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कविता

मेरे पीड़ा के सहभागी
भारती सिंह


बैठा था अपने पसंदीदा स्थान पर
मैं विचारों में मगन हो
खोया सा था
दूर तक खयालों की पगडंडियों पर
कँटीले राहों से होकर गुजर रहा था
लहूलुहान होते विचारों की तड़प
बेचैन कर रही थी
अचानक एक चिरपरिचित-सी आवाज ने
पुकारा मुझे
दृष्टि ठहर गई पल भर को सामने
आवाज थी नोटबुक की फड़फड़ाते पन्नों की
जैसे उसने मेरे भीतर झाँक लिया हो !
कातरता से जैसे कहा हो 
कहाँ भटक रहे हो !
मैं जो हूँ !
तुम्हारे घायल,  लहूलुहान विचारों को
अपने हृदय में समेट लेने को
रख दो मेरे सीने पर
आपनी आँखों का खारा पानी
सुलग रही जज्बातों की गीली लकड़ियाँ
तुम्हें भीतर से राख की ढेर में
तब्दील कर रही है
वह सुलगती लकड़ियाँ तुम्हें जला नहीं सकतीं
तराशो अपनी लेखनी को
लिख डालो,
वहाँ फैली
दमघोंटू
धुएँ की स्याही से
बिखेरो रोशनी गहराई तक
मैंने हमेशा से तुम्हारी ओर
आस भरी
प्रतीक्षातुर नजरों से देखा है
उसकी पुकार में आत्मा थी
मैंने किसी पुराने मित्र की मित्रता-सी
आत्मीयता पाई
जैसे मेरे उदास मन को
सहलाने के लिए
गले से लगाने के लिए
उसने धीरे से मेरे कंधे पर
अपना अपनत्व भरा हाथ रखा हो
मैं भी बढ़े हुए हाथ को
अपने हाथ में लेता हूँ
साझा करता हूँ एक पीड़ा
जो मुझे भीतर ही भीतर रीता कर रहा है
मैं कहता हूँ उससे
सुनो ! मेरे सच्चे मित्र
मेरे पीड़ा के सहभागी !
मैं टूट रहा हूँ !
मैं मृत हो रहा हूँ
मेरे भीतर की भावनाएँ आत्महत्या कर रही हैं
मेरे समूचे विचार घायल हैं
मैं तड़प रहा हूँ
वे तड़प रहे हैं
क्षत-विक्षत आत्मा लिए
अभी कल तक मेरे अंदर
भरा-पूरा वन था
जिसकी टहनियों पर
सपने फुदकते थे
आकांक्षाएँ अंगड़ाइयाँ लेती थीं
उल्लास आकाश की ओर
आँखें उठाए
इंद्रधनुषी रंगों से खेलती थी
मन आसमान की असीमित गोद में
कुलाँचे लेता
सब कुछ लुभावना था
सुहावना था।
 


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