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कविता

मोक्ष-भंग
सर्वेश सिंह


कर्म
जो कर नहीं पाए
शब्द
जिन्हें कह नहीं पाए
करने और कहने की आग लिए
फूँक दिए
ताप लिए
जल गए
बुझ लिए
एक अजीब शै है बनारस भी
लय हुए
पर तह नहीं पाए।
 


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