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कविता

वन के गीत - कबिनी
अनुकृति शर्मा


धुंध-भरे जंगल में जागी दिन की कन्या
पंछी-स्वर में गुंजित सत्वर शांति वन्या
कुहरे की जाली में दिपता
सूर्य चाँद-सा
नदी रुपहली झाईं हो
ज्यों तट एक भ्रम-सा
नील आवरण ओढ़े हैं
सब कुंज द्रुमों के
हरे ताल में जल पीते हैं
झुंड गजों के
जड़े खूँदते जंगली शूकर,
चौकन्ने-से चरते चीतल
निशाखेट से माँद तेंदुआ
सोता बाँसबनी में शीतल
एक बाघ, राजा इस बन का
लाँघ रहा पथ, पात न खड़का
पर सतर्क लंगूरों का दल
हाँक लगाता, कँपता जंगल
मोर पिहकते, साँभर चंचल
झाड़ों में, पेड़ों में हलचल
डालें चरमर पक्षी सरफर
और हवा में भय की मरमर
धीरे-धीरे स्वस्थ हुआ वन
जन्म मरण में व्यस्त हुआ वन
आदिम वन पर स्वर्णिम जावक
छितराती है उषा धन्या।
 


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