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कविता

माँ का घर
अनुकृति शर्मा


सुबह सवेरे बजी है घंटी
दरवाजे पर आहट कितनी!
गुंजित हैं स्वर, कुत्ता भौंका
"चुप कर नटखट," माँ ने डपटा
"देर रात तक जागी थी वो
अब सोती है"।
नल से टपका पानी - तुर, तुर,
गलियारा, पैरों की सर-फर,
खुली रसोई, बर्तन खटके,
झाड़न-पोंछन, चूड़े चटके
"माताजी!" दूधिया गुहारा,
"क्या कलेवा?" महरी बोली,
झिड़का माँ ने "धीरे बोलो,
सोती है वो।"
हवा झरोखे में भटकी है,
धूप छाँव में जा अटकी है,
प्रात नवंबर का उगता है,
नील गगन, शरद पकता है,
आधी जागी, अधसोई हूँ
माँ का घर है, अलसाई हूँ।
 


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