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कविता

चले तुम किस जल को ढूँढ़ने
ओम नागर


आँख भर उदासियाँ
ओक भर प्यास लिए
चले तुम किस जल को ढूँढ़ने
और कितने ही सवाल बूझने

जो बचा नहीं हैं थल पर
इस आदमी के बल पर
जो चर गया जंगल सारे
अब फिर रहा मारे-मारे

हौंसले उसके भी लगे हैं टूटने
चले तुम किस जल को ढूँढ़ने

जल आँख में था बचना
ये नदियाँ भूल गई हँसना
तालाब सारे सूखे पड़े हैं
समक्ष सौ संकट खड़े हैं

कब तक ये संसाधन हैं लूटने
चले तुम किस जल को ढूँढ़ने

जल मीठा धरती के पेंदे
फूल गुलाबी या फिर गेंदे
जल यह सुंदरता का मूल
इसे यूँ बहाओ न फिजूल

अब मौत के किवाड़ हैं खूँटने
चले तुम किस जल को ढूँढ़ने।
 


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