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कविता

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बृज नारायण चकबस्त


एक साग़र भी इनायत न हुआ याद रहे

एक साग़र भी इनायत न हुआ याद रहे ।

साक़िया जाते हैं, महफ़िल तेरी आबाद रहे ।।


बाग़बाँ दिल से वतन को ये दुआ देता है,

मैं रहूँ या न रहूँ ये चमन आबाद रहे ।


मुझको मिल जाय चहकने के लिए शाख़ मेरी,

कौन कहता है कि गुलशन में न सय्याद रहे ।


बाग़ में लेके जनम हमने असीरी झेली,

हमसे अच्छे रहे जंगल में जो आज़ाद रहे ।

दर्द-ए-दिल पास-ए-वफ़ा जज़्बा-ए-ईमाँ होना

दर्द-ए-दिल पास-ए-वफ़ा जज़्बा-ए-ईमाँ होना
आदमीयत यही है और यही इन्साँ होना

नौ-गिरफ़्तार-ए-बला तर्ज़-ए-फ़ुग़ाँ क्या जानें
कोई नाशाद सिखा दे इन्हें नालाँ होना

रह के दुनिया में यूँ तर्क-ए-हवस की कोशिश
जिस तरह् अपने ही साये से गुरेज़ाँ होना

ज़िन्दगी क्या है अनासिर में ज़हूर-ए-तर्तीब
मौत क्या है इन्हीं इज्ज़ा का परेशाँ होना

दिल असीरी में भी आज़ाद है आज़ादों का
वलवलों के लिये मुम्किन नहीं ज़िन्दा होना

गुल को पामाल न कर लाल-ओ-गौहर के मालिक
है इसे तुराह-ए-दस्तार-ए-ग़रीबाँ होना

है मेरा ज़ब्त-ए-जुनूँ जोश-ए-जुनूँ से बढ़कर
नंग है मेरे लिये चाक गरेबाँ होना

 

फ़ना का होश आना ज़िंदगी का दर्द-ए-सर जाना

फ़ना का होश आना ज़िंदगी का दर्द-ए-सर जाना

अजल क्या है खुमार-ए-बादा-ए-हस्ती उतर जाना


मुसीबत में बशर के जौहर-ए-मरदाना खुलते हैं

मुबारक बुजदिलों को गर्दिश-ए-किस्मत से डर जाना


बहुत सौदा रहा वाएज़ तुझे नार-ए-जहन्नुम का

मज़ा सोज़-ए-मोहब्बत का भी कुछ ए बेखबर जाना

 

ख़ाके-हिन्द

अगली-सी ताज़गी है फूलों में और फलों में
करते हैं रक़्स अब तक ताऊस जंगलों में


अब तक वही कड़क है बिजली की बादलों में
पस्ती-सी आ गई है पर दिल के हौसलों में

गुल शमअ-ए-अंजुमन है,गो अंजुमन वही है
हुब्बे-वतन नहीं है, ख़ाके-वतन वही है

बरसों से हो रहा है बरहम समाँ हमारा
दुनिया से मिट रहा है नामो-निशाँ हमारा

कुछ कम नहीं अज़ल से ख़्वाबे-गराँ हमारा
इक लाशे -बे-क़फ़न है हिन्दोस्ताँ हमारा

इल्मो-कमाल-ओ-ईमाँ बरबाद हो रहे हैं
ऐशो-तरब के बन्दे ग़फ़लत, में सो रहे हैं

ऐ सूरे-हुब्बे-क़ौमी ! इस ख़्वाब को जगा दे
भूला हुआ फ़साना कानों को फिर सुना दे

मुर्दा तबीयतों की अफ़सुर्दगी मिटा दे
उठते हुए शरारे इस राख से दिखा दे

हुब्बे-वतन समाए आँखों में नूर होकर
सर में ख़ुमार हो कर, दिल में सुरूर हो कर

है जू-ए-शीर हमको नूरे-सहर वतन का
आँखों को रौशनी है जल्वा इस अंजुमन का

है रश्क़े- महर ज़र्र: इस मंज़िले -कुहन का
तुलता है बर्गे-गुल से काँटा भी इस चमन का

ग़र्दो-ग़ुबार याँ का ख़िलअत है अपने तन को
मरकर भी चाहते हैं ख़ाके-वतन क़फ़न को

पयामे-वफ़ा

हो चुकी क़ौम के मातम में बहुत सीनाज़नी
अब हो इस रंग का सन्यास ये है दिल में ठनी
मादरे-हिन्द की तस्वीर हो सीने पे बनी
बेड़ियाँ पैर में हों और गले में क़फ़नी



हो ये सूरत से अयाँ आशिक़े-आज़ादी है
कुफ़्ल है जिनकी ज़बाँ पर यह वह फ़रियादी है



आज से शौक़े वफ़ा का यही जौहर होगा
फ़र्श काँटों का हमें फूलों का बिस्तर होगा
फूल हो जाएगा छाती पे जो पत्थर होगा
क़ैद ख़ाना जिसे कहते हैं वही घर होगा



सन्तरी देख के इस जोश को शरमाएँगे
गीत ज़ंजीर की झनकार पे हम गाएँगे

रामायण के दो दृश्‍य

रुखसत हुआ वो बाप से ले कर खुदा का नाम
राह-ए-वफ़ा की मन्ज़िल-ए-अव्वल हुई तमाम
मन्ज़ूर था जो माँ की ज़ियारत का इंतज़ाम
दामन से अश्क पोंछ के दिल से किया कलाम

इज़हार-ए-बेकसी से सितम होगा और भी
देखा हमें उदास तो ग़म होगा और भी

दिल को संभालता हुआ आखिर वो नौनिहाल
खामोश माँ के पास गया सूरत-ए-खयाल
देखा तो एक दर में है बैठी वो खस्ता हाल
सकता स हो गया है, ये है शिद्दत-ए-मलाल

तन में लहू का नाम नहीं, ज़र्द रंग है
गोया बशर नहीं, कोई तस्वीर-ए-संग है

क्या जाने किस खयाल में गुम थी वो बेगुनाह
नूर-ए-नज़र पे दीद-ए-हसरत से की निगाह
जुम्बिश हुई लबों को, भरी एक सर्द आह
ली गोशाहाए चश्म से अश्कों ने रुख की राह

चेहरे का रंग हालत-ए-दिल खोलने लगा
हर मू-ए-तन ज़बाँ की तरह बोलने लगा

आखिर, असीर-ए-यास का क़ुफ़्ले-दहन खुला
अफ़साना-ए-शदायद-ए-रंज-ओ-महन खुला
इक दफ़्तर-ए-मुज़ालिम-ए-चर्ख-ए-कुहन खुला
वो था दहां-ए-ज़ख्म, के बाब-ए-सुखन खुला

दर्द-ए-दिल-ए-ग़रीब जो सर्फ़-ए-बयां हुआ
ख़ून-ए-जिगर का रंग सुखन से अयां हुआ

रो कर कहा; खामोश खड़े क्यों हो मेरी जाँ?
मैं जानती हूँ, किस लिये आये हो तुम यहाँ
सब की खुशी यही है तो सहरा को हो रवाँ
लेकिन मैं अपने मुँह से न हर्गिज़ कहूँगी "हाँ"

किस तरह बन में आँख के तारे को भेज दूँ?
जोगी बना के राज दुलारे को भेज दूँ?

दुनिया का हो गया है ये कैसा लहू सफ़ेद?
अंधा किये हुए है ज़र-ओ-माल की उम्मेद
अंजाम क्या हुआ? कोई नहीं जानता ये भेद
सोचे बशर, तो जिस्म हो लर्ज़ां मिसाल-ए-बेद

लिक्‍खी है क्या हयात-ए-अबद इन के वास्ते?
फैला रहे हैं जाल ये किस दिन के वास्ते?

लेती किसी फ़क़ीर के घर में अगर जनम
होते न मेरी जान को सामान ये बहम
डसता न साँप बन के मुझे शौकत-ओ-हशम
तुम मेरे लाल, थे मुझे किस सल्तनत से कम

मैं खुश हूँ फूँक दे कोई इस तख़्त-ओ-ताज को
तुम ही नहीं, तो आग लगाऊँगी राज को

किन किन रियाज़तों से गुज़ारे हैं माह-ओ-साल
देखी तुम्हारी शक्ल जब ऐ मेरे नौ-निहाल!
पूरा हुआ जो ब्याह का अरमान था कमाल
आफ़त आयी है मुझ पे, हुए जब सफ़ेद बाल

छूटती हूँ उन से, जोग लें जिन के वास्ते
क्या सब किया था मैने इसी दिन के वास्ते?

ऐसे भी नामुराद बहुत आयेंगे नज़र
घर जिन के बेचिराग़ रहे आह! उम्र भर
रहता मेरा भी नख्ल-ए-तमन्ना जो बेसमर
ये जा-ए सबर थी, के दुआ में नहीं असर

लेकिन यहाँ तो बन के मुक़द्दर बिगड़ गया
फल फूल ला के बाग़-ए-तमन्ना उजड़ गया

सरज़ाद हुए थे मुझसे खुदा जाने क्या गुनाह
मझधार में जो यूँ मेरी कश्ती हुई तबाह
आती नज़र नहीं कोई अमन-ओ-अमां कि राह
अब यां से कूच हो तो अदम में मिले पनाह

तक़्सीर मेरी, खालिक़-ए-आलम बहल करे
आसान मुझ गरीब की मुश्किल अजल करे

सुन कर ज़बाँ से माँ की ये फ़रयाद दर्द-ख़ेज़
उस खस्त जाँ के दिल पे ग़म की तेग-ए-तेज़
आलम ये था क़रीब, के आँखें हों अश्क-रेज़
लेकिन हज़ार ज़ब्त से रोने से की गुरेज़

सोचा यही, के जान से बेकस गुज़र न जाये
नाशाद हम को देख कर माँ और मर न जाये

फिर अर्ज़ की ये मादर-ए-नाशाद के हुज़ूर
मायूस क्यूं हैं आप? अलम का है क्यूं वफ़ूर?
सदमा ये शाक़ आलम-ए-पीरी है ज़रूर
लेकिन न दिल से कीजिये सब्र-ओ-क़रार दूर

2

शायद खिज़ाँ से शक्ल अयाँ हो बहार की
कुछ मस्लहत इसी में हो परवरदिगार की

ये जाल, ये फ़रेब, ये साज़िश, ये शोर-ओ-शर
होना जो है, सब उस के बहाने हैं सर-ब-सर
असबाब-ए-ज़ाहिरी हैं, न इन पर करो नज़र
क्या जाने क्या है पर्दा-ए-क़ुदरत में जलवागर

खास उसकी मस्लहत कोई पहचानता नहीं
मन्ज़ूर क्या उसे है? कोई जानता नहीं

राहत हो या के रंज, खुशी हो के इन्तेशार
वाजिब हर एक रंग में है शुक्र-ए-किर्दगार
तुम ही नहीं हो कुश्त-ए-नीरंग-ए-रोज़गार
मातम-कदह में दहर के लाखों हैं सोगवार

सख्ती सही नहीं, के उठाई कड़ी नहीं
दुनिया में क्या किसी पे मुसीबत पड़ी नहीं

देखे हैं इस से बढ़ के ज़माने ने इंकलाब
जिन से के बेगुनाहों की उम्रें हुई खराब
सोज़े-दरूँ से क़ल्ब-ओ-जिगर हो गये कबाब
पीरी मिटी किसी की, किसी का मिटा शबाब

कुछ बन नहीं पड़ा, जो नसीबे बिगड़ गये
वो बिजलियाँ गिरीं के भरे घर उजड़ गये

माँ बाप मुँह ही देखते थे जिनका हर घड़ी
क़ायम थीं जिनके दम से उमीदें बड़ी बड़ी
दामन पे जिनके गर्द भी उड़ कर नहीं पड़ी
मारी न जिनको ख्वाब में भी फूल की छड़ी

महरूम जब वो गुल हुए रंग-ए-हयात से
उन को जला के खाक़ किया अपने हाथ से

कहते थे लोग देख के माँ बाप का मलाल
इन बेकसों की जान का बचना है अब मुहाल
है किबरियाँ की शान, गुज़रते ही माह-ओ-साल
खुद दिल से दर्द-ए-हिज्र का मिटता गया खयाल

हाँ कुछ दिनों तो नौहा-व-मातम हुआ किया
आखिर को रो के बैठ रहे, और क्या किया?

पड़ता है जिस ग़रीब पे रंज-ओ-महन का बार
करता है उस को सबर अता आप किरदार
मायूस हो के होते हैं इन्सान गुनाहगार
ये जानते नहीं, वो है दाना-ए-रोज़गार

इन्सान उस की राह में साबित क़दम रहे
गर दिन वही है, अम्र-ए-रज़ा में जो ख़म रहे

और आप को तो कुछ भी नही रंज का मुक़ाम
बाद-ए-सफ़र वतन में हम आयेंगे शादकाम
होते हैं बात करने में चौदह बरस तमाम
क़ायम उमीद ही से है, दुनिया है जिस का नाम

और यूं कहीं भी रंज-ओ-बल से मफ़र नहीं
क्या होगा दो घड़ी में किसी को खबर नहीं

अक्सर रियाज़ करते हैं फूलों पे बाग़बाँ
है दिन की धूप, रात की शबनम उन्हें गिराँ
लेकिन जो रंग बाग़ बदलते है नागहाँ
वो गुल हज़ार पर्दों में जाते हैं रायगाँ

रखते हैं जो अज़ीज़ उन्हें अपनी जाँ की तरह
मिलते हैं दस्त-ए-यास वो बर्ग-ए-ख़ज़ाँ की तरह

लेकिन जो फूल खिलते हैं सहरा में बेशुमार
मौक़ूफ़ कुछ रियाज़ पे उन की नहीं बहार
देखो ये चमन आराये रोज़गार
वो अब्र-ओ-बाद-ओ-बरफ़ में रहते हैं बरकरार

होता है उन पे फ़स्ल जो रब्बे-करीम का
मौज-ए-सुमूम बनती है झोंका नसीम का

अपनी निगाह है करम-ए-कारसाज़ पर
सहरा चमन बनेगा, वो है मेहरबाँ अगर
जंगल हो या पहाड़, सफ़र हो के हो हज़र
रहता नहीं वो हाल से बन्दे के बेख़बर

उस का करम शरीक अगर है तो ग़म नहीं
दामन-ए-दश्त, दामन-ए-मादर से कम नहीं

 


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