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कविता

लक्स
सर्वेश सिंह


ताक पर पड़ा था
पूनम के चाँद सा
लक्स इंटरनेशनल 
कि तुमसे लगने के बाद
जैसे सो गया हो गहरे!
बेहद आहिस्तगी से हथेली ने उसे छुआ
उठाया जैसे सोता हुआ कोई दुधमुँहा बच्चा हो  
मुट्ठियों में आकर वह कुनमुनाया
कि जैसे अब किन्हीं और हाथों में लगने की इच्छा ही न हो 
एक बनैले खरगोश की जैसे अथाह आँखे
मुझे घूरती हों
अर्घ्य मुद्रा के बीचोंबीच पड़ा वह
अब मेरी नशीली निगाहों की पनाहों में था
अथक प्राणों ने उसे सूँघा
जैसे मृत्यु सूँघे जीवन को
होठों तक आने से पहले 
छिटककर कई बार वह गिरा
पैरों पर
दुबले पानी में 
कि जैसे लाज कोई बैठी हो हृदय में उसके
घूँघट काढ़
बेचैन जीभ ने कोरों से छुआ उसे
फिसला वह उस पर अँगूर, बेल की तरह 
और तब ठहर गई समूची देह
आत्मा से सट गईं सारी इंद्रियाँ
रूक गई हवा
अबोल हुआ जल
एक सूरज झरोंखे के घोंसले में दुबक आया   
और फेनिल स्नेह सा वह
कंठ में बूँद-बूँद रिसता रहा
फैलता रहा
अंतर्नलियों में
हृदय में  
जैसे मीठे पानी का झरना
जैसे स्वाति की धारा-धार बूँदे
जैसे मरणासन्न प्राणों का गंगा जल
बरसते शावर के छंद ताल में
वह देह पर फिसलता रहा 
कि उसमें लगी तुम में
मैं समाहित होता रहा
पानी के प्रलय के खत्म होने तक
बह गया पानी
चिर रह गया स्नान
तुमसे लगे लक्स से नहाकर।
 


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