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कविता

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शील


आदमी का गीत

देश हमारा धरती अपनी, हम धरती के लाल
नया संसार बसाएंगे, नया इंसान बनाएंगे

सौ-सौ स्वर्ग उतर आएंगे,
सूरज सोना बरसाएंगे,
दूध-पूत के लिए पहिनकर
जीवन की जयमाल,
रोज़ त्यौहार मनाएंगे,
नया संसार बसाएंगे, नया इंसान बनाएंगे।
देश हमारा धरती अपनी, हम धरती के लाल।
नया संसार बसाएंगे, नया इन्सान बनाएंगे॥

सुख सपनों के सुर गूँजेंगे,
मानव की मेहनत पूजेंगे
नई चेतना, नए विचारों की
हम लिये मशाल,
समय को राह दिखाएंगे,
नया संसार बसाएंगे, नया इंसान बनाएंगे।
देश हमारा धरती अपनी, हम धरती के लाल।
नया संसार बसाएंगे, नया इंसान बनाएंगे॥

एक करेंगे मनुष्यता को,
सींचेंगे ममता-समता को,
नई पौध के लिए, बदल
देंगे तारों की चाल,
नया भूगोल बनाएंगे,
नया संसार बसाएंगे, नया इन्सान बनाएंगे।
देश हमारा धरती अपनी, हम धरती के लाल।
नया संसार बसाएंगे, नया इंसान बनाएंगे॥

 

बीच के लोग

खाते-पीते, दहशत जीते
घुटते-पिटते बीच के लोग।
वर्ग-धर्म पटकनी लगाता,
माहुर माते बीच के लोग।

घर में घर की तंगी-मंगी,
भ्रम में भटके बीच के लोग।
लोभ-लाभ की माया लादे,
झटके खाते बीच के लोग।

घना समस्याओं का जंगल,
कीर्तन गाते बीच के लोग।
नीचे श्रमिक, विलासी ऊपर,
बीच में लटके बीच के लोग।

बैल

तक-तक तक-तक बैल।
हुई ठीक दुपहर है प्यारे,
मृग-मरीचिका चली किनारे
खेत पड़ा है पैर पसारे,
ओ मौके के मीत हमारे।
तुम पर बड़ा भरोसा मुझको,
माँ ने पाला-पोसा तुमको।
मेहनत के दिन यार न झिझको,
हिम्मत मत हारो मत ठिठको।
तय कर ली है हमने-तुमने, सात हराई गैल।
तक-तक तक-तक बैल।।

आती होगी घर की रानी,
लिए तुम्हें चोकर की सानी।
मुझको लपसी-ठंडा पानी,
पगी प्रेम में ठगी बिकानी।
फर-फर उड़ती चूनर काली,
आती होगी बनी मराली।
रंजे नयन अधरों में लाली,
अंग-अंग में भरे वहाली।
मृदु मुस्कान चपल चितवन से ठगती छलिया छैल।
तक-तक तक-तक बैल।।

देखो आँतर करो न साथी,
विचक-विचक पग धरो न साथी।
मेरे साथी जग के साथी,
मन के साथी घन के साथी।
बीघा डेढ़ हो गया इनका,
पूरा काम हो गया उनका।
मुझको रोटी तुमको तिनका,
है आधार यही जीवन का।
चलो पेट भर लें चल करके दुखिया बैल टुटैल।
तक-तक तक-तक बैल।।

 


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हिंदी समय में शील की रचनाएँ