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कविता

लापता
भारती सिंह


वह शरद की कोई मखमली रात न थी
जहाँ रेशमी गिलाफ के बीच
कोई थोड़ा जगा, थोड़ा सोया हो
और कुछ खुरदुरे ख्वाब बुने जा रहे हों
वह फागुन की कोई लरजती सुबह न थी
जो अल-सुबह दरवाजे पर
कटोरे भर बसंत लेकर खड़ी हो
इस भाव के साथ कि
सामने दरवाजा खोलने वाला
जैसे इसी के इंतजार में 
झेल रहा हो युगों से वार-प्रतिवार को
वह कोई जेठ की तीखी दोपहर भी नहीं थी
जो किसी अडिग
किसी अड़ियल शिकारी की तरह
हाथों में ताप का बाण लिए
फेंक रही हो तीरों को क्षण-क्षण
वह आषाढ़ की गीली मिट्टी भी नहीं थी
जो बारहाँ इंतजार में थी
सोंधी-सी महक में
फसलों को लपेट लेने को आतुर
वह न थी एक ऐसी प्यास
जिसे स्वाति के बूँदों को पीना हो
वह एक उदास-सा बेनाम
सजायाफ्ता वक्त था
जिसमें भूख पकती थी
रात सौदागर की माफिक
रोज-रोज उसके आँखों से
सपने को
एक-एक कर
खरीद ले जाती थी
ऋतुओं को उससे परहेज था
जैसे हो वह कोई अछूत
बदहवास तूफानों में घिर कर
जैसे वह अपनी जड़ों से कट चुका था
उसके घर के दरवाजे के नेमप्लेट पर
लिखा था - 'लापता’!
 


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