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कविता

जो तुझमें है वो मुझमें है
भारती सिंह


जो तुझमें है वो मुझमें है
जो तेरा है वो मेरा है
फिर बात कहाँ पर अटकी है !

मैं बात फिजा की करती हूँ
तुम बात खिजाँ की करते हो
मैं शाख पे फूल खिलाती हूँ
तुम उपवन को खाक मिलाते हो
जो तुझमें है वो मुझमें है
जो तेरा है वो मेरा है
फिर बात कहाँ पर अटकी है !

मैं झरनों में संगीत सजाती हूँ
तुम सन्नाटे का बाना बुनते हो
मैं बयारों की रागिनी गुनती हूँ
तुम तूफानों को बहलाते हो
जो तुझमें है वो मुझमें है
जो तेरा है वो मेरा है
फिर बात कहाँ पर अटकी है !

मैं इंद्रधनुष में रंग उकेरती
तुम सपने स्याह बनाते हो
मैं मुस्कानों मे संसार ढूँढ़ती
तुम चीखों में सुकून को जीते हो
जो तुझमें है वो मुझमें है
जो तेरा है वो मेरा है
फिर बात कहाँ पर अटकी है !

मैं बात वफा की करती हूँ
तुम बीती यादें जीते हो
मैं राहो से काँटे चुनती हूँ
तुम मंजिल से भटकते हो
जो तुझमें है वो मुझमें है
जो तेरा है वो मेरा है
फिर बात कहाँ पर अटकी है !!
 


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