बोलते बहुत अच्छा हो लाल किले से तुम भी
लेकिन भाषण से रोटी नहीं बनती
नाचते भी क्या खूब हो तुम, दुनिया भर में
लेकिन हमारे घर का आँगन टेढ़ा है जरा-सा
गाते भी हो बहुत खूबसूरत हमारे दुख
लेकिन तुम्हारे राग से न मेह बरसे न आँख झरे है
तुम्हारे दो कदम चलने से मिलता बादशाहत का पता
लेकिन पगथलियाँ तुम्हारी छालों से अपरिचित हैं
बहुत अच्छा ही खाते होंगे, जब मन करें तुम तो
लेकिन कभी कोई रीती डकार आई हो तो बताना
कविता तो तुम भी कर ही लेते हो अच्छी-सी
लेकिन करते क्या हो इसके सिवा बताना जरा।