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कविता

उस कमरे में
अनुकृति शर्मा


उस कमरे में
जहाँ तुम नहीं हो
तुम हमेशा रहते हो।
यादों के नीम-अँधेरे में
बजते रहते हैं अनकहे शब्द
और अधूरे स्पर्श गुनगुनाते हैं
जल कर बुझ जाती हूँ मैं
और धुएँ-सा प्यार
मँडराता रहता है।
क्यों उस कमरे में
जहाँ तुम हमेशा रहते हो
तुम नहीं होते?
 
 


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