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कविता

शुभम श्री के प्रति
अनुकृति शर्मा


कवि,
तुम्हारा भाग नहीं हैं
काम अर्थ-धर्म-मोक्ष
यह लोक, वह लोक
तंत्र मंत्र यंत्र
सत्ता अनंत,
तुम्हारा भाग हैं शब्द 
औजार हथियार
खिलौने आभरण
उपहास के उपकरण
गहरे छिछले
अँधेरे के धूमकेतु
धूप में छतनार
पीर की भट्टी में
पकते नित्य कच्चे शब्द,
रक्त में रंगे
मन के मौसमों में
फूलते झरते
सनातन शब्द
तुम्हारी सोच की शिंजिनी पर
विष-बुझे मधु-शरों से
जो तने हैं।
 


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