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कविता

तुम्हरा कहा कौन सुनता हैं
ओम नागर


कौन कवि
और कैसी कविता
काहे शब्दों का सिर धुनता है
तुम्हरा कहा कौन सुनता है

जर्दा खाएँ मास्टर प्यारे
छोरें डस्टर चोर तुम्हारे
क ख ग घ भूल गए सब
नाव गई मस्तूल गए सब
काहे बिना बात कुढ़ता है
तुम्हरा कहा कौन सुनता है

मक्का कटती सरसों लिखते
अभी-अभी को परसों लिखते
खेत की मिट्टी देखी नाहीं
इन्कलाब की करें उगाहीं
काहे न धरती से जुड़ता है
तुम्हरा कहा कौन सुनता है

समय हुआ बहुत बलवंता
घाट-घाट पर साधू संता
जंतर-मंतर सुखिया तंतर
मनुज न जाने कोई अंतर
काहे बंद गली में मुड़ता है
तुम्हरा कहा कौन सुनता है।।
 


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