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कविता

जिनकी छिन गई जमीन
ओम नागर


पिछले एक दशक में
जिनकी छिन गई जमीन
वे धरा के हजारों जोतारी हार गए जिंदगी की जंग
कुछ हत्या पर उतारू
कई बैठे है आत्महत्या को बेचैन
बंजर खेतों की मेड़ पर उदास, चिंतामग्न

जिनकी छिन गई जमीन
जिनके उजड़ गए खेत-खलिहान
जिनके यहाँ राहत की जगह
आफत की रेलगाड़ी पहुँची हमेशा
जहाँ धड़ाधड़ काट दिए गए हों जंगल
जहाँ फटाफट पाट दिए गए हों खेत
धुआँ उगलती चिमनियों ने
जंगल को बना दिया दमे का मरीज
और सरकार ने जारी कर दिया बयान
कि हत्या पर उतारू तमाम अधनंगे-भिखमंगे लोग
बनते जा रहे है
लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा

जिनकी देह कर्ज के बोझ हो गई दुहरी
बत्तियों की चमक से रत्तीभर भी ज्यादा नहीं होती
आपदाओं की सरकारी टोह
जिनके यहाँ जवानी से पहले दस्तक देता हो बुढ़ापा
जिनकी जीवन रेखा घटती-बढ़ती हो
सरकार की मर्जी से
जिनके लिए जी लेने से अधिक सहज हो गया हो
मर लेना

जिसने गिरवी रखे अपने ही खेत की मिट्टी खोदते-खोदते
चुन ली आत्महत्या की राह
इधर आज भी किसी न किसी गाँव में
जुटे होंगे सरकारी अफसर
मौत को हत्या-आत्महत्या के बीच की
अबूझ पहेली बनाने में

शुक्र है इन दस सालों में
लाखों बेचैनियाँ मुड़ गईं आत्महत्या की ओर
जिन दिन सब की सब बेचैनियाँ तब्दील हो जाएँगी
आक्रोश की शक्ल में
जिनकी छिन गई जमीन वो हो जाएँगे हत्या पर उतारू
उस दिन देश के गृहमंत्री को बदलने पड़ेंगे
ग्रीन हंट के मायने।
 


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