।

प्रहर दिन चढ़ा होगा, इसी अवसर में एक अश्वारोही वेगपूर्वक अश्वचालन करते- करते चला आता था। उसने अनिवार्य गति से शिविर में प्रवेश किया। उसे देखकर उसके अमानुषिक तेज पुंज और वीरवेश से सब चमत्कृत होकर जहाँ के तहाँ चित्र लिखे से खड़े रह गए। किसी भी सामर्थ्य नहीं हुई कि उसके सन्मुख जाकर उसके आगमन का वृत्तांत पूछे, वा उसकी अनिवार्य गति का रोध करे।

युवा ने एक यवन प्रहरी से प्रश्न किया - ''बादशाह-सलामत नित्यकृत्य से निश्चिंत हो चुके हैं।

प्रहरी - ''जी, ठीक नहीं कह सकता, मगर दरबार का वक्त करीब है।''

अश्वारोही - ''दिल्लीश्वर की सेवा में कुछ निवेदन कर सकते हो।''

प्रहरी - ''आप कहाँ से आए हैं? आपका नाम क्या है? और काम क्या है?

अश्वारोही - ''अच्छा, तुम इतने ही में समझ लोगे! सूचना दो कि भागलपुर का राजा उपस्थित है।''

द्वारपालगण महाराज का परिचय पाकर खड़े हो गए और सभों ने अभिवादन किया। महाराज ने एक से पुनः सूचना देने का अनुरोध किया। द्वारपाल आज्ञा शिरोधार्य करके भीतर गया। अनंतर जो महाराज के समीप प्रहरीगण खड़े थे, परस्पर धीरे-धीरे सभों ने उनके परिचय पर तर्क-वितर्क करना आरंभ किया।

एक ने कहा - ''ये क्या तुगरलखाँ के दूत बनकर आए हैं?''

दूसरा - ''नहीं जी! कोई सिपहसालार होंगे। देखो, पोशाक वैसी ही है।''

तीसरा - ''नहीं-नहीं! बंगाले के कोई राजा होंगे।''

एक - ''ठीक तो कहा। खैर अभी सब मुफस्सिल हाल मालूम हो जाएगा।''

प्रहरीगण महाराज का परिचय निर्णय न करके क्षुण्णमन से खड़े रह गए, इतने ही में द्वारपाल के संग बीस-पच्चीस व्यक्ति उत्तमोत्तम परिच्छद परिधान किए बाहर आए। उन लोगों के मध्य में एक बहुमूल्य बस्त्रभरण से अलंकृत संभ्रांत युवक चले आते थे। उन लोगों को आते देखकर महाराज अश्व से अवतीर्ण हुए और अपनी उत्कर्षता दिखाने के लिए अनेक व्यक्तियों ने महाराज के अश्व को थाम लिया।

आगंतुक लोगों में एक व्यक्ति ने महाराज को अभिवादन करके कहा - ''महाराज! ये शाहनशाह दिल्ली के शाहजादे हैं। इनका नाम शाहजादे मुहम्मद है।''

श्रवणमात्र ही से महाराज और शाहजादे महामोद के संग गले मिले और यथायोग्य प्रेम-संभाषण करना आरंभ किया।

महाराज - ''आपके दर्शन की बड़ी अभिलाषा थी, सौभाग्यों से आज वह प्राप्त हुआ।''

शाहजादा - ''जी नहीं, मैं किस लायक हूँ! मगर हाँ, आपकी मुलाकात से मेरा दिल निहायत शाद हुआ, यह कहना लाजिम है।''

महाराज - ''अस्तु, दिल्लीश्वर अतिशय प्रसन्न हैं?''

शाहजादा - ''खुदा का फजल है। चलिए वे आपकी मुलाकात के इश्तियाक में बैठे हैं।

अनंतर शाहजादे ने महाराज का हाथ थामकर अनुचरवर्गों के सहित पटमंदिर के भीतर गमन किया, अश्व की रक्षा का भार द्वारपालों के सिर पड़ा।

महाराज को देखकर बादशाह अतीव हर्ष के संग सिंहासन से उठे और महाराज का सादर पाणिग्रहण करके कंठाश्लेष किया। दोनों महानुभावों में परस्पर यथोचित अभिवादन हुआ। पर महाराज ने अस्वीकार कर दिल्लीश्वर के वाम भाग में दूसरी रत्नमयी चौकी पर आसन ग्रहण किया, और प्रथम बादशाह को बैठाकर दूसरे पर स्वयं बैठे। बादशाह के इंगित से सब अनुयायीवर्ग यथोचित स्थान पर बैठे, शाहजादे बादशाह के दाहिने एक चौकी पर सुशोभित हुए। परस्पर अनंत वार्तास्रोत प्रेमवेग से बहने लगा।

बादशाह ने सस्मित कहा - ''आपका मिजाज शरीफ! सल्तनत में अमन व रियाया खुश व खुर्रम है?''

महाराज - ''जब आपके श्रीचरणों ने बंगभूमि को अलंकृत किया है, तब मंगल होने में त्रुटि क्या है? अन्यथा तुगरलखाँ जैसे नव्वाबों से महोदय! आनंद और शांति कब हो सकती है? अस्तु श्रीमान का मंगल, सर्वांगीण मंगल।''

बादशाह - ''खुदा के करम से जिंदा हूँ, और अब सफर से तबीयत भी कुछ फर्हत याफ्ता है। हाँ यदुनाथ मजे में हैं! वे आपके साथ नहीं आए?''

यदुनाथ सिंह का नाम सुनते ही महाराज का मुख विषण्ण हो गया, और उन्होंने दीर्घ निश्वास लेकर भग्न स्वर से कहा - ''श्रीमान! कहते हृदय विदीर्ण होता है, आज दो वर्ष गत हुए, इन्हीं दुष्ट पठानों ने, या यों सही कि तुगरलखाँ ने षड्यंत्र से उनका सर्वनाश किया। हाँ! उस सज्जन व्यक्ति को विनाश करके उनकी सती स्त्री और अनूढ़ा कन्या को न जाने कहाँ, किस दशा में उन दुष्टों ने रखा है, किंतु कुछ पता न लगने से व्यर्थ किसी को दंडित करना भी अनुचित समझा। इसी में दो वर्ष बीत गए, किंतु कुछ भी फलसिद्धि नहीं हुई।''

बादशाह - ''आजकल उनकी जगह पर कौन है?''

महाराज - ''जी! उपमंत्री रघुनाथसिंह उस पद पर स्थित किए गए हैं।''

बादशाह - ''आह! निहायत रंजदद कलमा आपने सुनाया! महाराज! खुदा जानता है कि मैंने इस बात से बहुत ही सदमा पाया। खैर! मजीर अल्लाहताला की; पर अब इन बदमाश फसादियों को जल्द सर करना चाहिए, वरन ये बिल्कुल सल्तनत को बर्बाद वा नेस्तनाबूद कर देंगे।

महाराज - ''अवश्य, किंतु तुगरलखाँ के पास सेना बहुत है, इसलिए जब तक पटने से श्रीमान की शेष सेना भी न आ जाए, तब तक सन्मुख न लड़कर कूटयुद्ध करना चाहिए।''

बादशाह - ''मैं भी यही खयाल करता था। खैर, इस काम में अंजाम देने के लिए कितनी फौज काफी होगी?''

महाराज - ''केवल पाँच सहस्र! उतनी मैं स्वयं संग्रह कर चुका हूँ, वे ही काम देंगी; किंतु आपसे विशेष सहायता समय-समय पर ली जाया करेगी।''

बादशाह - ''नहीं, नहीं, आप जितनी फौज चाहे, ले सकते हैं।''

महाराज - ''श्रीमान के समीप क्या नहीं! सभी ईश्वर ने प्रदान किया है; किंतु यदि मैं आपका पर नहीं हूँ तो मेरी जो कुछ वस्तु है, सब आपकी है, और आवश्यकता होने पर वह ली जाए।"

बादशाह - ''दुरुस्त है, ऐसा ही होगा; मगर बिल्फेल मेरी फौज भी आपके हमराह रहे; बस, जिस सूरत से चाहें, उससे काम का अंजाम दें, मगर आप जियादह खतरा न उठाए।''

महाराज - ''आपकी कृपा के प्रताप से मंगल ही होगा, आप कोई शंका न करें।''

बादशाह - ''इस वक्त आपके हमराह कितनी फौज आई हैं?''

महाराज - ''इस समय मैं एकाकी ही उपस्थित हुआ हूँ।''

यह सुनकर बादशाह आश्चर्यान्वित और इतर सभासद सन्न होकर निर्निमेष लोचनों से महाराज के मुख की ओर देखने लगे।

तब महाराज ने हँसकर कहा - ''इसमें आश्चर्य की क्या बात है?''

बादशाह - ''सरासर ताज्जुब का मकाम है! ऐसे खौफनाक वक्त में अकेले इस तरह घूमना आप ही का काम है।''

महाराज - ''अवश्य ही मैं मृत्यु के मुख में पड़ चुका था, किंतु ईश्वर ही ने रक्षा करके आपके समीप तक पहुँचाया।''

बादशाह - ''ये क्या फर्माया आपने? क्या हुआ था?''

इस पर महाराज ने, शाही दूत के मारे जाने, पुनः एक अपरिचित से उस (शाही) पत्र के पाने, अपनी सुरंग में बारूद बिछाई जाने का समाचार जानने, तदनंतर मंत्री विनोद सिंह के साथ बादशाह से मिलने के लिए प्रस्थान कर वन में मृग का पीछा करने, फिर वन के मध्य में रात्रि के समय शयनावस्था में यवनों के हाथ पड़ने; फिर यवनों का निज प्रस्ताव प्रकाश करने और उनका वध करके अपना मार्ग लेने, इत्यादि का सविस्तार वृत्तांत कह सुनाया, पर मल्लिका के अतिथि होने का हाल छिपा रखा। यह सब सुनकर बादशाह की आँखें क्रोध से लाल हो गई, उनकी भुजा फड़कने और अंग-प्रत्यंग काँपने लगे।

उन्होंने गर्ज कर सभासदों की ओर मुख फेर कर कहा - ''बस, जहाँ तक हो सके, अब जल्दी ही शैतान तुगरल का सर काट, लो, क्योंकि उस बदकार का अब जियादह दिन दुनिया में रहना बिहतर नहीं है। उसके खानदान में कोई भी जीता बचने न पावे और न वह भाग कर निकल जा सके।''

यह सुन सभी सभासद नीरव थे, किसी के मुख से भी कोई शब्द नहीं निकलता था! यह देख, सहसा महाराज ने कहा - ''दिल्लीपति! उस दुष्ट के वध का भार मैंने अपने ऊपर उठाया। ईश्वर की कृपा और आपकी सहायता हुई तो वह शीध्र ही अपने पापों का फल पाएगा।''

महाराज की बातें सुन सभी महा आनंदित होकर उनके साहस को आंतरिक धन्यवाद देने लगे।

बादशाह ने शांति लाभ करके कहा - ''वाकई आप क्षत्रिय वीर और हिंदुओं के सरताज हैं, वरन कौन ऐसी हिम्मत दिखलाएगा? अलाहाजुल्कयास, आपकी बात दिलोजान से कुबूल हुई, अब उस दोजखी कुत्ते को जिस तरह आप चाहें, फौरन कतल कर डालें।

महाराज - ''श्रीमान के लिए मैं दिलोजान से तैयार हूँ।''

बादशाह - ''और भी आप जो कुछ हमसे चाहें, बेरुकावट कहें।''

महाराज - ''यह आपके देवस्वभाव का परिचय है। अस्तु, उस दुष्ट का सिर मैं खुद काट कर मंत्री के ऋण से मुक्त होऊँगा, और उस दुष्ट के मारे जाने के अनंतर बंगाल के जिन-जिन भूम्यधिकारियों की स्थावर वा अस्थावर संपत्तियाँ हर ली गई हैं, वे क्षतिपूरण के संग उन्हें लौटा दी जाएँ।''

बादशाह - ''जरूर! जरूर। इसमें क्या कहना है! यह तो मसलहत की बात है।''

महाराज - ''एक बात और भी है।''

बादशाह - ''वह क्या।''

महाराज - ''वह कुछ विशेष नहीं है, केवल यही कि तुगरल ने मेरे समीप दूत के हाथ बड़ा अश्लील पत्र भेजा था।''

बादशाह - ''उस खत में उस नालायक ने क्या लिखा था।

इस पर महाराज ने - सुनिए,'' - यों कहकर उसके पत्र का सब आश्य सुना दिया, जिसे सुनकर बादशाह तुगरल पर बहुत ही कुपित हुए और बोले - ''इससे दो बातें साबित हुई, एक तो यह कि उसी ने मंत्री को मरवा डाला होगा? और दूसरी यह कि अभी तक उनके घर की औरतें उसके हाथ नहीं लगी होंगी! खैर! देखा जाएगा, उसकी मौत अब उसके नजदीक ही आ पहुँची है।''

इसके अनंतर बादशाह ने मोतीमहल दुर्ग के बारूद से उड़ा देने के रहस्य को कहा और फिर यों कहा - ''जब मैंने अपने अहलकार के मारे जाने का हाल सुना तो यह जानकर कि 'अब मेरे खत के न पाने से आप मेरे पास न आ सकेंगे,' मैं यहाँ अपने खेमे में चला आया। मगर महाराजा साहब वह अजनबी कौन है, जिसने आपके और मेरे किले को इस खूबी के साथ बचाया! खुदा जानता है, मैं उसके एहसानों के बोझ में सर नहीं उठा सकता।''

महाराज - ''श्रीमान! मैंने बहुत चाहा कि उस विचित्र युवक का कुछ परिचय पा सकूँ, परंतु वह अपने विषय में अभी कुछ भी नहीं कहता।''

बादशाह - ''खैर, तो अगर वह मेरे पास भी आया तो मैं उसे मुँह माँगा इनाम दूँगा।''

महाराज - ''इस बात की तो उससे मैं भी प्रतिज्ञा कर चुका हूँ।

बादशाह - ''सच है, वह इसी काबिल है।''

महाराज - ''तो अब आज्ञा हो तो मैं प्रस्थान करूँ।''

इस पर बादशाह के अनुरोध करने पर भी कार्यसाधन के लिए महाराज वहाँ न ठहर सके और कुछ फौज संग लेकर विदा हुए। बादशाह ने अतर-लायची देकर उन्हें सादर विदा किया, पर महाराज ने उसी समय शाही फौज को एक और भेजकर स्वयं एकाकी अपने दुर्ग ओर गमन किया।

बादशाही शिविर से निकल कर महाराज नरेंद्रसिंह दो ही कोस दूर गए होंगे कि उनके कानों में घोड़े के टापों की ध्वनि सुनाई दी, जिसे सुन यह जानने के लिए वे वहीं पर, जो कि एक घने जंगल का मुहाना था, ठहर गए। थोड़ी ही देर में उनके सामने घोड़ा कुदाता हुआ वही अज्ञात नाम अपरिचित आ पहुँचा, जिसे देख महाराज चकित होने के साथ ही अत्यंत प्रसन्न हुए और बोले - ''वाह, वाह मित्र! अपरिचित मित्र! तुम तो हमारे साथ-साथ मानो छाया की तरह फिर रहे हो!''

अपरिचित - (अपनी हँसी ओठों में दबा कर) ''इसलिए कि श्रीमान मेरी काया जो ठहरे! अस्तु, आपका बादशाह से मिलने जाना नव्वाब के चरों को विदित हो गया है और यह भी वे जान गए हैं कि आप बादशाही सेना को अपने साथ न लेकर अकेले इसी मार्ग से आवेंगे। अतएव आप उलटे फिरिए और शाही सेना से मिल और उसे साथ लेकर तब अपने दुर्ग की ओर जाइए, क्योंकि आगे बैरियों का गोल है।''

यों कहकर वह अपरिचित वहाँ से हवा हो गया और महाराज भी उधर से लौट पड़े।

परिशिष्ट - 3

उपन्यास : ' सुल्ताना रज़िया बेगम '

' आग लगी'

''किया, जिसके जो जी में आया, बराबर।
न कायम रही, बादशाही किसी की।''

सन 1206 ईस्वी में शहाबुद्दीन मुहम्मद गोरी ने अपने गुलाम कुतबुद्दीन ऐबक को, जिसके साथ शहाबुद्दीन के भतीजे महमूद गोरी की छोटी बहिन 'हमीदा' ब्याही गई थी, दिल्ली का बादशाह बनाया; यही गुलाम दिल्ली, या हिंदुस्तान का पहिला बादशाह हुआ। परंतु जब चार बरस राज्य करके (1210 ई.) वह चौगान खेलते समय घोड़े से गिर कर मर गया, तो उसका बेटा आरामशाह (सन 1210 ई. में) दिल्ली का दूसरा बादशाह हुआ। किंतु सालभर भी राज्य नहीं करने पाया था कि शमसुद्दीन अलतिमश ने, जो पहिले कुतबुद्दीन ऐबक का एक गुलाम था और जिसे कुतबुद्दीन की लड़की 'कुसीदा' ब्याही गई थी, बिहार से आकर आरामशाह को तख्त से उतारा और चुपचाप उसे मरवा कर दिल्ली के तख्त पर (सन 1211 ई.) में अपना कब्जा किया। दिल्ली के इस तीसरे बादशाह (शमसुद्दीन अलतिमश) ने बड़े दबदबे के साथ पच्चीस छब्बीस वर्ष तक निकष्टक राज्य किया और बहुत से देशों को जीतकर दिल्ली की राज्य सीमा को खूब बढ़ाया। अंत में जब वह मार्च सन 1236 ई0 में, मुलतान में मर गया तो उस समाचार को सुन कर उसका बड़ा बेटा रूकनुद्दीन फीरोजशाह दिल्ली के तख्त पर बैठा; किंतु वह बड़ा अयोग्य था और उसकी माँ कुसीदा भी बड़ी जालिम थी, इसलिए रज़िया, जो तब अपने बाप के साथ ही थी, एक बड़ी फौज के साथ मुलतान से चली और दिल्ली में आकर जिस तरह उसने अपने भाई को कैद करके दिल्ली के तख्त पर अपना कब्जा किया, उसका हाल हम उपन्यास के पहिले भाग में लिख आए हैं शमसुद्दीन अलतिमश के मरने पर (सन 1236 ई0 में) उसकी चारों संतति की उम्र जो उसी कुसीदा के पेट से पैदा हुई थी, इस क्रम से थी -

1. रूकनुद्दीन फीरोजशाह, - पच्चीस वर्ष का।

2. मुइज्जुद्दीन बहराम, - तेईस वर्ष का।

3. नासिरूद्दीन महमूद, - इक्कीस वर्ष का।

4. रज़िया बेगम, - उन्नीस वर्ष की।

और कुसीदा बेगम की उम्र उस समय (सन 1236 ई में) बयालीस वर्ष की थी, तथापित वह सौंदर्य और शरीर की पुष्टि के कारण पूर्ण युवती ही जान पड़ती थी।

पाठक! उस बात को न भूले हों, जो एक दिन बाग में अपने भाइयों के कैद करने के बारे में रज़िया ने अपने वजीर खुर्शेद खाँ के साथ की थी। सो उसी संकेत के अनुसार भटिंडे का किलेदार अलतूनियाँ दिल्ली से रवाना कर दिया था, और एक दिन रात के समय, रज़िया ने अपने भाई (दिल्ली के चौथे बादशाह) रुकनुद्दीन फीरोजशा को बेहोश करके अलतूनियाँ के पास भटिंडे के किले में कैद रहने के लिए भेज दिया था; तथा दिल्ली में यह बात मशहूर कर दी थी कि, ''रुकनुद्दीन बगैर किसी से कहे-सुने, न जाने कहाँ चला गया!'' उसके अलावे रज़िया ने मुइज्जुद्दीन और नासिरूद्दीन को बड़ी हिफाजत के साथ दिल्ली के किले में ही कैद कर रक्खा और अपनी माँ को भी एक प्रकार से नजरबंद ही कर रक्खा था।

यद्यपि रज़िया प्रगट में अपनी माँ और भाइयों की बड़ी खातिरदारी करती थी और उसकी आज्ञानुसार अलतूनियाँ रूकनुद्दीन की भी बड़ी खातिरदारी करता था, परंतु कुसीदा को यह बात बहुत ही बुरी लगी और वह भीतर ही भीतर रज़िया के विनष्ट करने का षड़यंत्र करने लगी। एक तो वह (कुसीदा) स्वभाव ही से बड़ी जालिम औरत थी, तिस पर अपने और अपने लड़कों के कैद किए जाने से वह एकदम से आग हो उठी और अपनी लड़की को मिट्टी में मिलाने का भीतर ही भीतर प्रपंच रचने से लगी थी। यद्यपि रज़िया ने रूकनुद्दीन के गायब की झूठी बात मशहूर कर दी थी, परंतु कुसीदा एक ही चालाक औरत थी, इसलिए उसने इस बात का पता लगा लिया कि, रूकनुद्दीन के नाथ रज़िया ने कैसा सलूक किया है।' इसलिए, अपने अवसर की प्रतीक्षा करती हुई वह चुप रही और अपने षड़यंत्र की आग धीरे-धीरे सुलगाने लगी थी।

इतिहासों में लिखा है कि, 'शमसुद्दीन अलतिमश के मरने की खबर पाकर जब उसका बड़ा बेटा रूकनुद्दीन फीरोजशाह तख्त पर बैठ गया था तो उसने अपने को एक दम निकम्मा बना डाला और उसकी माँ कुसीदा भी उसके बुरे कामों में उसे मदद पहुँचाने लगी थी। इसका नतीजा यह हुआ कि वह (रूकनुद्दीन) हरदम रंडी भंडुओं की सोहबत में डूबा रहता था, नशे और तमाशबीनी ही की शगल उसे आठों शाम रहती थी और सल्तनत का इंतजाम उसने अपनी माँ के भरोसे छोड़ दिया था। यही सबब था कि सल्तनत पर अपना कब्जा कायम रखने के खयाल से कुसीदा रुकनुद्दीन की बदचलनी को और भी तरक्की देती गई। वह बड़ी जालिम थी और अपने एक विश्वासपात्र वजीर बहरामखाँ के कहने में चलने लगी थी। इसका यह नतीजा हुआ कि खजाना वाहियात में लुटने लगा और सात महीने के अंदर रुकनुद्दीन तख्त से उतारा गया।'

बहरामखाँ शमसुद्दीन का एक प्यारा गुलाम था, जिसे उस (शमसुद्दीन) ने पढ़ा लिखा कर अपना मुसाहब बनाया था। जिस समय शमसुद्दीन अलतिमश बिहार का सूबेदार था, बहराम निरा लौंडा था; पर जब दिल्ली के तख्त पर शमसुद्दीन ने अपना कब्जा किया, बहराम को अपना 'नायब दीवान' बनाया इधर जब मुलतान में शमसुद्दीन मर गया और रुकनुद्दीन बादशाह हुआ तो कुसीदा ने बहराम को वजीर आजम बनाया। क्योंकि शमसुद्दीन का वजीर खुर्शेदखाँ उसके साथ मुलतान में था और दिल्ली में वजीर आजम के बहदे पर खुर्शेद कायम रहा और बहराम अपने पुराने बहदे 'नायबदीवानी' पर बहाल रहा।

यह बात हम कह आए हैं कि रज़िया के तख्त पर बैठने के समय उसकी माँ कुसीदा बेगम की उम्र बयालीस बरस की थी। बहराम खाँ उस समय चालीस बरस का एक हट्टा जवान था। वह संसार में एकदम तनहा था और उसने अपनी शादी नहीं कि थी; किंतु उसकी चाल चलन लोगों के जाहिर में बहुत अच्छी थी, यह हम नहीं जानते, पर इतना हम अवश्य कहेंगे कि यदि कुसीदा को बहराम सरीखा एक धूर्त मनुष्य न मिल गया होता तो कदाचित रज़िया की बर्बादी इतनी जल्दी न होती और उसके भाइयों को भी अपनी बहिन के पंजे से निकल जाने का मौका न मिलता। बहरामखाँ कैसा धूर्त था, इसकी कुछ थाह उसकी एक दिन की बातचीत से, जो कुसीदा के साथ हुई थी, पाठकों को लग जाएगी।

समय आधी रात का था। कुसीदा बगम एक छोटे से सजे हुए कमरे में, जिसके सब दरवाजे भीतर से बंद थे, टहल रही थी और रह-रहकर कान खड़े करके किसी की आहट ले रही थी। वह चौखूटा कमरा एक बारहदरी थी, जिसमें कान खड़े करके किसी की आहट ले रही थी। वह चौखूटा कमरा एक बारहदरी थी, जिसके हर एक ओर तीन-तीन दरवाजे थे, जो सबके सब भीतर से बंद थे और उसके कमरे में उस समय सिवाय कुसीदा बेगम के और कोई न था। वह कितनी देर से इस प्रकार टहल रही थी, यही नहीं मालूम, किंतु एकाएक किसी किस्म की खटके की आवाज, जोरावर, रोबीला और खूबसूरत जवान कुसीदा के सामने आ खड़ा हुआ। कुसीदा ने मुस्कुराकर उससे हाथ मिलाया और उसे लाकर एक मखमली कुर्सी पर बैठाया। उसी के सामने दूसरी कुर्सी पर वह खुद भी बैठ गई और बोली - बहराम, ''इसमें कोई शम नहीं। क्योकि रज़िया की उस हर्कत से, जो उसने उस बुतखाने और गौवों के बचाने के वास्ते बहुत से मुसलमानों को जेल भेज दिया है, सब मुसलमानों का जी उससे फिर गया है और सभी उसे काफिर समझने लगे हैं। इसके अलावे जब लोगों पर उसकी यह बात जाहिर होगी कि उसने अपने अस्तबल के एक दारोगा को, जो पेश्तर एक अदना गुलाम था, जिस नीयत से 'अमीर-उल-अमरा' की खिताब से सर्फराज किया है, फौरन बवाल मच जाएगा और कुत्ते की मौत मारी जाएगी।''

कुसीदा, ''या खुदा! क्या वह गुलाम 'अमीर-उल-उमरा' बनाया गया है! अफसोस! अब मैं इस दर्जे को पहुँच गई कि मुझे किसी अम्र की खबर ही नहीं मालूम होती! मगर खैर सुनो, जल्द इसे गारत करो। ''

बहराम, ''खैर सुनो, यह मैं तुमसे कह चुका हूँ कि मैंने एक अजीब ढंग से अलतूनियाँ से दोस्ती पैदा कर ली है और भटिंडे जाकर तुम्हारे बड़े शाहजादे के वहाँ पर कैद रहने का पूरा पता लगा आया हूँ।''

कुसीदा, ''हाँ, यह तुम कह चुके हो; और यह बात भी मैंने तुम्हारी ही जबानी सुनी है कि छोटे शाहजादे भी यहीं पर कैद हैं।''

बहराम, ''और तुम खुद भी कैदी ही तो हो कि इस कमरे से बाहर होने की इजाजत तुम्हें नहीं है।''

कुसीदा, ''यह तो हुई है; मगर बहराम! रज़िया को अगर ख्वाब में भी इस तिलस्सी बारहदरी का पता लग गया होता तो वह हर्गिज मुझे, मेरी मर्जी के मुताबिक इसमें न रहने देती।''

बहराम, ''फकत इतना ही नहीं, बल्कि यहाँ पर बहुत से मुकामात ऐसे हैं, जिनकी अभी तक तुम्हें भी मुतलक खबर नहीं है। मगर खैर, हाँ तो सुनो, रज़िया तो उस गुलाम याकू़ब पर आशिक हुई है, लेकिन याकूब उसे मुतलक नहीं चाहता।''

कुसीदा, ''क्या यह तुम ठीक कह रहे हो!''

बहराम, ''इसका तमाशा तुम्हें मैं अभी दिखलाऊँगा।''

यों कह कर बहराम उठा और उठ कर उसने एक ओर का दरवाजा खोला। फिर उसके अंदर वह कुसीदा को ले गया। वह मुकाम, जहाँ पर बहराम कुसीदा को ले गया था, एक छोठी सी कोठरी थी। वहाँ पर पहुँच कर बहराम ने उसे कोठरी की दीवार में की एक लकड़ी की तख्ती हटा दी तो स्याह आईना दीवार में जड़ा हुआ निकल आया। उसी आईने में से, जो वास्तव में रज़िया की ख्वाबगाह की दीवार में ही जड़ा हुआ था, दोनों उस (रज़िया) की ख्वाबगाह का तमाशा देखने लगे।

उस समय रज़िया बेताब होकर याकूब को अपने काबू में लाने का जाल बिछा रही थी, पर वह नमकहलाल याकू़ब उसके सामने अदब से झुका हुआ, उसकी नसीहत कर रहा था। मतलब यह कि उस दिन जो कुछ बातें रज़िया और याकू़ब में हुई थीं, उन का बहुत सा हिस्सा कुसीदा और बहराम ने सुना था। पर यह, वह पहिली मुलाकात न थी, जिसका हाल हम पहिले लिख आए हैं, वरन उसके बाद की थीं, जब रज़िया मौत का निवाला होते होते बच गई थी।

कुसीदा यह हाल देख दंग हो गई और फिर बहराम के साथ वह अपने कमरे में आ बैठी और बोली, - ''अय, बहराम! तुम इनसान हौ या कौन बशर हो! अय गजब, यह बात तो मुझे आज मालूम हुई कि इस बारहदरी में से रज़िया की ख्वाबगाह भी दिखलाई पड़ती है!

बहराम, 'फकत इतना ही नहीं, बल्कि अगर तुम चाहो तो उसकी ख्वाबगाह में भी इसी बारहदरी के अंदर से ही पहुँच सकती हो। यहाँ के जितने हालत मुझे तुम्हारे शौहर ने बतलाए थे।''

कुसीदा (ताने से) ''तुम उनके ऐसे ही पयारे थे।''

बहराम (हँसकर) ''खैर, यही सही; अच्छा, सुनो, अब तो तुमने यह बात बखूबी जान ली होगी कि रज़िया जिस पर मर रही है, वह उसे मुतलक नहीं चाहता।''

बहराम, ''इसलिए कि वह अपना दिल रज़िया की सहेली सौसन के हाथ बेच चुका है और वह (सौसन) भी उस पर जी जान से मुश्ताक हो रही है। इसके अलावे इस गुलाम (याकू़ब) के शागिर्द अयूब पर रज़िया की लौंडी जोहरा फरेफ्तः हुई है, मगर वह रज़िया की दूसरी सहेली गुलशन पर दिवाना हो रहा है और गुलशन भी उस पर निसार हो रही है। अजीब कैफियत है कि एक-एक माशूक के दो-दो आशिक हो रहे हैं और उनमें द फर्न वार चल रहे हैं, अब खुदा ही खैर करे।''

कुसीदा, ''बल्कि यों कहो कि खुदा इन कमबख्तों को गारत करे। मगर खैर, यह तो बतलाओ कि तुमने ये सब हालात क्यों कर जाने?''

बहराम, ''सुनो, एक दिन मैंने बाग में छिपकर सौसन और गुलशन की वे बातें सुनी थीं जो वे अपने अपने माशूकों के साथ कर रही थीं! उसी मौके पर मैंने अयूब और जोहरा की बातें भी सुनी थीं। मैंने उसी दंगल में रज़िया, उसकी सहेलियों और जोहरा की आँखों को परख लिया था कि किसकी आँखें किस जोश के साथ किसे तक रही हैं। इसी सबब से मैंने एक दिन बाग में छिप कर उस कैफियत को देखा, जिसका बयान मैं अभी कर गया हूँ। फिर एक रोज जोहरा याकू़ब को पहिले पहिल रज़िया की ख्वाब मैंने दूसरी राह से रज़िया की ख्वाबगाह के बगल में एक मुकाम पर पहुँच कर कुल कैफियत देखी थी। फिर याकू़ब के रुखसत होने के पेश्तर ही मैं। अपनी जगह से रवाना हुआ और एक खत लिख और उसे याकूब की कोठरी में डाल अपने डेरे पर चला आया इसके बाद जब याकूब 'अमीर-उल-उमरा' बना तो मैंने बात की बात में उससे दोस्ती कर ली, और उसके शार्गिद अयूब से भी, जो अब 'मुंशी कुतुबखान हुआ है।

यह वही ही था, जिसने उस रोज रज़िया को इतना तंग किया था। उसकी बातें सुनकर कुसीदा की आँखें लाल हो गई और उसने तमक कर कहा, ''मगर क्यों साहब! आप भी रज़िया के एक आशिक हैं क्या! अफसोस आपकी उस रोज शादी न होने पाई!''

बहराम, ''क्या खूब! अजी, मैंने तो, फकत यह जानने के लिए, कि वह याकूब को किस कदर चाहती है, उससे यह दिल्लगी, की थी। दरअसल न मैं उसे मार ही डालता और न उससे शादी ही करता; मगर अफ्सोस! उस अजनबी के एकाएक पहुँच जाने से जिसे मैं मुतलक नहीं पहिचान सका, कुछ न हो सका और उसे देखते ही मैं वहाँ से रफूचक्कर हुआ, ताकि जाहिर न हो जाऊँ।''

कु़सीदा, ''तुम तो कहे थे कि उस तिलस्मी कमरे का हाल सिवा तुम्हारे और कोई नहीं जानता, फिर उस वक्त वहाँ पर कौन पहुँच गया?''

बहराम, ''इस बात पर तो मैं भी हैरान हूँ कि वह कौन शख्स था, जिसे उस कमरे का हाल मालूम है; और वह ठीक वक्त पर उसकी मदद के लिए वहाँ क्यों कर जा पहुँचा था!''

निदान, फिर इस सिलसिले को दूसरे दिन के लिए छोड़ कर बहराम बिदा हुआ और कुसीदा ने जाकर पलंग पर आराम किया। प्रातःकाल हो गया था।

 

परिशिष्ट - 4

उपन्यास : राजकुमारी

'' माधो! मैं पतितन को राजा!''

''विषमा मलिनात्मानो द्विजिह्ना जिह्मगा इव।
जगत्प्राणहरा नित्यं कस्य नोद्वेजकाः खलाः।।''
(हरिगणस्य)

( रामलोचन का पत्र)

तीसरे दिन के दरबार आरंभ होने पर ब्रह्मचारी जी ने रामलोचन की आत्महत्या और उसके लिखे हुए पत्र के पाने का हाल कहकर उसके पत्र को पढ़ना प्रारंभ किया। उसने अपने पत्र में यों लिखा था -

''हाय! हाय! मैं घोर पापी हूँ। मेरे भयानक पापों का प्रायश्चित भी नहीं और मेरा कभी नरक की साँसत से उद्धार भी नहीं ही होगा! हाय! स्वामी के संग जैसा विश्वासघात और नमकहरामी मैंने की, उसके बदले में क्या सुख भोगा और अंत में क्या नतीजा पाया, इसे देखकर मेरे ही स्वभाव वाले लोग जरा सावधान हो जाए; क्योंकि किसी ने सच कहा है कि -

''कलजुग नहीं करजुग है यह,
     याँ दिन को दे और रात ले।
     क्या खूब सौदा नकद है,
     इस हाथ दे, उस हाथ ले।''

''हाय! बड़ी ही खोटी सायत में हुसैनी के साथ मेरी जान पहचान हुई थी, और यह बात सच ही हो गई कि - 'तुख्त तीसीर, सोहबत असर!'

''हुसैनी मुर्शिदाबाद के नवाब के यहाँ किसी अच्छे काम पर था; पर वह कमबख्त अपनी बदचलनी के सबब वहाँ से भागा। नवाब के महल की किसी औरत के साथ उस नालायक की आशनाई हो गई थी। यह बात सही है कि - 'लगी नहीं छिपती;' सो पर्दाफाश हो गया और हुसैनी के कत्ल का हुक्म हुआ; मगर उसे खबर लग गई, इससे वह वहाँ से भागा और मेरा साढ़ेसाती सनीचर बनकर मुझसे आ मिला!

''मेरे दयावान और सज्जन स्वामी राजा हीराचंद मुझ पर बड़ी कृपा रखते थे और वैसा ही सहेलीपने का बर्ताव उनकी सुशीला रानी साहब मेरी सती स्त्री जमनाकुँवर के साथ रखती थीं। मैं सुख की नींद सोता और अपने प्रभू की बढ़वार ही मनाया करता था, मगर अफसोस! साक्षात शैतान हुसैनी की शैतानी का असर धीरे-धीरे मेरा रोम-रोम में ऐसा भीग गया कि मैं खासा शैतान क्या, बल्कि शैतानों का किबलेगाह बन गया और फिर जो कुछ मैंने शैतानी का काम किया, अब उसके खयाल करने से भी मेरी रूह काँप उठती है। हा! अफसोस!!

''धीरे-धीरे मैं हुसैनी का पूरा गुलाम बन गया और राजा हीराचंद के ऊपर हाथ सफाई का मौका ढूँढ़ने लगा; मगर शैतान का काम क्या कभी रुका है? बस चट बरसात में रजासाहब सौताल-पर्गन में शिकार खेलने गए थे, वहीं जंगल में अकेला पाकर हुसैनी ने उन्हें बेकाबू करके संदूक में बंद किया और एक निरपराधी सौताल को मार, उसके खून में राजा के कपड़े रंग उसी के हाड़-मांस को राजा का बतला और यह जाहिर कर कि, 'राजा को शेर ने मार डाला', उसी जंगल में उनका नाम-निशान मिटा दिया।

''फिर हुसैनी की हिफाजत में छिपा लुकाकर संदूक में बंद राजासाहब मुंगेर लाए गए और अजायबघर में कैद किए गए। उनके कैद कर लेने पर पचासों राजकर्मचारियों को, जिन्होंने कि मेरी अधीनता नहीं मानी, उसी अजायबघर में ले जाकर कइयों को मैंने, और बहुतों को हुसैनी ने, मार डाला, जिनके कंकाल भी जाकर फेंके, कइयों को मैंने मारा, हाँ! आखिर एक दिन कमबख्त हुसैनी भी मारा गया और मैं अब अपना काम आप तमाम किया चाहता हूँ।

''यद्यपि ये सब काम मैंने किए, पर न जाने क्यों, मेरा कलेजा रह-रहकर इस कदर काँपता था कि न तो मैंने राजा को बेकाबू करने में हाथ बढ़ाया औरन अजायबघर में कैद करने पर बहुत दिनों तक मैं उनके सामने ही गया। हुसैनी बार बार मुझे यही सलाह देता था कि, 'हीराचंद को मार डालना ही अच्छा है, मगर न जाने क्यों, (सो ईश्वर ही जाने) उसकी इस राय पर मैं काँप उठता और यही जवाब देता कि, 'नहीं, नहीं; ऐसा नहीं होगा; यह आप ही कैदखाने की तकलीफ से कुछ रोज में मर जाएगा।' मगर यह कौन जानता था कि दस-बारह बरस जमीन के अंदर कैद की तकलीफ झेलकर भी राजा हीराचंद यों एकाएक धरती के ऊपर प्रगट हो जाएँगे और मैं यों अपनी करनी का फल पाऊँगा!

''राजासाहब का विशाल राजप्रसाद गंगा किनारे से उस अजायबघर तक फैला हुआ था, जिसमें कि अब मेरी गृहस्थी रहती है; मगर उस अजायबखाने' का हाल इतना पोशीदा था, कि राजासाहब अपनी रानी पर भी शायद नहीं जाहिर करते थे, तो मेरी क्या हकीकत थी! पर हुसैनी कमबख्त एक ही हरामी था, उसने मुझे अजायबघर के हाल जानने को इतना उभारा कि आखिर मैंने उसके हाल दर्याफ्त करने का भार हुसैनी ही पार दिया। वह भी एक ही शैतान था, आखिर उसने नई तालियाँ बनाकर अजायबघर को खोला और फिर हम दोनों ने मिलकर जहाँ तक हो सका, उसकी सैर की और वहाँ की बेशुमार दौलत देखी!

''मगर फिर भी, वहाँ पर के कई अजीब मामले मेरी समझ में न आए! एक तो उस कोठरी का हाल मैंने न जाना, जिसमें एक पुतला तलवार लिए खड़ा था! और उसमें पैर रखते ही वार करने को तैयार हो जाता था! दूसरे, एक कुएँ पर ढकी हुई ताँबे की चद्दर का पता भी मुझे न लगा कि उसके अंदर क्या है और उसके छूने से क्यों बेहोशी पैदा होती है! बस, इसी भाँति और भी कोई चीज उस अजायबघर में ऐसी रही होगी, जिसका भेद मुझे न जान पड़ा होगा!

''राजा हीराचंद को कैद कर लेने पर मैंने उनके खाने-पीने के लिए कभी कुछ भी नहीं भेजा, क्योंकि मैं बिना दाना पानी ही उन्हें मार डालना चाहता था; पर जब मैं, या हुसैनी, वहाँ गए, तब उन्हें हट्टे-कट्टे तंदुरुस्त और हाथ में तलवार लिए हुए टहलते पाया। यद्यपि मैं बेशर्म बनकर उनके सामने गया भी, पर उन्होंने मेरी ओर देखकर थूका और नजर फेरकर वहाँ से वे उस कोठरी के अंदर चले गए, जिसमें वह तलवार-बहादुर पुतला था! हुसैनी से भी वे कभी नहीं बोले और न कभी हम लोगों से अपनी खलासी के लिए उन्होंने कुछ कहा!

''मैंने और हुसैनी ने भी, यह ढंग देखकर बड़ा ताज्जुब किया और इस भेद को आजतक न समझा कि वे क्या खाते-पीते थे और क्योंकि जीते थे! यद्यपि मेरी राय न थी, पर हुसैनी ने अपनी इच्छा से बहुत कोशिश की कि हीराचंद को मार डाले; पर वे इतने होशियार रहते थे, और कभी-कभी न जाने कहाँ गायब हो जाते थे, कि आखिर उन पर हुसैनी की घात नहीं लगी और फिर इस डर से कि, कहीं हम्हीं लोगों का वे न मार डालें, हम लोग पीपल के पेड़ वाली राह से ताँबे के छींके पर बैठकर उस अजायबघर के अंदर जाते थे, क्योंकि इस तरह जाने में खतरा कम था। हाँ! इतना अवश्य था कि यदि हमलोग कभी वहाँ से कुछ जर, जवाहरात, अशर्फियाँ या कोई और चीज पर हाथ डालते तो राजासाहब फकत 'खबरदार!' कहकर लेने पाए; मगर ताज्जुब है कि उन्होंने हम दोनों में से एक को, या दोनों को, मार क्यों नहीं डाला? क्योंकि यदि वे चाहते तो ऐसा कर सकते थे। उस अजायबघर में अजीब सिफत थी कि कैदी तो बिना कुछ खाए-पीए बेफिक्र उसमें घूमे, और कैद करने वाला ही हर बार उससे अपनी तई बचाता रहे! मगर यह बात क्या थी, सो आजतक हम दोनों की समझ में न आई!

''अब लोग यह पूछ सकते हैं, कि 'जब राजासाहब में कैद होने पर भी इतनी ताकत थी तो वे उस कैदखाने में इतने दिनों तक रहे क्योंकर?' इसका जवाब, जहाँ तक मैं समझता हूँ यही हो सकता है कि, चाहे राजासाहब कैद में किसी ताकत के सबब से इतने वर्षों तक जीते रहे हों, पर उस अजायबघर से निकल जाना जरूर उनकी ताकत के बाहर रहा होगा! इसका सबब शायद यही हो सकता है कि उस अजायबखाने के अंदर उसकी दूसरी ताली न रही होगी! क्योंकि उस अजायबघर की तालियों का गुच्छा, जो कि राजासाहब के साथ ही साथ लोहे की संदूक में रहता था, उनके कैद कर लेने पर मैंने उसे अपने तहत में कर लिया था फिर उसी गुच्छे की तालियों से मैंने काम लेना प्रारंभ किया, और हुसैनी की बनाई तालियों को बेकार समझकर तोड़-फोड़ डाला। मुझे ब्रह्मचारी से बहुत खटका था, इसलिए जब वह तीर्थ करने जाने लगा था, तब मैंने एक आदमी उसके पीछे लगा दिया था। उस आदमी ने ब्रह्मचारी को धतूरे के बीज खिला-खिलाकर पागल बना डाला, इसलिए जब वह तीर्थ करके लौटा तो खासा पागल हो गया था; मगर कुछ बरसों के बाद फिर होश में आने पर तो उसने वह खेल खेला, कि वाह!

''मानिक को मैंने बच्चा समझकर राज्य से बेदखल कर निकाल बाहर किया और गंगा किनारे वाली इमारतों को मटियामेट कर इसी अजायबघर वाले बाग या मकान में अपनी गृहस्थी लेकर मैं रहने लगा। फिर कुछ दिन पीछे गिरिजा मानिक को लेकर मुंगेर में आई और खंडहर में रहने लगी। यद्यपि हुसैनी ने बहुत चाहा कि मानिक या गिरिजा को मार डाला जाए, मगर मैंने इस बात पर कुछ ध्यान नहीं दिया।

''कुछ दिनों के बाद हुसैनी ने यह पता लगाया कि, 'राजा हीराचंद ने कोई वसीका मानिक के नाम लिख दिया था, जो कि गिरिजा के कब्जे में है, और उसे वह खंडहर वाले तहखाने में लोहे की संदूक में रखे हुई है!' इस खबर के पाते ही सुरंग के रास्ते से भीतर ही भीतर जाकर मैंने उन कागजों को उड़ा कर अपने हाथ में किया, पर उन्हें फूँक क्यों न डाला, यह मेरी मूर्खता थी! उसके बाद गिरिजा मरी और हुसैनी ने रामानंद बन और छिपकर वे सब हाल सुने, जो कि उसने मरती बार, मानिक से कहे थे। फिर उसे हुसैनी ही ने फूका भी; मगर न जाने कहाँ से दूसरे दिन रामानंद आ पड़ा और फिर क्या हुआ, इसका हाल तो वह खुद भी कह सकता है।

''अब मैं कुछ भी नहीं कहना चाहता, सिवा इसके कि मेरी नमकहरामी के सारे हालात संसार में सर्वसाधारण के आगे जाहिर किए जाएँ और आत्महत्या अगर मैं कर गुजरा तो मेरी मिट्टी गंगा में जरूर बहा दी जाए; क्योंकि यद्यपि मेरा निस्तार प्रलय तक नरक से न होगा, पर फिर भी मुझे श्रीगंगा माता की इस अलौकिक महिमा पर अपने लिए भी कुछ भरोसा होता है कि - 'जेते तुम तारे, तेते नभ में न तारे हैं!

परिशिष्ट - 5

आदर्श रमणी वा हृदयहारिणी

' विधिविडंबना '

'' विधिर्हि बलिनां बली।''

जिस समय का हाल हम इस उपन्यास में लिख रहे हैं, उस समय रंगपुर के महाराज भी बंगदेश के प्रसिद्ध राजाओं में गिने जाते थे। कहते हैं कि एक बार दिल्ली के बादशाह अकबर ने रंगपुर के महाराज को हाथी घोड़े आदि बहुमूल्य पदार्थ तोहफे के तौर पर भेजे थे, इसलिए रंगपुर के राजा लोग बराबर दिल्ली के बादशाह के पक्षपाती रहे और बंगाले के सूबेदार से कभी न दबे; किंतु यह बात हम कह आए हैं और फिर भी कहते हैं कि समय जो चाहे सो करे। यद्यपि रंगपुर ने बंगाले के कतिपय अत्याचारी सूबेदारों के बड़े-बड़े हमले झेले, पर अंत में उसका भी बल क्षीण हो गया और उसे भी समय के फेर में पड़ कर बर्बाद होना पड़ा। यद्यपि कई अत्याचारियों की शनैश्चर की सी दृष्टि उस पर लगातार पड़ती आती थी, पर अंत में बंगाले के रावण सिराजुद्दौला ने उसे भरपूर तहस-नहस कर डाला। उस समय के बंगालियों के रोदन की प्रतिध्वनि अब तक इतिहासों में गूँज रही है।

जिस समय का हाल हम लिख रहे हैं, उस समय रंगपुर के बूढ़े राजा का नाम महाराजा महेंद्रसिंह था। ये बड़े तेजस्वी, प्रतापी, प्रजावत्सल, नीतिनिपुण और संस्कृत के पूरे पंडित थे। इनकी गुणग्राहकता और वदान्यता से उस समय बंगदेश में संस्कृत की बड़ी उन्नति हुई थी और संस्कृत के बड़े-बड़े विद्वानों ने अच्छे अच्छे ग्रंथ लिखे थे। महाराज बड़े धर्मिष्ट थे; प्रतिदिन तीन पहर से अधिक समय उनका पूजा पाठ में व्यतीत होता था। अवस्था यद्यपि पच्चासी बरस से ऊपर पहुँच चुकी थी, पर तो भी व्यायाम और उचित आहार विहार के कारण उन्हें कोई साठ बरस से ज्यादे उमरवाला नहीं कह सकता था। उनको एक पुत्र और एक ही कन्या थी। महाराज की स्त्री (महारानी) का नाम गिरिजादेवी था। यह मालदह के राजा की कन्या थीं। महाराजा और महारानी में, जैसा चाहिए, उससे भी अधिक प्रेम था और दोनों बड़े आनंद से इस लोक में ही स्वर्ग का सा सुख भोगते थे, किंतु अखंडनीय काल की महिमा ने राजा रानी में वियोग करा दिया। यद्यपि गिरिजादेवी के लिए यह बात बड़े हर्ष की हुई कि वह अपने पति के सामने ही परलोक सिधार गई किंतु महाराज के हृदय में प्यारी पत्नी के बिछोह की ऐसी गहरी चोट लगी कि उन्होंने उसी समय राज्य का भार अपने युवा पुत्र को देकर काशीवास करने के लिए पश्चिम की यात्रा की।

महाराज महेंद्रसिंह के सुयोग्य पुत्र का नाम नरेंद्रसिंह था। ये सचमुच अपने नामानुसार नरेंद्र की पदवी पाने के योग्य थे। उस समय इनकी अवस्था केवल इक्कीस-बाईस बरस की थी, जब इनके पिता काशीवासी हुए थे। ये संस्कृत और फारसी तथा शस्त्रविद्या में बड़े निपुण हो चुके थे और एक सुयोग्य युवराज के लिए जितने अच्छे गुणों की आवश्यकता है, उन सभों को ये पा चुके थे। महाराज महेंद्रसिंह बालविवाह के घोर विरोधी थे, इसलिए अबतक नरेंद्रसिंह छरे थे और इनकी तेरह-चौदह बरस की बहिन का भी विवाह नहीं हुआ था। राजकन्या भी संस्कृत तथा फारसी में और शस्त्रविद्या में अभ्यास रखती थी। उस राजकन्या अर्थात नरेंद्रसिंह की छोटी बहिन का नाम लवंगलता था।

पिता के काशी जाने पर नरेंद्रसिंह को राज्य की चिंता के साथ ही साथ और भी सैकड़ों तरह की चिंताओं ने घेर लिया था, तौ भी वे राजकाज को भली-भाँति से करते थे; किंतु बीच में एक बड़ी भारी दुर्घटना हो गई, जिसने नरेंद्रसिंह को बड़े झमेले में डाल दिया था, परंतु धीरज और बुद्धिमानी के साथ उन्होंने उस दुर्घटना का सामना करके उसे परास्त किया।

एक दिन दो व्यक्तियों के साथ अकेले में बैठे हुए नरेंद्रसिंह राजकाज संबंधी किसी गूढ़ विषय पर विचार कर रहे थे और उन तीनों के अलावे वहाँ पर उस समय कोई चौथा था न था। उन दो व्यक्तियों में एक तो उनके योग्य मंत्री माधवसिंह थे और दूसरे दिनाजपुर के राजकुमार कुमार मदनमोहन।

ये तीनों व्यक्ति किसी विषय पर कुछ तर्क-वितर्क कर रहे थे कि इतने ही में चोबदार ने आकर पाँच पत्र नरेंद्र सिंह के सामने रख दिए और फिर वहाँ से वह चला गया। पहिले नरेंद्रसिंह ने एक-एक करके उन लिफाफों को देखा और फिर उनमें से पहिले एक पत्र को खोल कर पढ़ा और फिर उसे अपने मंत्री के हाथ में दिया। सबके पीछे मदनमोहन ने भी उसे बाँचा। वह पत्र 'ईस्ट इंडियन कंपनी' के गवर्नर जनरल लार्ड क्लाइव साहब का लिखा हुआ था। पाठकों के मन बहलाव के लिए हम उसकी नकल हिंदी में नीचे लिख देते हैं -

''प्रियमित्र महाराज नरेंद्र सिंह!

''आपका कृपा-पत्र पाया, समाचार जाना।

''यह जान कर, कि आपकी पूजनीया माता का परलोकबास हुआ और आपके पूज्य पिताजी राज्य को त्याग कर काशीवासी हुए, चित्त को बड़ा खेद हुआ, किंतु यदि मुझे संतोष है तो इस बात से है कि बूढ़े महाराज ने राज्य का भार अपने सुयोग्य पुत्र (आप) के हाथ में दिया है।

''दुराचारी सिराजुद्दौला के अत्याचारों का हाल मुझे भली-भाँति मालूम है और आप निश्चय जानिए, वह दुष्ट अपनी करतूतों का नतीजा बहुत जल्द पावेगा। आप जानते ही हैं कि उसके कई दर्बारी मेरी ओर आ मिले हैं, जिनसे इस बात का पूरा निश्चय किया जा सकता है कि बहुत जल्द सिराजुद्दौला को तख्त से उतार कर उसकी जगह उसके सेनापति मीरजाफरखाँ को सूबेदार बनाऊँ।

''आपने अपने पत्र में जो कुछ लिखा है, उस पर हमारी कौंसिल ने अपनी बहुत अच्छी सम्मति प्रगट की है और उसके अनुसार कार्रवाइयाँ भी की जाने लगीं। अंत में, जब कि मीरजाफरखाँ सूबेदार बनाए जाएँगे, आप और आपके मित्रों की जो कुछ स्थावर संपत्तियाँ सिराजुद्दौला या इसके पहिले के जालिम सूबदारों ने जबर्दस्ती छीन ली हैं, उन्हें लौटा देने के लिए खाँ साहब ने पक्का एकरारनामा कंपनी को लिख दिया है।

''आपके कृपापत्र पाने और आपसे मिलने की आशा बनी रही।

आपका सच्चा,

क्लाइव।''

इस पत्र के पढ़ने से उन सभों के मुख पर प्रसंता छा गई और नरेंद्रसिंह ने गंभीरतापूर्वक कहा -

''यदि आज दिन भारत की इतनी दुर्गति न हुई होती, तो आज एक विदेशी मित्र के सामने सहायता के लिए हाथ न फैलाना पड़ता। मैं जहाँ तक अनुमान करता हूँ, एक न एक दिन ये विलायती सौदागर सारे भारतवर्ष में अपना झंडा फहरावेंगे और तब ये लोग यहाँ वालों के साथ कैसा बर्ताव करेंगे, इसे ईश्वर ही जाने, पर इस समय तो ये लोग अत्याचारी मुसलमानों के जुल्म से यहाँ वालों को बहुत ही बचा रहे हैं, यह थोड़े आनंद की बात नहीं है।''

माधवसिंह ने कहा, - ''यद्यपि जिस भाँति कंपनी वाले इस देश में अपना पैर जमाते जाते हैं, आपके कथनानुसार किसी न किसी दिन ये अवश्य भारत के राजा बन बैठेंगे और यहाँ वाले फिर भी पराधीन ही रहेंगे, किंतु एक अत्याचारी राजा की प्रजा बनने की अपेक्षा एक न्यायी राजा का दासानुदास बनना करोड़ गुना अच्छा है, क्योंकि इस बात के लिए यह भारत अँग्रेजों, का सदा रिनियाँ बना रहेगा कि इन्होंने अत्याचारियों के हाथ से यहाँ वालों की जान बचाई। यदि ऐसे अवसर पर अँग्रेज न आए होते तो यहाँ वाले अपना या अपने दशे की कल्याण कभी न कर सकते, क्यों कि कई सौ बरस तक मुसलमानों की गुलामी करते-करते हिंदुओं में अब जान ही कितनी बाकी रह गई है!''

मदनमोहन ने कहा, - ''ठीक है। यद्यपि हिंदुस्तान के कई एक बादशाह और नव्वाब ऐसे न्यायपरायण और प्रजावत्सल हो गए हैं कि जिनके प्रातःस्मरणीय नाम को आदर के साथ लेना चाहिए, पर अत्याचारियों की संख्या इतिहासों में इतनी अधिक है कि उसने प्रातःस्मरणीय, न्यायी मुसलमान-बादशाहों के नाम मानों भुला से दिए हैं! अस्तु, अब इन पत्रों को भी देखना चाहिए कि इनमें क्या लिखा है!''

यह सुन नरेंद्रसिंह ने दूसरी चिट्ठी खोलकर पढ़ी और उसे भी अपने मंत्री और मित्र को दिखलाई। वह चीठी मीरजाफरखाँ की लिखी हुई थी, जिसकी नकल यह है -

''जनाब महाराज साहब बहादुर!

''अर्ज यह है कि जो शर्त आपसे और मुझसे दर्मियान लाट है। मैं आपका निहायत ममनून एहसान हूँ कि आपकी बदौलत जनाब लाट साहब बहादुर मुझ नाचीज को सर्फराज करना चाहते हैं। इनशाहअल्लाहताला, अगर उस पाक परवरदिगार के दर्बार में मेरी इस्तदुवा कबूल हुई तो, खुदा जानता है, मैं आपका हमेशा फर्माबर्दार बना रहूँगा। मैं इस बात का एकरार करता हूँ कि सूबेदारी की सनद पाते ही मैं आपकी और आपके दोस्तों की उन जिमीदारियों को, जिन्हें जालिमों ने बिला वजह जप्त कर लिया है, बिला उज्र फौरन लौटा दूँगा।

बहुक्मे सदर,

मीरजाफर

मीरजाफर के पत्र से उन लोगों को और भी आनंद हुआ और उन लोगों के जी से यह बात जाती रही कि, - 'सभी मुसलमान एक ही तरह के हैं!' इसके बाद एक तीसरा पत्र पढ़ा गया, जिसे मुर्शिदाबाद से नरेंद्र के किसी गुप्तचर ने भेजा था। वह एक गुप्त पत्र था, इसलिए यहाँ पर हम उसका खोलना उचित नहीं समझते।

चौथा पत्र दुष्ट सिराजुद्दौला का था। यद्यपि उस घृणित पत्र की नकल कर हम अपने पाठकों का जी दुखाना नहीं चाहते थे, पर क्या करें, लाचार होकर हमें उस भष्ट पत्र की नकल भी करनी पड़ी -

''नरेंद्रसिंह!

''हमने सुना हैं कि तुम पोशीदा तौर पर जालिम गोरों की मदद करते हो, यह तुम्हारे हक में हर्गिज बेहतर नहीं है। तुम इस बात पर यकीन करो, कि वह दिन बहुत नजदीक है, जब कि मेरे दुश्मन गोरे निहायत ही बेरहमी के साथ कत्ल किए जावेंगे। चुनांचे अगर तुम अपने जान व माल की खैर चाहते हो तो बिलायती गोरों से बिल्कुल ताल्लुक छोड़ दो और मुझे अपनी दोस्ती का यकीन दिलाओ। अपनी सफाई और दोस्ती के जाहिर करने के वास्ते तुम्हारे लिए यह तरीक़ा सबसे अच्छा होगा कि तुम फौरन अपनी हमशीरा नाजनीन लवंगलता को मेरी खिदमत में दाखिल करो, वर्ना तुम यही समझना कि तुम्हारे हयात के दिन पूरे हो गए।

तुम्हारा,

नब्बाब सिराजुद्दौला।''

इस पत्र के पढ़ते ही, मारे क्रोध के नरेंद्र सिंह, माधव सिंह और मदनमोहन की आँखें लाल हो गईं और उनमें से आग की चिनगारियाँ झरने लगीं। नरेंद्र सिंह ने तलवार के कब्जे पर हाथ डालकर कहा -,

''हैं! इस पाजी की इतनी बड़ी मजाल! क्या, भारत से आज हिंदुओं का बिल्कुल नाम ही मिट गया! तब मेरा नाम नरेंद्र कि उस बदमाश को इस कमीनेपन का मुँह तोड़ जवाब दूँ।''

मदनमोहन के क्रोध से भभककर कहा,

''जी चाहता है कि अभी उस नालायक की धज्जियाँ उड़ा दूँ।''

माधव सिंह ने इतनी देर में अपने क्रोध को आप ही आप ठंडा कर लिया था, इसलिए उन्होंने नरेंद्र सिंह और मदनमोहन को बहुत कुछ समझा बुझा कर शांत किया, पर नरेंद्र ने अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार सिराजुद्दौला को एक छोटा सा पत्र अवश्य लिखा। उसकी भी बानगी देखिए,

''सिराजुद्दौला,

''महात्माओं ने सच कहा है कि - 'जब मनुष्य के विनाश होने के दिन आते हैं, तो उसकी बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है, इसलिए जब कि अँग्रेजों से बैर बिसाह कर तुम आप की आप बहुत जल्द बिनष्ट हुआ चाहता है तो ऐसी अवस्था में तुझ पर, तेरे पत्र पर और तेरे घमंड के कारण कुत्तों की मौत मारा जाएगा और तेरी बेगमें बाजारों में टके-टके को बिकती फिरेंगी।''

पाँचवाँ पत्र काशी से नरेंद्र के पुरोहित ने लिखा था, जिसकी ''स्वस्ति श्री चिरायुष्मान, सकलगुणगणालंकृत, महाराज श्री नरेंद्र सिंह वर्मा महाशयेषु कोटिशः शुभाशिषां राशयः संतुतराम् आगे समाचार यह है कि कई दिनों से आपके पूज्य श्री पिताजी की अवस्था बहुत ही गिर गई है और काशी के सभी अच्छे-अच्छे वैद्यों ने एक प्रकार से जवाब दे दिया है, इसलिए जहाँ तक हो सके, आप जल्द आइए।''

इस पत्र ने सभों के चित्त को डाँवाडोल कर दिया। इधर सिराजुद्दौला का अत्याचार और उधर पिता की अंतिम अवस्था; दोनों ओर संकट! किंतु बहुत कुछ सोच विचार करने पर राज्य और लवंगलता की रखवाली का बोझ माधव सिंह तथा मदनमोहन पर डालकर नरेंद्र ने घोड़ों की डाक से उसी समय काशी को प्रस्थान किया।

परिशिष्ट - 6

' किशोरी सतसई '

पौराणिकी :

उपन्यास सम्राट स्व. पं. किशोरीलाल गोस्वामी (जन्म सं0 1922 - निधन सं. 1982) से हिंदी सेवी संसार मुख्यत उपन्यासकार के रूप में - सुपरिचित है। यह कदाचित कम ही लोग जानते होंगे कि उन्होंने एक सतसई भी रची थी जो अब तक अप्रकाशित है। उनके सुपुत्र स्व. छबीलेलाल गोस्वामी ने अपने देहावसान से कुछ मास पूर्व उक्त सतसई श्री राधाविनोद गोस्वामी को प्रकाशनार्थ दी थी किंतु अद्यावधि उसका प्रकाशन नहीं हो सका।

पूरी सतसई स्व. श्रीछबीलेलाल गोस्वामी के द्वारा सुपाठ्य अक्षरों में डिमाई आकार की छह कापियों तथा 227 पृष्ठों पर लिखी हुई है। प्रथम पृष्ठ पर दो दोहे लिखने के पश्चात पाद टिप्पणी में लेखक के हाथ की 5 टिप्पणियाँ इस प्रकार हैं -

1. भक्ति विषयक 709 दोहे हैं।
    2. श्री किशोरीलाल गोस्वामी कृत है।
    3. छबीलेलाल गोस्वामी संपादित है।
    4. छपने पर मूल्य होगा।
    5. सरकार को ग्रामों के लिए चार आने में दी जाएँगी।
     छबीलेलाल गोस्वामी

(भक्ति सतसई का प्रथम बार पत्रिका में धारावाहिक प्रकाशन श्री राधाविनोद गोस्वामी के सौजन्य से हो रहा है।)

।। श्रीः।।
भक्ति सतसई
(दोहा)

                    जय जय श्री राधा रमन, जय जय श्रीब्रज चंद।
                        जय जय श्री जसुमतिसुवन, जय जय श्री नंदनंद।। 1।।
                        जय श्री वृंदा विपिन नथ, जय श्रीकुंज ललाम।
                        जय श्री जमुनाकूल सुभ जय श्री गिरिधर धाम।। 2।।
                        जय ब्रज मंडल नवल नव, जय ब्रजजन अभिराम।
                        जय-जल थल नभचर निकर, जय तरु लता ललाम।।3।।
                        जय श्रीहरि लीला सुधा सागर गुरु-गंभीर।
                        जय रस भाव तरंग मय, जन-मन पावन नीर।।4।।
                        नचत सदा जहँ प्रेममय, घनमन मोर अथोर।
                        दामिनि कामिनि सहित घनश्याम निरखि दृगकोर।।5।।
                        कहत कछुक अनुपम कथा, बानी बपु धरि कीर।
                        धुनि सुनि गुनि रस रासि चुनि, बाढ़त पुलक सरीर।।6।।
                        निज जीवन, जीवन करन, सफल सच्चिदानंद।
                        ब्रजमंडल मंडल परम, प्रगटे पूरनचंद।।7।।
                        नेति-नेति जेहि वेद कह, सूत्र कहत अव्यक्त
                        सोई निज जन हित हरी, प्रकट भए हैं व्यक्त।।8।।
                        मन बामा गोचर नहीं, दुरतिक्रम, मग ध्वांत।
                        श्रुति कुंठित, स्मृति प्रहत गति, अगम सूत्र सिद्धांत।।9।।
                        निजमति अनुसरि बिबिध बिध, भाखत बुद्धिनिधान।
                        पै कोऊ करि सकत नहिं, साँची प्रभु पहिचान।।10।।
                        पड़े सकल भ्रम तिमिर मग, ज्ञान गरूर बढ़ाई।
                        बुद्धि बिबेक बिहाइ निज, हृदय भरे कुटिलाई।।11।।
                        श्री मुख गीता-गीत सुभ, मारग परम पुनीत।
                        दुरमति बस तजि अधम जन, चलत पंथ विपरीत।।12।।
                        जनम-जनम करि-करि जतन, ज्ञान गर्व हिय धारि।
                        पावत नहिं हरि चरन सुभ, जब रज तम बल हारि।।13।।
                        प्रकट रजोगुन तें प्रबल, काम क्रोध रिपु रूप।
                        इनके पाले परि मनुज, परत रहत भव कूप।।14।।
                        द्वार तीन ये नरक के, काम क्रोध अरू लोभ।
                        इनके बस पडि़ मूढ़ जन, नित गति लहत असोभ।।15।।
                        पड़े राग विद्वेष महँ, मूढ़ जीव भरपूर।
                        भलो-बुरो समुझत नहीं, अधम आलसी कूर।।16।।
                        घटे धरम, बाढ़ै जबहिं, अति अधरम अनिवार।
                        करुना करि अवतरत तब, अखिल भुवन करतार।।17।।
                        करै कामना रहित नित, सबै काम धरि चेत।
                        करि अधीन मन, मनुज फल, अरपै हरिहिं सहेत।।18।।
                        जनम-जनम करि बहु जतन, ज्ञानी तरत सुनात।
                        भक्ति-भाव भावुक सुभट, जीवन मुक्त लखात।।19।।
                        भक्ति-भाव भूखे प्रभू रीझत सरल सुभाव।
                        निज जनते राखत न कछु मोहन मनहिं दुराव।।20।।
                        क्यों भटकत भ्रमजाल महँ, अरे मूढ़मति जीव।
                        छाँडि़ सबै जंजाल तू, लै रस सरस अतीव।।21।।
                        कर्म अरु ज्ञान उपासना, श्रुति त्रिकांड यह आहिं।
                        पै बिनु साँची भक्ति हरि, कबहूँ रीझत नाहिं।।22।।
                        श्री हरि में सब भाँति जो, परानुरक्ति लखाई
                        शुद्ध कामना तें रहित, सोई भक्ति कहाई।।23।।
                        मनहिं लगावै मनुज हो, मनमोहन में मीत।
                        पावै सोइ अमृत फल, मंगल मूल पुनीत।।24।।
                        हरि बिमुखन हूँ कों सदा, होत हरी को ज्ञान।
                        यातें भक्तिहिं ज्ञान नहिं, कोऊ कहत सुजान।।25।।
                        पूरन भक्ति भएँ सदा, ज्ञान गर्व नसि जात।
                        पै कबहूँ नहिं भक्ति को, होत बिनास लखात।।26।।
                        द्वेषभाव, प्रतिकूल अरू, रसभय सिद्ध स्वरूप।
                        भक्ति कहावत है अहो, कोउ अनुराग अनूप।।27।।
                        भक्ति, साधकाधीन नहि, ज्ञान कर्म की भाँति।
                        मिलन हेतु याकों परम, श्री हरि कृपा दिखाति।।28।।
                        अहो, भक्ति के फलन कों, अंत नहीं, सुनु एहि।
                        स्रुति सारद विधि सेस सिव, बरनि सकत नहिं जेहि।।29।।
                        सब साधन छयमान हैं, मानवकृत जग माहिं।
                        भक्तिरूपिनी हरि दया, होत कबहुँ छय नाहिं।।30।।
                        अमित जनम के अंत कहुँ, ज्ञानी होत जु सिद्ध।
                        पावत श्री हरिधाम तब, लहि हरि कृपा प्रसिद्ध।।31।।
                        यही ज्ञान को फल अहै, भक्ति, मुक्ति की रासि।
                        अनायास ही तेहि लहत, जे हरिजन अविनासि।।32।।
                        ज्ञान किए ही होत है, भक्ति, नहीं यह बात।
                        बिना ज्ञान हूँ निज जनन, बितरत हरि यहि तात।।33।।
                        ज्ञान कर्म योगादि मैं, भक्ति अपेक्षित आहि।
                        याही तें सबतें परे, भक्ति प्रधान कहाइ।।34।।
                        केवल ज्ञान किए कबौं, मुक्ति लहै नहि जीव।
                        अहै अपेक्षित ताहु मैं, श्री हरि भक्ति अतीव।।35।।
                        याही तें यह मुख्यता, लहि भक्ति सब भाँति।
                        याकी सब साधन विशें, उपयोगिता दिखाति।।36।।
                        हैं ज्ञानादिक अंग अरु, अंगिनि भक्ति कहाइ।
                        अंग कछू नहिं करि सकत, बिन अंगी मति पाइ।।37।।
                        साधनमात्र कहावहीं, ज्ञानादिक सब कर्म।
                        भक्ति अमृतफल रूप है, यही भागवत धर्म।।38।।
                        अंगी के आधीन हैं, सबै अंग, जग जान।
                        रहत अंग सब कर्मरत, निज अंगी मति मान।।39।।
                        ज्ञानमात्र ही फल अहै, यह नहि ठीक कहाय।
                        फल ज्ञानादिक कर्म को, केवल भक्ति लखाय।।40।।
                        थिर नहिं साधन मात्र हैं, यह प्रत्यक्ष दिखात।
                        पै, पाएँ हरि भक्ति, यह कबहूँ नाहिं नसात।।41।।
                        ज्ञानमात्र पुरुषार्थ यह, बात अल्पमति मान।
                        ज्ञानमात्र तैं मुक्ति नहिं, होत कबहुँ सच जान।।42।।
                        नर कौं नारी-नारि कौं नर पहिले लखि जानि।
                        अपने मन अनुरूप गुनि, प्रीति करत पहिचानि।।43।।
                        समुझहु यह दृष्टांत, का सुगम सिखावत रीति।
                        ज्ञान नहीं फल प्रीति को, ज्ञानहिं कों फल प्रीति।।44।।
                        औरहु अचरज की कथा, सुनहु मीत! चित लाई।
                        बिना ज्ञानहूँ होत है, अबिचल मंजु मिताइ।।45।।
                        देखहु अति अज्ञान सिसु, जननी लखि हुलसात।
                        मातृभाव को जदपि नहिं, वा महँ भाव लखात।।46।।
                        स्वप्न तथा दरसन स्रवन, करि उपजत जो प्रीति।
                        कहा ज्ञान की गंध तहँ, यही भक्ति की रीति।।47।।
                        प्रीति भए पाछे जहाँ, होत परस्पर ज्ञान।
                        तहूँ ज्ञान नहिं करि सकत, प्रीति पुष्टि यह जान।।48।।
                        यातें यह जनि जानिए, अहै प्रीति फल ज्ञान।
                        ज्ञान होय, या होय नहिं, उपजत प्रीति सुजान।।49।।
                        कछु नहिं गुरुता ज्ञान की मेरे जान दिखाति।
                        ब्रज जीवन बिन ज्ञान ही, मुक्ति लही सब भाँति।।50।।
                        ब्रह्म ज्ञान कछु नहिं रह्यो, गोपीजन मन माँहि।
                        तदपि लही जो उन गती, सो कोउ पाई नाहिं।।51।।
                        ज्ञान होत है भक्ति तें, कोउ अस कहत सुजान।
                        यातें ज्ञान विराग की, माता भक्ति बखान।।52।।
                        कोउ अस भाखत तत्वबित, मनन सील मतिमान।
                        अहै सहायक भक्ति में सात्विक निर्मल ज्ञान।।53।।
                        ईश्वर विषयक, ज्ञान जब, लहत मनुज मतिमान।
                        भक्ति मार्ग मैं होत हैं, तजै प्रवृत्ति महान।।54।।
                        ब्रह्मभाव लहि होत जब, मानस मगन अतीव।
                        तब नहिं सोचत अरु नहीं कछु चाहत यह जीव।।55।।
                        सब जीवन को मीत नित, परम पुलक मन सांत।
                        परा भक्ति तब लहत है, सुकृती जीव नितांत।।56।।
                        यातें सिद्ध भयो परम, भक्तिहि को अंगित्व।
                        या सम ज्ञानादिकन कों, नेकहुँ नाहिं महित्व।।57।।
                        मातु-पिता द्विज देव गुरु, भक्ति जदपि है भक्ति।
                        तदपि ईश विषयक कहीं, भक्ति परा अनुरक्ति।।58।।
                        या सम अन्य न भक्ति है, अखिल भुबन महँ मीत।
                        निज प्यारे हूँ तें अधिक हरि तें करिए प्रीति।।59।।
                        यही कहावत जगत में, भक्ति अनन्य उदार।
                        हरि विषयक त्रिभुवन विदित, सकल सूत्र श्रुति सार।।60।।
                        सबतें परें जहान में, श्री हरि भक्ति लखाय।
                        ज्ञानादिक सुभ योग हूँ, जातें न्यून कहाय।।61।।
                        योग सहायक भक्ति में, होत भक्ति तें योग।
                        यातें होत बिराग जो, सो नासत भव रोग।।62।।
                        अहै भक्ति वह ‘मुख्य’ जो, परा कहावति मीत।
                        अपरा ‘गौण’ कहावती, जग में परम पुनीत।।63।।
                        पहले अपरा होइ, जेहिं, पाएँ सिद्ध समाधि।
                        पाछें परा मिलै जबै, मिटै आधि औ व्याधि।।64।।
                        कोऊ नर सुकृती तबै पराभक्ति कों पाय।
                        जबैं दया करि दीन पैं, श्री हरि होत सहाय।।65।।
                        दुखद राग है, जानि यह भक्तिहि गनहु न हेय।
                        यह तो ईश्वर विषय रति, सब भाँतिन सुख देय।।66।।
                        घटै बढ़ै लागैं छुटै, संसारी रति मीत।
                        बढ़ै सदाई ईश की, निर्मल प्रीत पुनीत।।67।।
                        तप अरू ज्ञान जु कर्म तें, ‘योग’ बड़प्पन पाय।
                        ताहू तें अतिशय बड़ी, श्री हरि भक्ति कहाय।।68।।
                        चिंतत ‘अक्षर ब्रह्म’ जो, सो बहुत सहत कलेस।
                        पै हरि भक्ति बिना स्रमहिं, बितरत मुक्ति असेस।।69।।
                        श्रद्धा सम, नहिं भक्ति है, नहिं श्रद्धा ही भक्ति।
                        कर्मी आदिक की रहति, श्रद्धा माहिं प्रसक्ति।।70।।
                        श्रद्धा त्रिगुणमयी सदा, जीवन की जग होति।
                        जैसी श्रद्धा जासु की, तैसी ता मति ढोति।।71।।
                        श्रद्धा मानस धर्म है, जो धारत निरधार।
                        सोई श्रद्धावान है जो निज धरत बिचार।।72।।
                        त्रिगुणातीत अहै जथा, ब्रह्म, परम श्रुति मूल।
                        तथा परे है गुनन तैं, पराभक्ति अनुकूल।।73।।
                        राजस तामस होति नहीं, समुझि लेहु मन मीत।
                        अहै सात्विकी भक्ति यह, सबते परे पुनीत।।74।।
                        श्रद्धा परे बखानिए प्रेम लक्षणा भक्ति।
                        जो बिन स्वारथ होति है, अबिचल हरि अनुरक्ति।।75।।
                        ‘कर्मकांड’ आवागमन, नेक न मेटत देखु।
                        ‘ज्ञानकांड’ हू मैं अहै, अमित जन्म को लेखु।।76।।
                        यातें कह्यौं उपासना कांड परम रमनीय।
                        जातें नवधा भक्ति की, होत छटा कमनीय ।।77।।
                        भक्ति राजसी नाहि, अरू, नाहि तामसी होति।
                        रज-तम-मय ताकों कहत, श्रद्धा जो भव ढोति।।78।।
                        जबै सतोगुन के उदै, मानस निर्मल होय।
                        तबै पाइ मोहन दया, भक्ति लहत जग कोय।।79।।
                        पहिले अपरा पावई, भक्ति मनुज बड़ भाग।
                        पुनि कीने अनुराग अति, परा लहत रसपाग।।80।।
                        ऐसे हू देख्यो सुन्यो, परै, जगत में मीत।
                        प्र्रथमहिं पावै भागभट, परा भक्ति मन जीत।।81।।
                        नाहिं मुख्यता ज्ञान की, ताहीं ते मुनिराज।
                        जिज्ञासा किय ब्रह्म की, थापन भक्त समाज।।82।।
                        है त्रिकांडमय वेद तें, गीता अधिक महान।
                        जामैं थापन भक्ति को, कियो आपु भगवान।।83।।
                        है प्रवृत्ति तब लौ अवसि, बुधि हेतुन की मान।
                        जबलौं ब्रह्म विषैं नहीं, उपजत निर्मल ज्ञान।।84।।
                        नहीं कृत्य निष्पाद्य है, ब्रह्म सुदरसन मीत।
                        तौहू स्रवनादिक जतन हैं जग परम पुनीत।।85।।
                        पैए सब साधन जतन, तबही लौं जिय जान।
                        जबलौं अबिचल होत नहिं, श्री हरि भक्ति सुजान।।86।।
                        धान तबहिं लौं कूटिए, जबलौ तुष बिलगाय।
                        ऐसें हीं ज्ञानादिकरू, भक्ति होन लौं भाय।।87।।
                        जैसे स्रवनादिकन को परत भक्ति महँ काम।
                        तैसेईं सतसंग को, ठाम सदा सुखधाम।।88।।
                        बिन गुरु काज सरै नहीं, यह जानहु मन लाई।
                        यातें सतगुरू खोजिए, जगत बीच हरखाइ।।89।।
                        सत चित आनंदधन सरिस, परम मगन मन मीत।
                        संसयछेदन निपुन हरि, भक्ति निरत गत भीत।।90।।
                        जब श्री हरि करुना करैं, तबैं मिलैं गुरुदेव।
                        जो समुझाइ सकैं परम, गुप्त भक्ति के भेव।।91।।
                        बिनु गुरु हू, कोऊ कृती, पराभक्ति को पाय।
                        श्रीहरि कृपा भएँ जथा, गोपिन कथा बताय।।92।।
                        सकलैश्वर्य समेत हैं, एक मात्र भगवान।
                        उनकी सेवा करन ही, जीव कर्म जग जान।।93।।
                        आत्मज्ञान किए मिलैं, चाहे सिद्ध महान।
                        पै बिन भक्ति, न पावई, जीव परम कल्यान।।94।।
                        श्रुति प्रतिपादित सिद्ध यह, ईश्वरांश है जीव
                        ईश्वर सब सामर्थ्यमय, जीव अशक्त अतीव।।95।।
                        जो कछु अहै विशेषता, ईश जीव के माँहिं।
                        सो सव सत संगत किए, निर्मल ज्ञान बताहिं।।96।।
                        स्वाभाविक ऐश्वर्य है, सदा ईश को देखु।
                        पै वह पास न जीव के, प्रगट जगत मैं पेखु।।97।।
                        मनसा वाचा कर्मणा, सेवा करन सहेत।
                        यही जीव को कर्म है, जो चारिहूँ फल देत।।98।।
                        निष्ठा सहित द्रवै हृदय, सब भाँतिन गहि जाहि।
                        सत रज तम मय, जग बिदित, श्रद्धा सोई कहाहि।।99।।
                        ईश जीव दोऊ अहैं, अविनाशी, सच जान।
                        बद्ध मुक्त, ये जीव के, हैं द्वै भेद सुजान।।100।।
                        सब जीवन की एक ही, समय न मुक्ति बखान।
                        वह तो क्रम-क्रम होत है, निज कृत कर्म प्रमान।।101।।
                        प्रलय काल मैं होत जो, मुक्ति जीव की तात।
                        वह नहि मुक्ति बखानिए, जहँ बासना लजात।।102।।
                        बिना बासना के छुटे, मुक्ति लहै नहिं जीव।
                        बिना कृपा भगवान की, कहँ सुख मिलैं अतीव।।103।।
                        नाहिं अंत है बुद्धि को, याते जो धीमान।
                        सत्य तत्व पहिचानईं सत संगहि लहि ज्ञान।।104।।
                        सुर जन नहिं जानईं, कौन ईश को जीव।
                        का माया यह जगत का, का दुख का सुख सीव।।105।।
                        या माया तैं छूटि जों, रज तम जीति सुजान।
                        सरन गहत, ते तरत हैं, भवसागर मतिमान।।106।।
                        ज्ञानरहित, दूषित मती, हेतुवाद रत जीव।
                        पुनि-पुनि परत कुयोनि में, भव दुख सहत अतीव।।107।।
                        यातैं सतगुरु ज्ञान लहि वै हरि सरन सहेत।
                        भक्ति भाव में तरत भव, पावत अचल निकेत।।108।।
                        सब साधन को त्यागि अब, श्री हरि सरनहि जाहु।
                        नसैं पाप सब आपतें, परम मुक्ति को लाहु।।109।।
                        सब तजि हरि भजु भावतें, क्यों भव भ्रमत अजान।
                        सब पापन तें मुक्त करि, मुक्ति देत भगवान।।110।।
                        क्यों माया मैं भ्रमि रहे, खोइ सुमति, हवै सदा अकाज।
                        या जीवन को लाभ वह, भजहूँ सहेत मुकुंद ।।111।।
                        कोटि जतन रचि पचि करोऊ, हवै है सदा अकाज
                        एक भाव तें हरि भजे, सुधरि जात सब काज।।112।।
                        जगत जनक है ईस जग करता सोई कहाय।
                        अमितामित कल्यान गुन, वा मह सहज लखाय।।113।।
                        यातें वामें नेकहू, जानहु नाहि विकार।
                        वाकी लीला अगम कहु, जानी जाति अपार।।114।।
                        करि निज प्रकृतिहिं विकृत वह, जग सिरजत करतार।
                        यातें वामहँ नेकहूँ, हवै नहि सकत विकार।।115।।
                        जैसैं मायाबी करत, वस्तुन विकृति प्रचार।
                        पै निज जुगुतिहिं आपुनहि, नेकहुँ लहत विकार।।116।।
                        तैसैईं यह ईस को, करतब अजब दिखाय।
                        करता हवै हू आप जल, कमल सरिस रह भाय।।117।।
                        पय के कारज सरिस लखु, ईस विकृत नहिं होय।
                        कंचन सम तेहि जानिए, सदा एक रस मोय।।118।।
                        वामहँ रहत निहारिए, जीव सत्व बलवान।
                        अंस ईस को जो अहै, प्रकृति परे जो बखान।।119।।
                        अहै प्रतिष्ठा ईस की, लखु गृह पीठ समानु।
                        पीठ रु तापर थित दोऊ, घर भीतर ही जानु।।120।।
                        यातें प्रकृति विकार तें, जग माया महँ नाहिं।
                        माया अरु संसार दोउ, थित हैं ब्रह्महि माहिं।।121।।
                        यह विवेक अति कठिनतर, बुद्धिगम्य अतिरम्य।
                        ज्ञान योग तें जात कछु, जान्यो ब्रह्म प्रणम्य।।122।।
                        भक्ति भए नसि जात सब, भेद-भाव अति पोच।
                        कृपा लहैं हरि की मिटैं, भव बंधन के सोच।।123।।
                        कोटि जन्म के सुकृत सब, उदय होत जब आन।
                        तब करुना करि देत निज, भक्ति जनहिं भगवान।।124।।
                        जोग जज्ञ तप दान के, तज रे गर्व अथोर।
                        भक्ति बिना नहिं नेकहूँ, रीझत नंदकिसोर।।125।।
 


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