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कविता

सेक्यूलर जंगल
सर्वेश सिंह


शेर
मांस ही खाता है
यह ध्रुव-सत्य है
इसे मानते थे सब
पर इधर जंगल में हलचल-सी है
गर्दन में जानवराधिकारों की दफ्तियाँ लटकाए
रक्ताभ-भेड़िए
उसके खिलाफ लामबंद हुए हैं
शेर को जंगल छोड़ना ही पड़ेगा
जंगल अब सेक्यूलर हो रहा है
 


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