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कविता

गाँव की चिट्ठी शहर के नाम : आठ कविताएँ
ओम नागर


(एक)

जो कभी बाँची ही नहीं गई
न ही डाली गई कस्बाई पोस्ट ऑफिस के लैटरबॉक्स में
एक गाँव की चिट्ठी शहर के नाम

क्या लिखा होगा एक गाँव ने
लिखा होगा स्कूल तो हैं पर अध्यापक नहीं
सुना हैं शहरी स्कूल में बच्चे कम
होते हैं अध्यापक अधिक
शहर से कुछ अध्यापक माँगे होंगे शायद

यह भी लिखा होगा
गाँव में एक राशन कार्ड पर मिलता हैं तीन लीटर घासलेट
कभी-कभार
थोड़ी बिजली माँग ली होगी
ताकि आधी रात को बेमन न बुझानी पड़े चिमनियाँ
उजाले को न मारनी पड़े फूँक।

सुना हैं - शहर में उजास के लिए नहीं
जलने-जलाने के लिए ढूँढ़ा जाता हैं घासलेट
अस्पताल के पुलसिया रोजनामचे में लिखाया जाता अक्सर
देर रात चिमनी गिरने से झुलस गई बहू।

(दो)

एक गाँव की चिट्ठी में क्या लिखा हो सकता हैं भला
पाताल में समाता जल
हवा फैंकता ट्यूबवैल
औंधे मुँह गिरते अनाज के भाव
तासीर खो रही मिट्टी की चिंताएँ
जितनी माथे पर
उतनी चिट्ठी में भी

चिट्ठी वाला शहर कोटा भी हो सकता हैं
जयपुर भी
होने को तो शहर यह दिल्ली भी हो सकता हैं
इजाजत माँग ली हो
कि मुझे जंतर-मंतर पर बाँधने है सोलह जोड़ी बैल
तुम राजप्रासाद से बाहर आए तो ठीक
वरना चिट्ठी में क्या लिखना
राजपथ पर हल चलाने का मन है हमारा
ऐसी ही
उटपटाँग क्रांतिकारी ख्वाहिशें लिखी होंगी
एक गाँव ने अपनी चिट्ठी में।

(तीन)

दिल्ली लिखा होगा
चिट्ठी पर पते के स्थान
तो बिसर गया होगा पथ लिखना
आप भी जनाब !
गाँव की सामूहिक चिट्ठी
दर्द, शिकवा और शिकायतें भी सामूहिक
पते के फेर में लौट आई हो
या पटक दी गई हो बेपते की चिट्ठियों के ढेर में।

होने को तो यह भी हो सकता हैं
रेलगाड़ी के डिब्बे में धम्म से बोरा पटकते समय
गिर गई हो पटरी पर
छूट गई हो प्लेटफॉर्म पर
सच में किसी के हाथ लगी हो न लगी हो।

(चार)

लिखी होगी प्रेमचंद को याद करते हुए
अदम गोंडवी ,बल्ली सिंह चीमा, अंबिका दत्त
या हमारे चरण सिंह पथिक से तो जरूर लिया होगा मशविरा
कोई बात
कोई शिकायत
कोई गुहार
कोई उद्घोष
छूट तो नहीं गया होगा लिखते-लिखते।

लिखा होगा -
"बेरोजगार युवाओं की फौज चटकाती है चप्पलें"
शादी-ब्याह !
गाँव को शहर कब ब्याहता है अपनी बेटियाँ
शहर में ब्याही बेटियाँ ही वर्षों तक नहीं लौटती पीहर
जितने दिन रहती
गाँवडेल जुबान में पढ़ती रहती शहर के कशीदे।

इस धर्मसंकट को कितनी साफगोई से लिखा होगा
एक गाँव ने अपनी चिट्ठी में।

आरंभ में थोड़ा-सा परिचय
इस तरह से तो दिया ही होगा जरूर
"एक टूटी-फूटी-सी सड़क
जो जुड़ती ही है किसी न किसी राजधानी से
गाँव के मुहाने पर एक तालाब
बैशाख के दिनों बगुलों के घुटनों तक पानी
मरी हुई मछलियों की सड़ांध।"

सब कुछ बुरा ही बुरा न लिखा हो
भला-भला कुछ तो बचा ही होगा लिखने के लिए
तालाब की पाल पर बचा होगा बड़-पीपल का जोड़ा
सरकारी स्कूल के समीप
मोवणी घड़त वाला एक मीठा कुआँ
मन थोड़ा तो कसैला हुआ होगा जब
लिखा होगा कि गाँव में भी अब कम ही लोगों के
अंतस में बची होगी मिठास।

(पाँच)

लिखवाने के क्रम में
किसी बेरोजगार युवक ने लिखवाए होंगे कुछ शब्द
आक्रोश से भरे
सत्ता के विरुद्ध
पागलपन की हद से पार एक चीख।

पागलपन से आया होगा याद
एक लड़की का दीवानापन
दूर शहर जा बसे प्रेमी की लिखी आखिरी चिट्ठी
आशान्वित
जिसे बाँचा जाना है अभी पहली फुर्सत में
पटवारी के बस्ते में बंद दरख्वास्तों की तरह
अपने-अपने परिमाप में उलझी हुई।

लिखा होगा -
"थान से खेत हो गए रूमाल की तरह"
रूमाल लिखते-लिखते याद आ गया होगा
उसका रेशमी दुपट्टा
भटक गई होगी चिट्ठी की इबारत।

कौन बाँच सकता है !
एनडीटीवी वाला रवीश कुमार
कोई गाँव क्यों भरोसा करे भला
टीवी पर दिखने वाले किसी एक ही चेहरे पर
पूरा पढ़ा जाने के लिए
जहाँ रहती है हमेशा लिपे-पुते चेहरों की भरमार।

देश के प्रधानमंत्री का चुप चेहरा
बुंदेलखंड ने
विदर्भ ने
या बीते बरस लहसुन के गिरे भावों की बदौलत
पसीने से तरबतर
थके-हारे किसी पास के गाँव ने
पूरी विनम्रता के साथ
लिखी होगी शहर के नाम कोई चिट्ठी।

किसी भरोसेमंद से चिट्ठी बँचवाते समय
रवीश कुमार का चेहरा ही क्यों याद रहा भला
किसी प्रधानमंत्री का चेहरा
एक दिन में तो नहीं हो गया होगा अविश्वसनीय।

(छह)

निपट अकेलेपन
आधी रात के घनघोर सन्नाटे को बिखेरते
झींगुरों की कर्कश के बीच
एक गाँव ने लिखी होगी शहर के नाम कोई चिट्ठी।

रो रहा होगा आसमाँ
ओस के आँसू
सभी दरवाजों पर लगी होगी भीतरी सांकल
घड़ी-घड़ी खाँस रही होगी बूढ़ी काकी
अलसुबह तक लिखता रहा होगा
स्याह अँधेरे कागज पर
आले में रखी चिमनियों से बची-खुची
रोशनी उधार ले।

सूखे बबूल के काँटों ने बाँध लिए होंगे
आलपिन की तरह
चिट्ठी के अनेकों पृष्ठ।

गाँव में कमजोर आदमी का दुख
मजबूत आदमियों के जहन में उपजाता है दया
पुण्यों की लालसा की बदौलत
उतरे लिबास पहनता है आधा गाँव।

अपनी चिट्ठी के हाशिए पर लिख छोड़ा होगा
इसी तरह एक गाँव ने अपने सपनों का अतिरिक्त।

(सात)

गाँव ने जब लिखी होगी शहर के नाम कोई चिट्ठी
कालूलाल खाती से मिला होगा आक्रोश
लिखवाया होगा -
"कई जंगी पेड़ों को ढाला है मैंने सुंदर फर्नीचर में
बैलगाड़ी में
हल में
कभी जीवनचर्या का अहम हिस्सा हुआ करता था
अब हाथ नहीं रहा वह बल
बरस हुए नहीं चलाई किसी पर कुल्हाड़ी
बेधार पड़े है रंदा बसैला
लिखने से पहले चिट्ठी के शब्दों पर धार जरूर लगवाने गया होगा
कालूलाल खाती की खतौड़ तक।

लिखवाने को तो कुंजबिहारी कुम्हार ने भी लिखवाई होगी
अपने दिल की बात
कि मिट्टी में नहीं रहा पहले जैसा लोच
चाक से सूखी मिट्टी उड़ाने का नहीं होता मन
घर-घर पसरी स्टील ने
कई बार झुँझलाहट से भर दिया होगा उसे।

कभी झाड़ ली होगी कुंजबिहारी ने चाक से सूखी मिट्टी
गीली मिट्टी को देना चाहा होगा स्टील की शक्ल
लेकिन अपना चेहरा नहीं देख सकने की क्षुब्धता में
तोड़ दिया होगा कच्चा बर्तन
टूटकर बिखरने की इसी आवाज को रखा होगा बचाकर
शब्दों के बीच
प्रधानमंत्री की मेज पर पुनर्जीवित हो जाने का भरोसा
रहा ही होगा एक गाँव को अपनी चिट्ठी में।

चतरा मोची भी गिड़गिड़ाया होगा एकबारगी
हलक से बाहर आ खड़ी हुई होगी सिसकियाँ
लिखवाया होगा -
अब गाँव में नहीं बचे है इतने जिनावर
बरस हुए अपने हाथों खाल उधेड़े
कोई जूती नहीं गाँठी पटेलजी के लिए
ढोल भी कहाँ बजवाता है कोई अब इतना।

महीनों खूँटी पर टँगा रहता
सीलन और धूल खा गई है खनक
चतरा की बात पूरी गंभीरता से सुनी होगी
जब गाँव लिख रहा होगा शहर के नाम कोई चिट्ठी।

खाल उधेड़ने की बात पर मुस्कराया होगा मन ही मन
चलो अच्छा हुआ
मुक्त हुए
लेकिन ढोल की डम्म तो धर ही ली होगी
पंक्तियों के आरंभ में
बहरे लोकतंत्र को सुनाने के लिए।

लिखने से पहले
गली-गली नहीं करवाई होगी मुनादी
न ही पंच परमेश्वरों से ली होगी कोई सलाह
नहीं चाहता होगा
झूठ को भी सच की तरह लिखना।

(आठ)

चिट्ठी के लिए
चिड़ियाएँ तिनकों की तरह दबा लाई होगी कुछ शब्द
दूर से चोंच में दबाकर लाएँ शब्दों में अटक आई होगी
दूसरे गाँव की पीड़ाएँ।

बैठी होंगी जब गाँव के मुहाने पर
आशंकित कौवे मँडराने लगे होंगे भौंरों की तरह
बमुश्किल कोयल भी तलाशी गई होगी
चिट्ठी में चिमटी भर मिठास के लिए।

सभ्यता का हवाला दे
खेजड़े से उतर आया होगा गिरगिट
बोला होगा - "दिल्ली गिरगिटों की बस्ती है"
अपने समुदाय में शामिल होने की जल्दबाजी
कुछ शब्दों को करना चाहता होगा अपदस्थ
गिद्ध भी आ ही गए होंगे बचे-खुचे।

इस जन्मजात अय्यारी को
कितना समझ रहा होगा कोई गाँव
जब लिख रहा होगा शहर के नाम कोई चिट्ठी।

कोई परछाईं नहीं रही होगी देह की
कोहरे के आगोश में लिपटे होंगे आठों पहर
उतरते माघ की मावठ से दम तोड़ता धनिया
रहा होगा शामिल
सरसों से उधार लिया होगा कोई रंग।

कई दिनों तक एक-टक निहारा होगा आकाश
किसी खेत में नहीं बची होगी जब नमी
मवेशियों के मुँह से निकल रहे होंगे सफेद झाग
तब दिल्ली बना रही होगी बड़े बाँध की योजना
आरा मशीन पहले ही खा गई हमारे जंगल
गाँव के बाहर खड़ा होगा राजमार्गी अजगर।

निरंतर बेसुध गाँव को
कितना होश रहा होगा आखिर
जब लिखी होगी उसने शहर के नाम
प्रधानमंत्री के नाम कोई चिट्ठी।
 


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