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कविता

जागती रहो कवयित्री
सर्वेश सिंह


(कविता की सभा में सोती हुई एक कवयित्री को देखकर)

जागती रहो कवयित्री
कि अभी भी मंच पर बैठा एक बूढ़ा गिद्ध
अपने दाँतों को पैना कर रहा है
कि तुम्हें बेखबर देख वह थका हारा ज्योतिर्लिंग 
अपने लोगों को दे रहा है नई युक्ति
जिससे तुम्हें नोचा जा सके बार-बार
हर सभा में
कि अभी भी वहाँ जल रहा है वही दिया
जिसका प्रकाश तुम्हारे लिए नहीं है
देखो कि दिल्ली से आया एक सत्तासीन कवि
तुम्हें यूँ घोड़े बेच कर सोता देख
बिल्ली में बदलता जा रहा है
और उसके बगल में बैठा कवितातुर नौकरशाह
इतना अच्छा मौका पाकर
तुम्हारे सपनों में घुसने की कोशिश कर रहा है
और दूर पीछे बैठा
अपने भीतर स्त्री को पालने वाला
वह बलिष्ठ कवि
अपनी तीखी तिरछी नजरों से
तुम्हारी गौर देह
और उन्नत वक्ष में
कविता तलाश रहा है
सँभल जाओ कवयित्री
कि अभी भी कमरे हैं बंद
और बैठे हैं वहाँ ढेर सारे मर्द
जो अपनी अनामिका को तर्जनी से बड़ी तो जरूर देखना चाहते है
पर तुम्हें बढ़ता हुआ नहीं देखना चाहते 
(तुम्हे पता तो है न की इसका मतलब क्या है?)

अभी भी वक्त है कवयित्री
कि उठो, जागो और जगाओ उन सब को
जो थोड़ी सी जगह
थोड़ा सा सम्मान
और थोड़ी सी ठंडी हवा पाकर
तुम्हारे आस-पास सो गई हैं
बताओ उन्हें कि यह कुर्सी
यह थोड़ी सी ठंडी हवा
और यह थोड़ा सा बतकुच्चन
भले अपना सा लगे
पर यह मंच 
यह सभा
और यह कमरा
अभी भी उनकी जद से बाहर है
मत सोओ कवयित्री
कि कृत्रिम प्रकाश में
मर्दों से भरी सभा में 
यूँ आँखें बंद कर और मुँह खोलकर सोना
अभी भी एक स्त्री के लिए बहुत खतरनाक है
 


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