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कविता

आवाज की लकीर
भारती सिंह


सब कुछ बदल रहा है
बड़ी तेजी से बदल रहा है
कौन कर रहा साजिशें ?
किनके हाथों में है खंजर ?
समझना कठिन हो उठा है !
मैं आँखें चौड़ी कर
समय के पार जाने की कोशिश में हूँ
लेकिन असफल...
उम्मीदें आत्महंता हो चली है
भावनाओं का कत्ल हो रहा है
सपने किसी कोने में निरीह खरगोश से
आँखें मूँदे
दुबके पड़े हैं
स्थितियाँ दुश्वार हो गई है
पैरों के आगे से
रास्तों को खींच लिया जाता है
खड़े हैं फिर गहरी खाइयों के समक्ष
कहाँ रखें कदम !
गहरी खाइयाँ, जहाँ दृष्टि चुक जाती है
कदमों को पीछे मोड़
लौट जाना चाहते है
अपने ही पदचिह्नों का आसरा ले
कि हठात् सामने एक चेहरा दिखता है
चेहरे की बनावट से होकर
नजरें टिक जातीं है
उसकी विकृत मुस्कान पर
जो अत्यंत रहस्यमयी और डरावनी है
चीखती हूँ जोर से
बार-बार चीखना चाहती हूँ
कि सुनती हूँ अचानक
एक और आवाज
अपनी ही आवाज के सामानांतर
एक और लंबी आवाज खींच दी जाती है
मैं निर्वाक हो, चारों तरफ देखती हूँ
कई चेहरे है
जिन्हें मैं जानती हूँ
वर्षों से साथ रही हूँ उनके
जिया है उनके साथ के प्रतिक्षणों को
फिर ये पराए कैसे हो गए !
ये चेहरे अजनबी से क्यूँ दिख रहे !
मैं बारी बारी से सबको पुकारती हूँ
मैं भेजती हूँ उन्हें सनद
के मैं तुम्हें तो जानती हूँ
एक और जोर का अट्टहास !
सभी चेहरे एक साथ हो लिए
सभी हँस रहे है
मेरी बेचैनियाँ बढ़ती हैं
मैं कानों पर हाथों को रख
उन आवाजों को दम तक दूर धकेलती हूँ
आवाजें रुक जाती है
निर्जीव-सी खड़ी चिंतन में हूँ
अचानक आँखों के समक्ष
सब कुछ मिट जाता है
दिखती है उम्मीदें
हाथों में फंदे लिए
 


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