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कविता

मेरा एकांत
भारती सिंह


एक-एक शब्दों को
आजमाइशों के साथ
उन्हें पलकों से तराशते हुए
जोड़ती हूँ एक मुकम्मल फसाना
चाहत है कि वहाँ रहे
मेरी सरगोशियाँ और तन्हाइयाँ
संग-साथ होकर
परस्पर
दरवाजे पर लिख छोड़ूँ
एक शब्द
'एकांत'
न हो वहाँ अक्सर
उल्लास का आना जाना
दे खुशियाँ दस्तक कभी-कभार
भीतर की गरमाई को
न छू जाए
हल्की-सी भी पुरवाई
हो सब कुछ इस ढंग से
कि जैसे बेतरतीब-सा
बिखरे हो वक्त वहाँ
फिर भी महसूस हो
एक मुकम्मल फसाना ।
 


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