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कविता

मैं देना चाहता हूँ तुम्हें
ओम नागर


मैं देना चाहता हूँ तुम्हें
एक चम्मच नदी, एक कतरा धूप, थोड़ी सी छाँव
बस! काफी है तुम्हें
पनपने व खिलने के लिए

पर तुम हो कि सूखना चाहते
मिटाना चाहते हो अपने वजूद को
भूल रहे हो कि टूटकर भी तो
गिरना जमीन पर ही है

मैं देना चाहता हूँ तुम्हें
मुट्ठी भर आकाश
दो गज जमीन, चंद कदमों तक हौसला
बस! काफी है तुम्हें
उड़ने व उतरने कि लिए

पर तुम हो कि जड़ बना पालना चाहते हो
उस पेड़ को जिसके पत्ते
तेरे आने से पूर्व ही बिछ गए राह में
अपना अस्तित्व मिटा।

मैं देना चाहता हूँ तुम्हें
निर्मल झील
झरने का बहता पानी, जलचरों के झुंड
बस काफी है तुम्हें
मन बहलाने कि लिए।

पर तुम हो कि सागर से शांत, स्तब्ध
गमों का खारापन ले नापना चाहते हो
वेदना की गहराई को
जिसमें सिर्फ उतरना ही उतरना है मीलों तक।

मैं देना चाहता हूँ
तुम्हें थोड़ी-सी हिम्मत
थोड़ा सा विश्वास, थोड़ा सा हठ
बस! काफी है तुम्हें
अपने जैसा बनाने के लिए।


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