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कविता

आतंक के साये में बच्चे
ओम नागर


पेशावर के आर्मी स्कूल में
जिस आतंकी ने
पहले बच्चे को दागी होगी
पहली गोली
उसकी आँखों में नहीं तैरा होगा भला
अपने बच्चे का चेहरा
सैंकड़ों बच्चों में से किसी न किसी
बच्चे का चेहरा तो
मिलता ही होगा थोड़ा बहुत

दुनियाभर की भाषाओं के शब्दकोषों में
नहीं मिला आज कोई शब्द
जो मेरे भीतर के बेइंतहा नफरत को
दे सके कोई अभिव्यक्ति
हर कोई छोटा था आज
वो भी जो सींचते रहे हैं आतंक की फसल
वो भी जो काटते रहे हैं आतंक की फसल
एक घायल बच्चा बोल रहा था टी.वी. पर
‘मैं बड़ा होकर
नेस्तेनाबूत कर दूँगा आतंक की दुनिया।’

जब हम-सब
छोटे थे बहुत छोटे
दुनिया से बहुत बड़ा था हमारे घर का आँगन
जब हमारी दुनिया में शामिल नहीं था
कोई गाँव, कोई तहसील
कोई जिला, कोई राज्य और देश
जैसे-जैसे बड़े होते गए हमारे पंख
इन्हीं नामों के आसमानों में
उड़ता फिरा हमारा वजूद
और बड़ी होती गई हमारी दुनिया
आज जब पेशावर में भून दिए गए
सैकड़ों बच्चे
घर के आँगन में सिमटना चाहती है
हमारी दुनिया।

पेशावर के बच्चे भी जयपुर के बच्चों सी
हँसते हैं हँसी
पेशावर के बच्चों की अधूरी रुलाई
रो रहे हैं जयपुर के बच्चे
पेशावर का पिता रो रहा है आज
जयपुर का पिता महसूस रहा है
पेशावर के पिता का दर्द।

जिस तरह एक वक्त
घायल मलाला युसूफजई की कराह में
शामिल रहा दुनिया भर की बेटियों का दर्द
आज पेशावर के बच्चों में
दुनिया भर के पिताओं को दिख रहे हैं
अपने बच्चों के चेहरे
दर्द की नहीं होती कोई सरहद
न चीख का होता है कोई आसमान
दारुण दुख के घने कोहरे में लिपटी है धरती।

आज आतंक के साए में हैं
दुनिया भर के बच्चे
हर देश के मुहाने पर खड़ा है आतंक का अजगर
भविष्य निगलने को बेताब
कुटिल अट्टहासों और प्रतिशोध की जद में है
इन दिनों दुनिया भर की निर्मल हँसी।


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