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कविता

आवारगी
भारती सिंह


गाहे-ब-गाहे
अब भी
तिर जाता है
बंद दरवाजों का अक्स
कई रूपों में
कई आकारों में
कई रंगों में
कुछ धूसर से
कुछ स्याह से
सभी पहचानों से परे जा चुके हैं
लेकिन दरवाजे के भीतर रहती है
कुछ रहस्यों की वीरान सी दुनिया
जिनके भीतर कैद है
जंग खाए ताले से
कितनी ही आवाजें !
कितनी ही खामोशियाँ !
नहीं वे बाहर आती हैं
न ही मैं अंदर जा पाती हूँ
दरारों से अँधेरे की बू आती है नहीं आती
किसी भी बंद दरवाजे के भीतर से
रोशनी का एक भी कतरा
बंद दरवाजों के भीतर भी है
कोई एक ऐसी दुनिया
जिसके कोनों को थामकर
मिट जाना चाहती हैं ये
वहाँ भी छिड़ी एक जंग है
आवाजों और चुप्पियों के बीच
भा गई है उन्हें ये
बंद दरवाजे की वीरानी दुनिया !
ये दरवाजे इतिहास बन चुके हैं
इन दरवाजों के भीतर
कैद है इतिहास की आवारगी
जो अब तक दर्ज नहीं है
पन्नों में
किसी दस्तावेज की तरह
 


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