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कविता

महानगर में प्यार की जगह
घनश्याम कुमार देवांश


मैं उसे लेकर पूरे महानगर में घूमा
लेकिन कहीं कोई ऐसी जगह नहीं थी
जहाँ मैं उसे प्यार कर सकता
हम जहाँ भी जाते
एक छाया हमारे पीछे दम साधे चुपचाप चलती रहती
हम जिस दरख्त के नीचे खड़े होते
उसपर वह एक चमगादड़ की तरह लटक जाती
हम जिस बेंच पर बैठते वह उसके नीचे पसर जाती
किसी बंद कमरे में पहुँचते तो वह
हमारी हथेलियों और माथे पर
पसीना बनकर फिसलने लगती
कितना अजीब है यह सब
कि इतने बड़े महानगर में
प्यार करने के लिए एक भी जगह नहीं?


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