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प्रेमचंद की शेष रचनाएँ
प्रदीप जैन

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प्रेमचंद के सम्पादन में प्रकाशित मासिक ‘हंस’ का जनवरी-फरवरी 1932 का संयुक्तांक ‘आत्मकथा अंक’ के रूप में प्रकाशित हुआ था। इस विशेषांक के प्रकाशन से हिन्दी में आत्मकथा लेखन आरम्भ हुआ, जो निरन्तर प्रगति के पथ पर अग्रसर है। इसी विशेषांक में ‘जीवन-सार’ शीर्षक से प्रेमचंद का आत्मकथापरक लेख प्रकाशित हुआ था, जो उनकी एकमात्र आधी-अधूरी तथा संक्षिप्त सी आत्मकथा है, जिसका प्रेमचंद के जीवनीकारों ने व्यापक रूप से उपयोग किया है। अपनी इस आत्मकथा को प्रेमचंद ने निम्नांकित शब्दों से प्रारम्भ किया था -

"मेरा जीवन सपाट, समथल मैदान है, जिसमें कहीं-कहीं गढ़े तो हैं; पर टीलों, पर्वतों, घने जंगलों, गहरी घाटियों और खड्डों का स्थान नहीं है। जो सज्जन पहाड़ों की सैर के शौकीन हैं, उन्हें तो यहाँ निराशा ही होगी।1

1.   प्रेमचंद की अप्राप्य कहानियाँ,

प्रेमचंद के बहुधा उद्धृत उपर्युक्त शब्दों से उनकी बाल्य और किशोरावस्था की भयावह निर्धनता, स्कूल मास्टर तथा सब डिप्टी इंस्पेक्टर आफ स्कूल्स के रूप में स्थान-स्थान पर स्वास्थ्य के लिए प्रतिकूल वातावरण में निरन्तर नौकरी करते घूम- घूमकर आमंत्रित की गई शारीरिक बीमारी, महात्मा गांधी के असहयोग आन्दोलन से प्रभावित होकर 120 रुपये माहवार की सरकारी नौकरी को ठोकर मारकर जीविकोपार्जन के लिए दर-दर मिलती ठोकरें, वर्षों से संचित एक साध को पूरा करने के लिए मासिक ‘हंस’ तथा साप्ताहिक ‘जागरण’ के सम्पादन-प्रकाशन और सरस्वती प्रेस के संचालन से सुरसा के मुँह की तरह निरन्तर बढ़ते घाटे की भरपाई के लिए मुम्बई की मायानगरी में अनिच्छापूर्वक बिताया लगभग एक वर्ष का समय और अन्ततः जानलेवा बीमारी से लड़ते हुए इस नश्वर संसार को अलविदा कहकर अनन्त की यात्रा पर निकल जाना - सब कुछ ही प्रतिध्वनित होता है।

असंगतियों, विसंगतियों, प्रतिकूलताओं और विषमताओं से यावज्जीवन युद्धरत प्रेमचंद समाज के वंचित वर्ग की भावनाओं को अपनी प्रखर रचनाधर्मिता से निरन्तर वाणी प्रदान करते रहे और इस समूची प्रक्रिया में उन्हें इतना अवकाश ही कहाँ था कि वे स्वयं अपनी ओर भी कभी देख पाते। परिणामस्वरूप प्रेमचंद स्वयं से सदा निस्पृह ही बने रहे, यहाँ तक कि जीवन के अन्तिम क्षणों में भी उन्हें ध्यान था तो बस अपने मिशन का, वह मिशन जिसे पूरा करने के लिए उन्होंने ‘हंस’ निकाला और जिसके प्रकाशन की निरन्तरता बनी रहने की चिन्ता जीवन के अन्तिम क्षणों तक उनके साथ रही। प्रेमचंद की इस जनोन्मुखी चिन्तन-धारा को भले ही वर्तमान काल के विद्वान् ‘आभिजात्य संस्कारों की कमी’ की संज्ञा देने लगें, किन्तु उन्हें अपनी विचार-यात्रा, जीवन-संघर्ष, अस्तित्व की लड़ाई और दलित-शोषित वर्ग के चौमुखी उत्थान की चिन्ता ने कभी इतना अवकाश ही नहीं दिया कि वे अपनी रचनाओं से समन्वित हिन्दी-उर्दू पत्र-पत्रिकाओं को सहेजकर रखने की दिशा में तनिक भी सचेष्ट बने रह सकते। अत्यन्त अव्यवस्थित जीवन जीने वाले प्रेमचंद के लिए यह न तो सम्भव था, न व्यावहारिक ही। और यही कारण है कि उनकी अनेकानेक कहानियाँ पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो जाने पर भी कहानी-संकलनों में सम्मिलित नहीं हो पाईं। जहाँ तक हिन्दी-उर्दू लेखों का सम्बन्ध है, प्रेमचंद ने अपने जीवन-काल में उर्दू जीवनीपरक लेखों का ही एकमात्र संकलन ‘बाकमालों के दर्शन’ शीर्षक से प्रकाशित कराया था, और वह भी स्कूली पाठ्यक्रम में स्वीकृत कराकर आर्थिक कठिनाइयों से कुछ छुटकारा पाने के दृष्टिकोण से। अन्य हिन्दी-उर्दू लेख प्रेमचंद के जीवन-काल में पुस्तकाकार रूप में कभी प्रकाशित नहीं हो सके। सम्पादकीय आलेखों, टिप्पणियों और पुस्तक- समीक्षाओं को, भले ही वे कितनी ही महत्त्वपूर्ण क्यों न रही हों, पुस्तकाकार प्रकाशित कराने का तो मृत्यु ने उन्हें अवकाश ही नहीं दिया।

प्रेमचंद ने अपने 26 दिसम्बर 1934 के पत्र द्वारा इन्द्रनाथ मदान को सूचना देते हुए लिखा था - "मेरी कहानियों की कुल संख्या लगभग ढाई सौ है। अप्रकाशित कहानियाँ मेरे पास एक भी नहीं है।"1 स्पष्ट है कि लेखन-कार्य पूर्ण होते ही प्रेमचंद अपनी प्रत्येक रचना किसी न किसी पत्र-पत्रिका को प्रकाशनार्थ भेज दिया करते थे। अतः शोधकर्ताओं के प्रमाद, असावधानी, सुविधाभोगी वृत्ति तथा आलस्य के कारण प्रेमचंद की अनेक कहानियाँ, लेख आदि विभिन्न सुप्रसिद्ध अथवा अल्पज्ञात हिन्दी-उर्दू पत्र-पत्रिकाओं के पृष्ठों में अचीन्हे पड़े रह गए हैं। उनकी ऐसी ही अज्ञात रचनाओं को परवर्ती विद्वानों ने प्रेमचंद की ‘अप्राप्य’ रचनाओं के नाम से अभिहित करना प्रारम्भ कर दिया। यहाँ यह उल्लेख करना सर्वथा समीचीन होगा कि प्रेमचंद की ये ‘अप्राप्य’ रचनाएँ उनकी ‘अप्रकाशित’ रचनाएँ नहीं हैं और इस सम्बन्ध में किसी प्रकार का भ्रम नहीं होना चाहिए। ध्यातव्य है कि प्रेमचंद की कुछ रचनाएँ ऐसी भी हैं, जो उनके देहावसान के समय प्रकाशन की प्रक्रिया में थीं लेकिन उनका प्रथम प्रकाशन उनके देहावसान के उपरान्त ही सम्भव हो पाया।

1.  चिट्ठी-पत्री, भाग-2,

मुंशी प्रेमचंद की इन अज्ञात या अप्राप्य रचनाओं को खोजकर साहित्य-संसार के समक्ष प्रस्तुत कर देने का कार्य कब आरम्भ हुआ, इस सम्बन्ध में प्रायः विद्वानों ने भ्रामक सूचनाएँ उपलब्ध कराई हैं। आश्चर्य तब होता है जब राष्ट्रीय ही नहीं वरन् अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर ‘प्रेमचंद-विशेषज्ञ’ के रूप में अपनी पहचान बनाने वाले डा. कमल किशोर गोयनका भी तथ्यपरक सूचना उपलब्ध कराने में सफल नहीं हो पाते। डा. गोयनका ने सन् 2005 में प्रकाशित अपनी पुस्तक में लिखा है -

"प्रेमचंद के अप्राप्य साहित्य की खोज का सिलसिला रावलपिंडी में रहते हुए भीष्म साहनी ने 1941 में आरम्भ किया था। उन्होंने ‘विशाल भारत’ के मई 1941 के अंक में ‘स्व. प्रेमचंदजी के पत्रों का संग्रह’ शीर्षक से एक नोटिस छपवाया था जिसमें पाठकों के पास उपलब्ध प्रेमचंद के पत्रों को भेजने का आग्रह किया गया था। इसके बाद मदन गोपाल ने 1943 से इसी कार्य को आरम्भ किया और काफी सफलता प्राप्त की, किन्तु अप्राप्य एवं अज्ञात साहित्य की खोज का व्यवस्थित कार्य अमृतराय ने लगभग 1957 में आरम्भ किया। और ... हजारों पृष्ठों का अप्राप्य साहित्य पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत किया। प्रेमचंद के सम्पूर्ण साहित्य को उपलब्ध कराने की दृष्टि से यह एक ऐतिहासिक घटना थी, एक विस्फोट था, एक अविस्मरणीय उपलब्धि थी। इसके पश्चात् इन पंक्तियों के लेखक ने 1962 से इस कार्य को उठाया और विगत 25 वर्षों में हजारों पृष्ठों के अप्राप्य-अज्ञात साहित्य को खोज निकाला।1

डा. गोयनका के उपर्युक्त कथन के अनुसार 8 अक्टूबर 1936 को प्रेमचंद के देहावसान के लगभग 5 वर्ष पश्चात् भीष्म साहनी ने प्रेमचंद के पत्रों का संग्रह करने की सूचना प्रकाशित कराकर उनकी अप्राप्य-अज्ञात रचनाओं को खोजना प्रारम्भ किया था। पत्रों का संग्रह करने को रचनाओं (कहानी, लेख आदि) की खोज का कार्य कैसे और क्यों माना गया, यह कुछ स्पष्ट नहीं होता। उपर्युक्त शब्दों से यह भ्रम भी होता है कि इस कार्य को अमृतराय तथा डा. कमल किशोर गोयनका ने ही हाथ में लिया तथा अन्य किसी भी विद्वान् ने इस दिशा में कार्य करने की आवश्यकता अनुभव नहीं की। इसके अतिरिक्त प्रेमचंद के दोनों पुत्र श्रीपतराय और अमृतराय अपने पिता से उत्तराधिकार में मिले हुए सरस्वती प्रेस का संचालन सफलता से कर रहे थे और स्वयं डा. गोयनका ने अपने उपर्युक्त उद्धरण में ही इस दिशा में किए गए अमृतराय के प्रयासों की खुले हृदय से प्रशंसा भी की है। अतः, उपर्युक्त उल्लेख से भ्रम होता है कि प्रेमचंद के देहावसान के पश्चात् 21 वर्षों तक अमृतराय ने उनके अज्ञात तथा दृष्टि से ओझल रह गए साहित्य को खोजने का तनिक भी उद्योग नहीं किया और उन्होंने इस कार्य को पहली बार 1957 में ही आरम्भ किया और उनके पश्चात् प्रेमचंद साहित्य पर शोध करके सन् 1972 में पी-एच्.डी. की उपाधि प्राप्त करने वाले डा. कमल किशोर गोयनका ने ‘1962 से इस कार्य को उठाया’ और केवल वे ही इस कार्य को आगे बढ़ाने में सफल हो सके। तार्किक आधार पर इसी भ्रम के निवारण हेतु आगामी पंक्तियों में प्रेमचंद के अज्ञात-अप्राप्य साहित्य की खोज का इतिवृत्त प्रस्तुत है।

1.   प्रेमचंद की अप्राप्य कहानियाँ,

उल्लेख किया जा चुका है कि प्रेमचंद की कतिपय रचनाएँ ऐसी भी हैं, जो उनके देहावसान के समय प्रकाशन की प्रक्रिया में थीं परन्तु उनके जीवन-काल में प्रकाशित न हो सकीं। प्रेमचंद की ऐसी रचनाओं, जिन्हें प्रकारान्तर से उनकी अप्रकाशित रचनाएँ स्वीकार किया जा सकता है, के सम्बन्ध में सर्वप्रथम विचार करना सर्वथा समीचीन होगा।

प्रेमचंद के सम्पादन में मासिक ‘हंस’ मार्च 1930 से सितम्बर 1936 तक प्रकाशित हुआ। 8 अक्टूबर 1936 को प्रेमचंद का देहावसान हो जाने पर अक्टूबर 1936 के अंक से ‘हंस’ शिवरानी देवी के सम्पादन में प्रकाशित होना प्रारम्भ हुआ। ‘हंस’ के अक्टूबर 1936 के अंक में प्रेमचंद की कहानी ‘कश्मीरी सेब’ प्रकाशित हुई जिस पर लेखकीय नामोल्लेख ‘स्व. प्रेमचंदजी’ के रूप में प्रकाशित हुआ। यह कहानी पीछे चलकर ‘कफन और शेष रचनाएँ’ शीर्षक संकलन में सम्मिलित हुई। प्रेमचंद के देहावसान वाले मास में ही इस कहानी के प्रकाशित होने से इसमें तनिक भी सन्देह नहीं रहता कि उनकी अज्ञात-अप्राप्य-अप्रकाशित रचनाएँ प्रकाश में लाने का कार्य उनके देहावसान के तत्काल पश्चात् आरम्भ हो गया था।

प्रेमचंद ने एक बालोपयोगी कहानी ‘कुत्ते की कहानी’ शीर्षक से लिखी थी और यह कहानी एक लघु पुस्तिका के रूप में प्रकाशित होनी प्रस्तावित थी। इसके सम्बन्ध में ‘हंस’ के फरवरी 1936 के अंक में सूचना भी प्रकाशित हुई थी। डा. माता प्रसाद गुप्त द्वारा प्रान्तीय गजट के प्रामाणिक आधार पर उपलब्ध कराई गई सूचना के अनुसार यह पुस्तिका नवम्बर 1936 में सरस्वती प्रेस, बनारस से प्रकाशित हुई थी। इस पुस्तिका में प्रेमचंद की लिखी एक संक्षिप्त भूमिका भी प्रकाशित है, जिस पर 14 जुलाई 1936 तिथि मुद्रित है, जो सम्भवतः भूमिका-लेखन की तिथि है।

चन्द्रगुप्त विद्यालंकार के निमन्त्रण पर प्रेमचंद ने अप्रैल 1936 में लाहौर में आयोजित आर्यभाषा सम्मेलन में भाग लेकर एक लाख से अधिक की संख्या के जनसमूह के समक्ष भाषण दिया था, जिसका अविकल पाठ उनके देहावसान के छह माह पश्चात् ‘हंस’ के फरवरी 1937 के अंक में पहली बार प्रकाशित होकर प्रेमचंद साहित्य में समाविष्ट हुआ, जो आगे चलकर ‘कुछ विचार’ शीर्षक संकलन में सम्मिलित हुआ।

अंग्रेजी के सुप्रसिद्ध नाटककार जार्ज बर्नार्ड शॉ के नाटक ‘बैक टू मैथ्यूसेलह’ के एक अंश ‘इन दि बिगिनिंग’ का हिन्दी अनुवाद प्रेमचंद ने ‘सृष्टि का आरम्भ’ शीर्षक से किया था। यह अनुवाद पहली बार प्रेमचंद के देहावसान के उपरान्त ‘हंस’ के मार्च तथा अप्रैल 1937 के दो अंकों में क्रमशः प्रकाशित हुआ जो बाद में 1938 में सरस्वती प्रेस से पुस्तकाकार रूप में भी प्रकाशित हुआ।

अप्रैल 1935 में इन्दौर में हिन्दी साहित्य सम्मेलन का अधिवेशन हुआ, जिसमें पढ़ने के लिए प्रेमचंद ने अपना भाषण लिख लिया था और उसकी प्रति ‘जमाना’ में प्रकाशनार्थ मुंशी दयानारायण निगम को भेज दी थी। सम्मेलन में तो प्रेमचंद नहीं जा पाए परन्तु उनका भाषण निगम साहब ने ‘जमाना’ के अप्रैल 1935 के अंक में ही प्रकाशित कर दिया था। प्रेमचंद के इस भाषण का हिन्दी रूप पहली बार ‘हंस’ के अप्रैल 1937 के अंक में ‘उर्दू हिन्दी हिन्दुस्तानी’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ। इस भाषण के हिन्दी रूप के सम्बन्ध में यह सूचना प्राप्त नहीं होती कि यह रूपान्तरण अमृतराय ने किया था अथवा प्रेमचंद के कागजों में अमृतराय को उनके मूल हिन्दी भाषण की पाण्डुलिपि प्राप्त हो गई थी, जिसे उन्होंने ‘हंस’ में प्रकाशित कर दिया। इतना अवश्य कहा जा सकता है कि यदि यह प्रेमचंद का मूल हिन्दी भाषण है तो इसका प्रथम प्रकाशन अप्रैल 1937 में हुआ और यदि यह अमृतराय द्वारा उर्दू से हिन्दी में रूपान्तरित करके प्रकाशित किया गया था तो इसे उस प्रयास के अन्दर समाहित किया जाना चाहिए जिसमें प्रेमचंद की उर्दू रचनाओं को हिन्दी-साहित्य-संसार के समक्ष हिन्दी में रूपान्तरित करके प्रकाशित किया गया।

प्रेमचंद और मुंशी दयानारायण निगम के पारस्परिक सम्बन्ध किसी परिचय की अपेक्षा नहीं रखते। निगम साहब के सम्पादन में प्रकाशित उर्दू मासिक ‘जमाना’ वह अकेली पत्रिका है, जिसमें प्रेमचंद की सर्वाधिक रचनाएँ प्रकाशित हुईं। प्रेमचंद की एक कहानी ‘क्रिकेट मैच’ न जाने कैसे निगम साहब की फाइलों में पड़ी रह गई थी, जिसे उन्होंने प्रेमचंद के देहावसान के उपरान्त ‘जमाना’ के जुलाई 1937 के अंक में प्रकाशित करके प्रेमचंद साहित्य में सम्मिलित कराया।

प्रेमचंद ने अपने 19 मार्च 1935 के पत्र में हसामुद्दीन गौरी को लिखा -

"मेरी दो किताबें जामिया मिल्लिया, देहली के एहतेमाम से छप रही हैं। एक का नाम ‘मैदाने अमल’, दूसरी का नाम ‘वारदात’ है। तीसरी जेरे तसनीफ है।"1

उपर्युक्त पत्र से स्पष्ट है कि स्वयं प्रेमचंद ने 1935 में अपने ‘वारदात’ शीर्षक उर्दू कहानी-संकलन को जामिया मिल्लिया, देहली द्वारा प्रकाशित कराना सुनिश्चित कर लिया था। सम्प्रति प्राप्त प्रमाणों के आधार पर यह कहानी-संकलन प्रेमचंद के जीवन-काल में प्रकाशित नहीं हुआ। इसके प्रकाशन के सम्बन्ध में डा. कमल किशोर गोयनका ने निम्नांकित सूचना उपलब्ध कराई है -

"वारदात’ : उर्दू कहानी-संकलन/संकलन-प्रेमचंद/प्रकाशक-मकतबा जामिया, दिल्ली, प्रथम संस्करण फरवरी 1938 ......‘जमाना’ जून 1937 (जो फरवरी 1938 में छप सका) में दयानारायण निगम ने ‘वारदात’ का परिचय दिया है।"2

प्रतीत होता है कि डा. गोयनका ने ‘जमाना’ प्रेमचंद नम्बर को फरवरी 1938 में प्रकाशित होना मानते हुए ‘वारदात’ को भी फरवरी 1938 में प्रकाशित होना मान लिया है। परन्तु ‘जमाना’ प्रेमचंद नम्बर के सम्बन्ध में मुंशी दयानारायण निगम ने ‘जमाना’ के दिसम्बर 1937 के अंक में निम्नांकित सूचना प्रकाशित कराई थी-

1.  चिट्ठी-पत्री, भाग-2,

2.  प्रेमचंद विश्वकोश, भाग-2, 

"पिछले साल हमने अपने रफीक मोहतरम मुंशी प्रेमचंद की यादगार में ‘जमाना’ का एक खास नम्बर शाया करने का ऐलान किया था। हम उसे दिसम्बर 1936 के पर्चे के बजाए अप्रैल 1937 में शाया करना चाहते थे, लेकिन बाज अहम मजामीन, जो इस नम्बर के लिये खास तौर पर लिखाए गए थे, इस कदर जल्द तैयार न हो सके और उनकी तादाद व हजम में भी इस कदर इजाफा हो गया कि हमको जून 1937 के पर्चे को भी इसी नम्बर में शामिल करना पड़ा। मगर ऐडीटर की खराबी-ए-सेहत और बाज दीगर वजूह से इस नम्बर की इशाअत में गैरमामूली ताखीर हो गई। मगर अब शुक्र का मकाम है कि हमारी मेहनत ठिकाने लगी और यादगारे प्रेमचंद अपनी तमाम खुसूसियात के साथ तैयार हो गया है और इस नम्बर के साथ ही शाया हो रहा है।1

स्पष्ट है कि ‘जमाना’ का प्रेमचंद नम्बर वास्तव में दिसम्बर 1937 में ही छपकर तैयार हो गया था, जिसमें मुंशी दयानारायण निगम ने ‘वारदात’ का परिचय इस प्रकार प्रस्तुत किया था -

"वारदात’ : तेरह अफसानों का मजमूआ जामिया मिल्लिया, दिल्ली से 1937 में शाया हुआ।2

स्पष्ट है कि निगम साहब के अनुसार यह संकलन 1937 में प्रकाशित हो गया था। इसके सम्बन्ध में गोपाल कृष्ण माणकटाला विस्तार से लिखते हैं -

"डा. गोयनका इसका सने इशाअत 1938 (फरवरी) तहरीर फरमाते हैं। निगम साहब सितम्बर 1937 के ‘जमाना’ में सफहा 203 पर ‘इल्मी खबरें और नोट’ के उनवान के तहत तहरीर फरमाते हैं - ‘इस असना में मुंशी प्रेमचंद के तेरह छोटे अफसानों का एक मजमूआ ‘वारदात’ के नाम से जामिया मिल्लिया प्रेस से शाया हुआ है।’ अक्टूबर 1937 के ‘जमाना’ में इसका एक इश्तिहार भी शाया हुआ है।3

उपर्युक्त सूचना से स्पष्ट है कि डा. गोयनका द्वारा निर्दिष्ट इस कहानी-संकलन के प्रकाशन की अनुमानित तिथि भ्रामक है और यह संकलन अगस्त 1937 में अवश्य ही प्रकाशित हो चुका था, जिसमें निम्नांकित 13 कहानियाँ सम्मिलित थीं -

1. शिकवा शिकायत (‘चन्दन’, जून 1932), 2. मासूम बच्चा (‘जामिया’, फरवरी 1935), 3. बदनसीब माँ, 4. शान्ति (‘इस्मत’, दिसम्बर 1934 - मूल शीर्षक ‘सुकूने कल्ब’ तथा इसी शीर्षक से ‘दूध की कीमत’ नामक उर्दू कहानी-संकलन में सम्मिलित), 5. रोशनी (‘अदबी दुनिया’, नवम्बर 1932), 6. मालकिन, 7. नयी बीवी (‘अफसाना’, मई 1933), 8. गिल्ली डंडा, 9. स्वांग (‘जामिया’, जनवरी 1935), 10. इन्साफ की पुलीस, 11. गमनदारी बुज बखुर, 12. मुफ्त करम दाश्तन, और 13. कातिल की माँ।

1. जमाना का 35वाँ साल : रफ्तारे जमाना; जमाना, कानपुर, दिसम्बर 1937,
2. प्रेमचंद की तसानीफ; जमाना प्रेमचंद नम्बर,
3. जमीमा नम्बर चार; जमाना प्रेमचंद नम्बर, 

इस विवरण से स्पष्ट है कि उक्त संकलन की सात कहानियों के सम्बन्ध में यह सूचना उपलब्ध नहीं है कि उनका प्रथम प्रकाशन किस उर्दू पत्र-पत्रिका में हुआ था। लेकिन सम्प्रति प्राप्त प्रमाणों के आलोक में इस संकलन की कहानियों का चयन तथा इसका नामकरण स्वयं प्रेमचंद ने 1935 में ही कर लिया था। अतः इस संकलन के अगस्त 1937 में प्रकाशित हो जाने से साहित्य-जगत् को सात कहानियों के साथ प्रेमचंद का एक अप्रकाशित उर्दू कहानी-संकलन भी उपलब्ध हो गया था।

प्रेमचंद ने हिन्दी में जोधपुर के दुर्गादास की जीवनी लिखी थी। इस जीवनी के सम्बन्ध में अन्य किसी स्रोत से कोई सूचना नहीं मिलती और न यह सूचना ही उपलब्ध है कि इसकी प्रेमचंद के हस्तलेख वाली पाण्डुलिपि कहाँ सुरक्षित है, लेकिन इसे ‘दुर्गादास’ शीर्षक पुस्तक के रूप में सरस्वती प्रेस, बनारस से सन् 1938 में प्रकाशित कराकर प्रेमचंद साहित्य में सम्मिलित करने का श्रेय प्रेमचंद के पुत्रों को ही है।

प्रेमचंद की लिखी 12 बाल कहानियों का एक संकलन ‘जंगल की कहानियाँ’ शीर्षक से पहली बार 1938 में सरस्वती प्रेस से प्रकाशित हुआ। इस संकलन के सम्बन्ध में ‘हंस’ के फरवरी 1936 के अंक में सूचना प्रकाशित हुई थी, जिससे यह ज्ञात होता है कि प्रेमचंद ने अपने जीवन-काल में इस संकलन की योजना को अन्तिम रूप दे दिया था। प्रेमचंद की इन अप्रकाशित कहानियों को प्रकाश में लाने का श्रेय उनके पुत्रों को ही है।

जिस प्रकार प्रेमचंद का प्रथम उपन्यास ‘असरारे मआबिद’ अपूर्ण रहा, उसी प्रकार उनका अन्तिम उपन्यास ‘मंगलसूत्र’ भी पूर्ण न हो सका। प्रेमचंद का यह अन्तिम अपूर्ण उपन्यास लम्बे समय तक साहित्य-संसार की दृष्टि से ओझल रहा और पहली बार अमृतराय के प्रयास से ‘हंस’ के फरवरी 1948 के अंक में प्रकाशित होकर साहित्य-संसार के समक्ष आ पाया। हिन्दुस्तानी पब्लिशिंग हाउस, इलाहाबाद से भी इस उपन्यास का पुस्तकाकार रूप में प्रकाशित होना बताया जाता है। इस उपन्यास का प्रथम उल्लेख दिसम्बर 1937 में प्रकाशित ‘जमाना’ के प्रेमचंद विशेषांक में प्राप्त है, जिससे यह अनुमान होता है कि इस उपन्यास का एक पुस्तकाकार संस्करण प्रेमचंद के देहावसान के उपरान्त दिसम्बर 1937 से पूर्व ही प्रकाशित हो चुका था। प्रेमचंद के इस अन्तिम तथा महत्त्वपूर्ण उपन्यास को प्रेमचंद साहित्य में पहली बार सम्मिलित कराने का श्रेय अमृतराय को ही है। प्रेमचंद के इस अन्तिम अपूर्ण उपन्यास का हैदराबाद (पाकिस्तान) के मनोचिकित्सक डा. हसन मंजर द्वारा किया गया उर्दू अनुवाद 1991 में मशहूर आफसेट प्रेस, कराची से प्रकाशित हुआ था। डा. हसन मंजर द्वारा अनूदित ‘मंगलसूत्र’ भारत में गोपाल कृष्ण माणकटाला की भूमिका सहित माडर्न पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली से 2002 में प्रकाशित हुआ। प्रेमचंद की केवल हिन्दी में लिखी गई रचनाओं को उर्दू में अनूदित करके प्रकाशित कराने की दिशा में यह एक प्रशंसनीय एवं स्वागत-योग्य प्रयास है। उल्लेखनीय है कि डा. हसन मंजर शिवरानी देवी की पुस्तक ‘प्रेमचंद घर में’ का भी उर्दू अनुवाद करके प्रकाशित करा चुके हैं।

उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि प्रेमचंद की नितान्त अप्रकाशित रचनाओं को खोजकर प्रकाशित करा देने का महनीय कार्य उनके पुत्रद्वय श्रीपतराय और अमृतराय ने ही प्रमुख रूप से सम्पादित किया और एक कहानी श्रीमती शिवरानी देवी ने और एक कहानी मुंशी दयानारायण निगम ने प्रकाशित कराई। इस विवरण से यह भी प्रमाणित हो जाता है कि प्रेमचंद के अज्ञात-अप्राप्य ही नहीं, वरन् उनके अप्रकाशित साहित्य की भी तलाश का सिलसिला उनके देहावसान के साथ ही प्रारम्भ हो गया था। और, इस तथ्य के आलोक में डा. कमल किशोर गोयनका की पूर्व उद्धृत सूचना प्रामाणिक सिद्ध नहीं होती।

श्रीपतराय और अमृतराय ने अपने पिता प्रेमचंद के देहावसान के अनन्तर ही उनकी अप्रकाशित रह गई रचनाओं को प्रकाशित कराने के साथ-साथ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में यत्र-तत्र बिखरी पड़ी रचनाओं को संकलित कर प्रकाशित करा देने का महत्त्वपूर्ण कार्य भी व्यवस्थित रूप से आरम्भ कर दिया था। इनके प्रयासों से सरस्वती प्रेस से प्रकाशित ‘कफन और शेष रचनाएँ’ शीर्षक संकलन मार्च 1937 में ही साहित्य-संसार के हाथों में आ गया था, जिसमें संकलित रचनाएँ निम्नांकित हैं -

1. कफन (‘चाँद’, अप्रैल 1936), 2. लेखक (‘हंस’, नवम्बर 1931), 3. जुरमाना, 4. रहस्य (‘हंस’, सितम्बर 1936), 5. मेरी पहली रचना (‘हंस’, दिसम्बर 1935), 6. कश्मीरी सेब (‘हंस’, अक्टूबर 1936), 7. जीवन-सार (‘हंस’, आत्मकथा अंक, जनवरी-फरवरी 1932), 8. तथ्य (‘हंस’, फरवरी 1937), 9. दो बहनें (‘माधुरी’, अगस्त 1936), 10. आहुति (‘हंस’, नवम्बर 1930), 11. होली का उपहार (‘माधुरी’, अप्रैल 1931), 12. पंडित मोटेराम की डायरी (‘जागरण’, जुलाई 1934), 13. प्रेम की होली (‘मतवाला’, 23 मार्च 1929), और 14. यह भी नशा वह भी नशा।

स्पष्ट है कि इस संकलन में विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में छपी उन 12 कहानियों तथा दो लेखों को संकलित करके पुस्तकाकार रूप में प्रकाशित किया गया था, जिनका संकलन प्रेमचंद नहीं कर पाए थे। सम्प्रति यह ज्ञात नहीं हो सका कि इनमें से ‘जुरमाना’ तथा ‘यह भी नशा वह भी नशा’ शीर्षक कहानियाँ किस पत्र-पत्रिका के किस अंक में प्रकाशित हुई थीं। ध्यातव्य है कि प्रेमचंद की सर्वाधिक चर्चित कहानी ‘कफन’ इसी संकलन में पहली बार संकलित होकर प्रकाशित हुई थी। इस संकलन के प्रकाशन को प्रेमचंद की असंकलित रचनाओं को सुव्यवस्थित रूप से संकलित करने की दिशा में किया गया प्रथम, महत्त्वपूर्ण एवं सफल प्रयास स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए।

‘कफन और शेष रचनाएँ’ जैसा एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण तथा प्रारम्भिक कार्य उर्दू में भी दृष्टि में आता है। जून 1937 में इस्मत बुक डिपो, देहली द्वारा प्रेमचंद की उर्दू कहानियों का एक संकलन ‘दूध की कीमत’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ। इस संकलन के प्रकाशित होने की सूचना उर्दू मासिक ‘इस्मत’ के जून 1937 के अंक में तथा ‘साकी’ के जुलाई 1937 के अंक में प्रकाशित हुई थी। इस संकलन में संकलित 9 कहानियों की सूची निम्नानुसार है -

1. कुसुम (‘इस्मत’, अक्टूबर 1932), 2. वफा का देवता (‘इस्मत’, दिसम्बर 1932), 3. अक्सीर (‘इस्मत’, मई 1933), 4. ईदगाह (‘इस्मत’, दिसम्बर 1933), 5. सुकूने कल्ब (‘इस्मत’, दिसम्बर 1934), 6. दो बहनें (‘इस्मत’, सितम्बर- अक्टूबर 1936), 7. रियासत का दीवान, 8. दूध की कीमत, और 9. जाविया-ए-निगाह।

उपर्युक्त सूची से स्पष्ट है कि अन्तिम तीन कहानियों के अतिरिक्त जिनके पत्र-पत्रिका में पूर्व प्रकाशन के सन्दर्भ सम्प्रति उपलब्ध नहीं हैं, शेष छह कहानियाँ उर्दू मासिक ‘इस्मत’ के ही विभिन्न अंकों में प्रकाशित हुई थीं। इस तथ्य के आलोक में यह अनुमान भी किया जा सकता है कि उपर्युक्त सूची की अन्तिम तीन कहानियाँ भी सम्भवतः ‘इस्मत’ के ही अन्य अंकों में प्रकाशित हुई होंगी, परन्तु इस अनुमान को पुष्ट प्रमाणों से विश्वसनीय आधार दिया जाना अपेक्षित है। ‘दूध की कीमत’ को प्रेमचंद की यत्र-तत्र बिखरी हुई उर्दू रचनाओं को तलाश करके संकलित करने की दिशा में प्रथम व्यवस्थित प्रयास स्वीकार करने में कोई बाधा नहीं है। यहाँ यह उल्लेख करना भी समीचीन होगा कि सम्प्रति यह तो ज्ञात नहीं है कि इस संकलन का सम्पादन किन्होंने किया था लेकिन यह अनुमान किया जा सकता है कि सम्भवतः ‘इस्मत’ के तत्कालीन सम्पादक राजिक-उल-खैरी ने ही इस संकलन का सम्पादन किया होगा।

8 अक्टूबर 1936 को प्रेमचंद का देहावसान हुआ तो ‘जमाना’ के अक्टूबर 1936 के अंक में ही पत्रिका का दिसम्बर 1936 का अंक ‘प्रेमचंद नम्बर’ के रूप में प्रकाशित करने की घोषणा कर दी गई। अन्यान्य कारणों से इस विशेषांक के प्रकाशन में विलम्ब होता गया और अन्ततः दिसम्बर 1936 तथा जून 1937 के दो अंकों के संयुक्त अंक के रूप में ‘जमाना प्रेमचंद नम्बर’ दिसम्बर 1937 में छपकर तैयार हो पाया। इस विशेषांक में मुंशी दयानारायण निगम ने ‘हंस’ के आत्मकथा अंक (जनवरी-फरवरी 1932) में प्रकाशित प्रेमचंद के आत्मकथापरक लेख ‘जीवन-सार’ का उर्दू अनुवाद कर ‘मुंशी प्रेमचंद की कहानी उनकी जबानी’ शीर्षक से प्रकाशित किया। यह लेख प्रेमचंद की केवल हिन्दी में प्रकाशित रचनाओं का उर्दू अनुवाद करके प्रकाशित कराने की दिशा में हुआ प्रथम प्रयास था, जिसके पश्चात् ऐसा प्रयास डा. कमर रईस ने भी किया, जिसका विवरण यथास्थान प्रस्तुत है। खेद का विषय है कि प्रेमचंद के देहावसान के तत्काल पश्चात् आरम्भ होने पर भी इस दिशा में पर्याप्त कार्य नहीं हो पाया।

प्रेमचंद का एक उर्दू कहानी-संकलन 1933 में तीर्थराम हरबंसलाल ने लाहौर से प्रकाशित किया था, जिसके सम्बन्ध में डा. कमल किशोर गोयनका ने निम्नांकित सूचना उपलब्ध कराई है-

"निजात’-उर्दूकहानी-संकलन/प्रकाशक-तीर्थराम हरबंसलाल, अनारकली, लाहौर, प्रथम संस्करण 1933/संग्रह की कहानियाँ मार्च 1934 में ‘आखिरी तोहफा’ शीर्षक से प्रकाशित हुईं। उपेन्द्रनाथ अश्क के लेख ‘प्रेमचंद के पत्र’ (‘हंस’, दिसम्बर 1948) के अनुसार तीर्थराम हरबंसलाल ने प्र्रेमचंद से 250 रु. में ‘निजात’ का कापीराइट लिया था, लेकिन पुस्तक प्रकाशन के साथ ही उसकी दुकान बन्द हो गयी। प्रेमचंद ने फिर 50 रु. लेकर इसका कापीराइट नारायणदत्त सहगल, लाहौर को दे दिया, जिसने ‘आखिरी तोहफा’ नाम से इसकी कहानियों को मार्च 1934 में प्रकाशित किया। ... ‘निजात’ का विज्ञापन ‘नैरंगे खयाल’, जून-जुलाई 1936, पृ. 168 पर प्राप्त होता है।1

उल्लेखनीय है कि ‘निजात’ का स्पष्ट उल्लेख करने पर भी डा. कमर रईस और मदन गोपाल ने इसे प्रेमचंद के कहानी-संकलनों की सूची में स्थान नहीं दिया। अतः डा. गोयनका की उपर्युक्त सूचना की इस सीमा तक तो पुष्टि हो जाती है कि यह कहानी-संकलन अकाल मृत्यु का शिकार होकर अलभ्य हो गया था। इस कहानी- संकलन की मूल प्रति खोजकर डा. प्रदीप जैन ने इसका प्रामाणिक विवरण ‘आजकल’ (जुलाई 2007) और ‘हमारी जबान’ (8-14 सितम्बर 2008) में पहली बार प्रकाशित करा दिया था। उल्लेखनीय है कि जब प्रकाशक का व्यवसाय बन्द हो जाने के कारण यह संकलन बाजार में नहीं आ पाया था, तब तीन वर्ष उपरान्त ‘नैरंगे खयाल’ के जून-जुलाई 1936 के अंक में इसका विज्ञापन प्रकाशित होने की डा. गोयनका की सूचना संदिग्ध तथा अप्रामाणिक प्रतीत होती है। इसके अतिरिक्त इस संकलन के ‘आखिरी तोहफा’ नाम से प्रकाशित होने की सूचना देने के साथ डा. गोयनका ने ‘आखिरी तोहफा’ के सम्बन्ध में निम्नांकित सूचना भी उपलब्ध कराई है-

 

"आखिरी तोहफा’ - उर्दू कहानी-संकलन/प्रकाशक-नारायणदत्त सहगल एण्ड संस, लाहौर, प्रथम संस्करण मार्च 1934/लाहौर से प्रकाशित उर्दू पत्रिका ‘नैरंगे खयाल’ के मार्च 1934 के अंक में संग्रह के प्रकाशित होने की घोषणा।2

1. प्रेमचंद विश्वकोश, भाग-2,

2. प्रेमचंद विश्वकोश, भाग-2,

डा. गोयनका की उपर्युक्त दोनों सूचनाओं में अन्तर्विरोध स्पष्ट हैं। यदि ‘नैरंगे खयाल’ के जून-जुलाई 1936 के अंक में ‘निजात’ का विज्ञापन प्रकाशित हुआ था तो इसी पत्रिका के मार्च 1934 के अंक में ‘आखिरी तोहफा’ के प्रकाशन की घोषणा का क्या औचित्य है, यह कुछ बुद्धिगम्य नहीं है। उधर दिसम्बर 1937 में छपकर तैयार हो चुके ‘जमाना’ के प्रेमचंद नम्बर में मुंशी दयानारायण निगम द्वारा उर्दू कहानी-संकलनों की सूची में ‘आखिरी तोहफा’ का उल्लेख प्राप्त न होने से भी इस विशेषांक के प्रकाशन तक इस कहानी-संकलन के प्रकाशित होने में सन्देह होता है। ‘आखिरी तोहफा’ के नवें संस्करण की एक प्रति इन पंक्तियों के लेखक के व्यक्तिगत संग्रह में उपलब्ध है, जिसके आन्तरिक मुखपृष्ठ पर प्रकाशित विवरण निम्नांकित है -

"आखिरी तोहफा/प्रेमचंद/जुमला हुकूक बहके नारायणदत्त सहगल आफ लाहौर महफूज हैं/पब्लिशर्स/नारायणदत्त सहगल एण्ड संस (लाहौर), चौक फतहपुरी, दिल्ली; मुहल्ला थापरान, जालन्धर शहर/प्रिन्टर्स - महबूब-उल-मताबा बर्की प्रेस, दिल्ली/नवीं बार/कीमत 2 रुपये 12 आने"

स्पष्ट है कि संग्रह के प्रकाशक ने प्रेमचंद से इसका प्रकाशनाधिकार खरीद लिया था, जो कि डा. गोयनका की पूर्व उद्धृत सूचना से साम्य रखता है। इसके पश्चात् ‘फहरिस्त’ शीर्षक से संग्रह की अनुक्रमणिका प्रस्तुत करने के अनन्तर ‘मकबूलियत’ शीर्षक से संग्रह के समस्त संस्करणों का विवरण इस प्रकार प्रकाशित है -

"पहला ऐडीशन 1200 अप्रैल 1938

दूसरा ऐडीशन 1500 मार्च 1939

तीसरा ऐडीशन 1000 नवम्बर 1940

चौथा ऐडीशन 1000 अप्रैल 1942

पाँचवाँ ऐडीशन 1500 अगस्त 1943

छठा ऐडीशन 2000 जनवरी 1944

सातवाँ ऐडीशन 1000 फरवरी 1947

आठवाँ ऐडीशन 2000 नवम्बर 1949

नवाँ ऐडीशन 2000 जनवरी 1951"

संग्रह के प्रकाशक द्वारा प्रस्तुत किए गए उपुर्यक्त विवरण पर अविश्वास करने का कोई भी कारण उपस्थित नहीं है और प्रामाणिक रूप से ‘आखिरी तोहफा’ का प्रथम संस्करण प्रेमचंद के देहावसान के उपरान्त अप्रैल 1938 में ही प्रकाशित हुआ था। ‘नैरंगे खयाल’ का सन्दर्भित अंक तो सम्प्रति उपलब्ध नहीं हो सका, परन्तु इतना अनुमान किया जा सकता है कि यदि इस पत्रिका में कथित विज्ञापन प्रकाशित हुआ था तो वह मात्र संग्रह की प्रकाशन-पूर्व सूचना के रूप में ही प्रकाशित हुआ होगा, और मात्र इस कथित विज्ञापन के आधार पर संग्रह को मार्च 1934 में प्रकाशित हुआ स्वीकार नहीं किया जा सकता।

‘आखिरी तोहफा’ में सम्मिलित होकर प्रकाशित हुई कहानियों का विवरण निम्नांकित है -

1. कातिल, 2. आखिरी तोहफा (‘चन्दन’, अगस्त 1931), 3. अदीब की इज्जत (‘चन्दन’, दिसम्बर 1931-‘परवीन’ शीर्षक से), 4. दो बैल (‘चन्दन’, नवम्बर 1931), 5. जेल (‘चन्दन’, जनवरी 1931), 6. शिकार (‘चन्दन’, अक्टूबर 1931), 7. आखिरी हीला (‘चन्दन’, फरवरी 1931), 8. सती (‘चन्दन’, मई 1932), 9. तुलू-ए-मुहब्बत (‘चन्दन’, सितम्बर 1931), 10. वफा की देवी, 11. डिमांस्ट्रेशन (‘हुमायूँ’, जनवरी 1932), 12. बरात, और 13. निजात।

स्पष्ट है कि इस संकलन की चार कहानियों के किसी पत्र-पत्रिका में पूर्व प्रकाशित होने का सन्दर्भ उपलब्ध नहीं है। अतः प्रेमचंद के एक अलभ्य कहानी- संकलन ‘निजात’ को नये शीर्षक ‘आखिरी तोहफा’ के अन्तर्गत पुनः प्रस्तुत करने और इसके साथ प्रेमचंद की चार दुर्लभ कहानियों को प्रेमचंद साहित्य में सम्मिलित कराने का श्रेय लाहौर के पुस्तक प्रकाशक नारायणदत्त सहगल एण्ड संस को ही है।

1938 में सरस्वती प्रेस से प्रेमचंद की कहानियों का एक संकलन ‘नारी जीवन की कहानियाँ’ शीर्षक से पहली बार प्रकाशित हुआ। इस संकलन में प्रेमचंद के विभिन्न संकलनों से पन्द्रह कहानियों का चयन किया गया था, जिनका विवरण निम्नांकित है-

1. बेटों वाली विधवा (‘मानसरोवर’, भाग-1), 2. स्वामिनी (‘मानसरोवर’, भाग-1), 3. गृहनीति (‘मानसरोवर’, भाग-2), 4. बड़े घर की बेटी (‘सप्त सरोज’, ‘प्रेम द्वादशी’), 5. दो बहनें (‘कफन और शेष रचनाएँ’), 6. शान्ति (‘मानसरोवर’, भाग-1), 7. जीवन का शाप (‘मानसरोवर’, भाग-2), 8. गृहदाह (‘प्रेम प्रसून’, ‘प्रेम द्वादशी’, ‘सप्त सुमन’, ‘प्रेम पंचमी’), 9. तथ्य (‘कफन और शेष रचनाएँ’), 10. आभूषण (‘प्रेम प्रसून’, ‘प्रेम पंचमी’, ‘नवजीवन’), 11. कौशल (‘प्रेम प्रमोद’), 12. सती (‘प्रेम तीर्थ’, ‘सप्त सुमन’, ‘प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ’-प्रथम संस्करण, ‘प्रेम पीयूष’), 13. जादू (‘मानसरोवर’, भाग-2), 14. जेल (‘समर यात्रा तथा अन्य कहानियाँ’), और 15. अन्तिम शान्ति।

दशरथनन्दन श्रीराम की कथा भारतीय जनमानस में गहरे तक पैठी हुई जनता के दैनन्दिन जीवन को व्यापक रूप से प्रभावित और विभावित करती चली आती है। प्रेमचंद भी राम-कथा के व्यापक प्रभाव से अछूते न रह सके और उन्होंने बालोपयोगी सरल भाषा में संक्षेपतः राम-कथा लिखकर सन् 1929 में लाजपतराय एण्ड संस, लाहौर से ‘रामचर्चा’ शीर्षक से उर्दू में प्रकाशित कराई थी। प्रेमचंद की इस उर्दू पुस्तक का हिन्दी अनुवाद इसी शीर्षक से सन् 1938 में सरस्वती प्रेस से प्रकाशित हुआ। यह ज्ञात नहीं हो सका कि यह हिन्दी अनुवाद किसने किया था, और न इसके प्रथम संस्करण पर इसके अनूदित होने के तथ्य का कोई उल्लेख ही प्राप्त है। इतना अवश्य है कि इसके प्रकाशन से प्रेमचंद द्वारा केवल उर्दू में लिखी हुई रचनाओं को हिन्दी साहित्य-संसार के समक्ष प्रस्तुत करने के समयसाध्य और श्रमसाध्य कार्य का श्रीगणेश हुआ। इसके अतिरिक्त इस अनूदित पुस्तक से ही यह दिशा भी निर्धारित हुई कि प्रेमचंद द्वारा केवल उर्दू में लिखी गई रचनाओं को हिन्दी संसार के समक्ष प्रस्तुत करने के लिए उनका हिन्दी रूपान्तरण किया जाना चाहिए न कि मात्र देवनागरी लिप्यन्तरण करके ही प्रकाशित कर दिया जाय।

यद्यपि प्रेमचंद ने कथेतर लेखन से ही अपना लेखकीय जीवन आरम्भ किया था तथापि कालान्तर में उनकी ख्याति ‘कथा-सम्राट्’ एवं ‘उपन्यास-सम्राट्’ के रूप में ही हुई। इतना ही नहीं, प्रेमचंद का कथाकार का स्वरूप साहित्य-संसार पर इस सीमा तक छा गया कि उनका कथेतर लेखन विस्मृति के गहन तिमिर से आवृत्त होकर अचीन्हा ही रह गया। प्रेमचंद के कथेतर लेखन की ओर साहित्य-संसार का ध्यान आकर्षित करने का प्रथम प्रयास भी प्रेमचंद के पुत्रद्वय ने ही किया, जिन्होंने सरस्वती प्रेस से 1939 में ‘कुछ विचार’ शीर्षक संकलन प्रकाशित करके साहित्य-संसार को प्रेमचंद के एक नितान्त भिन्न रूप से परिचित कराया। इस संकलन में प्रेमचंद के 11 लेख, भाषण तथा भूमिका सम्मिलित हैं जिनका विवरण निम्नांकित है -

लेख - 1. कहानी कला, 2. उपन्यास, 3. उपन्यास का विषय (‘हंस’, मार्च 1930), 4. जीवन में साहित्य का स्थान (‘हंस’, अप्रैल 1932)।

भाषण - 1. साहित्य का उद्देश्य (प्रगतिशील लेखक संघ के प्रथम अधिवेशन का अध्यक्षीय भाषण; उर्दू में ‘जमाना’ के अप्रैल 1936 अंक में प्रकाशित, हिन्दी में ‘हंस’ के जुलाई 1936 अंक में प्रकाशित), 2. एक भाषण (आर्य भाषा सम्मेलन, लाहौर में दिया गया भाषण; ‘हंस’, फरवरी 1937 अंक में प्रकाशित), 3. उर्दू हिन्दी और हिन्दुस्तानी (हिन्दी साहित्य सम्मेलन के इन्दौर अधिवेशन में देने के लिए लिखा गया; उर्दू में ‘जमाना’ के अप्रैल 1935 अंक में प्रकाशित, हिन्दी में ‘हंस’ के अप्रैल 1937 अंक में प्रकाशित), 4. राष्ट्रभाषा हिन्दी और उसकी समस्याएँ (दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा, मद्रास के उपाधि वितरणोत्सव में दिया गया दीक्षान्त भाषण; ‘हंस’, जनवरी 1935 अंक में प्रकाशित), 5. कौमी भाषा के विषय में कुछ विचार (राष्ट्रभाषा सम्मेलन, मुम्बई के स्वागताध्यक्ष के रूप में दिया गया भाषण; ‘हंस’, नवम्बर 1934 अंक में प्रकाशित)।

भूमिका - 1. कहानी कला-1(हिन्दी कहानी-संकलन ‘प्रेम प्रसून’), 2. कहानी कला-2 (हिन्दी कहानी-संकलन ‘मानसरोवर’, भाग-1)।

उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि इस संकलन द्वारा जहाँ प्रेमचंद के नानाविध कथेतर लेखन से साहित्य-जगत् को परिचित कराने का सफल प्रयास किया गया, वहीं दूसरी ओर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं-पुस्तकों में बिखरी हुई प्रेमचंद की रचनाओं को अत्यन्त व्यवस्थित रूप से सम्पादित-संकलित करके सुरक्षित करने का भी महत्त्वपूर्ण कार्य किया गया। इसके अतिरिक्त उपर्युक्त विवरण से यह भी स्पष्ट है कि इस संकलन में प्रेमचंद के दो लेख -1. ‘कहानी कला’ और 2. ‘उपन्यास’ ऐसे भी संकलित हैं जिनके किसी पत्र-पत्रिका-पुस्तक में पूर्व प्रकाशित होने की सूचना सम्प्रति उपलब्ध नहीं है। इन लेखों के सम्बन्ध में इस सम्भावना को भी सिरे से नकारा नहीं जा सकता कि अमृतराय को इन लेखों की मूल प्रतियाँ ही प्रेमचंद के कागजों में हस्तगत हो गई हों और उन्होंने इन्हें भावी पीढ़ियों के लिए सुरक्षित कर देने के दृष्टिकोण से इस संकलन में प्रकाशित कर दिया हो। परन्तु इस सम्बन्ध में कोई पुष्ट प्रमाण प्राप्त होने पर ही निश्चयात्मक रूप से कुछ कह पाना सम्भव होगा। इतना अवश्य है कि प्रेमचंद की अज्ञात-असंकलित रचनाओं को संकलित-सम्पादित करके प्रकाशित कराने की दिशा में ‘कुछ विचार’ का प्रकाशन अत्यन्त महत्त्वपूर्ण तथा क्रान्तिकारी घटना है।

प्रेमचंद का सर्वाधिक चर्चित उपन्यास ‘गोदान’ उनके जीवन-काल में मात्र हिन्दी में ही प्रकाशित हुआ था। प्रेमचंद के देहावसान के उपरान्त इसका उर्दू अनुवाद मुंशी इकबाल बहादुर वर्मा सेहर हतगामी ने किया जो 1939 में बिना अनुवादक के नामोल्लेख के मकतबा जामिया, दिल्ली से प्रकाशित हुआ। इस अनूदित उपन्यास पर अनुवादक का नाम प्रकाशित न होने से साहित्यिक क्षेत्र में यह व्यापक वाद-विवाद का विषय बना रहा कि उर्दू ‘गऊदान’ अनुवाद है अथवा मौलिक रचना।

जैसा कि उल्लेख किया जा चुका है, प्रेमचंद के जीवन-काल में उनके जीवनीपरक उर्दू लेखों का संकलन ‘बाकमालों के दर्शन’ शीर्षक से 1929 में प्रकाशित हुआ था। इस संकलन के प्रथम संस्करण का विवरण गोपाल कृष्ण माणकटाला ने गया से प्रकाशित होने वाले उर्दू मासिक ‘सुहेल’ के मई-जून 1986 के अंक में प्रकाशित कराने के पश्चात् 1988 में प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘प्रेमचंद : कुछ नये मुबाहिस’ में भी प्रकाशित करा दिया था। माणकटाला ने यह विवरण पुस्तक की उस मूल प्रति से प्रस्तुत किया था जो उन्होंने मदन गोपाल को उधार दी थी। जब माणकटाला इस पुस्तक की मूल प्रति मदन गोपाल से वापस लेकर हवाई जहाज से मुम्बई गए तो हवाई अड्डे के सुरक्षाकर्मियों ने तलाशी के दौरान इसे गुम कर दिया और साहित्य-संसार के पास केवल माणकटाला द्वारा प्रकाशित कराया गया विवरण ही रह गया था, लेकिन संतोष की बात कि इस संकलन की एक प्रति भोपाल के श्री हबीब अहमद के निजी संग्रह में सुरक्षित है। इस संकलन का द्वितीय संस्करण कुछ परिवर्द्धनों के साथ 1932 में प्रकाशित हुआ था, जिसके सम्बन्ध में विद्वानों ने प्रायः भ्रामक सूचनाएँ उपलब्ध कराई हैं। इस द्वितीय संस्करण की प्रति इन पंक्तियों के लेखक ने पटना की खुदाबख्श ओरियंटल पब्लिक लाइब्रेरी में खोज निकाली जो उसे सासाराम (बिहार) के श्री एस.के. अहमद ने भेंट की है। इस द्वितीय संस्करण में संकलित लेखों का विवरण मैंने उर्दू मासिक ‘ऐवाने उर्दू’ (नवम्बर 2006) में प्रकाशित कराकर पहली बार साहित्य-संसार को प्रामाणिकता के साथ उपलब्ध करा दिया था। इसमें प्रकाशित लेखों की सूची निम्नवत् है-

1. राणा प्रताप (‘जमाना’, नवम्बर 1906), 2. राजा टोडरमल (‘जमाना’, अक्टूबर 1905), 3. राजा मान सिंह (‘जमाना’, अक्टूबर 1905), 4. अकबरे आजम (‘जमाना’, अक्टूबर 1905; लेखक : मौलवी मौ. अजीज मिर्जा), 5. रणजीत सिंह (‘जमाना’, मई 1911), 6. राणा जंगबहादुर (‘जमाना’, जुलाई 1916), 7. रेनाल्ड्स (‘जमाना’, जनवरी 1909), 8. टामस गेन्सबरो (‘जमाना’, सितम्बर 1907), 9. स्वामी विवेकानन्द (‘जमाना’, मई 1908), 10. गैरीबाल्डी (‘जमाना’, जुलाई 1907), 11. डाक्टर सर रामकृष्ण भांडारकर (‘जमाना’, दिसम्बर 1913), 12. सर सैयद, 13. बदरुद्दीन तैयबजी, 14. अब्दुल हलीम शरर (‘जमाना’, फरवरी 1927; लेखक : ख्वाजा अब्दुल रऊफ इशरत लखनवी, शीर्षक - ‘मौलाना शरर मरहूम’), 15. वहीदुद्दीन सलीम (‘जमाना’, अगस्त 1928; लेखक : सैयद अब्दुल वदूद दर्द बरेलवी, शीर्षक - ‘मौलाना सलीम पानीपती मरहूम’), और 16. आनरेबल गोपाल कृष्ण गोखले (‘जमाना’, नवम्बर-दिसम्बर 1905)।

उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि जहाँ इस संकलन में सम्मिलित दो जीवनियों- 1. सर सैयद और 2. बदरुद्दीन तैयबजी के सम्बन्ध में यह ज्ञात नहीं है कि वे किस पत्र-पत्रिका में पूर्व प्रकाशित हुई थीं, वहीं दूसरी ओर अन्य लेखकों की लिखी तीन जीवनियाँ - 1. अकबरे आजम (मौलवी मौ. अजीज मिर्जा), 2. अब्दुल हलीम शरर (ख्वाजा अब्दुल रऊफ इशरत लखनवी), और 3. वहीदुद्दीन सलीम (सैयद अब्दुल वदूद दर्द बरेलवी) भी इसमें सम्मिलित हैं। ध्यातव्य है कि प्रेमचंद ने मुंशी दयानारायण निगम को लिखे अपने 25 अक्टूबर 1932 के पत्र में इस सम्बन्ध में स्पष्ट सूचना देते हुए लिखा था -

"पहले इस मजमूए में मुसलमान मशाहीर न थे। शायद इसी बिना पर कमेटी ने इस पर इल्तफात न किया था। अब वह कमी पूरी कर दी गई है। अकबर तो मैंने अजीज मिर्जा से लिया है। वहीदुद्दीन सलीम और शरर भी ‘जमाना’ के मजामीन से मकतबिस हैं।"1

आश्चर्य है कि प्रेमचंद के उपर्युक्त पत्रांश को अपनी पुस्तकों में उद्धृत करने पर भी मदन गोपाल ने इन तीनों जीवनियों को प्रमादवश प्रेमचंद की मौलिक रचना बताकर ‘कुल्लियाते प्रेमचंद’ के भाग-20 तथा 21 में प्रकाशित करा दिया।

1.  चिट्ठी-पत्री, भाग-1,

प्रेमचंद के जीवनीपरक उर्दू लेखों के इस संकलन का हिन्दी अनुवाद 1940 में सरस्वती प्रेस से दो भागों में ‘कलम तलवार और त्याग’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ था। इस संकलन में प्रकाशित अनूदित जीवनियों का विवरण निम्नांकित है -

भाग-1 : 1. राणा प्रताप, 2. रणजीत सिंह, 3. राणा जंगबहादुर, 4. अकबर महान्, 5. स्वामी विवेकानन्द, और 6. राजा मान सिंह।

भाग-2 : 1. राजा टोडरमल, 2. श्री गोपाल कृष्ण गोखले, 3. गेरीबाल्डी, 4. मौ. वहीदुद्दीन सलीम, 5. डा. सर रामकृष्ण भांडारकर, 6. बदरुद्दीन तैयबजी, 7. सर सैयद अहमद खाँ, 8. मौ. अब्दुल हलीम शरर, और 9. रेनाल्ड्स।

उपर्युक्त विवरण से यह स्पष्ट है कि इस संकलन में 15 जीवनियाँ प्रकाशित हुई थीं, जबकि ‘बाकमालों के दर्शन’ के द्वितीय संस्करण में 16 जीवनियाँ सम्मिलित थीं। टामस गेन्सबरो की जीवनी का हिन्दी अनुवाद इस संकलन में प्रकाशित न करके पीछे चलकर ‘विविध प्रसंग’, भाग-1 में क्यों प्रकाशित किया गया, यह कहना तो कुछ सम्भव नहीं है, लेकिन इतना अवश्य है कि प्रेमचंद की केवल उर्दू में प्रकाशित रचनाओं का हिन्दी रूपान्तरण प्रकाशित करा देने का जो कार्य ‘रामचर्चा’ के प्रकाशन के साथ 1938 में प्रारम्भ हुआ था, ‘कलम तलवार और त्याग’ उसीशृंखला की आगामी कड़ी थी। यहाँ यह उल्लेख करना भी सर्वथा समीचीन होगा कि सम्भवतः इस पुस्तक के प्रकाशन के समय तक अमृतराय को प्रेमचंद का मुंशी दयानारायण निगम के नाम लिखा 25 अक्टूबर 1932 का पूर्व सन्दर्भित पत्र नहीं मिल सका होगा क्योंकि यह पत्र मदन गोपाल के व्यक्तिगत संग्रह में था। और, सम्भवतः यही कारण है कि अन्य लेखकों द्वारा लिखी पूर्व उल्लिखित तीनों जीवनियाँ हिन्दी में रूपान्तरित कराकर इस संकलन में भी प्रकाशित करा दी गई होंगी।

प्रेमचंद के देहावसान के उपरान्त श्रीपतराय और अमृतराय, दोनों भाई सरस्वती प्रेस का संचालन संयुक्त रूप से करते रहे और 1949 में अमृतराय ने सरस्वती प्रेस से पृथक् होकर ‘हंस प्रकाशन’ के नाम से अपना स्वतन्त्र प्रकाशन-गृह इलाहाबाद में स्थापित कर लिया। इसके उपरान्त ही अमृतराय विशेष रूप से सक्रिय दिखाई देते हैं और उनकी इस नवीन स्फूर्ति, सक्रियता एवं अपनी विरासत को सहेजने की प्रबल इच्छा का प्रमाण प्रेमचंद के 74वें जन्म दिवस पर जुलाई 1954 में शिवरानी प्रेमचंद द्वारा प्रकाशित तथा अमृतराय के हंस प्रकाशन द्वारा वितरित संकलन ‘साहित्य का उद्देश्य’ के रूप में सामने आता है। इस संकलन में 40 शीर्षकों के अन्तर्गत प्रेमचंद की 54 कथेतर रचनाएँ (लेख, भाषण तथा सम्पादकीय) सम्मिलित करके प्रकाशित की गई थीं, जिनका विवरण निम्नांकित है -

1. साहित्य का उद्देश्य (‘हंस’, जुलाई 1936), 2. जीवन में साहित्य का स्थान (‘हंस’, अप्रैल 1932), 3. साहित्य का आधार (‘जागरण’, 12 अक्टूबर 1932), 4. कहानी कला-1 (कहानी-संकलन ‘प्रेम प्रसून’), 5. कहानी कला-2 (कहानी- संकलन ‘मानसरोवर’, भाग-2), 6. कहानी कला-3, 7. उपन्यास, 8. उपन्यास का विषय (‘हंस’, मार्च 1930), 9. साहित्य में बुद्धिवाद (‘हंस’, मई 1935), 10. जड़वाद और आत्मवाद (‘हंस’, अक्टूबर 1934), 11. संग्राम में साहित्य (‘हंस’, जुलाई 1930), 12. साहित्य में समालोचना (‘हंस’, मई 1931), 13. हिन्दी गल्प कला का विकास (‘हंस’, नवम्बर 1934), 14. साहित्य और मनोविज्ञान (‘हंस’, फरवरी 1936), 15. फिल्म और साहित्य (‘हंस’, जून 1935), 16. सिनेमा और जीवन (‘हंस’, मार्च 1935), 17. साहित्य की नयी प्रवृत्ति (‘हंस’, अप्रैल 1935), 18. दन्त कथाओं का महत्त्व (‘हंस’, अक्टूबर 1934), 19. ग्राम्य गीतों में समाज का चित्र (‘हंस’, अप्रैल 1935), 20. समकालीन अंग्रेजी ड्रामा (‘हंस’, मई 1935), 21. रोमें रोलाँ की कला (‘हंस’, मार्च 1934), 22. राष्ट्रभाषा हिन्दी और उसकी समस्याएँ (‘हंस’, जनवरी 1935), 23. कौमी भाषा के विषय में कुछ विचार (‘हंस’, नवम्बर 1934), 24. हिन्दी-उर्दू की एकता (‘कुछ विचार’ में ‘एक भाषण’ शीर्षक से), 25. उर्दू हिन्दी और हिन्दुस्तानी (‘हंस’, अप्रैल 1937), 26. अन्तरप्रान्तीय साहित्यिक आदान-प्रदान के लिए : (प) एक सार्वदेशिक साहित्य संस्था की आवश्यकता (‘हंस’, फरवरी 1934); (पप) भारतीय साहित्य परिषद् (‘हंस’, मई 1936); (पपप) भारतीय साहित्य परिषद् की अस्ल हकीकत (‘हंस’, जून 1936); (पअ) प्रान्तीय साहित्य की एकता (‘हंस’, अक्टूबर 1935); (अ) हिन्दी साहित्य सम्मेलन (‘हंस’, मई 1936), 27. हंस के जन्म पर : (प) शीर्षकहीन टिप्पणी (‘हंस’, मार्च 1930); (पप) हंस की नीति (‘हंस’, मार्च 1930); (पपप) डोमिनियन और स्वराज्य (‘हंस’, मार्च 1930); (पअ) युवकों का कर्त्तव्य (‘हंस’, मार्च 1930); (अ) सरल जीवन स्वाधीनता के संग्राम की तैयारी हो (‘हंस’, मार्च 1930); (अप) शान्ति रक्षा (‘हंस’, मार्च 1930); (अपप) जेल-सुधार (‘हंस’, मार्च 1930); (अपपप) जापान के लोग लम्बे हो रहे हैं (‘हंस’, मार्च 1930); (पग) राजनीति और रिशवत (‘हंस’, मार्च 1930); (ग) पहले हिन्दुस्तानी, फिर और कुछ (‘हंस’, मार्च 1930); (गप) महात्माजी का वाइसराय से निवेदन (‘हंस’, मार्च 1930), 28. प्रगतिशील लेखक संघ का अभिनन्दन (‘हंस’, जनवरी 1936), 29. उट्ठो मेरी दुनिया के गरीबों को जगा दो (‘हंस’, मार्च 1936), 30. अतीत का मुर्दा बोझ (‘हंस’, अक्टूबर 1935), 31. साहित्यिक उदासीनता (‘हंस’, फरवरी 1931), 32. लेखक संघ (‘हंस’, दिसम्बर 1934), 33. एक प्रसिद्ध गल्पकार के विचार (‘हंस’, जून 1933), 34. समाचार पत्रों के मुफ्तखोर पाठक (‘हंस’, जून 1934), 35. जापान में पुस्तकों का प्रचार (‘हंस’, फरवरी 1935), 36. रुचि की विभिन्नता (‘हंस’, अप्रैल 1935), 37. प्रेम विषयक गल्पों से अरुचि (‘हंस’, अप्रैल 1935), 38. साहित्य में ऊँचे विचार की आवश्यकता (‘हंस’, फरवरी 1935), 39. रूसी साहित्य और हिन्दी (‘हंस’, मई 1933), और 40. शिरोरेखा क्यों हटानी चाहिये (‘हंस’, अक्टूबर 1935)।

उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि पूर्व प्रकाशित संकलन ‘कुछ विचार’ में संकलित सभी 11 रचनाएँ इस संकलन में भी सम्मिलित हैं। इनके अतिरिक्त इसमें 29 शीर्षकों के अन्तर्गत कुल मिलाकर 43 अन्य रचनाएँ भी पहली बार संकलित करके प्रकाशित की गईं। इस संकलन की रचनाएँ प्रमुखता से प्रेमचंद द्वारा लिखी गई सम्पादकीय टिप्पणियाँ हैं, जो उनके मासिक ‘हंस’ तथा साप्ताहिक ‘जागरण’ में प्रकाशित हुई थीं। इस संकलन का प्रकाशन प्रेमचंद की बिखरी हुई रचनाओं को एकत्र करके पुस्तकाकार प्रकाशित करने की दिशा में एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण प्रयास था। और, यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि साहित्यिक क्षेत्र में इस संकलन का जैसा भव्य स्वागत हुआ उसने ही अमृतराय को प्रेरणा दी कि प्रेमचंद की अन्य दृष्टिओझल सम्पादकीय टिप्पणियों को भी संकलित किया जाना आवश्यक है ताकि प्रेमचंद के प्रखर एवं तेजस्वी पत्रकार के स्वरूप से भी साहित्य-संसार का प्रत्यक्ष परिचय हो सके। यहाँ यह उल्लेख करना भी सर्वथा समीचीन होगा कि यद्यपि ‘साहित्य का उद्देश्य’ के प्रथम संस्करण पर सम्पादक-संकलनकर्ता का नामोल्लेख प्रकाशित नहीं है तथापि मात्र ‘संकलनकर्ता’ के उल्लेख के साथ ‘दो शब्द’ शीर्षक से प्रकाशित इसकी निम्नांकित सम्पादकीय टिप्पणी से इसमें कोई सन्देह नहीं रहता कि इन शब्दों के माध्यम से स्वयं अमृतराय ही पाठकों से संवाद स्थापित कर रहे हैं -

"प्रेमचंद के साहित्य और भाषा-संबंधी निबन्धों भाषणों आदि का एक संग्रह ‘कुछ विचार’ के नाम से पहले ही छप चुका है। लेकिन उसमें दी गई सामग्री के अलावा भी सामग्री थी जो ‘हंस’ की पुरानी फाइलों में दबी पड़ी थी और अब तक किसी संकलन में नहीं आयी थी। वे अधिकांश में सम्पादकीय टिप्पणियाँ हैं। उनमें कुछ टिप्पणियाँ बड़ी हैं और कुछ छोटी, कुछ टिप्पणियाँ एकदम स्वतन्त्र हैं और कुछ में किसी तात्कालिक साहित्यिक घटना या वादविवाद ने निमित्त का काम किया है। वह जो भी हो, सब में प्रेमचंद की आवाज बोल रही है और सब किसी न किसी महत्त्वपूर्ण साहित्यिक-सांस्कृतिक प्रश्न पर रोशनी डालती हैं। इसलिए इस सामग्री का संकलन करते समय हमने और सब बातों को छोड़कर अपनी दृष्टि केवल इस बात पर रक्खी है कि ऐसी एक पंक्ति भी छूटने न पाये जिससे किसी साहित्यिक प्रश्न पर रोशनी पड़ती हो या प्रेमचंद का स्पष्ट अभिमत मालूम होता हो। जो टिप्पणियाँ सामयिक विषयों को लेकर हैं, उनको लेते समय भी हमारी दृष्टि यही है कि यद्यपि उनकी सामयिकता अब कालप्रवाह में बह गयी है तथापि उनके भीतर, किसी भी निमित्त से, कही हुई मूल बात का महत्त्व आज भी है और आगे भी रहेगा और इसलिए उसे पाठकों तक पहुँचना चाहिए।

हमें विश्वास है कि यह नया, पूर्णतर संकलन साहित्यिक विचारक प्रेमचंद और साहित्यकार प्रेमचंद को और अच्छी तरह समझने में सहायक होगा।"

प्रेमचंद के अन्तिम लेखों में से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण एक लेख ‘महाजनी तमद्दुन’ शीर्षक से उर्दू मासिक ‘कलीम’ के अगस्त 1936 के अंक में प्रकाशित हुआ था, जिसका हिन्दी रूप ‘महाजनी सभ्यता’ शीर्षक से उन्होंने देहावसान से एक माह पूर्व अपने सम्पादन में प्रकाशित ‘हंस’ के अन्तिम अंक में सितम्बर 1936 में प्रकाशित किया था। जोंक की भाँति निरन्तर समाज का खून चूसने वाली महाजनी सभ्यता के मूल पर प्रबल प्रहार करने वाले प्रेमचंद के इस लेख से उनके सामाजिक सरोकार पूर्णता में स्पष्ट होते हैं और इस दृष्टि से इस लेख को उनकी वैचारिक वसीयत माना जाता है। अमृतराय ने जब अक्टूबर 1959 में ‘प्रेमचंद स्मृति’ शीर्षक से प्रेमचंद पर संस्मरणात्मक आलेखों का एक महत्त्वपूर्ण संकलन प्रकाशित कराया तो उसमें संकलित लेखों की प्रकृति से इतर प्रेमचंद का यह लेख भी सम्मिलित करके सुरक्षित कर दिया। इससे प्रेमचंद साहित्य के संकलन-संरक्षण के प्रति अमृतराय की प्रतिबद्धता का सहज ही अनुमान किया जा सकता है।

प्रेमचंद के पहले उर्दू कहानी-संकलन ‘सोजे वतन’ का महत्त्व इस तथ्य से भली प्रकार समझा जा सकता है कि इसी के कारण उस समय नवाबराय के लेखकीय नाम से लिखने वाले धनपतराय श्रीवास्तव ने ‘प्रेमचंद’ का लेखकीय नाम ग्रहण किया था, और कालान्तर में यह नाम इतना प्रसिद्ध तथा लोकप्रिय हुआ कि प्रेमचंद के नाम की छाया में धनपतराय और नवाबराय के नाम विस्मृति के गहन अंधकार में विलीन हो गए। इस संकलन में सम्मिलित पाँच कहानियों में से मात्र एक कहानी ‘यही मेरा वतन है’ प्रेमचंद के जीवन-काल में हिन्दी में ‘यह मेरी मातृभूमि है’ शीर्षक से ‘प्रेम प्रसून’ नामक कहानी-संकलन में सम्मिलित होकर प्रकाशित हुई थी और शेष चारों कहानियाँ हिन्दी- साहित्य-जगत् को उपलब्ध नहीं थीं। अमृतराय ने ‘सोजे वतन’ शीर्षक से ही इस कहानी-संकलन की कहानियों का हिन्दी रूपान्तरण 1960 में अपने हंस प्रकाशन से प्रकाशित करके केवल उर्दू में प्रकाशित प्रेमचंद की रचनाओं का हिन्दी रूपान्तरण प्रस्तुत करके प्रेमचंद साहित्य के संरक्षण की अपनी प्रतिबद्धता का पुनः प्रमाण दिया था।

इधर हिन्दी में तो प्रेमचंद साहित्य के संरक्षण-संकलन का पर्याप्त कार्य सामने आ रहा था परन्तु उर्दू-जगत् में 1937 में ‘दूध की कीमत’ और 1938 में ‘आखिरी तोहफा’ के प्रकाशन के पश्चात् इस दिशा में एक आश्चर्यजनक मौन पसरा हुआ था। 1960 में डा. कमर रईस ने इस मौन को तोड़ने का सफल प्रयास किया जिनके सम्पादन में यूनिवर्सिटी पब्लिशर्स, अलीगढ़ से ‘मजामीने प्रेमचंद’ नामक संकलन प्रकाशित होकर उर्दू-संसार के समक्ष आया। डा. कमर रईस ने इस संकलन में प्रेमचंद के नानाविध कथेतर लेखन को सहेजने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया, जो इसमें सम्मिलित रचनाओं की निम्नांकित सूची से स्पष्ट है -

1. मेरी कहानी (‘जमाना’ प्रेमचंद नम्बर, दिसम्बर 1937 में ‘मुंशी प्रेमचंद की कहानी उनकी जबानी’ शीर्षक से प्रकाशित; ‘हंस’ के आत्मकथा अंक में प्रकाशित लेख ‘जीवन-सार’ का उर्दू अनुवाद), 2. फने तस्वीर (‘जमाना’, मार्च 1907), 3. हिन्दुस्तानी मुसव्विरी (‘जमाना’, अक्टूबर 1910 - मूल शीर्षक ‘हिन्दुस्तानी फने तस्वीर’), 4. रेनाल्ड और उसकी मुसव्विरी (‘जमाना’, जनवरी 1909 - मूल शीर्षक ‘रेनाल्ड्स’), 5. कलामे अकबर पर एक नजर (‘जमाना’, नवम्बर 1909 - मूल शीर्षक ‘कुल्लियाते अकबर (तनकीद)’; ‘जमाना’ में यह समीक्षा बिना लेखकीय नामोल्लेख के प्रकाशित हुई थी अतः इसे प्रेमचंद की रचना सिद्ध करने के लिए कोई पुष्ट प्रमाण खोजा जाना अपेक्षित है), 6. जामी की मसनवी जुलेखा (‘जमाना’, अक्टूबर 1909 - मूल शीर्षक ‘जुलेखा’), 7. नाविल का फन (‘साहित्य का उद्देश्य’ में संकलित ‘उपन्यास’ शीर्षक लेख का उर्दू अनुवाद), 8. नाविल का मौजू (‘हंस’, मार्च 1930 में प्रकाशित लेख ‘उपन्यास का विषय’ का उर्दू अनुवाद), 9. शरर और सरशार (‘उर्दू-ए-मुअल्ला’, मार्च-अप्रैल 1906), 10. अल्लामा राशिद-उल-खैरी के सोशल अफसाने (‘इस्मत’, जुलाई 1936), 11. मुख्तसर अफसाना (हिन्दी कहानी-संकलन ‘प्रेम प्रसून’ की भूमिका का उर्दू अनुवाद), 12. मुख्तसर अफसाने का फन (हिन्दी कहानी-संकलन ‘मानसरोवर’, भाग-1 की भूमिका का उर्दू अनुवाद), 13. विक्रमोर्वशी का उर्दू तर्जुमा (‘जमाना’, फरवरी 1908 - मूल रूप से ‘तनकीद’ शीर्षक के अन्तर्गत प्रकाशित पुस्तक-समीक्षा का अंश), 14. ड्रामा-ए-जंगे रूस व जापान (‘जमाना’, फरवरी 1906 - मूल रूप से ‘हाल की बाज किताबें’ शीर्षक के अन्तर्गत प्रकाशित पुस्तक-समीक्षा का अंश), 15. गालियाँ (‘जमाना’, दिसम्बर 1909), 16. स्वामी विवेकानन्द (‘जमाना’, मई 1908), 17. अदब की गर्जो गायत (‘जमाना’, अप्रैल 1936), और 18. उर्दू हिन्दी हिन्दुस्तानी (‘जमाना’, अप्रैल 1935)।

उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि जहाँ डा. कमर रईस ने कतिपय मूल शीर्षक अपने तईं परिवर्तित कर दिए हैं, वहीं बिना कोई प्रमाण दिए ‘जमाना’ में प्रकाशित ‘कुल्लियाते अकबर’ की समीक्षा को प्रेमचंद की रचना बताकर इस संकलन में सम्मिलित कर दिया है। उल्लेखनीय है कि डा. रईस ने इस रचना का सम्पूर्ण पाठ प्रकाशित नहीं कराया और इसका अन्तिम अंश किसी त्रुटिवश अथवा उपलब्ध न हो पाने के कारण छोड़ दिया। अमृतराय और मदन गोपाल ने भी इसका ठीक वही पाठ प्रकाशित कराया है जो डा. कमर रईस ने प्रकाशित कराया था। इससे स्पष्ट है कि डा. रईस की असावधानी से इसके सम्बन्ध में भ्रम व्याप्त हो गया है। फिर भी यह संकलन जहाँ एक ओर प्रेमचंद के कथेतर उर्दू लेखन को संकलित-प्रकाशित करने की दिशा में हुआ प्रथम प्रयास है, वहीं दूसरी ओर केवल हिन्दी में प्रकाशित प्रेमचंद की रचनाओं को उर्दू में अनूदित करके उर्दू-साहित्य-संसार के हाथों सौंपने के महत्त्वपूर्ण प्रयास के रूप में भी सामने आता है। ध्यातव्य है कि प्रेमचंद की केवल हिन्दी में प्रकाशित रचनाओं को उर्दू में अनुवाद करके प्रकाशित करने की दिशा में कोई महत्त्वपूर्ण कार्य अभी तक नहीं हो पाया है, यहाँ तक कि ‘कुल्लियाते प्रेमचंद’ में भी इस प्रकृति की रचनाओं को मात्र लिप्यन्तरण करके ही प्रकाशित कर दिया गया है जो उर्दू पाठकों तथा विद्वानों के लिए सुबोध नहीं है।

पूर्व प्रस्तुत विवरण से स्पष्ट है कि प्रेमचंद के देहावसान के तत्काल पश्चात् अमृतराय उनकी यत्र-तत्र बिखरी रचनाओं को सहेजने-संभालने का महत्त्वपूर्ण कार्य आरम्भ कर चुके थे। प्रेमचंद की इस प्रकार की रचनाओं के महत्त्व से अमृतराय भली-भाँति परिचित थे, जैसा कि ‘साहित्य का उद्देश्य’ की पूर्व उद्धृत सम्पादकीय टिप्पणी से स्पष्ट है। जब अमृतराय ने प्रेमचंद की जीवन-गाथा लिखने का संकल्प किया तो उसके लिए उन्होंने प्रेमचंद की समस्त ज्ञात-अज्ञात रचनाओं को आधार सामग्री के रूप में प्रयोग करने का निश्चय किया और जब इस प्रयास में उन्हें अनेक महत्त्वपूर्ण रचनाएँ मिलीं तो वे स्वयं भी आश्चर्यचकित रह गए। अमृतराय लिखते हैं -

"सब जानते हैं, प्रेमचंद ने अपने साहित्यिक जीवन का आरम्भ उर्दू से किया था। बरसों केवल उर्दू में लिखते रहने के बाद वह हिन्दी की तरफ आये। उपन्यास और कहानियाँ तो लिखी ही, साहित्य, संस्कृति, समाज, राजनीति से सम्बन्ध रखने वाले विविध प्रसंगों पर ढेरों लेख भी लिखे। इस प्रकार के लेखन का उनका क्रम आजीवन चला और मुंशीजी के पूर्ण साहित्यिक व्यक्तित्व और देन को समझने के लिए उसका महत्त्व मुंशीजी के कथा-साहित्य से अणुमात्र भी कम नहीं है।

इस खजाने की तरफ अब तक किसी का ध्यान नहीं गया था, और शायद इन पंक्तियों के लेखक का भी न जाता अगर मुंशीजी की प्रामाणिक जीवनी लिखने के तकाजे ने उसे मजबूर न किया होता कि वह उन सब चीजों की छानबीन करे जो-जो मुंशीजी ने जब-जब और जहाँ-जहाँ लिखीं। पुरातत्व-विभाग की इसी खुदाई में यह दफीना हाथ लग गया!1

अनेकानेक हिन्दी-उर्दू पत्र-पत्रिकाओं में बिखरी पड़ी रचनाओं को खोजना, उर्दू से हिन्दी में रूपान्तरित करना, व्यवस्थित करना आदि कार्य अत्यन्त श्रमसाध्य तथा समयसाध्य है और निश्चित ही अमृतराय को इस कार्य में बरसों का लम्बा समय लगा होगा। अमृतराय ने ‘प्रेमचंद : कलम का सिपाही’ की भूमिका में स्पष्ट उल्लेख किया है कि इस जीवनी के लिखने में उन्हें पाँच वर्ष का समय लगा। यह पुस्तक पहली बार 1962 में प्रकाशित हुई थी, अतः इसका लेखन-कार्य 1957 में प्रारम्भ हुआ मानना सर्वथा उचित है। डा. कमल किशोर गोयनका, जो 1957 को प्रेमचंद की अज्ञात रचनाओं की खोज के कार्यारम्भ का वर्ष मानते हैं, उसकी उपर्युक्त तथ्यों से पुष्टि नहीं होती।

अमृतराय ने प्रेमचंद की रचनाओं को संकलित-रूपान्तरित-प्रकाशित कराने की दिशा में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कार्य करके 1962 को प्रेमचंद साहित्य के सन्दर्भों में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण एवं स्मरणीय वर्ष बना दिया। इस वर्ष में अमृतराय ने तीन भागों में ‘विविध प्रसंग’, दो भागों में ‘गुप्त धन’, ‘शबे तार’, ‘मंगलाचरण’ और दो भागों में ‘चिट्ठी-पत्री’ प्रकाशित कराकर हजारों पृष्ठों में विस्तृत प्रेमचंद की उन रचनाओं से साहित्य-संसार का प्रथम साक्षात्कार कराया, जिनसे उसका कोई परिचय नहीं था। अमृतराय द्वारा प्रकाशित कराए गए इन संकलनों का संक्षिप्त परिचय आगामी पंक्तियों में प्रस्तुत है -

विविध प्रसंग - तीन भागों में प्रकाशित इस संकलन में प्रेमचंद के अनेकानेक हिन्दी-उर्दू लेख, सम्पादकीय आलेख और पुस्तक समीक्षाएँ सम्मिलित हैं। इसमें उर्दू लेखों को हिन्दीकरण करके प्रस्तुत किया गया है। लेखों पर प्रथम प्रकाशन के सन्दर्भ प्रायः शुद्ध हैं, मात्र कुछ सन्दर्भ अपूर्ण तथा अशुद्ध हैं। इस संकलन में जो सबसे बड़ी कमी है, वह यह है कि लेखों तथा सम्पादकीय आलेखों/टिप्पणियों को स्पष्ट रूप से पृथक्-पृथक् वर्गीकृत नहीं किया गया है। ध्यातव्य है कि प्रेमचंद के युग में पत्र- पत्रिकाओं में सम्पादकीय आलेख एक-दो पृष्ठ में नहीं वरन् कई-कई पृष्ठों में विस्तृत होते थे और एक ही अंक में कई-कई छोटी-बड़ी टिप्पणियाँ प्रकाशित हुआ करती थीं। यह खेदजनक है कि परवर्ती विद्वानों ने लेखों तथा सम्पादकीय टिप्पणियों को पृथक्- पृथक् वर्गीकृत करने की दिशा में लेशमात्र भी ध्यान देने की आवश्यकता अनुभव नहीं की। वे मक्षिकास्थाने मक्षिका की उक्ति को चरितार्थ करते हुए मात्र अमृतराय की ही नकल करके अपने कर्त्तव्य की परिपूर्णता समझते रहे।

1. विविध प्रसंग, भाग-1,

गुप्त धन - दो भागों में प्रकाशित इस कहानी-संकलन में प्रेमचंद की 56 हिन्दी-उर्दू कहानियाँ पहली बार हिन्दी में संकलित-रूपान्तरित करके प्रकाशित की गईं। इसमें सम्मिलित कहानियों का विवरण इस प्रकार है -

प्रथम भाग- 1. दुनिया का सबसे अनमोल रतन (‘सोजे वतन’), 2. शेख मखमूर (‘सोजे वतन’), 3. शोक का पुरस्कार (‘सोजे वतन’ - मूल शीर्षक ‘सिला-ए-मातम’), 4. सांसारिक प्रेम और देश प्रेम (‘जमाना’, अप्रैल 1908 - मूल शीर्षक ‘इश्के दुनिया और हुब्बे वतन’), 5. विक्रमादित्य का तेगा (‘जमाना’, जनवरी 1911), 6. आखिरी मंजिल (‘जमाना’, अगस्त-सितम्बर 1911 - मूल शीर्षक ‘मंजिले मकसूद’), 7. आल्हा (‘जमाना’, जनवरी 1912), 8. नसीहतों का दफ्तर (‘जमाना’, मई-जून 1912 - मूल शीर्षक ‘आलिमे बेअमल’), 9. राजहठ (‘जमाना’, दिसम्बर 1912), 10. त्रिया चरित्र (‘जमाना’, जनवरी 1913), 11. मिलाप (‘जमाना’, जून 1913), 12. मनावन (‘जमाना’, जुलाई 1912), 13. अंधेर (‘जमाना’, जुलाई 1913), 14. सिर्फ एक आवाज (‘जमाना’, अगस्त-सितम्बर 1913), 15. नेकी (‘अदीब’, सितम्बर 1910 - मूल शीर्षक ‘बेगरज मोहसिन’), 16. बाँका जमींदार (‘जमाना’, अक्टूबर 1913), 17. अनाथ लड़की (‘जमाना’, जून 1914), 18. कर्मों का फल (‘खतीब’, अगस्त 1915), 19. अमृत (‘जमाना’, मार्च 1913 - पत्रिका में शीर्षक था ‘मौत और जिन्दगी’ लेकिन ‘प्रेम पचीसी’, भाग-2 में ‘अमृत’ शीर्षक से संकलित हुई), 20. अपनी करनी (‘जमाना’, सितम्बर-अक्टूबर 1914 - मूल शीर्षक ‘शामते आमाल’; ‘खाके परवाना’ में ‘खाके परवाना’ शीर्षक से संकलित हुई), 21. गैरत की कटार (‘जमाना’, जुलाई 1915), 22. घमण्ड का पुतला (‘जमाना’, अगस्त 1916 - मूल शीर्षक ‘सरे पुरगुरूर’), 23. विजय (‘जमाना’, अप्रैल 1918 - मूल शीर्षक ‘फतह’), 24. वफा का खंजर (‘जमाना’, नवम्बर 1918 - मूल शीर्षक ‘खंजरे वफा’), 25. मुबारक बीमारी (‘प्रेम बतीसी’, भाग-1 - मूल शीर्षक ‘मर्जे मुबारक’), और 26. वासना की कड़ियाँ (‘कहकशाँ’, सितम्बर-अक्टूबर 1918 - मूल शीर्षक ‘जंजीरे हवस’)।

द्वितीय भाग - 1. पुत्र प्रेम (‘सरस्वती’, जून 1920), 2. इज्जत का खून (‘सुबहे उम्मीद’, सितम्बर 1919 - मूल शीर्षक ‘खूने हुर्मत’), 3. होली की छुट्टी (‘जादे राह’), 4. नादान दोस्त (‘खाके परवाना’), 5. प्रतिशोध (‘प्रेम चालीसी’, भाग-1 - मूल शीर्षक ‘इन्तकाम’; डा. कमल किशोर गोयनका के अनुसार यह कहानी ‘जमाना’ के अक्टूबर 1923 के अंक में भी ‘इन्तकाम’ शीर्षक से प्रकाशित हुई, जो भ्रामक सूचना है। वस्तुस्थिति यह है कि ‘जमाना’ के सम्बन्धित अंक में इस शीर्षक से जो कहानी प्रकाशित हुई थी, वह इफ्तिखार-उल-रसूल बदर द्वारा किसी अन्य भाषा से अनूदित कहानी है, जो इस कहानी से नितान्त भिन्न है और जिसके मूल लेखक के सम्बन्ध में कोई उल्लेख प्राप्त नहीं होता), 6. देवी (‘प्रेम चालीसी’, भाग-1), 7. खुदी (‘ख्वाबो खयाल’; ‘खाके परवाना’), 8. बड़े बाबू (‘बहारिस्तान’, फरवरी 1927), 9. राष्ट्र का सेवक (‘प्रेम चालीसी’, भाग-1 - मूल शीर्षक ‘कौम का खादिम’), 10. आखिरी तोहफा (‘चन्दन’, अगस्त 1931), 11. कातिल (‘निजात’; ‘आखिरी तोहफा’), 12. बोहनी (‘नैरंगे खयाल’, दिसम्बर 1928), 13. बन्द दरवाजा (‘प्रेम चालीसी’, भाग-2), 14. तिरसूल (‘प्रेम चालीसी’, भाग-1), 15. स्वांग (‘जामिया’, जनवरी 1935), 16. सैलानी बन्दर (‘माधुरी’, फरवरी 1924), 17. नबी का नीति निर्वाह (‘सरस्वती’, मार्च 1924), 18. मन्दिर और मस्जिद (‘माधुरी’, अप्रैल 1925), 19. प्रेम सूत्र (‘सरस्वती’, अप्रैल 1926), 20. ताँगे वाले की बड़ (‘जमाना’, सितम्बर 1926 - ‘बम्बूक’ के लेखकीय नामोल्लेख से प्रकाशित), 21. शादी की वजह (‘जमाना’, मार्च 1927 - ‘बम्बूक’ के लेखकीय नामोल्लेख से प्रकाशित), 22. मोटेरामजी शास्त्री (‘माधुरी’, जनवरी 1928), 23. पर्वत यात्रा (‘माधुरी’, अप्रैल 1929), 24. कवच (‘विशाल भारत’, दिसम्बर 1929), 25. दूसरी शादी (‘चन्दन’, सितम्बर 1931 - ‘लाला धनपतराय’ के लेखकीय नामोल्लेख से प्रकाशित), 26. सौत (‘विशाल भारत’, दिसम्बर 1931), 27. देवी (‘चाँद’, अप्रैल 1935), 28. पैपुजी (‘माधुरी’, अक्टूबर 1935), 29. क्रिकेट मैच (‘जमाना’, जुलाई 1937), और 30. कोई दुख न हो तो बकरी खरीद लो (‘वारदात’ - मूल शीर्षक ‘गमनदारी बुज बखुर’; डा. गोयनका इस कहानी का नामोल्लेख ‘गमनदारी बजंजर’ के रूप में करते हैं, जो नितान्त असंगत है)।

उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि इस संकलन में विभिन्न हिन्दी-उर्दू पत्रिकाओं तथा उर्दू कहानी-संकलनों से ऐसी कहानियाँ सम्मिलित करके प्रकाशित की गईं जो या तो पूर्व प्रकाशित किसी संकलन में सम्मिलित नहीं थीं अथवा जिनके हिन्दी रूप पूर्व प्रकाशित नहीं थे। प्रेमचंद की कहानियों को समग्रता में संकलित करने की दिशा में इस संकलन का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान है। यहाँ यह तथ्य भी ध्यान में रखा जाना चाहिए कि जिन उर्दू कहानियों के हिन्दी रूप इस संकलन में प्रकाशित हुए हैं, भले ही उनके शीर्षकों का भी हिन्दीकरण क्यों न कर दिया गया हो, वे अमृतराय द्वारा किए गए हिन्दी रूपान्तरण हैं। स्वयं अमृतराय ने इस संकलन में प्रस्तुत हिन्दी रूपान्तरण को प्रेमचंद की मौलिक हिन्दी कहानी के रूप में उल्लिखित करना प्रारम्भ करके प्रेमचंद साहित्य के सम्बन्ध में व्यापक भ्रम का विस्तार कर दिया और उनका अनुकरण करते हुए डा. जाफर रजा और डा. कमल किशोर गोयनका सहित समस्त परवर्ती विद्वान् भी इन कहानियों को प्रेमचंद की मौलिक हिन्दी कहानी के रूप में उल्लिखित करते चले आते हैं। इसी भ्रम का प्रभाव है कि पीछे चलकरप्रेमचंद की अन्य अज्ञात कहानियाँ, लेख आदि जो हिन्दी रूपान्तरण अथवा लिप्यन्तरण होकर प्रकाश में आए, उन्हें भी प्रेमचंद की मौलिक हिन्दी रचना बताया जाने लगा। इस भ्रम का निराकरण करके इस दूषित प्रवृत्ति पर तत्काल रोक लगनी चाहिए ताकि प्रेमचंद साहित्य का यथार्थ साहित्य-संसार के सामने आ सके। यहाँ यह उल्लेख करना भी सर्वथा सुसंगत होगा कि ‘गुप्त धन’ में अमृतराय ने कहानियों के जो प्रकाशन सन्दर्भ प्रस्तुत किए हैं, उनमें इस बात पर ध्यान नहीं दिया जा सका कि उनके प्रथम प्रकाशन का सन्दर्भ प्रस्तुत किया जाए। इसके विपरीत अनेक कहानियों पर मात्र संकलन के नाम का ही उल्लेख कर दिया गया है। उपर्युक्त विवरण में हमने सम्प्रति ज्ञात हो सके प्रथम प्रकाशन के सन्दर्भ प्रस्तुत कर दिए हैं, ताकि भावी पीढ़ी के शोधकर्ता उनसे लाभान्वित हो सकें।

शबे तार - प्रेमचंद ने बेल्जियम के प्रसिद्ध नाटककार मारिस मेटरलिंक के नाटक ‘साइटलैस’ का उर्दू अनुवाद करके उर्दू मासिक ‘जमाना’ के सितम्बर तथा अक्टूबर 1919 के दो अंकों में क्रमशः प्रकाशित कराया था। प्रेमचंद द्वारा अनूदित यह नाटक उर्दू में तो कभी पुस्तकाकार रूप में प्रकाशित नहीं हो पाया लेकिन अमृतराय ने ‘जमाना’ के सम्बन्धित अंकों में से खोजकर इसे 1962 में ही हिन्दी में पुस्तकाकार प्रकाशित करा दिया। अमृतराय के सत्प्रयास से ही इस नाटक से हिन्दी-साहित्य-संसार का प्रथम परिचय हुआ।

मंगलाचरण - प्रेमचंद के प्रारम्भिक चार उपन्यासों का संकलन ‘मंगलाचरण’ शीर्षक से अमृतराय ने 1962 में ही प्रकाशित कराया था। इस संकलन का महत्त्व इस तथ्य से समझा जा सकता है कि प्रेमचंद का सबसे पहला उपन्यास ‘असरारे मआबिद’ पहली बार इसी संकलन के माध्यम से साहित्य-संसार में प्रकट हुआ और इसके अतिरिक्त वर्षों से अप्राप्य चले आते तीन अन्य हिन्दी-उर्दू के प्रारम्भिक उपन्यास भी इसी संकलन द्वारा साहित्य-संसार के सामने आ सके। आगामी पंक्तियों में इसमें संकलित चारों उपन्यासों पर संक्षेपतः विचार किया जा रहा है ताकि प्रेमचंद के अज्ञात साहित्य को पुनः प्रकाशित कराने की दिशा में अमृतराय के महनीय प्रयास का समग्रता में मूल्यांकन करने में सुविधा हो।

1. असरारे मआबिद - प्रेमचंद का पहला उपन्यास बनारस से मुंशी गुलाब चंद के सम्पादन में प्रकाशित होने वाले एक अल्पज्ञात उर्दू साप्ताहिक पत्र ‘आवाजे खल्क’ के 8 अक्टूबर 1903 से 1 फरवरी 1905 तक के अंकों में ‘असरारे मआबिद’ शीर्षक से क्रमशः प्रकाशित हुआ था। 1962 से पूर्व तक कतिपय उर्दू आलोचना ग्रन्थों में ही इस उपन्यास का अशुद्ध नामोल्लेख ‘इसरारे मुहब्बत’ के रूप में प्राप्त होता था, परन्तु उपन्यास प्राप्त नहीं था। पहली बार ‘मंगलाचरण’ में सम्मिलित करके ही अमृतराय ने इस उपन्यास को साहित्य-संसार के समक्ष प्रस्तुत किया था। ध्यातव्य है कि अमृतराय ने ‘असरारे मआबिद’ को हिन्दी में रूपान्तरित करने के साथ ही इसका नाम भी इस प्रकार लिखा था - ‘असरारे मआबिद उर्फ देवस्थान रहस्य’। उल्लेखनीय है कि प्रेमचंद के इस पहले उर्दू उपन्यास का मूल उर्दू पाठ सम्प्रति उपलब्ध नहीं है। मदन गोपाल ने उर्दू में ‘कुल्लियाते प्रेमचंद’ सम्पादित करते समय भी इस उपन्यास का मूल पाठ खोजकर प्रकाशित कराने का कोई प्रयास नहीं किया और आश्चर्यजनक रूप से इसके अमृतराय द्वारा किये गये हिन्दी रूपान्तरण को पुनः उर्दू में अनूदित करके ही प्रकाशित करा दिया है।

इस उपन्यास के सम्बन्ध में मदन गोपाल का दावा है कि इसकी खोज का श्रेय अमृतराय को नहीं दिया जा सकता, जबकि सम्प्रति प्राप्त प्रमाण इसके प्रतिकूल हैं। इस उपन्यास की खोज का इतिवृत्त परिशिष्ट-1 में प्रस्तुत है।

2. हमखुर्मा व हमसवाब - यह उपन्यास सन् 1904 में पहली बार प्रकाशित हुआ था और इसके दो-तीन संस्करण प्रकाशित होने के संकेत प्राप्त होते हैं। आश्चर्य की बात है कि इसके किसी भी संस्करण पर प्रकाशन वर्ष का कोई उल्लेख प्राप्त नहीं होता, यहाँ तक कि ‘मंगलाचरण’ में अमृतराय ने इसके द्वितीय संस्करण के मुखपृष्ठ की जो अनुकृति प्रकाशित की है, उस पर भी प्रकाशन वर्ष का उल्लेख उपलब्ध नहीं है। इतना अवश्य है कि यह उपन्यास लम्बे समय से अनुपलब्ध चला आता था और हिन्दी-साहित्य-जगत् के सम्मुख इसका हिन्दी रूपान्तरण ‘मंगलाचरण’ में सम्मिलित करके पहली बार प्रस्तुत किया गया।

3. प्रेमा - यह उपन्यास 1907 में इंडियन प्रेस, इलाहाबाद ने प्रकाशित किया था। इसका द्वितीय संस्करण प्रकाशित होने की कोई सूचना सम्प्रति उपलब्ध नहीं है। यह प्रेमचंद का पहला हिन्दी उपन्यास है और इस दृष्टि से इसका महत्त्व सदा रहेगा। यह उपन्यास पूर्व प्रकाशित उर्दू उपन्यास ‘हमखुर्मा व हमसवाब’ का हिन्दी रूपान्तरण है और एक संकलन में एक ही उपन्यास के हिन्दी तथा उर्दू रूप - दोनों को प्रकाशित करके अमृतराय ने पहली बार साहित्य-संसार को प्रेमचंद की रचनाओं के हिन्दी-उर्दू रूपों का तुलनात्मक अध्ययन करने की प्रेरणा और सुविधा प्रदान की थी, इसमें किसी प्रकार का कोई सन्देह नहीं रहना चाहिए।

4. रूठी रानी - ‘जमाना’ के अप्रैल-मई 1907 के संयुक्तांक तथा अगस्त 1907 के दो अंकों में प्रेमचंद द्वारा अनूदित एक उपन्यास ‘रूठी रानी’ शीर्षक से दो किस्तों में प्रकाशित हुआ था। यही ‘रूठी रानी’ पीछे चलकर जमाना प्रेस, कानपुर से पुस्तकाकार भी प्रकाशित हुआ जिसके मुखपृष्ठ की अनुकृति अमृतराय ने ‘मंगलाचरण’ में प्रकाशित कराई है। इस पर प्रकाशन वर्ष का तो कोई उल्लेख प्राप्त नहीं है, परन्तु इसके द्वितीय संस्करण के प्रकाशित होने की भी कोई सूचना उपलब्ध नहीं है। इस लघु उपन्यास का हिन्दी रूपान्तरण भी अमृतराय ने पहली बार ‘मंगलाचरण’ के माध्यम से ही साहित्य-संसार के समक्ष प्रकट किया था।

कुछ विद्वानों ने आरोप लगाया है कि हिन्दी से उर्दू में अनूदित रचना होने के कारण अमृतराय द्वारा ‘रूठी रानी’ को उर्दू से हिन्दी में रूपान्तरित करके प्रकाशित कराना अनुचित है। परन्तु ये विद्वान् सम्भवतः इस दिशा में ध्यान देने का कुछ प्रयास नहीं कर पाए कि 1962 में जब अमृतराय ने इसका हिन्दी रूपान्तरण ‘मंगलाचरण’ में प्रकाशित कराया था, उस समय यह तथ्य उनके संज्ञान में नहीं आ सका था। यही नहीं, जब मदन गोपाल ने 1965 में ‘कलम का मजदूर प्रेमचंद’ शीर्षक से प्रेमचंद की जीवनी प्रकाशित कराई थी तब वे भी इस सम्बन्ध में कुछ निश्चयात्मक उल्लेख करने में सफल नहीं हो सके थे कि ‘रूठी रानी’ वास्तव में जोधपुर के देवी प्रसाद मुंसिफ के इसी शीर्षक से 1906 में भारत मित्र प्रेस, कलकत्ता से प्रकाशित हिन्दी लघु उपन्यास का उर्दू अनुवाद है।

‘मंगलाचरण’ में संकलित प्रेमचंद के चारों उपन्यासों को साहित्य-संसार के समक्ष प्रस्तुत करके अमृतराय ने उनकी अज्ञात रचनाओं की खोज के कार्य को नई ऊँचाइयाँ दीं। खेद है कि अमृतराय के इस महत्त्वपूर्ण कार्य से भावी शोधकर्ता और प्रेमचंद-विशेषज्ञ प्रेरणा ग्रहण नहीं कर सके, अन्यथा उनके प्रारम्भिक उपन्यासों में से एक उपन्यास ‘किशना’ अभी तक प्राप्त होकर प्रेमचंद साहित्य में सम्मिलित हो चुका होता।

चिट्ठी-पत्री - प्रेमचंद के देहावसान के तत्काल पश्चात् ‘विशाल भारत’ के नवम्बर 1936 के अंक में पं. बनारसी दास चतुर्वेदी ने अपनी सारस्वत श्रद्धांजलि के रूप में ‘स्वर्गीय प्रेमचंदजी’ शीर्षक लेख प्रकाशित किया था। इस लेख में चतुर्वेदीजी ने अपनी बात को प्रेमचंद के पत्रों के आलोक में ही प्रामाणिक आधार प्रदान किया था। मुंशी दयानारायण निगम ने दिसम्बर 1937 में छपकर तैयार हुए ‘जमाना’ के प्रेमचंद नम्बर में ‘प्रेमचंद के खयालात’ शीर्षक अपने लेख में प्रेमचंद के अनेक पत्रों का व्यापक रूप से उपयोग किया था। इन दोनों लेखों से प्रेमचंद के व्यक्तित्व एवं कृतित्व को समझने के लिए उनके पत्रों का महत्त्व स्थापित हो जाता है। अमृतराय ने भी जब ‘प्रेमचंद : कलम का सिपाही’ शीर्षक से प्रेमचंद की जीवनी लिखी तो उसमें भी प्रेमचंद के पत्रों का व्यापक रूप से प्रयोग किया और इन पत्रों के सहारे ही वे प्रेमचंद के जीवन के उलझे-बिखरे सूत्रों को एक माला के रूप में गूँथने में सफल हो सके। यही कारण है कि अमृतराय ने सन् 1962 में ही प्रेमचंद के समस्त उपलब्ध पत्रों का बृहद् संकलन ‘चिट्ठी-पत्री’ शीर्षक से दो भागों में प्रकाशित भी करा दिया।

‘चिट्ठी-पत्री’ में संकलित प्रेमचंद के पत्रों से जहाँ उनकी रचनाओं के प्रथम प्रकाशन सन्दर्भों को प्रामाणिक आधार प्रदान करने में सहायता मिलती है, वहीं दूसरी ओर उनकी अज्ञात रचनाओं की खोज में भी व्यापक रूप से सहायता मिलती है। इस दृष्टि से प्रेमचंद के पत्रों का प्रकाशन एक ऐतिहासिक घटना है।

यह दुर्भाग्य की बात है कि जहाँ अमृतराय प्रेमचंद के अज्ञात साहित्य को प्रकाशित कराने का महनीय कार्य सम्पादित कर रहे थे, वहीं इस क्रम में उन्हें अदालत का मुँह भी देखना पड़ा। हुआ यह कि मदन गोपाल ने ‘जमाना’ सम्पादक मुंशी दयानारायण निगम के अतिरिक्त कुछ अन्य महानुभावों से भी प्रेमचंद के पत्र प्राप्त करके उनका संग्रह कर लिया था। मदन गोपाल ने अपने संग्रह के पत्रों की प्रतिलिपियाँ (मूल पत्र नहीं) अमृतराय को उपलब्ध भी करा दी थीं और पारस्परिक सहमति से मदन गोपाल तथा अमृतराय - दोनों के संग्रह के पत्रों का संकलन ‘चिट्ठी-पत्री’ शीर्षक से प्रकाशित कर दिया गया। जब अमृतराय को ‘प्रेमचंद : कलम का सिपाही’ पर साहित्य अकादमी पुरस्कार प्रदान किए जाने की घोषणा हुई तो मदन गोपाल ने इसके विरुद्ध न्यायालय से स्थगन आदेश प्राप्त करके उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार लेने से रोक दिया। मदन गोपाल ने इस आधार पर मुकदमा दायर किया था कि प्रेमचंद के पत्रों को संकलित-व्यवस्थित करके उन्हें ‘साहित्यिक स्वरूप’ प्रदान करने के कारण इन पत्रों पर उनका कापीराइट है। विधिक रूप से देखा जाय तो पत्रों पर उनके लेखक का कापीराइट होता है और इस दृष्टि से मदन गोपाल का दावा निराधार था। लेकिन साहित्य अकादमी पुरस्कार जैसा प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त करने में विलम्ब न हो, सम्भवतः इस दृष्टि से अमृतराय ने मदन गोपाल से पारस्परिक समझौता करके और ‘चिट्ठी-पत्री’ की अनबिकी प्रतियों पर अपने नाम के साथ उनका नाम प्रकाशित कराकर तथा भूमिका में भी मदन गोपाल का संक्षिप्त वक्तव्य जोड़कर मुकदमा वापस कराने में सफलता प्राप्त की।

ध्यातव्य है कि इस मुकदमे के सम्बन्ध में स्वयं मदन गोपाल ने ही पर्याप्त सामग्री उपलब्ध करा दी है जिसके अध्ययन से वास्तविकता सामने आ जाती है। यहाँ विस्तारभय से यह समस्त विवरण प्रस्तुत नहीं किया जा रहा है। जो महानुभाव इस सम्बन्ध में विस्तार से जानना चाहें वे मदन गोपाल की पुस्तक ‘मुंशी प्रेमचंद की चिट्ठी-पत्री’ (1997) और डा. श्याम सिंह शशि की पुस्तक ‘प्रेमचंद के मदन गोपाल’ (2001) में उपलब्ध मदन गोपाल-श्रीपतराय एवं मदन गोपाल-अमृतराय पत्राचार और इस मुकदमे के दस्तावेज तथा मदन गोपाल द्वारा अपनी आत्मकथा ‘प्रेमचंद के जीवनीकार की आत्मकथा’ (1994) में ‘साहित्यिक धोखा’ शीर्षक (पृष्ठ संख्या 169-71) और ‘कलम का मजदूर प्रेमचंद’ के तृतीय संस्करण (2006) में ‘प्रेमचंद के पत्रों में कापीराइट’ (पृष्ठ संख्या 311-19) शीर्षक लेख के अन्तर्गत प्रस्तुत विवरण का अध्ययन करके सत्यान्वेषण करने का प्रयास कर सकते हैं।

उल्लेखनीय है कि प्रेमचंद के देहावसान के उपरान्त उनकी रचनाओं का कापीराइट उत्तराधिकार में उनके दोनों पुत्रों श्रीपतराय तथा अमृतराय को संयुक्त रूप से प्राप्त हुआ था। जब मदन गोपाल ने ‘कलम का मजदूर प्रेमचंद’ में प्रेमचंद की रचनाओं को उद्धृत किया तो उसके लिए उन्होंने मात्र श्रीपतराय से ही अनुमति प्राप्त की थी और अमृतराय की उपेक्षा कर दी थी, जबकि विधिक रूप से देखा जाय तो इसके लिए अमृतराय से भी अनुमति ली जानी चाहिए थी। मदन गोपाल के इस व्यवहार की पृष्ठभूमि में श्रीपतराय के साथ उनके घनिष्ठ आत्मीय सम्बन्धों की भूमिका महत्त्वपूर्ण प्रतीत होती है। मदन गोपाल और श्रीपतराय का पारस्परिक पत्राचार मदन गोपाल की पुस्तक ‘मुंशी प्रेमचंद की चिट्ठी-पत्री’ और डा. श्याम सिंह शशि की पुस्तक ‘प्रेमचंद के मदन गोपाल’ में उपलब्ध है, जिनका अवलोकन करने से स्पष्ट हो जाता है कि इन दोनों मित्रों में कैसे और किस प्रकार के घनिष्ठ अंतरंग सम्बन्ध थे। इस परिप्रेक्ष्य में यह अनुमान करना भी कुछ असंगत न होगा कि मदन गोपाल द्वारा अमृतराय के विरुद्ध मुकदमा दायर करने में अमृतराय का दिन-प्रतिदिन बढ़ता यश और श्रीपतराय तथा अमृतराय के पारस्परिक सम्बन्ध सौहार्दपूर्ण न होना ही महत्त्वपूर्ण कारक था।

1962 में अमृतराय द्वारा प्रकाशित कराए गए प्रेमचंद के हजारों पृष्ठों के अप्राप्त साहित्य के उपर्युक्त समस्त विवरण से इसमें किसी प्रकार का सन्देह नहीं रहता कि अपने पिता के देहावसान के अनन्तर अमृतराय ने इस दिशा में जो कार्य प्रारम्भ किया था उसकी चरम परिणति 1962 में जाकर उपर्युक्त समस्त संकलनों के रूप में हो पाई। यहाँ यह उल्लेख करना भी असंगत नहीं होगा कि अमृतराय ने 1949 में सरस्वती प्रेस से पृथक् होकर अपना स्वतन्त्र प्रकाशन संस्थान ‘हंस प्रकाशन’ के नाम से इलाहाबाद में स्थापित कर लिया था। इसके अतिरिक्त इस बात के संकेत भी प्राप्त होते हैं कि अमृतराय ने ‘हिन्दुस्तानी पब्लिशिंग हाउस’ के नाम से भी इलाहाबाद में एक अन्य प्रकाशन संस्थान स्थापित किया था, जिससे प्रेमचंद की कुछ हिन्दी-उर्दू पुस्तकें प्रकाशित हुईं। परन्तु यह अवश्य है कि 1949 के पश्चात् ‘सरस्वती प्रेस’ से ‘सोलह अप्राप्य कहानियाँ’ (1981) शीर्षक संकलन के अतिरिक्त प्रेमचंद के अप्राप्त साहित्य का प्रकाशन नहीं हुआ और मात्र हंस प्रकाशन द्वारा अमृतराय के उद्योग तथा अध्यवसाय से खोजकर प्रकाशित कराई गई पुस्तकों को ही नाम बदलकर प्रकाशित किया जाता रहा। ‘सोलह अप्राप्य कहानियाँ’ के सम्बन्ध में तो यथास्थान विवरण प्रस्तुत किया जाएगा, लेकिन इस तथ्य के आलोक में यह अनुमान किया जा सकता है कि 1936 से 1949 तक सरस्वती प्रेस से प्रेमचंद की जो भी अप्राप्य रचनाएँ प्रकाशित हुईं अथवा ‘हंस’ में प्रकाशित हुईं, उनमें श्रीपतराय की भूमिका नगण्य और अमृतराय की भूमिका प्रमुख रही होगी।

अमृतराय ने 1967 में अपने हंस प्रकाशन से प्रेमचंद की कथेतर रचनाओं का एक संकलन ‘साहित्य का उद्देश्य’ शीर्षक से प्रकाशित किया, जिसमें सम्मिलित रचनाओं का विवरण निम्नवत् है -

1. साहित्य का उद्देश्य (‘हंस’, जुलाई 1936), 2. जीवन में साहित्य का स्थान (‘हंस’, अप्रैल 1932), 3. साहित्य का आधार (‘जागरण’, 12 अक्टूबर 1932), 4. कहानी कला-1 (कहानी-संकलन ‘प्रेम प्रसून’), 5. कहानी कला-2 (कहानी- संकलन ‘मानसरोवर’, भाग-2), 6. कहानी कला-3, 7. उपन्यास, 8. उपन्यास का विषय, 9. उपन्यास रचना (‘माधुरी’, अक्टूबर 1922), 10. साहित्य में समालोचना (‘हंस’, मई 1931), 11. साहित्य और मनोविज्ञान (‘हंस’, फरवरी 1936), 12. राष्ट्रभाषा हिन्दी और उसकी समस्याएँ (‘हंस’, जनवरी 1935), 13. कौमी भाषा के विषय में कुछ विचार (‘हंस’, नवम्बर 1934), 14. हिन्दी-उर्दू की एकता (‘कुछ विचार’ में ‘एक भाषण’ शीर्षक से), 15. उर्दू हिन्दी और हिन्दुस्तानी (‘हंस’, अप्रैल 1937), 16. भारतेन्दु बाबू हरिश्चन्द्र (‘जमाना’, जनवरी 1914), 17. बिहारी (‘जमाना’, अप्रैल 1917), और 18. केशव (‘जमाना’, जुलाई 1917)।

उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि ‘साहित्य का उद्देश्य’ के 1954 में प्रकाशित प्रथम संस्करण से मात्र 14 रचनाएँ ही इस संकलन में सम्मिलित की गईं और शेष छोड़ दी गईं। ध्यातव्य है कि चार रचनाएँ - 1. उपन्यास रचना, 2. भारतेन्दु बाबू हरिश्चन्द्र, 3. बिहारी, और 4. केशव - ऐसी हैं जो इस संकलन में जोड़ दी गई हैं। इस तथ्य के आलोक में डा. गोयनका का कथन -"पुस्तक के पुराने संस्करण में से केवल 12 निबन्धों को रखा गया और 6 नये निबन्ध जोड़ दिये गये"1 प्रामाणिक रूप से असंगत सिद्ध हो जाता है। इस नवीन संकलन में ‘यह संस्करण’ शीर्षक से अमृतराय का एक प्रकाशकीय वक्तव्य भी प्रकाशित है, जिसका अविकल पाठ निम्नांकित है -

"साहित्य का उद्देश्य’ का पिछला संस्करण समाप्त हुए काफी समय हो गया।

‘विविध प्रसंग’ के तीन खंड प्रकाशित हो जाने पर, जिनमें प्रेमचंद के सम्पूर्ण लेख संगृहीत हैं, ‘साहित्य का उद्देश्य’ के नये संस्करण की उपयोगिता भी संदिग्ध हो गयी। पर इधर बहुत दिनों से उसकी माँग विद्यार्थियों और शिक्षण संस्थाओं की ओर से हमारे पास पहुँचती रहती है। फलतः यह नया संस्करण प्रस्तुत है। वर्तमान संस्करण महत्त्वपूर्ण संशोधन और परिवर्द्धन के साथ प्रकाशित किया जा रहा है, कुछ लेख हटा दिये गये हैं और कुछ अधिक महत्त्वपूर्ण लेख जोड़ दिये गये हैं। हमारा विश्वास है कि अब यह पुस्तक पहले से भी अधिक सर्वांग पूर्ण है, न केवल विद्यार्थियों के लिए बल्कि अन्य पाठकों के लिए भी, जो इस महान् साहित्यकार के साहित्य-सम्बन्धी विचारों से परिचित होना चाहते हैं।"

उपर्युक्त कथन से इस बात में कोई सन्देह नहीं रहता कि यह संकलन सर्वथा स्वतन्त्र संकलन है। पूर्व प्रकाशित संकलन का ही शीर्षक यथावत् ग्रहण कर लेने और इस नवीन संकलन पर ‘द्वितीय संस्करण’ का उल्लेख प्रकाशित हो जाने से यह भ्रम व्याप्त हो गया है कि यह कोई नवीन संकलन नहीं है। उपुर्यक्त विवरण से इस भ्रम का निवारण हो जायगा, ऐसी आशा रखनी चाहिए।

जहाँ हिन्दी में प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य विपुल परिमाण में प्रकाशित हो रहा था और उर्दू से भी अनुवाद करके प्रकाशित किया जा रहा था, वहीं उर्दू-साहित्य-संसार अपने इस शीर्षस्थ रचनाकार के प्रति कुछ विशेष उत्साह प्रदर्शित नहीं कर पा रहा था। 1968 में मदन गोपाल के सम्पादन में मकतबा जामिया, नई दिल्ली द्वारा ‘प्रेमचंद के खुतूत’ शीर्षक से प्रेमचंद के पत्रों का उर्दू में संकलन प्रकाशित करके उर्दू-जगत् के इस अनपेक्षित उदासीन व्यवहार की बर्फ पिघलाने का प्रयास दृष्टिपथ में आता है। परन्तु इस संकलन में मदन गोपाल ने ‘चिट्ठी-पत्री’ में पूर्व प्रकाशित हो चुके प्रेमचंद के सभी पत्र प्रकाशित न करके मात्र वही पत्र प्रकाशित किए जो उनके अपने संग्रह में उपलब्ध थे अथवा इधर-उधर पत्र-पत्रिकाओं और पुस्तकों आदि में प्रकाशित हो चुके थे। ध्यातव्य है कि इस संकलन में कुछ पत्र ऐसे भी हैं जो ‘चिट्ठी-पत्री’ में उपलब्ध नहीं हैं, और इस दृष्टि से इस पत्र-संकलन का अपना विशिष्ट महत्त्व है।

मुम्बई से प्रकाशित उर्दू मासिक ‘शायर’ के मई-जून 1969 के अंक में हरबंस दोस्त ने हिन्दी मासिक ‘स्वाधीनता’ के किसी अंक में प्रकाशित ‘वैराग्य’ शीर्षक कहानी का निदा फाजली द्वारा किया हुआ उर्दू अनुवाद ‘विराग’ शीर्षक से प्रकाशित कराकर प्रेमचंद की इस सर्वथा अज्ञात कहानी को प्रेमचंद साहित्य में सम्मिलित कराया। ध्यातव्य है कि प्रेमचंद की मौलिक हिन्दी कहानी ‘वैराग्य’ का मूल पाठ सम्प्रति उपलब्ध नहीं है और न इसका प्रथम प्रकाशन-सन्दर्भ ही ज्ञात है।

अमृतराय के पूर्व उल्लिखित महत्त्वपूर्ण कार्य के पश्चात् प्रेमचंद की अप्राप्त रचनाओं की खोज की कोई विशेष सम्भावना नहीं रही, इस धारणा को खण्डित करते हुए इलाहाबाद के डा. जाफर रजा ने प्रेमचंद साहित्य पर शोध करने के क्रम में प्रेमचंद की 25 अप्राप्त कहानियाँ खोज निकालीं। इस सम्बन्ध में स्वयं डा. जाफर रजा लिखते हैं-

"इन पंक्तियों के लेखक को अपने शोध कार्य के बीच उर्दू तथा हिन्दी के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं से पच्चीस ऐसी कहानियाँ प्राप्त हुईं जो अब तक सर्वथा अज्ञात थीं। यह कहानियाँ शीघ्र ही हंस प्रकाशन, इलाहाबाद से ‘गुप्त धन’, भाग-3 के रूप में प्रकाशित हो रही हैं। इन कहानियों के नाम निम्नलिखित हैं - 1. आबे हयात, 2. अश्के नदामत, 3. बाँसुरी, 4. बरात, 5. बड़ी बहन, 6. दोनों तरफ से, 7. दाराशिकोह का दरबार, 8. रूहे हयात, 9. रोशनी, 10. रू-ए-सियाह, 11. दारू-ए-तल्ख, 12. सगे लीली, 13. शुद्धि, 14. सौदा-ए-खाम, 15. सम्पादक मोटेराम शास्त्री, 16. स्वप्न, 17. खौफे रुसवाई, 18. कातिल की माँ, 19. करिश्मा-ए-इंतकाम, 20. कैफरे किरदार, 21. गमी, 22. वतन की कीमत, 23. वफा की देवी, 24. वैराग्य, और 25. धोके की टट्टी। इन्हें आगामी पृष्ठों में दी गयी तालिका में सम्मिलित कर लिया गया है।"1

1.  प्रेमचंद : उर्दू हिन्दी कथाकार,

डा. रजा की उपर्युक्त सूचना से यह स्पष्ट है कि इन 25 सुदुर्लभ कहानियों को रूपान्तरित-सम्पादित करके वे संकलन की पाण्डुलिपि अमृतराय को सौंप चुके थे। अनेकानेक व्यस्तताओं के मध्य अमृतराय इस पाण्डुलिपि का परीक्षण करने हेतु वांछित समय नहीं निकाल सके होंगे और इस संकलन का प्रकाशन टलता गया होगा। इसी मध्य ‘प्रेमचंद के उपन्यासों का शिल्प विधान’ विषय पर शोध कार्य में संलग्न डा. कमल किशोर गोयनका प्रेमचंद से सम्बन्धित बहुत सी सामग्री सितम्बर 1976 में इलाहाबाद जाकर अमृतराय के यहाँ से ले आए। इसका विवरण स्वयं डा. गोयनका के ही शब्दों में -

"मैंने अमृतराय को 20 जनवरी 1974 को पत्र लिखकर प्रेमचंद सम्बन्धी सामग्री उपलब्ध कराने का आग्रह किया था। उन्होंने अपने 31 जनवरी 1974 के पत्र में मुझे लिखा, ‘आप अकारण मुझको इतना महत्त्व दे रहे हैं। मेरे पास अब कोई नयी सामग्री या सूचना नहीं है और अगर कुछ होगी तो वह इतनी गहराई में जाने पर मिलेगी, जिसके लिए मेरे पास सचमुच अभी न तो समय है और न उत्साह। आप जिस लगन से अपना काम कर रहे हैं उसको तो पूरा कर ही डालें - आगे जो कुछ नया सामने आयेगा, वह जुड़ता रहेगा।’ इस पर भी मैंने प्रयास जारी रखे। जुलाई 1975 को इलाहाबाद जाकर उनसे मिलने का कार्यक्रम बना कि 27 जुलाई 1975 की रात्रि को इमर्जेन्सी काल में दिल्ली विश्वविद्यालय के लगभग 300 प्रोफेसरों के साथ मैं भी गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बाद सितम्बर 1976 में फिर इलाहाबाद जाना हुआ तो अमृतराय ने प्रेमचंद से सम्बन्धित दस्तावेजों से भरा एक छोटा बक्सा मेरे सामने रखकर कहा, ‘मैंने प्रेमचंद की छाती पर पाँच साल बैठकर काम किया और उनकी जीवनी लिखी तथा हजारों पृष्ठों का गुमशुदा साहित्य ढूँढ़कर पाठकों के सम्मुख रखा। अब मुझे प्रेमचंद पर कुछ नहीं करना है। इसमें आपके लायक कुछ चीजें हों तो देख लीजिए। मुझे कोई आपत्ति नहीं है।’ मैंने सारी सामग्री देखी और कुछ सामग्री ऐसी मिली, जिसका अमृतराय ने प्रेमचंद पर लिखी अपनी जीवनी में कोई उपयोग नहीं किया था। ऐसी सामग्री पाकर मैं उत्साह से भर गया। सामग्री छाँटकर मैंने अमृतराय से आग्रह किया कि वे उसे देख लें, क्योंकि उसका समुचित उपयोग करने के लिए मुझे उसे दिल्ली लेकर आना था। अमृतराय ने इसकी आवश्यकता नहीं समझी और सामग्री ले जाने की आज्ञा दे दी। उन्हें जब ‘कलम का सिपाही’ के दूसरे संस्करण पर चित्रों की आवश्यकता हुई तो उन्होंने 3 नवम्बर 1976 के पत्र में मुझे लिखा था, ‘मुझसे ही भूल हुई, आपने तो यह सब सामग्री, जो आप यहाँ से ले जा रहे थे, मुझको दिखानी चाही थी; मैंने देख ही ली होती तो अच्छा रहता, क्योंकि तब मैं वो सब चित्र कभी आपको न देता। ‘कलम का सिपाही’ के नये संस्करण के लिए मुझे उनकी तत्काल जरूरत है।’ इस पत्रांश से बिल्कुल स्पष्ट है कि मैं जो सामग्री उनके यहाँ से लाया, उसके लिए उनकी पूर्ण सहमति थी।1

उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि जो सामग्री अमृतराय के यहाँ से डा. गोयनका लेकर आए थे, उसका न तो अमृतराय के पास कोई विवरण उपलब्ध रहा, न ही उनके संज्ञान में यह आ सका कि डा. गोयनका क्या-क्या सामग्री अपने साथ ले गए। इसके अतिरिक्त इस बात का भी कोई संकेत प्राप्त नहीं होता कि डा. गोयनका जो मूल दस्तावेज आदि ले आए थे वे उन्होंने अमृतराय को लौटाने का कभी कोई उपक्रम किया हो। ऐसा नहीं है कि अमृतराय उन मूल दस्तावेजों का महत्त्व नहीं समझते थे। प्रेमचंद के छोटे भाई महताबराय के पुत्र और स्वयं प्रेमचंद-परम्परा के सशक्त कहानीकार श्री कृष्ण कुमार राय ने एक वार्ता में मुझे बताया था कि अपने जीवन के अन्तिम दिनों तक अमृतराय इस सामग्री के वापस किए जाने की प्रतीक्षा करते रहे और यह कि अनेक बार माँगे जाने पर भी डा. गोयनका ने इस समूची सामग्री को उन्हें लौटा देने का कोई प्रयास नहीं किया, भले ही वे अपने सम्पादन में प्रकाशित संकलनों तथा अपने संयोजन में लगाई जाने वाली प्रेमचंद-प्रदर्शनियों में उस सामग्री का व्यापक रूप से उपयोग तथा उपभोग कर चुके थे। अमृतराय के जिस पत्रांश को डा. गोयनका ने उद्धृत किया है उससे भी अमृतराय का मानसिक सन्ताप स्पष्ट होता है। यदि डा. गोयनका इस सम्बन्ध में अमृतराय द्वारा उन्हें लिखे गए समस्त पत्रों का अविकल पाठ प्रकाशित करा दें तो वास्तविकता सामने आ सकती है। इस सम्बन्ध में मदन गोपाल का कथन भी उल्लेखनीय है, जिन्होंने लिखा -

"1957 में मैंने (‘गुप्त धन’ तब नहीं निकला था) दो रजिस्टरों में उर्दू में और उन्हीं के हिन्दी रूपान्तरण की एक सूची तैयार की थी। एक रजिस्टर कमल किशोर गोयनका ले गए थे, दूसरा अभी भी मेरे पास है।2

उपर्युक्त शब्दों से स्पष्ट है कि मदन गोपाल द्वारा तैयार की गई प्रेमचंद की कहानियों की जो सन्दर्भिका डा. गोयनका उनसे उधार माँगकर ले गए थे, उसे लौटाने का उन्होंने कभी कोई उपक्रम नहीं किया।

यह संयोग अकारण नहीं प्रतीत होता कि डा. कमल किशोर गोयनका सितम्बर 1976 में अमृतराय के यहाँ से सामग्री उठाकर लाए और उनके द्वारा प्रस्तुत प्रेमचंद की एक विस्मृत कहानी ‘दोनों तरफ से’ ‘नया प्रतीक’ के अक्टूबर 1976 के अंक में प्रकाशित हो गई। इसके पश्चात् डा. गोयनका द्वारा स्वयं प्रस्तुत विवरण के अनुसार उन्होंने प्रेमचंद की ऐसी भूली-बिसरी आठ अन्य कहानियाँ भी विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में अपनी प्रस्तुति में प्रकाशित कराईं, जिनका विवरण निम्नांकित है -

1. स्वप्न (‘दिल्ली’, फरवरी-मार्च 1977), 2. गमी (‘आजकल’, मई 1977), 3. रूहे सियाह (‘निर्झर’, जुलाई 1977), 4. सम्पादक मोटेरामजी शास्त्री (‘कहानी’, जुलाई 1977), 5. करिश्मा-ए-इन्तकाम (‘सारिका’, जुलाई-2, 1978), 6. वियोग और मिलाप (‘दैनिक हिन्दुस्तान’, 7 अक्टूबर 1979), 7. आबे हयात (‘शीराजा’, मई 1980), और 8. बड़ी बहन (‘कादम्बिनी’, जुलाई 1980)।

1. प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य, भाग-1,

2. प्रेमचंद वाङ्मय अब उर्दू में भी; आजकल, नई दिल्ली, जून 2005,

डा. गोयनका का दावा है कि उन्होंने स्वयं ही उर्दू कहानियों को देवनागरी में लिप्यन्तरित करके प्रकाशित कराया, लेकिन अनेक उर्दू विद्वान् इस तथ्य का स्पष्ट उल्लेख करते हैं कि डा. गोयनका उर्दू भाषा और लिपि से नितान्त अपरिचित हैं। इन विद्वानों की मान्यता की पुष्टि इस तथ्य से भी हो जाती है कि प्रेमचंद की जिस कहानी का शीर्षक उर्दू में ‘रू-ए-सियाह’ था, वह डा. गोयनका के देवनागरी लिप्यन्तरण में आकर ‘रूहे सियाह’ हो गया और मूल उर्दू शब्दों के अर्थ ‘काला मुँह’ को भी भ्रष्ट करके ‘कलुषित आत्मा’ कर दिया गया। यहाँ यह भी सन्देह उत्पन्न होता है कि जो डा. गोयनका अक्टूबर 1976 से पूर्व प्रेमचंद की एक भी नयी रचना खोजने में सफल नहीं हो सके थे, उन्हें ऐसा कौन-सा दफीना हाथ आ गया जिसमें से निकाल- निकालकर उन्होंने ये कहानियाँ प्रकाशित करानी आरम्भ कर दीं। इस सन्देह को इस तथ्य से बल प्राप्त होता है कि डा. गोयनका ने अक्टूबर 1976 से जुलाई 1980 तक प्रेमचंद की जो 9 अज्ञात कहानियाँ प्रकाशित कराईं उनमें से आठ कहानियाँ ऐसी हैं जिनका स्पष्ट नामोल्लेख डा. जाफर रजा की पूर्व उद्धृत 25 कहानियों की सूची में प्राप्त है। इस विचित्र संयोग से यह सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि डा. गोयनका सितम्बर 1976 में अमृतराय के यहाँ से जो सामग्री बिना उनके संज्ञान में लाए उठा ले गए थे, उसी के साथ डा. जाफर रजा द्वारा अमृतराय को दी गई ‘गुप्त धन’, भाग-3 की मूल पाण्डुलिपि का महत्त्वपूर्ण अंश भी डा. गोयनका के पास पहुँच गया होगा और उन्होंने सम्भवतः डा. रजा के शोध और श्रम का अपहरण करने की दृष्टि से उन कहानियों को अपनी खोज बताकर प्रकाशित कराना प्रारम्भ कर दिया होगा। जहाँ तक डा. रजा की सूची में अनुपलब्ध कहानी ‘वियोग और मिलाप’ का सम्बन्ध है, यह भी कुछ अस्वाभाविक नहीं जान पड़ता कि यह कहानी अमृतराय को किसी अन्य स्रोत से प्राप्त हुई हो और इसकी प्रति भी डा. गोयनका को अमृतराय के यहाँ से लाई गई सामग्री में ही मिल गई हो।

उपर्युक्त विवरण के आधार पर अनुमान किया जा सकता है कि जब अमृतराय के यहाँ से ‘गुप्त धन’, भाग-3 की मूल पाण्डुलिपि का महत्त्वपूर्ण अंश ही लुप्त हो गया तब इस संकलन का प्रकाशन कैसे सम्भव हो सकता था। ध्यातव्य है कि 1981 में प्रकाशित ‘प्रेमचंद विश्वकोश’ में डा. कमल किशोर गोयनका ने एक कहानी- संकलन का निम्नांकित विवरण प्रस्तुत किया था -

"प्रेमचंद की अप्राप्य कहानियाँ’ - कहानी-संकलन/संकलन एवं प्रस्तुतकर्त्ता - डा. कमल किशोर गोयनका/प्रकाशक-श्रीपतराय, सरस्वती प्रेस, 5 सरदार पटेल मार्ग, इलाहाबाद; 2/43, अन्सारी रोड, दरियागंज; पुस्तक यन्त्रस्थ है/डा. कमल किशोर गोयनका ने पाँच वर्ष की अनवरत खोज के पश्चात् प्रेमचंद की अप्राप्य और असंकलित 16 हिन्दी-उर्दू कहानियों को विभिन्न हिन्दी-उर्दू पत्रिकाओं एवं कहानी- संग्रहों से प्राप्त किया/यह पुस्तक इन्हीं 16 कहानियों का संग्रह है। इन कहानियों में 11 कहानियाँ उर्दू पत्रिकाओं एवं संग्रहों से प्राप्त की गई हैं। ये कहानियाँ हैं - करिश्मा-ए-इन्तकाम (‘जमाना’, फरवरी 1911), दोनों तरफ से (‘जमाना’, मार्च 1911), बड़ी बहन (‘अदीब’, जुलाई 1911), खौफे रुसवाई (‘अदीब’, सितम्बर 1911), खूने हुर्मत (‘सुबहे उम्मीद’, सितम्बर 1919), आबे हयात (‘सुबहे उम्मीद’, मार्च 1920), रूहे स्याह (‘सुबहे उम्मीद’, नवम्बर 1920), शुद्धी (‘ख्वाबो खयाल’ संग्रह से, मार्च 1934), बारात (‘आखिरी तोहफा’ संग्रह से, मार्च 1934), रोशनी (‘वारदात’ संग्रह से, फरवरी 1938), कातिल की माँ (‘वारदात’ संग्रह से, फरवरी 1938)। हिन्दी पत्रिकाओं से प्राप्त 5 कहानियाँ हैं - वियोग और मिलाप (‘प्रताप’, विजयदशमी 1917), सम्पादक मोटेरामजी शास्त्री (‘माधुरी’, अगस्त-सितम्बर 1938), गमी (‘मतवाला’, 31 अगस्त 1929), स्वप्न (‘वीणा’, जुलाई 1930), विराग (‘स्वाधीनता’ के किसी अंक में प्रकाशित हिन्दी कहानी का उर्दू रूप)।1

डा. गोयनका ने उपर्युक्त संकलन 1981 में प्रकाशनाधीन होने की सूचना दी थी परन्तु आश्चर्यजनक रूप से इन्हीं 16 कहानियों पर आधारित एक कहानी-संकलन 1981 में ही श्रीपतराय के सम्पादन में ‘सोलह अप्राप्य कहानियाँ’ शीर्षक के अन्तर्गत सरस्वती प्रेस से प्रकाशित हो गया। इस संकलन पर टिप्पणी करते हुए डा. जाफर रजा लिखते हैं-

"अभी हाल में श्रीपतराय ने प्रेमचंद की ‘सोलह (16) अप्राप्य (नायाब) कहानियाँ’ शाया की हैं। ये तमाम कहानियाँ मेरी तलाशकर्दा हैं लेकिन कहीं इसका ऐतराफ करने की जहमत गवारा नहीं की गई। इनमें तेरह (13) कहानियाँ उर्दू से हिन्दी में नक्ल लफ्ज हैं। महज तीन (3) हिन्दी कहानियाँ हैं। इस तरह के तर्जुमे और नक्ल लफ्ज को प्रेमचंद की निगारिश क्योंकर कहा जा सकेगा।"2

उपर्युक्त शब्दों से डा. जाफर रजा की व्यथा का सहज ही अनुमान किया जा सकता है।

1988 में डा. कमल किशोर गोयनका के सम्पादन में भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली से प्रकाशित ‘प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य’ नाम से जो संकलन दो भागों में प्रकाशित हुआ, उसके प्रथम भाग में डा. गोयनका ने प्रेमचंद की कथित रूप से ‘अप्राप्य’ 32 कहानियाँ प्रकाशित कराईं जिनका विवरण निम्नवत् है –

1. प्रेमचंद विश्वकोश, भाग-2,

2. प्रेमचंद : कहानी का रहनुमा (उर्दू),

1. करिश्मा-ए-इन्तिकाम (‘जमाना’, फरवरी 1911), 2. दोनों तरफ से (‘जमाना’, मार्च 1911), 3. बड़ी बहन (‘अदीब’, जुलाई 1911), 4. खौफे रुसवाई (‘अदीब’, सितम्बर 1911), 5. कैफरे कर्दार (‘अदीब’, जुलाई 1912), 6. धोके की टट्टी (‘अदीब’, नवम्बर 1912), 7. सगे लैला (‘अदीब’, अप्रैल 1913), 8. दारू-ए-तल्ख (‘हमदर्द’, 17 जुलाई 1913), 9. अपने फन का उस्ताद (‘जमाना’, सितम्बर 1916), 10. दरवाजा (‘अलनाजिर’, जुलाई 1917), 11. वियोग और मिलाप (‘प्रताप’, सितम्बर 1917), 12. खूने हुर्मत (‘सुबहे उम्मीद’, सितम्बर 1919), 13. बाँसुरी (‘कहकशाँ’, जनवरी 1920), 14. प्रतिज्ञा (‘श्री शारदा’, मार्च 1920), 15. आबे हयात (‘सुबहे उम्मीद’, मार्च 1920), 16. रूहे सियाह (‘सुबहे उम्मीद’, नवम्बर 1920; यह कहानी ‘प्रतिज्ञा’ हिन्दी कहानी का मामूली परिवर्तन के साथ उर्दू अनुवाद है), 17. रूहे हयात (‘जमाना’, जनवरी 1921), 18. मोटेरामजी शास्त्री का नैराश्य (‘समालोचक’, मार्च-अप्रैल 1928), 19. शुद्धि (‘ख्वाबो खयाल’, मई 1928), 20. सम्पादक मोटेरामजी शास्त्री (‘माधुरी’, अगस्त-सितम्बर 1928), 21. बोहनी (‘भारत’, 7 अक्टूबर 1928), 22. खूनी (‘भारत’, 25 नवम्बर 1928), 23. गमी (‘मतवाला’, 31 अगस्त 1928), 24. स्वप्न (‘वीणा’, जुलाई 1930), 25. खेल (‘चन्दन’, अप्रैल 1931), 26. बीमार बहिन (‘कुमार’, जुलाई 1932), 27. रंगीले बाबू (‘भारत’, 26 जनवरी 1933), 28. वैराग्य (‘स्वाधीनता’; 1933 अनुपलब्ध पत्रिका में इसी शीर्षक से प्रकाशित हुई थी, किन्तु हरबंश सिंह ‘दोस्त’ ने इसका उर्दू अनुवाद करके ‘विराग’ शीर्षक से ‘शायर’ (मुम्बई) उर्दू मासिक पत्रिका के मई-जून 1969 के अंक में प्रकाशित कराया था। उसी उर्दू रूप से इसका हिन्दीकरण किया गया है), 29. बारात (‘आखिरी तोहफा’, मार्च 1934), 30. कातिल की माँ (‘वारदात’, मार्च 1935), 31. रोशनी (‘वारदात’, मार्च 1935), 32. एक अपूर्ण कहानी (उर्दू से तिथि अज्ञात)।1

आश्चर्य इस बात का है कि इन 32 कहानियों में से 16 कहानियाँ ठीक वही हैं जो श्रीपतराय के सम्पादन में प्रकाशित ‘सोलह अप्राप्य कहानियाँ’ में सम्मिलित थीं। यही 32 कहानियाँ 2005 में अनिल प्रकाशन, दिल्ली से डा. गोयनका द्वारा सम्पादित ‘प्रेमचंद की अप्राप्य कहानियाँ’ शीर्षक संकलन में भी प्रकाशित हुईं। इस तथ्य को स्पष्ट रूप से स्वीकार करते हुए डा. कमल किशोर गोयनका ने अपने 12 अक्टूबर 2005 के पत्र में मुजफ्फरनगर के श्री वेदप्रकाश गर्ग को लिखा था-

1.  प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य, भाग-1,

"प्रेमचंद की अप्राप्य कहानियाँ’ - ये वही कहानियाँ हैं जो ‘प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य’ में हैं।"

ध्यातव्य है कि डा. जाफर रजा ने अपनी उर्दू पुस्तक ‘प्रेमचंद : कहानी का रहनुमा’ के प्रथम संस्करण में लिखा था -

"इनके अलावा राकिम को उर्दू और हिन्दी के मुख्तलिफ रसाइल व अखबारात और कहानियों के मजमूओं से सोलह (16) ऐसी कहानियाँ दस्तयाब हुईं जो अब तक की फहरिस्तों में शामिल नहीं थीं। (प्रेमचंद : कहानी का रहनुमा, सफहा 257)"1

यह संयोग भी विचित्र प्रतीत होता है कि सन् 1969 में डा. रजा ने प्रेमचंद की 16 दुर्लभ कहानियों की खोज करने का उल्लेख किया, डा. गोयनका ने सन् 1981 में पूर्व उद्धृत सूचना के अनुसार ठीक 16 अप्राप्य कहानियों पर आधारित संकलन प्रकाशनाधीन होने का उल्लेख किया और सन् 1981 के आसपास ही श्रीपतराय ने भी 16 कहानियों पर आधारित संकलन ‘सोलह अप्राप्य कहानियाँ’ शीर्षक से अपने सम्पादन में प्रकाशित करा दिया। तीनों ही उल्लेखों में कहानियों की समान संख्या चौंकाने वाली है।

उल्लेखनीय है कि ‘प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य’ और ‘प्रेमचंद की अप्राप्य कहानियाँ’ - दोनों संकलनों में डा. कमल किशोर गोयनका ने प्रेमचंद की ‘सम्प्रति अज्ञात तथा अप्राप्य’ कहानियों की सूची भी इस प्रकार प्रस्तुत की है -

"1. ‘दाराशिकोह का दरबार’, उर्दू से, ‘आजाद’ (लाहौर), सम्पादक बिशन सहाय आजाद, जिल्द 4, सितम्बर 1908; 2. ‘सौदा-ए-खाम’, उर्दू से, ‘हमदर्द’, अगस्त 1914; 3. ‘जंजाल’, उर्दू से, ‘तहजीबे निस्वाँ’, उर्दू मासिक, अगस्त 1918; 4. ‘अश्के नदामत’, उर्दू से, ‘कहकशाँ’, उर्दू मासिक पत्रिका, जनवरी 1920; 5. ‘वतन की कीमत’, उर्दू से, ‘नैरंग’, उर्दू मासिक, जनवरी 1931; 6. ‘वफा की देवी’, उर्दू से, ‘आखिरी तोहफा’, उर्दू कहानी संग्रह 1934 में संकलित"2

 

1.  डा. कमर रईस द्वारा प्रेमचंद के नुमाइंदा अफसाने, 

2.  प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य, भाग-1,

"1. ‘दाराशिकोह का दरबार’: उर्दू कहानी, ‘आजाद’, लाहौर, सितम्बर 1908; 2. ‘सौदा-ए-खाम’: उर्दू कहानी, ‘हमदर्द’, अगस्त 1914; 3. अश्के नदामत (अंग्रेजी कहानी का अनुवाद): उर्दू कहानी, ‘अलअस्र’, 1917 तथा ‘कहकशाँ’, जनवरी 1920; 4. ‘जंजाल’: उर्दू कहानी, ‘तहजीबे निस्वाँ’, 3 अगस्त 1918; 5. अश्के नदामत : उर्दू कहानी, ‘कहकशाँ’, जनवरी 1920; 6. ‘वतन की कीमत’, उर्दू कहानी, ‘नैरंग’, जनवरी 1931; 7. ‘वफा की देवी’, उर्दू कहानी ‘आखिरी तोहफा’, उर्दू कहानी संग्रह 1934"1

उपर्र्युक्त सूचियों से स्पष्ट है कि ‘प्रेमचंद की अप्राप्य कहानियाँ’ में प्रस्तुत सूची में ‘अश्के नदामत’ कहानी का दो बार उल्लेख करके इन कहानियों की संख्या में अनावश्यक वृद्धि कर दी गई है। इसके अतिरिक्त यह भी कुछ बुद्धिगम्य नहीं है कि जब डा. कमल किशोर गोयनका ‘आखिरी तोहफा’ संकलन से ‘बारात’ शीर्षक कहानी खोजकर प्रकाशित करा सकते थे तब उसी संकलन में सम्मिलित ‘वफा की देवी’ शीर्षक कहानी खोजने में उन्हें सफलता क्यों प्राप्त नहीं हुई। इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि डा. गोयनका को इस उर्दू कहानी-संकलन की जो प्रति उपलब्ध हुई, उसमें यह कहानी सम्मिलित होने से छूट गई हो!

1.  प्रेमचंद की अप्राप्य कहानियाँ,

1988 और 2005 में प्रकाशित दो संकलनों में ‘अप्राप्य’ कहानियों की एक सी सूची प्रकाशित होने से स्पष्ट होता है कि इस 18 वर्षों की सुदीर्घ कालावधि में डा. गोयनका न तो प्रेमचंद की अप्राप्य कहानियों की अपनी ही सूची को छोटा कर सके, न ही प्रेमचंद की अन्य कोई अज्ञात-असन्दर्भित कहानी तलाश कर सके। जो डा. गोयनका 12 वर्षों की अवधि में प्रेमचंद की 32 ‘अप्राप्य’ कहानियाँ खोज लेने की चमत्कारिक क्षमता से सम्पन्न थे, उनकी इस क्षमता को ग्रहण कैसे लग गया? इसके कारणों की पड़ताल करना तो पृथक् से गम्भीर शोध की अपेक्षा रखता है, इतना अवश्य है कि ‘सोलह अप्राप्य कहानियाँ’, ‘प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य’, भाग-1 और ‘प्रेमचंद की अप्राप्य कहानियाँ’ शीर्षक संकलनों में प्रस्तुत कहानियों की तुलना डा. जाफर रजा द्वारा प्रस्तुत एवं पूर्व उद्धृत 25 कहानियों की सूची तथा डा. गोयनका द्वारा प्रस्तुत सम्प्रति ‘अप्राप्य’ कहानियों की सूची से करने पर यह तथ्य उद्घाटित होता है कि मात्र निम्नांकित 8 कहानियाँ ही इस प्रकृति की हैं जो श्रीपतराय अथवा डा. गोयनका के संकलनों में तो सम्मिलित हैं, लेकिन जिनका उल्लेख डा. जाफर रजा द्वारा प्रस्तुत कहानियों की सूची में उपलब्ध नहीं है -

1. वियोग और मिलाप, 2. प्रतिज्ञा, 3. मोटेरामजी शास्त्री का नैराश्य, 4. बोहनी, 5. खूनी, 6. खेल, 7. बीमार बहन, और 8. रंगीले बाबू

ध्यातव्य है कि प्रेमचंद की सम्प्रति ‘अप्राप्य’ कहानियों की सूची में उल्लिखित कहानी ‘जंजाल’ का उल्लेख डा. जाफर रजा द्वारा प्रस्तुत ‘पहली बार उर्दू में प्रकाशित कहानियों की सूची’ में प्राप्त होता है और ‘प्रतिज्ञा’ शीर्षक कहानी को डा. वीर भारत तलवार ने खोजकर प्रकाशित कराया था। उपर्युक्त विवरण के आलोक में अन्यथा प्रमाण प्राप्त होने तक उपर्युक्त 8 कहानियों में से ‘प्रतिज्ञा’ के अतिरिक्त शेष 7 कहानियों को ही डा. कमल किशोर गोयनका की तलाश स्वीकार किया जा सकता है और शेष कहानियों की खोज का श्रेय डा. जाफर रजा को ही दिया जाना सर्वथा सुसंगत है। यहाँ अपने शोध का बलात् अपहरण कर लिए जाने से उद्भूत डा. जाफर रजा की व्यथा पर दृष्टिपात करना असंगत न होगा, जिन्होंने लिखा -

1. "हमें हिन्दी-उर्दू के मुख्तलिफ रसाईल, अखबारात और कहानियों के मजमूओं से प्रेमचंद की पच्चीस (25) ऐसी कहानियाँ दस्तयाब हुईं जो हिन्दी और उर्दू के माहिरीने प्रेमचंदयात की दस्तरस से बाहर थीं। ये कहानियाँ हमारी तैयारकर्दा फहरिस्तों में शामिल होती रही हैं। ‘प्रेमचंद : उर्दू-हिन्दी कथाकार’ (हिन्दी) में अलग से भी इनकी निशानदिही कर दी गई है। पहले इन कहानियों पर मबनी एक मजमूआ उर्दू और हिन्दी में अलग-अलग शाया करने का इरादा था जिसकी अब जरूरत बाकी न रह गई है क्योंकि ‘याराने तेजगाम’ ने हमसे पहले ही मंजिल को जा लिया और हमारी फहरिस्तों से इन कहानियों के मुताल्लिक जरूरी मालूमात हासिल करके इन्हें शाया कर दिया। वे हमारे शुक्रिये के मुस्तहिक हैं।"1

1. प्रेमचंद की अप्राप्य कहानियाँ

2. "हमें हिन्दी-उर्दू की विभिन्न पत्रिकाओं, समाचार पत्रों और कहानियों के संकलनों से प्रेमचंद की 25 (पचीस) ऐसी कहानियाँ प्राप्त हुई हैं, जो हिन्दी और उर्दू संकलनों से बाहर थीं। ये कहानियाँ हमारी तैयार की हुई सूचियों में सम्मिलित होती रही हैं। ‘प्रेमचंद : उर्दू-हिन्दी कथाकार’ (उर्दू संस्करण, 1978 ई., हिन्दी संस्करण 1982 ई.) में अलग से भी इनको चिह्नित कर दिया गया है। पहले इन कहानियों पर आधारित एक संकलन उर्दू और हिन्दी में पृथक्-पृथक् प्रकाशित कराने का विचार था, जिसकी अब आवश्यकता शेष नहीं रह गई है, क्योंकि लोगों ने हमारी सूचियों से इन कहानियों के सम्बन्ध में आवश्यक जानकारी प्राप्त करके, मेरा कोई सन्दर्भ दिये बिना ही उन्हें अपने नाम से सम्पादित कर प्रकाशित करा दिया है। इनके सम्पादक हमारे धन्यवाद के पात्र हैं।"2

डा. जाफर रजा के उपर्युक्त शब्दों से उनका वह मनस्ताप स्पष्टतः प्रकट होता है जो समयसाध्य और श्रमसाध्य गहन-गम्भीर शोध के पश्चात् उपलब्ध होने वाली सामग्री की चोरी हो जाने पर किसी भी शोधकर्ता के मन में स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होता। प्रतीत होता है कि डा. रजा ‘गुप्त धन’, भाग-3 के प्रकाशित न होने के कारणों पर चिन्तन नहीं कर सके और उनको इस बात का तनिक भी आभास न हो पाया कि अमृतराय के यहाँ से उनकी पाण्डुलिपि येन-केन-प्रकारेण हस्तगत करके अन्य महानुभाव उन्हें उसके श्रेय से वंचित भी कर सकते हैं। क्या साहित्य-संसार इन कहानियों की खोज का श्रेय इसके वास्तविक अधिकारी डा. जाफर रजा को देकर एक दीर्घकालीन पाप का प्रायश्चित्त करने का साहस कर सकेगा?

डा. जाफर रजा द्वारा ‘गुप्त धन’, भाग-3 (अप्रकाशित) में प्रेमचंद की 25 कहानियाँ संकलित किए जाने के पश्चात् खुदाबख्श ओरियंटल पब्लिक लाइब्रेरी, पटना ने 1978-79 में प्रकाशित अपनी उर्दू पत्रिका ‘खुदाबख्श लाइब्रेरी जर्नल’ के अंक 7-8 में उर्दू मासिक ‘अदीब’ से संचयन प्रकाशित किया। इस संचयन की विशेषता यह है कि इसे पत्रिका के सम्बन्धित अंकों से फोटोप्रति द्वारा प्रकाशित किया गया है। जर्नल के इस अंक में ‘अदीब’ में प्रकाशित प्रेमचंद की निम्नांकित रचनाएँ पुनः प्रकाशित की गईं –

1. प्रेमचंद : कहानी का रहनुमा (उर्दू), तृतीय संस्करण, 1999,

2. प्रेमचंद : कहानी का रहनुमा (हिन्दी),

1. उर्दू जबान और नावल (अगस्त 1910), 2. खौफे रुसवाई (सितम्बर 1911), 3. बेगरज मोहसिन (सितम्बर 1910), 4. धोखे की टट्टी (नवम्बर 1912), 5. कैफरे किरदार (जुलाई 1912), 6. सगे लैला (अप्रैल 1913), और 7. बड़ी बहन (जुलाई 1911)

उपर्युक्त रचनाओं में से मात्र ‘बेगरज मोहसिन’ शीर्षक कहानी ही प्रेमचंद के जीवन-काल में ‘प्रेम बतीसी’, भाग-1 में सम्मिलित होकर प्रकाशित हुई थी। इसके अतिरिक्त अन्य रचनाओं में से ‘खौफे रुसवाई’ और ‘बड़ी बहन’ ‘सोलह अप्राप्य कहानियाँ’ में और तीन कहानियाँ ‘धोखे की टट्टी’, ‘कैफरे किरदार’ और ‘सगे लैला’ ‘प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य’, भाग-1 में सम्मिलित होकर प्रकाशित हुई थीं। उपर्युक्त रचनाओं में से प्रेमचंद का लेख ‘उर्दू जबान और नावल’ पूर्णतः उपेक्षित रहा और पहली बार मदन गोपाल के सम्पादन में प्रकाशित ‘कुल्लियाते प्रेमचंद’ में सम्मिलित होकर ही साहित्य-संसार के समक्ष आ सका। ध्यातव्य है कि डा. गोयनका ने जब उपर्युक्त पाँचों कहानियाँ ‘प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य’ में प्रकाशित कराई थीं तब तो उन्होंने इसका कोई संकेत नहीं दिया था कि इनका पाठ उन्हें कहाँ से प्राप्त हुआ, लेकिन उन्होंने 2005 में ‘प्रेमचंद की अप्राप्य कहानियाँ’ की भूमिका में लिखा -

"मेरे पिता सेठ चन्द्रभान गोयनका की बुलन्दशहर स्थित लाइब्रेरी में मुझे ‘अदीब’, ‘माधुरी’ तथा ‘जमाना’ के अंक मिले..."1

डा. गोयनका का उपर्युक्त दावा सन्देहास्पद प्रतीत होता है क्योंकि ‘सोलह अप्राप्य कहानियाँ’ और ‘प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य’ प्रकाशित होने से पूर्व ही ये कहानियाँ ‘खुदाबख्श लाइब्रेरी जर्नल’ में प्रकाशित हो चुकी थीं। यही नहीं, प्रेमचंद की उर्दू कहानियों के देवनागरी लिप्यन्तरण का भी डा. गोयनका का दावा सन्देहास्पद प्रतीत होता है, क्योंकि इस बात के पुष्ट प्रमाण प्राप्त होते हैं कि डा. गोयनका उर्दू भाषा तथा लिपि से अपरिचित हैं। दूसरे यह कि यदि उन्हें उर्दू आती है तो वे ‘खुदाबख्श लाइब्रेरी जर्नल’ में पुनः प्रकाशित हो चुके प्रेमचंद के लेख ‘उर्दू जबान और नावल’ को देवनागरी में लिप्यन्तरित करके ‘प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य’ में क्यों सम्मिलित नहीं कर सके!

1.  प्रेमचंद की अप्राप्य कहानियाँ,

उपर्युक्त विवरण के आधार पर यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि ‘खुदाबख्श लाइब्रेरी जर्नल’ में प्रकाशित प्रेमचंद की उपर्युक्त रचनाओं की खोज का श्रेय जर्नल के सम्पादक मण्डल के तत्कालीन अध्यक्ष काजी अब्दुल वदूद और लाइब्रेरी के तत्कालीन निदेशक डा. आबिद रजा बेदार को ही है।

बाबा-ए-उर्दू मौलवी अब्दुल हक ने अंजुमन तरक्की उर्दू, औरंगाबाद की ओर से 1930 में ‘नैरंगे अदब’ शीर्षक एक संकलन स्कूली पाठ्यक्रम हेतु प्रकाशित कराया था। इस संकलन हेतु उन्होंने आग्रह करके प्रेमचंद से भी एक लेख लिखवाया था, जो ‘बनारस’ शीर्षक से इसमें सम्मिलित होकर प्रकाशित हुआ था। प्रेमचंद के इस सर्वथा अज्ञात लेख को प्रकाश में लाने का श्रेय डा. शम्स बदायुँनी को है, जिन्होंने इसका पाठ बदायूँ के श्री वीरेन्द्र प्रसाद सक्सेना से प्राप्त करके बदायूँ से प्रकाशित उर्दू त्रैमासिक ‘रोशन’ के जनवरी-मार्च 1984 के अंक में प्रकाशित करा दिया था। ध्यातव्य है कि मदन गोपाल ने इस लेख को ‘कुल्लियाते प्रेमचंद’ में ही सम्मिलित नहीं किया वरन् ‘आजकल’ उर्दू और हिन्दी में भी प्रकाशित करा दिया।

1980 में प्रेमचंद की जन्म शताब्दी समूचे देश में धूमधाम के साथ मनाई गई। इस धूमधड़ाके में अनेकानेक समारोहों में लच्छेदार भाषण देते घूमते तथाकथित ‘प्रेमचंद-विशेषज्ञों’ के अनुत्तरदायित्वपूर्ण व्यवहार के मध्य इस देशव्यापी समारोह की सर्वाधिक उल्लेखनीय उपलब्धि मुम्बई के उर्दू कथाकार गोपाल कृष्ण माणकटाला का प्रेमचंद साहित्य पर शोध के मैदान में प्रविष्ट होना था। इस दिशा में माणकटाला के शोध के परिणाम शीघ्र ही साहित्य-संसार के समक्ष प्रकट होने लगे और उन्होंने अत्यन्त अध्यवसाय के साथ प्रेमचंद की कतिपय अज्ञात रचनाएँ खोजकर प्रकाशित कराने में सफलता प्राप्त की। गोपाल कृष्ण माणकटाला ने प्रेमचंद की जो अज्ञात रचनाएँ तलाश करके प्रकाशित कराईं, उनका विवरण निम्नांकित है -

1. रूहे हयात, कहानी (‘जमाना’, जनवरी 1921; ‘हमारी जबान’, उर्दू साप्ताहिक, नई दिल्ली, 8 मई 1984), 2. जान आफ आर्क, लेख (‘जमाना’, जुलाई 1909; ‘हमारी जबान’, 22 जुलाई 1984), 3. काउंट टाल्सटाय और फने लतीफ, लेख (‘जमाना’, जून 1920; ‘हमारी जबान’, 8 सितम्बर 1984), 4. बिहारी सतसई, पुस्तक समीक्षा (‘जमाना’, फरवरी 1920; ‘प्रेमचंद और तसानीफ प्रेमचंद : कुछ नये तहकीकी गोशे’ पुस्तक में संकलित, 1985), 5. चकबस्त के नाटक ‘कमला’ की भूमिका (‘जमाना’, नवम्बर 1915; ‘प्रेमचंद : कुछ नये मुबाहिस’ पुस्तक में संकलित, 1988), 6. मलकाना राजपूत मुसलमानों की शुद्धि, लेख (‘जमाना’ मई 1923; ‘प्रेमचंद : कुछ नये मुबाहिस’ पुस्तक में संकलित, 1988) 7. प्यारे लाल शाकिर की पुस्तक ‘अक्सीरे सुखन’ का मुकद्दमा (1913; ‘प्रेमचंद : कुछ नये मुबाहिस’ पुस्तक में संकलित, 1988), 8. हाथी दाँत, लेख (‘उर्दू-ए-मुअल्ला’, अक्टूबर 1904; ‘प्रेमचंद : कुछ नये मुबाहिस’ पुस्तक में संकलित, 1988), और 9. हिन्दुस्तानी रेलों की साठ साला तारीख, लेख (‘जमाना’, जनवरी 1915; ‘प्रेमचंद : कुछ नये मुबाहिस’ पुस्तक में संकलित, 1988)।

उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि प्रेमचंद की अज्ञात तथा असन्दर्भित रचनाओं को खोजकर प्रकाशित-संकलित करने की दिशा में गोपाल कृष्ण माणकटाला का कार्य भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।

1985 से 1988 के मध्य डा. वीर भारत तलवार ने भी प्रेमचंद की कुछ अप्राप्य रचनाएँ खोजकर प्रकाशित कराने में सफलता प्राप्त की। डा. तलवार द्वारा पुनः प्रकाशित कराई गई इन रचनाओं को डा. कमल किशोर गोयनका ने उनका कोई सन्दर्भ दिए बिना ही ‘प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य’ में सम्मिलित कर लिया था। डा. तलवार के इस महनीय प्रयास का विस्तृत विवरण तो सम्प्रति उपलब्ध नहीं है, लेकिन उन्होंने शिमला से इन पंक्तियों के लेखक के नाम लिखे अपने 3 मार्च 2009 के पत्र द्वारा जो विवरण अपनी स्मृति के सहारे उपलब्ध कराया है, वह निम्नांकित है -

"प्रेमचंद की जिन रचनाओं को मैंने खोजा और छपवाया, उनके शीर्षक मुझे याद हैं। उन पत्रिकाओं के नाम भी याद हैं जहाँ छपीं। लेकिन अंक संख्या और वर्ष याद नहीं हैं।

1. प्रतिज्ञा (कहानी, मूल हिन्दी) - ‘जनसत्ता’ में 1986-87 के करीब

2. मलकाना राजपूत मुसलमानों की शुद्धि - ‘हंस’, 1985-87 के बीच

3. स्वराज्य की पोषक और विरोधक व्यवस्था - ‘आलोचना’, 1985-87 के

बीच

4. अन्ना कारेनीना की भूमिका - ‘वर्तमान साहित्य’, 1985-87 के बीच

(छविनाथ पांडेय द्वारा अनूदित उपन्यास)

‘मलकाना राजपूत मुसलमानों की शुद्धि’ लेख उर्दू में था और मूल रूप से ‘जमाना’ में 1924-25 में छपा था। इसका देवनागरी में लिप्यन्तरण और हिन्दी अनुवाद मैंने ही किया था। प्रेमचंद की रचनाओं को खोजकर एक बार छपवा देने से उन पर सबका समान अधिकार हो जाता है। उपरोक्त सभी रचनाएँ बाद में कमल किशोर गोयनका द्वारा सम्पादित ‘प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य’ (ज्ञानपीठ) में शामिल कर ली गई हैं।"

1988 में भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली से डा. कमल किशोर गोयनका के सम्पादन में दो भारी भरकम खण्डों में ‘प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य’ शीर्षक संकलन प्रकाशित हुआ। साहित्यिक क्षेत्र में इस संकलन का अभूतपूर्व स्वागत हुआ जिसमें 1159 पृष्ठों में प्रेमचंद की नानाविध सामग्री प्रकाशित हुई। इसमें सम्मिलित रचनाओं के सम्बन्ध में इस संकलन के सम्पादक डा. गोयनका ने यह दावा किया कि इसमें प्रेमचंद की ‘अप्राप्य’ रचनाएँ ही प्रकाशित की गई हैं, लेकिन वास्तविकता इसके प्रतिकूल है। जहाँ एक ओर इसमें प्रेमचंद द्वारा अनूदित नाटक ‘सृष्टि का आरम्भ’, उनका अन्तिम अपूर्ण उपन्यास ‘मंगलसूत्र’ तथा श्रीपतराय के सम्पादन में प्रकाशित ‘सोलह अप्राप्य कहानियाँ’ में सम्मिलित सभी 16 कहानियाँ ‘अप्राप्य’ बताकर सम्मिलित कर दी गईं, वहीं प्रेमचंद के पत्रों, सम्पादकीय आलेखों आदि में भी स्थान-स्थान पर ऐसी रचनाएँ सम्मिलित हैं जो इससे पूर्व प्रकाशित संकलनों में उपलब्ध हैं। इसमें तो सन्देह नहीं कि इस संकलन में कुछ ऐसी सामग्री भी सम्मिलित है जो पहली बार संकलित करके प्रकाशित की गई है, लेकिन पुनरावृत्ति करके संकलन का आकार बढ़ा देना और भ्रामक वातावरण की सृष्टि करना कुछ बुद्धिगम्य नहीं है। भले ही यह संकलन 1100 पृष्ठों के स्थान पर 100 पृष्ठों का ही होता, लेकिन इसमें वास्तविक रूप से वे रचनाएँ ही सम्मिलित होतीं जिनसे प्रेमचंद-साहित्य में नवीन अभिवृद्धि होती तो इसका महत्त्व निश्चित रूप से अधिक होता। कहा भी गया है - क्षणं प्रज्ज्वलितं श्रेयो न च धूमायितं चिरम्।

‘प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य’ द्वारा व्याप्त भ्रम का प्रभाव ‘कुल्लियाते प्रेमचंद’ तथा ‘प्रेमचंद रचनावली’ जैसे सार्वकालिक महत्त्व के प्रकाशनों पर तो दृष्टिगोचर होता ही है, स्वयं इसके सम्पादक डा. कमल किशोर गोयनका भी अपने द्वारा निर्मित भ्रमजाल से बच नहीं सके और उसका प्रभाव डा. गोयनका के सम्पादन में प्रकाशित ‘प्रेमचंद पत्र कोश’ (2007) पर भी दिखाई देता है। ‘प्रेमचंद-विशेषज्ञ’ के रूप में प्रचारित डा. गोयनका के इस प्रकार के अनुत्तरदायित्वपूर्ण व्यवहार को असावधानी, प्रमाद, सुविधाभोगी शोध और स्पष्ट दृष्टि का अभाव के अतिरिक्त और क्या कहा जा सकता है?

जिस भाँति ‘प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य’ का साहित्यिक क्षेत्र में प्रचार-प्रसार किया गया, उससे प्रेमचंद की अन्य लुप्त रचनाएँ सामने आने की सम्भावना क्षीण हो चली थी। यह तो सत्य है कि इस संकलन के पश्चात् प्रेमचंद की लुप्त तथा विस्मृत रचनाएँ खोजकर संकलित कर देने का कोई संगठित प्रयास दृष्टिपथ में नहीं आता, लेकिन समय-समय पर विभिन्न हिन्दी-उर्दू पत्र-पत्रिकाओं में प्रेमचंद की लुप्त रचनाएँ प्रकाशित होते रहने से यह धारणा टूटती प्रतीत होती है। आगामी पंक्तियों में सम्प्रति संज्ञान में आए ऐसे छिटपुट प्रयासों का संक्षेपतः उल्लेख प्रस्तुत है।

बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में उर्दू के विभागाध्यक्ष डा. हुकमचंद नैयर ने प्रेमचंद की एक अज्ञात कहानी ‘दाराशिकोह का दरबार’ उर्दू मासिक ‘आजाद’, लाहौर के सितम्बर 1908 के अंक से खोजकर कोलकाता के उर्दू मासिक ‘इंशा’ के जनवरी 1995 के अंक में प्रकाशित कराई, जिसे गोपाल कृष्ण माणकटाला ने विस्तृत शोध टिप्पणी से संवलित करके अपनी पुस्तक ‘प्रेमचंद का सेक्यूलर किरदार और दीगर मजामीन’ (2001) में संकलित कर दिया।

भारत यायावर ने कानपुर के ‘प्रताप’ की फाइलों में से खोजकर उसके दिसम्बर 1925 के किसी अंक में प्रकाशित नितान्त असन्दर्भित लेख ‘इस्लामी सभ्यता’, ‘इंडिया टुडे’ के अक्टूबर 1995 के अंक में प्रकाशित कराया। इस लेख को अनीस आजमी ने उर्दू में अनुवाद करके ‘इस्लामी तहजीब’ शीर्षक से ‘ऐवाने उर्दू’ के किसी अंक में प्रकाशित कराया, जहाँ से लेकर गोपाल कृष्ण माणकटाला ने इस उर्दू अनुवाद को अपनी पुस्तक ‘प्रेमचंद का सेक्यूलर किरदार और दीगर मजामीन’ में सम्मिलित कर लिया।

मदन गोपाल के सम्पादन में 2000 से 2005 के मध्य 24 भारी भरकम भागों में कौमी कौंसिल बराए फरोगे उर्दू जबान, नई दिल्ली द्वारा उर्दू में प्रकाशित ‘कुल्लियाते प्रेमचंद’ भले ही नाना प्रकार की गलतियों का पुलिन्दा ही क्यों न हो, भले ही ‘प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य’ में संकलित करके प्रकाशित की गई प्रेमचंद की अनेक पुस्तक-समीक्षाओं में से एक भी इसमें सम्मिलित न की जा सकी हो, लेकिन इसके पृष्ठों में प्रेमचंद की कुछ ऐसी रचनाएँ भी सम्मिलित होकर प्रकाशित हुईं, जो न तो किसी अन्य उर्दू-हिन्दी संकलन में सम्मिलित हैं, न इसके उपरान्त 20 भागों में हिन्दी में जनवाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली द्वारा 2006 में प्रकाशित ‘प्रेमचंद रचनावली’ के द्वितीय संस्करण में ही सम्मिलित की जा सकीं।

प्रेमचंद का एक लेख ‘राज्यवाद और साम्राज्यवाद’ गोरखपुर से प्रकाशित ‘स्वदेश’ के 18 मार्च 1928 के अंक में प्रकाशित हुआ था जिसे खोजकर डा. कमल किशोर गोयनका ने साप्ताहिक ‘पाञ्चजन्य’ के 10 अगस्त 2008 के अंक में प्रकाशित कराकर प्रेमचंद साहित्य में सम्मिलित किया।

जैसा कि उल्लेख किया जा चुका है, प्रेमचंद की केवल हिन्दी में लिखी रचनाओं का उर्दू अनुवाद कर प्रकाशित कराने की दिशा में अभी तक पर्याप्त कार्य नहीं हो पाया है। सौभाग्य की बात है कि बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में फारसी साहित्य के रीडर एवं विभागाध्यक्ष डा. सैयद हसन अब्बास का ध्यान इस दिशा में गया है जिन्होंने हाल ही में प्रेमचंद की पुस्तक ‘शेख सादी’ का उर्दू अनुवाद करना प्रारम्भ कर दिया है जो शीघ्र ही प्रकाशित होकर साहित्य-संसार के हाथों में होगा। आशा की जानी चाहिए कि डा. अब्बास इस दिशा में अध्यवसाय तथा मनोयोग के साथ कार्य करके प्रेमचंद की केवल हिन्दी में लिखी सभी रचनाओं के उर्दू अनुवाद उर्दू-जगत् को उपलब्ध कराने में सफल हो सकेंगे।

यहाँ यह उल्लेख करना कुछ असंगत न होगा कि इस सम्भावना को भी सिरे से नहीं नकारा जा सकता कि उपर्युक्त रचनाओं के अतिरिक्त भी प्रेमचंद की कोई अन्य अज्ञात रचना किसी हिन्दी-उर्दू पत्र-पत्रिका में प्रकाशित हुई हो, लेकिन हमारे संज्ञान में न आ सकी हो।

उपर्युक्त समस्त विवरण से स्पष्ट है कि प्रेमचंद की अज्ञात-अप्राप्त-असन्दर्भित- असंकलित रचनाओं की खोज का कार्य सुव्यवस्थित रूप में उनके देहावसान के अनन्तर ही प्रारम्भ हो गया था, जो आज तक अबाध गति से चला आता है। साथ ही यह भी स्पष्ट है कि इस दिशा में जितना कार्य अमृतराय कर सके, उसके समक्ष अन्य विद्वानों का कार्य नगण्य ही है, भले ही 1962 के पश्चात् 14 अगस्त 1996 को देहावसान होने तक अमृतराय इस दिशा में कुछ कार्य करते दिखाई नहीं देते।

डा. कमल किशोर गोयनका के सम्पादन में प्रकाशित बहुप्रचारित संकलन ‘प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य’ के प्रकाशन के उपरान्त भी प्रेमचंद की अज्ञात-असन्दर्भित रचनाएँ प्रकाश में आने का अनवरत सिलसिला ही वह सूत्र था जिसने मुझे लगभग 17-18 वर्ष पूर्व भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली के तत्कालीन प्रबन्ध न्यासी साहू रमेशचंदजी जैन की आज्ञापालन हेतु प्रेमचंद का प्रामाणिक सन्दर्भ ग्रन्थ तैयार करते- करते उनकी अज्ञात-असंकलित रचनाओं की तलाश में समर्पित भाव से प्रवृत्त कर दिया और यह सुखद संयोग है कि इस दिशा में मुझे आशातीत सफलता प्राप्त हुई। मैं अब तक प्रेमचंद की जो अज्ञात-अप्राप्त-असन्दर्भित रचनाएँ खोजकर प्रेमचंद साहित्य में सम्मिलित कराने में सफल हो सका, उनका संक्षिप्त विवरण निम्नांकित है-

1. हिन्दी साहित्य सम्मेलन, दिल्ली में दिया गया भाषण (‘कादम्बिनी’, जुलाई 2006; ‘हम बिना तैयारी के लेखक बनना चाहते हैं’ शीर्षक से प्रकाशित), 2. पद्म सिंह शर्मा के साथ तीन दिन (‘उत्तर प्रदेश’, जुलाई 2006), 3. आबशारे न्याग्रा (‘आजकल’, अक्टूबर 2006), 4. दो अंग्रेजी फिलासफर (‘आजकल’, अक्टूबर 2006), 5. कलामे सुरूर (‘आजकल’, अक्टूबर 2006), 6. स्विट्जरलैण्ड (‘आजकल’, अक्टूबर 2006), 7. महरी (‘आजकल’, अक्टूबर 2006), 8. अश्के नदामत (‘आजकल’; ‘नया दौर’, अक्टूबर 2006), 9. इश्तिहारी शहीद (‘नया दौर’, जुलाई-अगस्त 2007), 10. इत्तिफाक ताकत है, 11. शहीदे आजम (‘उर्दू दुनिया’, अक्टूबर 2008), 12. सौदा-ए-खाम (‘उर्दू दुनिया’, जुलाई 2008), 13. जंजाल, 14. अहदे अकबर में हिन्दुस्तान की हालत, 15. अहमद अली तथा सज्जाद जहीर के नाम लिखे प्रेमचंद के पत्र।

इनके अतिरिक्त मैं प्रेमचंद की दो अप्राप्त पुस्तकों - 1. ‘निजात’ (कहानी- संकलन), एवं 2. ‘बाकमालों के दर्शन’ (द्वितीय संस्करण) की खोज करके इनका प्रामाणिक विवरण भी प्रस्तुत कर चुका हूँ और प्रेमचंद के समस्त छद्म नामों का भी सप्रमाण निर्धारण कर चुका हूँ।

प्रेमचंद साहित्य के सम्बन्ध में यह दुःखद सत्य है कि अनेक ऐसी रचनाओं को भी इसमें सम्मिलित करके प्रकाशित किया जा रहा है, जिनके लेखक अन्य विद्वान् हैं। मैं अब तक ऐसी जिन रचनाओं को प्रेमचंद साहित्य से निकाल बाहर करने के लिए सप्रमाण चिह्नित कर चुका हूँ, उनका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है -

1. अकबरे आजम (मूल लेखक मौलवी मौ. अजीज मिर्जा), 2. मौलाना वहीदुद्दीन सलीम (मूल लेखक सैयद अब्दुल वदूद दर्द बरेलवी), 3. अब्दुल हलीम शरर (मूल लेखक ख्वाजा अब्दुल रऊफ इशरत लखनवी), 4. इन्साफ (मूल अनुवादक बाबू हरप्रसाद सक्सैना), 5. कलामे अकबर पर एक नजर (मूल लेखक अज्ञात), 6. फिरकेवाराना कशीदगी (जो सन्दर्भ उपलब्ध है, वहाँ रचना उपलब्ध नहीं है, न ही कहीं दृष्टि में आती है), 7. सुरूर और शाकिर (मूल लेखक मुंशी नौबतराय नजर), 8. मुबाहिसा : मौजूदा जौक ही सही (मूल लेखक खान बहादर मिर्जा जाफर अली खान), 9. शुद्धि एक जवाब (मूल लेखक श्रीराम शर्मा), 10. प्रेम प्रभाकर (मूल अनुवादक आत्माराम)।

यहाँ यह उल्लेख भी करना चाहूँगा कि तटस्थ एवं निर्लिप्त भाव से सत्यान्वेषण करना ही साहित्यिक शोध है, जिसमें व्यक्तिगत मान्यताओं, विचारों और भावनाओं का कोई स्थान नहीं होता। इसी मार्ग का अनुसरण करते हुए मैंने समस्त पूर्वाग्रहों से पृथक् रहकर अपने शोध के परिणाम साहित्य-संसार के हाथों सौंपे हैं और यदि इनसे किसी भी विद्वान् को लेशमात्र भी कष्ट हुआ है तो मैं उसके लिए क्षमाप्रार्थी हूँ।

मुंशी प्रेमचंद के देहावसान के उपरान्त उनकी रचनाओं की चिन्ता तो उनके उत्तराधिकारियों को हुई, लेकिन साहित्य-संसार उनका भौतिक स्मारक बनाने की दिशा में सक्रिय होता दिखाई दिया। यह प्रसन्नता की बात है कि प्रेमचंद के छोटे भाई महताबराय ने अपना वह पैतृक भवन जिसमें प्रेमचंद का जन्म हुआ था, प्रेमचंद-स्मारक बनाने के विशिष्ट उद्देश्य के लिए नागरी प्रचारिणी सभा, काशी को दान कर दिया। सभा ने इस हेतु चन्दा भी वसूला लेकिन स्मारक नहीं बनना था सो नहीं बना और सभा ने दान में प्राप्त किया हुआ भूखण्ड उत्तर प्रदेश सरकार को विधिविरुद्ध दान करके इस कार्य से अपना पीछा छुड़ा लिया। प्रेमचंद-स्मारक की संक्षिप्त व्यथा-कथा परिशिष्ट-2 में प्रस्तुत है, जिससे यह अनुमान लगा पाना सम्भव है कि देश के सर्वश्रेष्ठ, सर्वमान्य एवं सर्वाधिक लोकप्रिय रचनाकार की स्मृतियों को सुरक्षित रखने के नाम पर कैसा घृणित मजाक किया गया और किया जा रहा है।

किसी भी रचनाकार की जीवन-शैली के सम्बन्ध में डा. कमल किशोर गोयनका लिखते हैं -

"साहित्य तथा साहित्यकार का संसार कोई व्यवस्थित, संगठित तथा कौशलपूर्ण करीने से सजाई-बैठाई वस्तुओं का संसार नहीं है। प्रायः साहित्यकार कौशलपूर्ण यान्त्रिक जीवन जीने का अभ्यस्त नहीं होता और न उसे ऐसा जीवन रुचिकर ही लगता है। वह रचना के अतिरिक्त अन्य मानवीय संसार में अव्यवस्था, लापरवाही तथा स्वाभाविक रूप में रहना और जीना पसन्द करता है। यही कारण है कि वह रचना के समय जितना अनुशासित, सन्तुलित तथा व्यवस्थित होता है, जीवन में वह उतना ही लापरवाह तथा अव्यवस्थित रहता है। उसकी यह जीवन-शैली उसके समग्र बाह्य जीवन पर छायी रहती है। वह रचना के पूर्ण होने के बाद उन्हें प्रकाशनार्थ पत्र- पत्रिकाओं में भेजता है और उनके छपने पर उन्हें संकलित करके भी प्रकाशित कराने का प्रयत्न करता है; परन्तु प्रायः ऐसा होता है कि अनेक रचनाएँ इन संकलनों में आने से रह जाती हैं। इसके मूल में साहित्यकार का अपना व्यक्तित्व तथा रुचि-अभिरुचि दोनों ही क्रियाशील रहती हैं। ऐसा प्रायः प्रत्येक साहित्यकार से होता है कि रचना पूर्ण होने के बाद प्रकाशन के अनुपयुक्त लगी हो, प्रकाशन के बाद इधर-उधर खो गयी हो अथवा उसका अस्तित्व ही विस्मृत हो गया हो। कई बार ऐसा भी होता है कि रचना के प्रकाशित होने के बाद रचनाकार उसे डिस्ऑन कर दे और संकलन में देना उपयुक्त न समझे और कभी-कभी ऐसा भी हो सकता है कि प्रकाशित रचना की कलात्मकता से स्वयं रचनाकार ही सन्तुष्ट न हो और एक बार प्रकाशित करने के बाद, अपनी साहित्यिक उपलब्धियों को देखते हुए वह उस रचना को सदा-सदा के लिए पाठकों की दृष्टि से गायब कर देना चाहता हो। किसी भी साहित्यकार की प्रकाशित-अप्रकाशित रचनाओं के भावी पाठकों की दृष्टि से ओझल या गायब होने के मूल में ऐसे ही अनेक कारण हो सकते हैं।"1

डा. गोयनका का उपर्युक्त कथन तो वास्तविकता पर आधारित है, लेकिन वे इसके अतिरिक्त यह भी लिखते हैं -

1.  प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य, भाग-1,

"प्रेमचंद के साहित्य के साथ यह एक दुःखद सत्य है कि उनका सम्पूर्ण साहित्य अभी तक हमारे सामने नहीं है। वे अपने 34-35 वर्ष के लेखन-काल में निरन्तर और नियमित रूप से लिखते रहे। आरम्भ में उन्होंने उर्दू में लिखा और लगभग 1914 से हिन्दी में नियमित लिखना आरम्भ कर दिया। उन्होंने अपनी हिन्दी-उर्दू रचनाओं को भी परस्पर अनुवाद या रूपान्तर करके प्रकाशित कराया लेकिन अनेक बार ऐसा भी हुआ कि रचनाएँ एक भाषा में प्रकाशित होकर दूसरी भाषा में कभी पहुँच नहीं पायीं। ऐसी स्थिति में प्रेमचंद जैसे साहित्यकार के साथ जिसने प्रचुर मात्रा में साहित्य लिखा हो तथा जो दो-दो भाषाओं में लिखने तथा रचनाओं का आदान-प्रदान करता रहा हो, यह अस्वाभाविक नहीं लगता कि उनकी रचनाएँ काल-प्रवाह के साथ अदृश्य होती चली जायें। प्रेमचंद के जीवन-संघर्ष, जीविका के लिए बार-बार स्थानों के परिवर्तन, प्रचुर लेखन, सुविधाओं की कमी, आभिजात्य संस्कारों के अभाव आदि के कारण उनकी रचनाएँ या तो लुप्त हो गयीं अथवा संकलनों में आने से रह गयीं अथवा संकलन के समय अनुपलब्ध होने के कारण सदैव के लिए संकलित होने से रह गयीं। यह कहना आज बहुत कठिन है कि प्रेमचंद ने कलाहीनता अथवा अपरिपक्व विचारों के कारण इन अप्राप्य रचनाओं को संकलित न किया हो।"1

यद्यपि डा. गोयनका का यह कथन वास्तविकता से कहीं दूर दिखाई देता है, तथापि यहाँ तक होता तो भी गनीमत थी। इससे भी आगे बढ़कर डा. गोयनका ने प्रेमचंद के देहावसान के बाद के 72 बरसों में भी उनकी रचनाओं को समग्रता में संकलित करने के गुरुतर दायित्व से स्वयं को, अपने-जैसे शोधकर्ताओं को और समूचे साहित्य-संसार को अलग-थलग रखते हुए मात्र यह कहकर पल्ला झाड़ लिया -

"साहित्यकार अपनी कमजोर रचनाएँ प्रकाशित नहीं कराता और यदि करा लेता है तो उन्हें संकलित न करके उन्हें अकाल मृत्यु का शिकार बना देता है। अनेक बार साहित्यकार अपनी रचनाओं का बड़ा कठोर आलोचक होता है और वह अपनी दुर्बल रचनाओं को छाँट-फटक कर फेंक देता है, परन्तु यहाँ एक विचारणीय प्रश्न है कि यदि साहित्यकार का श्रेष्ठ ही पाठक के सम्मुख आता है तो वह रचनाकार की वास्तविक रचनाधर्मिता तथा उसकी विकास-यात्रा को वैज्ञानिक दृष्टि से समझ तथा उसका विश्लेषण नहीं कर पायेगा। अतः रचना के पूर्ण होते ही उस पर से रचनाकार का एकाधिकार समाप्त हो जाता है और वह पाठक की वस्तु बन जाती है। इसलिए किसी भी साहित्यकार को यह अधिकार नहीं होना चाहिए कि वह अपनी जिन रचनाओं को लिखने अथवा प्रकाशन के बाद दुर्बल समझता है, उन्हें वह वापस ले ले या उन्हें भावी पाठकों की दृष्टि से लुप्त कर दे। वास्तव में इसकी भी कोई गारन्टी नहीं है कि रचनाकार जिन्हें कला शून्य अथवा दुर्बल रचना समझ रहा है, वे पाठक की दृष्टि में वास्तव में वैसी ही हों, अथवा भावी पाठकों के लिए उनकी कोई अर्थवत्ता एवं सार्थकता न हो।"2

डा. कमल किशोर गोयनका के उपर्युक्त शब्दों से ऐसा प्रतीत होता है मानो अपनी रचनाओं को साहित्य-संसार के समक्ष समग्रता से प्रस्तुत करने का दायित्व प्रेमचंद का ही था और अपनी अनेक रचनाओं को ‘कमजोर’ अथवा ‘दुर्बल’ समझकर उन्हें विस्मृति के अंधकूप में डालकर ‘वापस लेने’ अथवा ‘भावी पाठकों की दृष्टि से लुप्त’ कर देने का जघन्य पाप भी प्रेमचंद ने ही किया है। और यदि डा. गोयनका के अनुसार यह दुष्कृत्य स्वयं प्रेमचंद का ही किया हुआ है तो उन्हें अपनी पुस्तकों के नामकरण भी इस प्रकार करने उचित होते - ‘प्रेमचंद का परित्यक्त साहित्य’ एवं ‘प्रेमचंद की परित्यक्त कहानियाँ’। यह उल्लेख करते समय तिथिक्रम से प्रेमचंद की जीवनी लिखकर डी.लिट्. की उपाधि प्राप्त करने वाले डा. गोयनका प्रेमचंद के अस्त- व्यस्त जीवन, आर्थिक कष्टों से छुटकारा पाने की छटपटाहट, समाज के शोषित-वंचित वर्ग की व्यथा-कथा कहने की आकुलता के साथ-साथ अपना अस्तित्व बचाए रखने के उनके समूचे संघर्ष को भी विस्मृत कर जाते हैं। यह कुछ बुद्धिगम्य नहीं है कि जो रचनाकार अपनी रचना किसी भी पत्र-पत्रिका में प्रकाशित करा देता है वह उसे ‘वापस’ कैसे ले सकता है अथवा कैसे ‘भावी पाठकों की दृष्टि से लुप्त’ कर सकता है? और जब कोई भी साहित्यकार ऐसा नहीं कर सकता तो डा. गोयनका साहित्यकारों से कौन सा अधिकार छीनने की बात करते हैं?

1. प्रेमचंद की अप्राप्य कहानियाँ, 

2. प्रेमचंद की अप्राप्य कहानियाँ, 

मुख्य प्रश्न यह है कि किसी भी साहित्यकार की रचनाओं को उसके देहावसान के उपरान्त समग्रता के साथ साहित्य-संसार के समक्ष प्रस्तुत करने का दायित्व किसका है? वास्तव में यह दायित्व साहित्य-जगत् का है, साहित्य अन्वेषकों का है, शोधकर्ताओं का है, और प्रेमचंद के विशेष सन्दर्भ में ‘प्रेमचंद-विशेषज्ञों’ का है। अपनी गलती को प्रेमचंद के मत्थे मँढ़कर डा. गोयनका ही नहीं, प्रेमचंद साहित्य का कोई भी अन्वेषक अपने दायित्व से बचने में सफल नहीं हो सकता।

प्रेमचंद की रचनाओं के साथ-साथ उनकी पाण्डुलिपियाँ भी कितनी महत्त्वपूर्ण हैं, यह डा. कमल किशोर गोयनका के निम्नांकित कथन से स्पष्ट है -

"प्रेमचंद की उपलब्ध हिन्दी-उर्दू पाण्डुलिपियों का अध्ययन होना चाहिए। कहानी अथवा उपन्यास की पाण्डुलिपि के अध्ययन से प्रेमचंद की सृजन-प्रक्रिया के अनेक रहस्यमय एवं अज्ञात तथ्य उद्घाटित हो सकेंगे। ‘गोदान’ की पाण्डुलिपि के लगभग 800 पृष्ठों के दो ड्राफ्ट मेरे पास हैं जो सृजन-प्रक्रिया के अनेक अज्ञात तथ्यों को पहली बार उद्घाटित करते हैं। इस पाण्डुलिपि से ज्ञात होता है कि प्रथम ड्राफ्ट और दूसरे ड्राफ्ट की कथा में बड़ा अन्तर है तथा प्रेमचंद ने दूसरे ड्राफ्ट में अनेक प्रसंगों को बदल दिया है। इसी पाण्डुलिपि में अंग्रेजी में लिखी एक रूपरेखा है जिसमें होरी की पत्नी का नाम झिंकी है तथा होरी की मृत्यु पर गोबर अपने हाथ से गोदान करता है। अतः प्रेमचंद की मूल पाण्डुलिपियों का संग्रह करके उनका वैज्ञानिक अध्ययन किया जाना चाहिए। वास्तव में, तभी हम उनके सृजन-संसार की एक झलक प्राप्त कर सकते हैं।"1

यह तो कुछ स्पष्ट नहीं होता कि ‘गोदान’ की दो पाण्डुलिपियों के लगभग 800 पृष्ठों के दो ड्राफ्ट डा. कमल किशोर गोयनका के अधिकार में कैसे पहुँच गए, परन्तु प्रेमचंद की ढेरों उर्दू पाण्डुलिपियाँ किस प्रकार अनजाने में नष्ट हो गईं, यह प्रेमचंद के छोटे भाई महताबराय के सुपुत्र कृष्ण कुमार राय के लेख से ज्ञात हो जायगा जिसका अविकल पाठ परिशिष्ट-4 में प्रस्तुत है। किस प्रकार प्रेमचंद की पाण्डुलिपियाँ उधार माँगी जाकर जीम ली गईं, यह काशी के श्रीरामरत्न पुस्तक भवन के संस्थापक कीर्तिशेष मुरारी लाल केडिया के पहली बार प्रकाशित हो रहे पत्रों से स्पष्ट हो जाएगा जिनका मूल पाठ परिशिष्ट-5 में प्रस्तुत है। और, किस प्रकार शोध के नाम पर उधार माँगी गई प्रेमचंद की अनेक महत्त्वपूर्ण पाण्डुलिपियाँ भावी शोधकर्ताओं की पहुँच से बाहर कर दी गईं, यह श्री रामरत्न पुस्तक भवन, बनारस के संस्थापक कीर्तिशेष मुरारी लाल केडिया के सुपुत्र गगनेन्द्र कुमार केडिया के लेख से स्पष्ट हो जायगा जिसका अविकल पाठ परिशिष्ट-6 में प्रस्तुत है।

1. प्रेमचंद : एक पुनर्मूल्यांकन; प्रेमचंद : सृजन एवं चिन्तन,

मुंशी प्रेमचंद जैसे देश के सर्वश्रेष्ठ तथा सर्वमान्य रचनाकार की पाण्डुलिपियों को व्यक्तिगत सम्पत्ति बनाना भावी शोध का गला घोटना और भावी शोधकर्ताओं की राह में मात्र काँटे ही नहीं वरन् भाले भी बो देना है। आश्चर्य तब होता है जब ‘राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन’ जैसी राष्ट्रीय संस्था अपना कर्तव्य भूलकर प्रेमचंद जैसे विश्वविश्रुत रचनाकार की पाण्डुलिपियों के उद्धार का कोई भी प्रयास करती दिखाई नहीं देती। क्या साहित्य-संसार और राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन देश के शीर्षस्थ रचनाकार के व्यक्तित्व-कृतित्व के सम्बन्ध में भावी शोध के द्वार पर जड़ दी गई मेखें निकालने का कुछ प्रयास कर सकेगा?

प्रेमचंद साहित्य पर महत्त्वपूर्ण कार्य करके ‘प्रेमचंद-विशेषज्ञ’ के विरुद से सम्मानित पाँच विद्वानों का उल्लेख गोपाल कृष्ण माणकटाला करते हैं, लेकिन उन्होंने इन विद्वानों में मुंशी दयानारायण निगम और अमृतराय का नामोल्लेख नहीं किया है। मेरी दृष्टि में ये दोनों विद्वान् ‘प्रेमचंद-विशेषज्ञ’ के विरुद के वास्तविक अधिकारी हैं, जो इन सहित सभी विद्वानों के अग्रांकित संक्षिप्त कार्यवृत्त से स्पष्ट हो जायगा।

1. मुंशी दयानारायण निगम

सन् 1882 में कानपुर में जन्मे मुंशी दयानारायण निगम उर्दू मासिक ‘जमाना’ के यशस्वी सम्पादक थे। प्रेमचंद को प्रेमचंद बनाने में सर्वाधिक योगदान निगम साहब का ही है जो इस तथ्य से भली प्रकार समझा जा सकता है कि ‘जमाना’ ही वह एकमात्र पत्रिका है जिसमें प्रेमचंद की सर्वाधिक रचनाएँ प्रकाशित हुईं। प्रेमचंद के देहावसान के उपरान्त मुंशी दयानारायण निगम ने ‘जमाना’ का प्रेमचंद विशेषांक प्रकाशित किया था जो दिसम्बर 1937 में छपकर तैयार हो पाया था। इस विशेषांक में निगम साहब ने प्रेमचंद की आत्मकथा ‘जीवन-सार’ का उर्दू अनुवाद ‘मुंशी प्रेमचंद की कहानी उनकी जबानी’ शीर्षक से प्रकाशित किया और प्रेमचंद के व्यक्तित्व-कृतित्व पर अनेक महत्त्वपूर्ण लेख प्रकाशित किए। इन लेखों में सैयद अली जव्वाद जैदी का वह लम्बा लेख ‘प्रेमचंद की जिन्दगी और तसानीफ पर एक नजर’ भी सम्मिलित है जिसे विस्तार देकर मदन गोपाल उर्दू में ‘प्रेमचंद की आपबीती’ और हिन्दी में ‘प्रेमचंद की आत्मकथा’ शीर्षक पुस्तकें लिखने में सफल हुए। इसी विशेषांक में निगम साहब के निम्नांकित महत्त्वपूर्ण लेख भी प्रकाशित हुए थे -

1. प्रेमचंद की बातें, 2. मिसेज प्रेमचंद, 3. प्रेमचंद की बाज तसानीफ के हालात, और 4. प्रेमचंद के खयालात।

इनके अतिरिक्त इस अंक में ‘जमाना और प्रेमचंद’ शीर्षक से निगम साहब ने ‘जमाना’ में प्रकाशित प्रेमचंद की रचनाओं को विधानुसार वर्गीकृत करके उनकी ससन्दर्भ सूची प्रस्तुत की तथा ‘मुंशी प्रेमचंद की तसानीफ’ शीर्षक से प्रेमचंद की सभी हिन्दी-उर्दू पुस्तकों की सूची भी प्रस्तुत की। ये दोनों सूचियाँ यद्यपि न तो पूर्ण हैं, न ही सर्वथा दोषरहित, लेकिन इन दोनों सूचियों से ही प्रेमचंद पर व्यवस्थित अध्ययन आरम्भ हुआ और इनको ही प्रेमचंद पर भावी शोध की आधारशिला माना जाता है।

२. अमृतराय

प्रेमचंद के छोटे बेटे अमृतराय का जन्म 1921 में गोरखपुर में हुआ था। पूर्व प्रस्तुत विवरण से स्पष्ट है कि प्रेमचंद साहित्य को खोजकर प्रकाश में लाने का महनीय कार्य अमृतराय ने 1936 से 1962 तक अत्यन्त अध्यवसाय के साथ सम्पन्न किया। 1962 में अमृतराय ने पहली बार प्रेमचंद की कहानियों तथा उपन्यासों की ससन्दर्भ तालिकाएँ ‘प्रेमचंद : कलम का सिपाही’ के परिशिष्ट के रूप में प्रकाशित कराकर प्रेमचंद साहित्य के विशिष्ट शोधकर्ता के रूप में अपना महत्त्व स्थापित किया।

यह आश्चर्य की बात है कि क्षमता, योग्यता, सुविधा और संसाधन उपलब्ध होने पर भी अमृतराय 1962 के पश्चात् प्रेमचंद साहित्य पर अपना शोधकार्य जारी न रख सके। इसका कारण यह भी हो सकता है कि इसके पश्चात् उन्होंने अपना ध्यान मौलिक सर्जनात्मक लेखन पर ही केन्द्रित कर लिया हो।

३. मदन गोपाल

1919 में हाँसी, जिला हिसार में जन्मे मदन गोपाल सन् 1944 में प्रेमचंद की संक्षिप्त जीवनी अंग्रेजी में पुस्तकाकार प्रकाशित कराकर साहित्यिक क्षेत्र में चर्चित हुए। मदन गोपाल ने सन् 1941 के आसपास ही प्रेमचंद के पत्रों को संगृहीत करना प्रारम्भ कर दिया था जो उनका सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कार्य है। 1964 में इनकी लिखी अंग्रेजी पुस्तक ‘प्रेमचंदः ए लिटरेरी बायग्राफी’ प्रकाशित हुई और 1965 में ‘कलम का मजदूर प्रेमचंद’ हिन्दी और उर्दू में पहली बार प्रकाशित हुई। ध्यातव्य है कि इन तीनों पुस्तकों को प्रेमचंद की प्रतिष्ठित अंग्रेजी-हिन्दी-उर्दू जीवनी पुस्तक होने का गौरव प्राप्त है। 1968 में मदन गोपाल के सम्पादन में ‘प्रेमचंद के खुतूत’ शीर्षक से प्रेमचंद के पत्रों का संग्रह उर्दू में प्रकाशित हुआ। इसके पश्चात् मदन गोपाल का सार्वकालिक महत्त्व का प्रकाशन ‘कुल्लियाते प्रेमचंद’ (24 भाग) 2000 से 2005 के मध्य साहित्य-संसार के समक्ष आया। यह संग्रह शोध की दृष्टि से अत्यन्त त्रुटिपूर्ण है, जिसका कारण यह है कि मदन गोपाल ने इसके सम्पादन में अपेक्षित शोध नहीं किया। प्रेमचंद पर उनका कार्य कब पूर्ण हुआ, इसकी सूचना देते हुए स्वयं मदन गोपाल लिखते हैं -

"प्रेमचंद पर जो काम मैंने गत शताब्दि के चौथे दशक में शुरू किया था, वह छठे दशक में मेरी ‘प्रेमचंद : ए लिटरेरी बायग्राफी’ और इसके हिन्दी और उर्दू में संक्षिप्त रूप ‘कलम का मजदूर’ के प्रकाशन के साथ सम्पन्न हो गया था। इस बीच एक ऐसी घटना भी घटी थी जिसके कारण मेरा मन इतना खट्टा हो गया था कि जैसे मैंने प्रेमचंद से मुँह मोड़ लिया हो। मैं भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, गोस्वामी तुलसीदास, बालमुकुन्द गुप्त और नेताजी सुभाष चन्द्र बोस इत्यादि पर काम में उलझ गया था।"1

जिस घटना का संकेत मदन गोपाल करते हैं, वह उनका अमृतराय पर मुकदमा करना ही है। स्पष्ट है कि मदन गोपाल के अनुसार प्रेमचंद पर उनका कार्य 1964-65 तक पूर्णता को प्राप्त हो चुका था और 1965 के उपरान्त उन्होंने प्रेमचंद साहित्य पर सन् 2000 के निकट पूर्व में ही हाथ लगाया और ‘कुल्लियाते प्रेमचंद’ का सम्पादन किया। कौमी कौंसिल बराए फरोगे उर्दू जबान के तत्कालीन निदेशक डा. हमीदुल्ला भट्ट ने मदन गोपाल को ‘कुल्लियाते प्रेमचंद’ के सम्पादन का कार्य किस प्रकार सौंपा, स्वयं मदन गोपाल के ही शब्दों में -

"निदेशक हमीदुल्ला भट्ट से बातचीत में मैंने कहा कि प्रेमचंद की सभी हिन्दी और उर्दू कहानियों को कालक्रम के अनुसार यदि कोई छापे तो मैं सूची बना सकता हूँ। हमीदुल्ला भट्ट साहब ने सुझाव का स्वागत करते हुए कहा कि हम तो कुल्लियात (वाङ्मय) भी छाप सकते हैं। आप एक नोट लिखकर हमें दे दें। मैंने कहा यदि आप अपने सेक्रेटरी को मेरे साथ भेज दें वे इसे तुरन्त कर सकते हैं। उन्होंने अपना पी.ए. मेरे साथ भेज दिया और मैंने पाँच पृष्ठ का सुझाव उन्हें भेज दिया। दो दिन बाद 10-2-99 को काउंसिल की लिटरेरी पैनल की मींटिग होनी थी। यह सुझाव उन्हें पेश हुआ और स्वीकारा गया। पैनल ने यही फैसला किया कि यह काम मुझे सौंपा जाए।"2

स्पष्ट है कि अकेले मदन गोपाल के बुढ़ा चले कंधों पर ‘कुल्लियाते प्रेमचंद’ जैसे महत्त्वपूर्ण प्रकाशन के सम्पादन का सम्पूर्ण बोझ रखने का निर्णय मात्र दो दिनों में ही ले लिया गया। इस अनावश्यक हड़बड़ी का कारण क्या था यह तो कुछ ज्ञात नहीं होता, परन्तु यह निर्णय लेने के मात्र छह वर्षों के अन्दर ही ‘कुल्लियाते प्रेमचंद’ के 24 भारी भरकम खण्ड प्रकाशित हो जाने से इस कार्य को निपटा देने में व्यवहृत आश्चर्यजनक शीघ्रता का अनुमान लगा पाना सम्भव है। इतने महत्त्वपूर्ण संग्रह का सम्पादन करने की क्या प्रक्रिया रही, स्वयं मदन गोपाल के ही शब्दों में -

"तीन चार वर्ष हुए उर्दू के प्रकाशकों द्वारा प्रेमचंद की अनदेखी के कारण मैंने कौमी काउंसिल बराए फरोगे उर्दू छब्च्न्स् को सुझाव दिया कि वे प्रेमचंद वाङ्मय निकालें। सुझाव स्वीकारा गया। अभी तक वाङ्मय (कुल्लियाते प्रेमचंद) के चौदह-पन्द्रह खण्ड प्रकाशित हो चुके हैं, नौ पर काम चल रहा है। इस कुल्लियात के लिए मेरे पुराने नोट्स और सामग्री काम आई और मुझे विशेष शोध कार्य नहीं करना पड़ा।"3

1. भूमिका; प्रेमचंद दर्पण, 

2. प्रेमचंद वाङ्मय अब उर्दू में भी; आजकल, नई दिल्ली, जून 2005, 

3. भूमिका; प्रेमचंद दर्पण, 

स्पष्ट है कि ‘कुल्लियाते प्रेमचंद’ के सम्पादन के लिए न तो ‘विशेष शोध कार्य’ किया गया, न ही इस सुदीर्घ कालावधि में हुए सम्पूर्ण शोध से लाभ उठाया गया। और यही कारण है कि इस समग्र में अनेकानेक त्रुटियाँ स्थान पा गईं, तथापि अनेक दृष्टियों से इसका महत्त्व सदा सर्वदा बना रहेगा।

उल्लेखनीय है कि ‘कुल्लियाते प्रेमचंद’, भाग-1, के पृष्ठ सं. अप पर मदन गोपाल ने ‘हंस’ कार्यालय, बनारस के लैटर पैड पर उर्दू में लिखे हुए विवरण की अनुकृति प्रकाशित कराते हुए उसके परिचय में लिखा है - "प्रेमचंद ने बिस्तरे मर्ग पर अपनी तसानीफ की एक फहरिस्त तैयार की थी। इसमें ‘बेवा’ से लेकर ‘गऊदान’ तक का जिक्र है जो ‘हंस’ के लैटर पैड पर लिखा गया।"

जिस मूल दस्तावेज की अनुकृति मदन गोपाल ने प्रकाशित कराई है, उस पर स्पष्ट रूप से ‘संपादिका शिवरानी देवी’ शब्द भी छपे हुए हैं। पूर्व में उल्लेख किया जा चुका है कि शिवरानी देवी के सम्पादन में ‘हंस’ का प्रकाशन अक्टूबर 1936 के अंक से प्रारम्भ हुआ था। प्रेमचंद के देहावसान की तिथि 8 अक्टूबर 1936 के आलोक में यह कुछ बुद्धिगम्य नहीं है कि क्या प्रेमचंद के देहावसान से पूर्व ही शिवरानी देवी को विश्वास हो गया था कि अब ‘हंस’ कभी भी प्रेमचंद के सम्पादन में प्रकाशित नहीं होगा!

2001 में मदन गोपाल की लिखी ‘प्रेमचंद की आपबीती’ पुस्तक उर्दू में प्रकाशित हुई जिसका हिन्दी संस्करण 2002 में ‘प्रेमचंद की आत्मकथा’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ।

प्रेमचंद के छोटे बेटे अमृतराय के विरुद्ध मुकदमा दायर करके उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार लेने से रोकने के कारण मदन गोपाल साहित्यिक क्षेत्र में व्यापक रूप से चर्चा में आए।

मदन गोपाल के उपर्युक्त कार्य से स्पष्ट है कि प्रेमचंद के व्यक्तित्व के अध्ययन में उनका योगदान अविस्मरणीय है और 80 वर्ष की परिपक्व अवस्था में ‘कुल्लियाते प्रेमचंद’ जैसे समग्र का सम्पादन स्वीकार करके पूर्णता को पहुँचाना उनके जैसे समर्पित व्यक्ति के लिए ही सम्भव हो सकता था। मदन गोपाल पर प्रेमचंद का प्रभाव इस तथ्य से समझा जा सकता है कि उन्होंने अपना निजी पत्राचार तथा अपनी आत्मकथा क्रमशः ‘मुंशी प्रेमचंद की चिट्ठी-पत्री’ तथा ‘प्रेमचंद के जीवनीकार की आत्मकथा’ शीर्षकों से प्रकाशित कराई।

यह अवश्य है कि 1968 से 2000 तक के 32 वर्षों में प्रेमचंद पर मदन गोपाल की कोई पुस्तक प्रकाश में आने का कोई संकेत प्राप्त नहीं होता, यद्यपि इस मध्य भी उनके छिटपुट लेख प्रकाशित होते रहे।

4. डा. कमर रईस

1932 में शाहजहाँपुर में जन्मे डा. कमर रईस को 1958 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय ने ‘प्रेमचंद का तनकीदी मुताल्ला : बहैसियत नावलनिगार’ विषय पर पी-एच्.डी. की उपाधि प्रदान की। डा. कमर रईस को उर्दू में प्रेमचंद साहित्य पर पी-एच्.डी. करने वाले प्रथम शोधार्थी होने का गौरव भी प्राप्त है। उनका शोध प्रबन्ध अगले वर्ष 1959 में पुस्तकाकार प्रकाशित भी हो गया, जिसके अब तक अनेक संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं। इसके पश्चात् 1960 में डा. रईस के सम्पादन में ‘मजामीने प्रेमचंद’ शीर्षक संकलन प्रकाशित हुआ जिसने उर्दू-संसार को पहली बार प्रेमचंद के कथेतर लेखन से परिचित कराने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया। 1962 में जब अमृतराय के सम्पादन में प्रेमचंद की अनेक अज्ञात रचनाओं के संकलन प्रकाशित हो रहे थे तब डा. कमर रईस के सम्पादन में ‘मुंशी प्रेमचंद : शख्सियत और कारनामे’ संकलन प्रकाशित हुआ जो प्रेमचंद के व्यक्तित्व और कृतित्व के अनेक अनछुए प्रसंगों को प्रकट करता है। 1968 में डा. कमर रईस की प्रसिद्ध पुस्तक ‘तलाशो तवाजुन’ प्रकाशित हुई जिसके एक लम्बे लेख में उन्होंने पहली बार प्रेमचंद की कहानियों और कहानी-संकलनों पर विस्तृत शोधपरक सूचनाएँ उर्दू-संसार के समक्ष प्रस्तुत कीं। 1980 में उनकी शोधपरक लघु पुस्तक ‘प्रेमचंद : फिक्रो फन’ प्रकाशित हुई। 1981 में उनके सम्पादन में ‘प्रेमचंद के नुमाइंदा अफसाने’ संकलन प्रकाशित हुआ जिसमें प्रेमचंद की 17 उर्दू कहानियाँ संकलित हैं। इस संकलन को डा. रईस ने प्रेमचंद की कहानियों तथा कहानी-संकलनों पर आधारित एक विद्वत्तापूर्ण भूमिका से भी समन्वित कर दिया है। इसके पश्चात् प्रेमचंद पर उनकी कोई पुस्तक प्रकाशित होने के प्रमाण नहीं मिलते। 1959 में प्रकाशित डा. कमर रईस की पहली पुस्तक ‘प्रेमचंद का तनकीदी मुताल्ला’ के दो संस्करण कौमी कौंसिल बराए फरोगे उर्दू जबान, नई दिल्ली से 2005 में और एजूकेशनल पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली से 2007 में भी प्रकाशित हुए जो इस पुस्तक की लोकप्रियता और प्रतिष्ठा का स्पष्ट प्रमाण है।

यद्यपि ‘प्रेमचंद के नुमाइंदा अफसाने’ के पश्चात् डा. कमर रईस की प्रेमचंद पर अन्य कोई पुस्तक प्रकाशित होने की सूचना नहीं मिलती तथापि प्रेमचंद और प्रेमचंद साहित्य के प्रति उनकी अगाध निष्ठा और समर्पित भाव उन्हें समस्त प्रेमचंद-विशेषज्ञों में विशेष स्थान का अधिकारी बनाता है। उल्लेखनीय है कि डा. कमर रईस प्रेमचंद साहित्य पर शोध करने वाले प्रत्येक शोधार्थी की हर सम्भव सहायता करने के लिए सदा तत्पर रहते थे।

5. डा. जाफर रजा

1939 में इलाहाबाद में जन्मे डा. जाफर रजा की प्रेमचंद पर पहली उर्दू पुस्तक ‘प्रेमचंद : कहानी का रहनुमा’ 1969 में प्रकाशित हुई। इसके पश्चात् डा. रजा को ‘प्रेमचंद के हिन्दी कथा साहित्य और उनके उर्दू कथा साहित्य का तुलनात्मक अध्ययन’ विषय पर इलाहाबाद विश्वविद्यालय ने 1977 में पी-एच्.डी. की उपाधि प्रदान की। यह भी विचित्र संयोग है कि डा. जाफर रजा को उपाधि तो मिली हिन्दी में लेकिन उनके शोध प्रबन्ध का पुस्तकाकार रूप में प्रथम प्रकाशन 1977 में ही उर्दू में ‘प्रेमचंद : फन और तामीरे फन’ शीर्षक से हुआ और यह हिन्दी में पहली बार 1983 में ‘प्रेमचंद : उर्दू-हिन्दी कथाकार’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ। डा. रजा की पहली उर्दू पुस्तक का हिन्दी रूप भी 2005 में ‘प्रेमचंद : कहानी का रहनुमा’ शीर्षक से ही प्रकाशित हुआ।

डा. रजा ने पहली बार प्रेमचंद की कहानियों के हिन्दी-उर्दू रूपों की तुलनात्मक सूचियाँ तैयार कीं और उनके द्वारा प्रशस्त मार्ग का अवलम्बन लिए बिना इस दिशा में कोई भी भावी कार्य सम्भव न हो सका।

प्रेमचंद पर उपर्युक्त पुस्तकों के अतिरिक्त डा. रजा की कोई अन्य पुस्तक प्रकाशित होने का प्रमाण नहीं मिलता जिससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि 1977 के पश्चात् उन्होंने छिटपुट लेखों के अतिरिक्त प्रेमचंद पर गम्भीर कार्य करना बंद कर दिया।

6. गोपाल कृष्ण माणकटाला

1924 में लाहौर के निकट बागबानपुरा में जन्मे गोपाल कृष्ण माणकटाला विभाजन के कारण पढ़ाई छोड़कर मुम्बई में आ बसे और वहाँ अपना उद्योग स्थापित किया। उर्दू कहानीकार के रूप में अपनी पहचान बनाने वाले माणकटाला 1980 में कालिदास गुप्ता रिजा की प्रेरणा से प्रेमचंद साहित्य पर शोध में संलग्न हो गए। अब तक उनकी जो पुस्तकें प्रेमचंद साहित्य पर प्रकाशित हुई हैं उनका विवरण इस प्रकार है- 1. प्रेमचंद और तसानीफ प्रेमचंद : कुछ नये तहकीकी गोशे (1985), 2. प्रेमचंदः कुछ नये मुबाहिस (1988), 3. प्रेमचंद : हयाते नौ (1993), 4. प्रेमचंद का सेक्यूलर किरदार और दीगर मजामीन (2001), 5. तौकीते प्रेमचंद (2002), और 6. प्रेमचंद दर्पण (2003 हिन्दी में)। इनके अतिरिक्त उन्होंने ‘जमाना’ का प्रेमचंद नम्बर भी पुनः सम्पादित करके तथा शोधपरक चार ‘जमीमों’ से संवलित करके 2002 में कौमी कौंसिल बराए फरोगे उर्दू जबान, नई दिल्ली से पुस्तकाकार रूप में प्रकाशित कराया। माणकटाला ने शिवरानी देवी की पुस्तक ‘प्रेमचंद घर में’ का भी उर्दू अनुवाद पूर्ण करके कौमी कौंसिल बराए फरोगे उर्दू जबान, नई दिल्ली को बरसों पहले भेज दिया था लेकिन डा. हसन मंजर द्वारा किया हुआ इस पुस्तक का उर्दू अनुवाद अंजुमन तरक्की उर्दू (हिन्द), नई दिल्ली से प्रकाशित हो जाने के कारण माणकटाला द्वारा किया गया अनुवाद प्रकाशित न हो सका।

माणकटाला ने उर्दू में प्रेमचंद साहित्य पर गम्भीर कार्य करके अपना विशिष्ट स्थान बनाया है। यहाँ इस तथ्य का उल्लेख करना भी सर्वथा समीचीन होगा कि जहाँ अन्य सभी प्रेमचंद-विशेषज्ञों ने अपना शोध कार्य अचानक ही बन्द कर दिया, वहीं माणकटाला ने अपना शोध कार्य तभी बन्द किया जब शारीरिक स्वास्थ्य ने उनका साथ देना छोड़ दिया। यही नहीं, माणकटाला ने अपनी परम्परा को जीवित बनाए रखने की दृष्टि से अपनी समस्त संचित साहित्यिक पूँजी 12 अप्रैल 2008 को मुझे मुम्बई में निस्संकोच सौंपकर एक अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया।

7. डा. कमल किशोर गोयनका

1937 में बुलन्दशहर में जन्मे डा. कमल किशोर गोयनका सम्भवतः ऐसे एकमात्र विद्वान् हैं, जिन्होंने प्रेमचंद के जीवन और साहित्य पर ही पी-एच्.डी. और डी.लिट्. के शोध प्रबन्ध लिखे हों। डा. गोयनका ने 1972 में दिल्ली विश्वविद्यालय से ‘प्रेमचंद के उपन्यासों का शिल्प विधान’ विषय पर पी-एच्.डी. और 1984 में रांची विश्वविद्यालय से ‘प्रेमचंद का जीवन’ विषय पर डी.लिट्. की उपाधियाँ प्राप्त की थीं। प्रेमचंद पर डा. गोयनका की निम्नांकित पुस्तकें सम्प्रति प्रकाशित हो चुकी हैं-

1. प्रेमचंद के उपन्यासों का शिल्प-विधान (1974), 2. प्रेमचंद : कुछ संस्मरण (1980), 3. प्रेमचंद (1980), 4. प्रेमचंद और शतरंज के खिलाड़ी (1980), 5.प्रेमचंद : अध्ययन की नयी दिशाएँ (1981), 6. रंगभूमि : नये आयाम (1981), 7.प्रेमचंद विश्वकोश (दो खण्ड, 1981), 8. प्रेमचंद : चित्रात्मक जीवनी (1986), 9. प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य (दो खण्ड, 1988), 10. प्रेमचंद की हिन्दी-उर्दू कहानियाँ (1990), 11. प्रेमचंद : रचना संकलन (1994), 12. प्रेमचंद के नाम पत्र (2002), 13. प्रेमचंद : देश-प्रेम की कहानियाँ (2002), 14. प्रेमचंद : बाल साहित्य समग्र (2002), 15. रंगभूमि (विद्यार्थी संस्करण) (2004), 16. प्रेमचंद और रंगभूमि उपन्यास (2004), 17. प्रेमचंद की अप्राप्य कहानियाँ (2005), 18. प्रेमचंदः नयी पहचान (2005), 19. प्रेमचंद पत्र कोश (2007)।

इसके अतिरिक्त प्रेमचंद पर डा. कमल किशोर गोयनका की कुछ पुस्तकें सम्प्रति अप्रकाशित होने की सूचना देते हुए निर्मल सैनी लिखती हैं-

"डा. कमल किशोर गोयनका ने प्रेमचंद साहित्य पर अनेक पुस्तकें प्रकाशित की हैं। प्रेमचंद के अतिरिक्त इन्होंने अन्य साहित्यकारों पर भी अनेक पुस्तकें लिखीं हैं और अनेक पुस्तकों के सम्पादन का भी कार्य किया है। प्रकाशित पुस्तकों के अलावा इनकी कुछ अप्रकाशित कृतियाँ हैं जिनमें से कुछ प्रकाशनाधीन हैं और कुछ शीघ्र पूर्ण होने वाली हैं। इन पुस्तकों का विवरण इस प्रकार है-

1. प्रेमचंद विश्वकोश, खण्ड 3, 4, 5

2. प्रेमचंद : नयी पहचान

3. ‘कफन’ : आत्मा की तलाश

4. प्रेमचंद और भारतीयता

5. गोदान की पाण्डुलिपियों का अध्ययन

6. प्रेमचंद कहानी कोश

7. प्रेमचंद की सम्पूर्ण कहानियाँ

8. प्रेमचंद का हिन्दुपन

आदि पुस्तकें अप्रकाशित हैं।"1

ध्यातव्य है कि 1988 में ‘प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य’ प्रकाशित होने के पश्चात् डा. गोयनका की जो भी पुस्तकें प्रेमचंद पर प्रकाशित हुई हैं वे या तो संचयन मात्र हैं अथवा पूर्व प्रकाशित पुस्तकों के किसी अंश अथवा पूरी पुस्तक की नये शीर्षक के अन्तर्गत मात्र पुनरावृत्ति। इससे यह निष्कर्ष निकालना अस्वाभाविक प्रतीत नहीं होता कि 1988 से अब तक के 21 वर्षों में डा. गोयनका अपने छिटपुट लेखों के माध्यम से प्रेमचंद की एक काल्पनिक एवं तथाकथित ‘भारतीय मूर्ति’ गढ़ने और प्रेमचंद के ‘हिन्दूपन’ को उजागर करने का ‘महनीय’ कार्य ही सम्पादित करते रहे और प्रेमचंद साहित्य उनकी चिन्तन-परिधि से बाहर हो गया। इसकी पुष्टि अन्य लेखकों पर प्रकाशित डा. गोयनका की पुस्तकों से हो जाती है, जिनका विवरण निम्नांकित है -

1. प्रभाकर माचवे : प्रतिनिधि रचनाएँ (1984), 2. अभिमन्यु अनतः एक बातचीत (1985), 3. जिज्ञासाएँ मेरी : समाधान बच्चन के (1985), 4. अभिमन्यु अनतः विवादास्पद रचनाकार (1985), 5. मन्मथनाथ गुप्त : प्रतिनिधि रचनाएँ (1985), 6. रवीन्द्रनाथ त्यागी : प्रतिनिधि रचनाएँ (1987), 7. हजारी प्रसाद द्विवेदीः कुछ संस्मरण (1988), 8. विष्णु प्रभाकर : प्रतिनिधि रचनाएँ (1988), 9. यशपालः कुछ संस्मरण (1990), 10. अभिमन्यु अनतः समग्र कविताएँ (1998), 11. अभिमन्यु अनत : प्रतिनिधि रचनाएँ (1999), 12. मॉरिशस की हिन्दी कहानियाँ (2000), 13. दिनेशनन्दिनी डालमिया से बातचीत (2002), 14. लघुकथा का व्याकरण (2002), 15. ब्रजेन्द्र कुमार भगत ‘मधुकर’ काव्य रचनावली (2003), 16. मंजुल भगत : समग्र कथा साहित्य (2004)।

ध्यातव्य है कि डा. गोयनका के बहुचर्चित ‘प्रेमचंद विश्वकोश’ में उपस्थित भयंकर भूलों पर डा. वीर भारत तलवार ने अपने एक लम्बे लेख - ‘प्रेमचंद की जीवनी का सवाल’ में विस्तार से प्रकाश डाला था और ‘प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य’ के सम्बन्ध में इसी प्रकरण में पूर्व ही इंगित किया जा चुका है, जो डा. गोयनका की ‘प्रेमचंद-विशेषज्ञता’ का प्रमाण है।

उपर्युक्त सभी प्रेमचंद-विशेषज्ञों ने पुस्तकों के अतिरिक्त अनेकानेक लेख भी लिखकर समय-समय पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित कराए हैं, जिनका विवरण विस्तारभय से नहीं दिया जा रहा है। ध्यातव्य है कि इन सभी प्रेमचंद-विशेषज्ञों के शोध में अन्यान्य कारणों से अनेक स्खलन दृष्टिगोचर होते हैं, जिनके कतिपय उदाहरण प्रस्तुत हैं –

1. डा. कमल किशोर गोयनका का साहित्य-संसार,

1. डा. कमल किशोर गोयनका, डा. जाफर रजा, मदन गोपाल, गोपाल कृष्ण माणकटाला आदि ने ‘शिकार’ कहानी का प्रथम प्रकाशन ‘जमाना’ के जून 1910 के अंक में होने का उल्लेख किया है, जबकि वास्तव में यह कहानी ‘जमाना’ में कभी प्रकाशित नहीं हुई।

2. डा. कमल किशोर गोयनका लिखते हैं कि ‘अश्के नदामत’ शीर्षक कहानी ‘अलअस्र’ के 1917 के किसी अंक में प्रकाशित हुई। वास्तव में यह कहानी ‘कहकशाँ’ के जनवरी 1920 के अंक में प्रकाशित हुई थी।

3. डा. कमल किशोर गोयनका ने ‘तोबा’ कहानी के सम्बन्ध में यह लिखकर अपना कर्त्तव्य पूर्ण समझ लिया कि यह कहानी ‘फिरदौसे खयाल’ संकलन में सम्मिलित होने से पूर्व किस पत्र-पत्रिका में प्रकाशित हुई यह ज्ञात नहीं है। उन्होंने यह सन्दर्भ देने की आवश्यकता अनुभव नहीं की कि यह कहानी उर्दू साप्ताहिक ‘रियासत’ के 2 मार्च 1929 के अंक में प्रकाशित हुई थी।

4. डा. कमल किशोर गोयनका ने प्रेमचंद द्वारा अनूदित टाल्सटाय की कहानियों के एक संकलन ‘प्रेम प्रभाकर’ का उल्लेख किया है। वास्तव में ‘प्रेम प्रभाकर’ शीर्षक से जो संकलन प्रकाशित हुआ था उसमें टाल्सटाय की कहानियों के हिन्दी अनुवाद अवश्य संकलित थे, लेकिन उनके अनुवादक प्रेमचंद नहीं वरन् तत्कालीन पटियाला रियासत के सिविल इंजीनियर आत्माराम थे।

5. डा. कमल किशोर गोयनका ने ‘अन्तरप्रान्तीय साहित्यिक आदान प्रदान के लिए’ शीर्षक प्रेमचंद के एक सम्पादकीय आलेख का उल्लेख किया है। इस शीर्षक से प्रेमचंद का कोई सम्पादकीय आलेख कभी प्रकाशित नहीं हुआ। वास्तविकता यह है कि अमृतराय ने इस शीर्षक के अन्तर्गत ‘साहित्य का उद्देश्य’ के प्रथम संस्करण में कथित रूप से चार लेकिन वास्तव में पाँच भिन्न-भिन्न सम्पादकीय आलेख प्रस्तुत किए थे और इस सम्बन्ध में स्पष्ट रूप से उल्लेख भी कर दिया था।

6. हिन्दी कहानी ‘प्रारब्ध’ का प्रथम प्रकाशनोल्लेख डा. कमल किशोर गोयनका द्वारा ‘विशाल भारत, अक्टूबर 1921’ के रूप में किया गया है। हिन्दी मासिक ‘विशाल भारत’ का प्रथम अंक सम्पादकाचार्य पं. बनारसीदास चतुर्वेदी के सम्पादन में जनवरी 1928 में कलकत्ते से प्रकाशित हुआ था। अतः यह सूचना नितान्त अशुद्ध है।

7. हिन्दी कहानी ‘मुक्ति मार्ग’ का प्रथम प्रकाशनोल्लेख डा. कमल किशोर गोयनका, मदन गोपाल और गोपाल कृष्ण माणकटाला ने ‘विशाल भारत, अप्रैल 1924’ के रूप में किया है। जब ‘विशाल भारत’ का प्रथम अंक जनवरी 1928 में प्रकाशित हुआ था तब यह सूचना प्रामाणिक नहीं है।

8. हिन्दी कहानी ‘सद्गति’ का प्रथम प्रकाशनोल्लेख डा. कमल किशोर गोयनका, डा. जाफर रजा, मदन गोपाल और गोपाल कृष्ण माणकटाला ने ‘विशाल भारत, अक्टूबर 1931’ के रूप में किया है। यह कहानी ‘विशाल भारत’ में कभी प्रकाशित नहीं हुई।

9. उर्दू कहानी ‘सैरे दरवेश’ का प्रथम प्रकाशनोल्लेख डा. कमल किशोर गोयनका और डा. जाफर रजा ने ‘जमाना, अप्रैल-जून 1910’ के रूप में किया है। वास्तव में यह कहानी ‘जमाना’ के अप्रैल से जुलाई तक के 4 अंकों में धारावाहिक प्रकाशित हुई थी।

10. उर्दू कहानी ‘बूढ़ी काकी’ का प्रथम प्रकाशनोल्लेख डा. कमल किशोर गोयनका, मदन गोपाल और गोपाल कृष्ण माणकटाला ने ‘कहकशाँ, जुलाई 1920’ और डा. जाफर रजा ने ‘तहजीबे निस्वाँ’ के रूप में किया है। यह कहानी ‘कहकशाँ’ के सन्दर्भित अंक में प्रकाशित होने से पूर्व लाहौर के उर्दू साप्ताहिक ‘तहजीबे निस्वाँ’ के 25 मई 1918, 1 जून 1918 और 8 जून 1918 के तीन अंकों में धारावाहिक प्रकाशित हुई थी।

11. उर्दू कहानी ‘साँप की माशूका’ का प्रथम प्रकाशनोल्लेख मदन गोपाल और गोपाल कृष्ण माणकटाला ने ‘तहजीबे निस्वाँ, अगस्त 1922’ के रूप में किया है। यह कहानी पहली बार लाहौर के उर्दू मासिक ‘हजार दास्तान’ के जुलाई 1922 के अंक में प्रकाशित हुई थी और महिलाओं के योग्य रूपान्तरण करके ‘तहजीबे निस्वाँ’ के सम्पादक ने अपनी टिप्पणी के साथ पत्रिका के 5 अगस्त और 12 अगस्त 1922 के दो अंकों में ‘नागजी’ शीर्षक से प्रकाशित की थी।

12. उर्दू कहानी ‘ईमान का फैसला’ का प्रथम प्रकाशनोल्लेख डा. जाफर रजा ने ‘आजाद, जुलाई 1917’ और मदन गोपाल ने ‘सरस्वती, जुलाई 1917’ के रूप में किया है। यह कहानी ‘जमाना’ के अक्टूबर और नवम्बर 1917 के दो अंकों में क्रमशः प्रकाशित हुई थी।

13. उर्दू लेख ‘रामायण और महाभारत’ का प्रथम प्रकाशन मदन गोपाल के अनुसार ‘जमाना’ के मई 1912 के अंक में हुआ था। यह लेख ‘जमाना’ के मई-जून 1912 के संयुक्तांक में प्रकाशित हुआ था।

14. उर्दू लेख ‘कदीम हिन्दू इल्मे रियाजी’ का प्रथम प्रकाशनोल्लेख मदन गोपाल ने ‘जमाना, मई-जून 1917’ के रूप में किया है। यह लेख ‘जमाना’ के मई-जून 1912 के संयुक्तांक में प्रकाशित हुआ था।

15. हिन्दी लेख ‘दुखी जीवन’ का प्रथम प्रकाशनोल्लेख डा. कमल किशोर गोयनका ने ‘हंस, वैशाख 1990 वि.सं.’ और अमृतराय ने ‘वैशाख 1990’ के रूप में किया है। विद्यावाचस्पति वेदप्रकाश गर्ग ने पहली बार सप्रमाण इंगित किया था कि यह लेख ‘द्विवेदी अभिनन्दन ग्रंथ’ में प्रकाशित हुआ था।

16. ‘जमाना’ के दिसम्बर 1917 के अंक में प्रेमचंद की एक कहानी प्रकाशित हुई थी जिसका शीर्षक था ‘दर्द और दवा’। डा. कमल किशोर गोयनका द्वारा इस कहानी का शीर्षक अपने तईं बदलकर ‘दवा और दारू’ कर देने की पृष्ठभूमि स्पष्ट नहीं है।

इनके अतिरिक्त अन्य लेखकों की रचनाएँ प्रेमचंद के नाम से प्रकाशित करा देने की भयंकर भूल का उल्लेख पूर्व में ही किया जा चुका है। यहाँ तक ही नहीं, गोपाल कृष्ण माणकटाला ने ‘जमाना’ का प्रेमचंद नम्बर अपनी शोधपरक टिप्पणियों (जमीमों) सहित प्रकाशित कराया है जिनके द्वारा उन्होंने इस विशेषांक में स्थान पा गई त्रुटियों का परिष्कार किया है। खेद का विषय है कि माणकटाला साहब की शोधपरक टिप्पणियाँ भी सर्वथा त्रुटिरहित नहीं हैं।

लम्बे समय से प्रेमचंद साहित्य पर शोध करने वाले इन प्रेमचंद-विशेषज्ञों के शोध में अन्यान्य कारणों से स्थान पा जाने वाली त्रुटियाँ ही प्रेमचंद साहित्य पर गहन- गम्भीर शोध करके भावी शोधकर्ताओं के लिए प्रामाणिक आधार सामग्री उपलब्ध कराने की दिशा में मेरे प्रवृत्त होने का हेतु बनीं। और, इसी कारण से मैं इन सभी ‘प्रेमचंद-विशेषज्ञों’ का हृदय से आभारी हूँ कि यदि ये विद्वान् असावधानी, प्रमाद तथा सुविधाभोगी वृत्ति से विलग रहकर अपने शोध को सर्वांग पूर्ण करने में सफल हो जाते तो मेरे जैसे किसी भी शोधकर्ता के लिए प्रेमचंद साहित्य के सम्बन्ध में प्रामाणिक जानकारी जुटाने का कोई कारण ही शेष नहीं रहता।

ध्यातव्य है कि उपर्युक्त सात प्रेमचंद-विशेषज्ञों में से मात्र तीन - डा. कमर रईस, डा. जाफर रजा और डा. कमल किशोर गोयनका ही ऐसे हैं जो विश्वविद्यालयीय शिक्षा से सम्बद्ध रहे। विश्वविद्यालयीय शोध के सम्बन्ध में डा. कमल किशोर गोयनका का निम्नांकित उल्लेख द्रष्टव्य है -

"हिन्दी के शोधार्थियों में नयी खोज का उत्साह नहीं है और न बड़े-बड़े हिन्दी विभाग ही जमीन में दबी ऐसी पुरानी सभ्यताओं-सामग्रियों को ही खोदकर निकालने के लिए तत्पर हैं। हिन्दी में आदमी प्रोफेसर हुआ और उसने लिखना-पढ़ना तथा खोज-खबर लेना छोड़ दिया। अब शोध-कार्य केवल पी-एच्.डी. की उपाधि तक ही सीमित रह गया है, क्योंकि डॉक्टर बनकर ही नौकरी मिल सकती है। देश के हिन्दी-विभागों में श्रेष्ठ शोध की जो परम्परा थी, वह अब मर चुकी है, क्योंकि अध्यक्षों एवं प्रोफेसरों की कोई रुचि तथा प्रतिबद्धता नये ज्ञान के प्रति अब रह नहीं गयी है।"1

प्रेमचंद साहित्य पर विभिन्न विश्वविद्यालयों ने अब तक जो सैकड़ों पी-एच्.डी. की उपाधियाँ प्रदान की हैं उनके लिए लिखे गए शोध प्रबन्धों की गुणवत्ता पर डा. गोयनका उपर्युक्त शब्दों द्वारा प्रश्नचिह्न लगाते प्रतीत होते हैं। यही नहीं उपर्युक्त शब्दों से यह प्रेरणा भी मिलती है कि विश्वविद्यालयीय शोध के आधार पर प्रेमचंद के जीवन और साहित्य के जो सन्दर्भ सामने आते हैं, उन सबका भी सत्यापन करके उन्हें प्रमाणपुष्ट किया जाना चाहिए और वह भी विश्वविद्यालयीय नहीं वरन् स्वतन्त्र शोध द्वारा। वास्तव में विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में सुविधाभोगी शोध की जो परम्परा विकसित हो गई है उसका मूल उद्देश्य मात्र उपाधि प्राप्त करना है, और इसमें वास्तविक साहित्यिक शोध पीछे, कहीं बहुत पीछे छूट जाता है। परन्तु व्यावहारिक कठिनाई यह भी है कि विश्वविद्यालयों अथवा महाविद्यालयों में शिक्षण से सम्बद्ध महानुभाव यह सहन नहीं कर पाते कि कोई स्वतन्त्र शोधकर्ता उनके परिणामों पर उँगली उठाने लगे, भले ही उनको भी ज्ञात हो जाय कि ये गलत हैं। ऐसी दशा में वे ऐसे स्वतन्त्र शोधकर्ता की शोध करने की योग्यता, क्षमता, पात्रता और आवश्यकता पर ही प्रश्नचिह्न लगाने का प्रयास करने लगते हैं। दिनों दिन विकसित होती यह दूषित मानसिकता तथा प्रवृत्ति हिन्दी-उर्दू में साहित्यिक शोध के लिए अत्यन्त घातक है तथा यदि इस पर प्रभावी रोक न लगाई जा सकी तो वह दिन दूर नहीं जब इस माफिया तन्त्र से भयभीत होकर स्वतन्त्र शोधकर्त्ता अपने कार्य से विरत हो जायगा अथवा इस गिरोह की दुष्टताओं तथा षड्यन्त्रों का शिकार हो जायगा। यहाँ यह उल्लेख करना भी सर्वथा समीचीन होगा कि विश्वविद्यालयीय शोध को एक सिरे से नकार देना भी उचित नहीं है। ऐसा कदापि सम्भव नहीं है कि समूचा विश्वविद्यालयीय शोध ही स्तरहीन हो जाए। यदि 10 शोध-प्रबन्धों में से एक भी स्तरीय बन पड़ता है तो उसका स्वागत किया जाना प्रत्येक दृष्टि से उचित होगा, और ऐसा प्रायः होता है। विश्वविद्यालयीय शोध के गिरते स्तर के लिए जहाँ उपाधि का शिकार करने निकले शोधार्थी किसी सीमा तक दोषी हैं वहीं विश्वविद्यालयीय शिक्षा से सम्बद्ध उनके शोध निर्देशक कहीं अधिक दोषी हैं जो शोध की श्रेष्ठ परम्परा को जीवन्त बनाए रखने में सफल नहीं हो सके। परन्तु एक सिरे से समस्त विश्वविद्यालयीय शोध को खारिज करना उस शोध को भी नकार देना है जो रेगिस्तान में नखलिस्तान की भाँति सुखद होता है।

1. प्रेमचंद की अप्राप्य कहानियाँ,

प्रस्तुत संकलन में सम्मिलित प्रेमचंद की समस्त रचनाओं में से मात्र तीन रचनाएँ - 1. ‘दाराशिकोह का दरबार’, 2. ‘वफा की देवी’ और 3. ‘जॉन आफ आर्क’ ही ऐसी हैं जो अभी तक मात्र उर्दू में ही संकलित होने के कारण हिन्दी-साहित्य-संसार की दृष्टि-परिधि में नहीं आ पाई थीं। इनके अतिरिक्त अन्य सभी रचनाएँ प्रेमचंद साहित्य में नवीन अभिवृद्धि हैं। संकलन की रचनाओं के प्रथम प्रकाशन सन्दर्भ एवं पाठ के स्रोत का विवरण परिशिष्ट-7 में प्रस्तुत है जिससे यह स्पष्ट है कि इनका प्रकाशन-काल 1907 से 1933 तक विस्तृत है अर्थात् ये प्रेमचंद के लगभग सम्पूर्ण लेखकीय जीवन के विस्तार की रचनाएँ हैं। इन रचनाओं से प्रेमचंद की विचार-यात्रा और उनके रचनात्मक विकास क्रम पर नवीन प्रकाश पड़ता है और प्रेमचंद के समग्र मूल्यांकन में अतिरिक्त सुविधा प्राप्त होती है। यह संकलन प्रेमचंद के सम्प्रति ज्ञात जीवन और वैचारिक विकास यात्रा में नवीन तथ्यों का समावेश करने में सफल हो सकेगा, ऐसा विश्वास है। प्रेमचंद साहित्य में इन रचनाओं का स्थान और महत्त्च निर्धारित करना तो डा. नामवर सिंह और डा. मैनेजर पाण्डेय जैसे सुधी आलोचकों के कार्यक्षेत्र में अनुचित तथा अनधिकृत पदक्षेप होगा, अतः यह दायित्व इन्हीं विद्वानों पर है। हाँ, इतना अवश्य कहना चाहूँगा कि अपने जीवन-काल में जो प्रेमचंद ‘ब्राह्मण विरोधी’ होने के आरोपों तथा आक्षेपों से जूझते रहे, उन्हीं को स्वतन्त्र भारत में ‘दलित विरोधी’ और ‘सामन्त का मुंशी’ बताया जाने लगा। किसी ने भी यह सोचने का कोई प्रयास नहीं किया कि ये दोनों आरोप वास्तव में दो भिन्न-भिन्न धुर विरोधी ध्रुव हैं। यही नहीं, प्रेमचंद के मूलतः आर्य समाजी विचारधारा में दीक्षित होने के पुष्ट प्रमाणों (देखिए परिशिष्ट-3) की उपेक्षा करके वामपंथी विचारधारा के विद्वान् उन्हें सदा लाल झंडे में लपेटने की दिशा में सचेष्ट रहे। इन विद्वानों की मान्यता के लिए पर्याप्त आधार भी उपलब्ध होता है, जिसे अहमद अली तथा सज्जाद जहीर के नाम लिखे गए प्रेमचंद के वे पत्र भी पुष्ट करते हैं जो पहली बार इस संकलन के माध्यम से प्रकाश में आ रहे हैं और जिनके आधार पर निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि अपने जीवन के अन्तिम दिनों में प्रेमचंद साम्यवाद की विचारधारा में पूर्णता से दीक्षित दिखाई देते हैं। ध्यातव्य है कि किसी भी लेखक अथवा विचारक की वही विचारधारा मान्य होती है जो उसके समूचे जीवन के अनुभवों से होकर गुजरती हुई उसके जीवन के अन्तिम भाग में पुष्ट होकर सामने आती है, और इस दृष्टि से प्रेमचंद को साम्यवादी बताना प्रत्येक दृष्टि से उचित है। परन्तु आश्चर्य तब होता है जब सर्वहारा वर्ग को वाणी देकर लामबन्द कर देने वाले प्रेमचंद जैसे उस रचनाकार को जो अपने समूचे जीवन में साम्प्रदायिकता, धर्म पर हावी होते कठमुल्लापन, रूढ़िवादिता, अत्याचार, अन्याय, उत्पीड़न और शोषण जैसी बुराइयों से निरन्तर संघर्षरत रहा हो, भगवा ब्रिगेड के एकमात्र अलमबरदार डा. कमल किशोर गोयनका साम्यवाद विरोधी और हिन्दुत्व का पोषक सिद्ध करने की निरर्थक और अनावश्यक खींचतान में अपनी समस्त प्रतिभा नष्ट करने पर आमादा हो जाएँ। ऐसे किसी भी प्रयास से न तो प्रेमचंद की कथित ‘भारतीय मूर्ति’ का निर्माण हो पाना सम्भव है, न ही उनकी मानसिक संरचना को गुणात्मक रूप से परिवर्तित किया जा सकता है। हाँ यह अवश्य है कि इस बहाने डा. गोयनका वामपंथी विचारधारा के विद्वानों को अत्यन्त अमर्यादित शब्दों में गरियाने और कोसने का कोई अवसर नहीं चूकते, जिसे साहित्यिक शोध के नाम पर स्थापित कर देने का षड्यन्त्र भी पनप रहा है।

इस संकलन में उर्दू रचनाओं का हिन्दी रूपान्तरण करके प्रस्तुत किया गया है जिसके सम्बन्ध में स्पष्टीकरण दिए बिना मेरी बात पूरी नहीं होगी। अमृतराय ने जब 1962 में प्रेमचंद की अनेकानेक रचनाएँ प्रकाशित कराई थीं तब लिखा था -

"उर्दू से प्राप्त कहानियों को ज्यों का त्यों छाप देना हिन्दी पाठकों के प्रति अन्याय समझकर मैंने उनको हिन्दी का जामा पहनाया है - मुंशीजी की अपनी हिन्दी का, यानी जहाँ तक मुझसे हो सका।"1

प्रारम्भ में मैं अमृतराय के उपर्युक्त शब्दों से सहमत नहीं था और मैंने भी प्रेमचंद की एक-दो दुर्लभ रचनाएँ मात्र देवनागरी में लिप्यन्तरित करके प्रकाशित कराईं। संयोग कुछ ऐसा हुआ कि एक बार ‘समकालीन भारतीय साहित्य’ के तत्कालीन सम्पादक अरुण प्रकाशजी से भेंट करने का सौभाग्य मिला तो उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि ‘अब हिन्दी में वह पीढ़ी शेष नहीं रही जो उर्दू-हिन्दी दोनों भाषाओं से परिचित होती थी।’ उनकी बात पर मैंने जितना चिन्तन किया और इस प्रकार के देवनागरी लिप्यन्तरण को जितना स्वयं से पृथक् करके देखने का प्रयास किया उतना ही मैं अमृतराय के उपर्युक्त कथन से सहमत होता चला गया। यहाँ तक ही नहीं, अमृतराय से आगे बढ़कर मैंने उर्दू के मात्र उन्हीं शब्दों का प्रयोग करने का निर्णय लिया जिन्हें बदल देने से भाव में स्खलन हो जाता है। और, इस प्रकार प्रेमचंद की उर्दू रचनाओं का हिन्दी रूपान्तरण ही प्रस्तुत करने का अन्तिम निर्णय ले लिया ताकि देश के सम्पूर्ण विस्तार में, विशेषकर अहिन्दी भाषी क्षेत्र में प्रेमचंद की दुर्लभ रचनाएँ साहित्य-प्रेमियों को आप्यायित करने में सफल हो सकें। इस रूपान्तरण के सम्बन्ध में ध्यातव्य है कि यह प्रेमचंद की मूल हिन्दी रचना नहीं है यद्यपि कथ्य प्रेमचंद का ही है। अतः इसे प्रेमचंद की हिन्दी रचना के रूप में उल्लिखित करना भयंकर भूल होगी। प्रेमचंद की उर्दू रचनाओं को प्रस्तुत करने के सम्बन्ध में डा. गोयनका लिखते हैं -

"मेरा दृढ़ मत है कि प्रेमचंद की उर्दू या हिन्दी भाषा को बदलने का किसी को भी अधिकार नहीं है, चाहे उनके पुत्र अमृतराय हों या शोधार्थी शैलेश जैदी। अमृतराय ने ‘गुप्त धन’ में प्रेमचंद की अनेक उर्दू कहानियों की भाषा में परिवर्तन कर दिया है और शीर्षक तक बदल दिये हैं जो साहित्य के किसी भी मापदण्ड से उचित नहीं है। प्रेमचंद की उर्दू अथवा हिन्दी भाषा का विकासात्मक अध्ययन करने तथा उनकी भाषागत प्रवृत्तियों के विवेचन में ऐसे भाषा-परिवर्तन से सही निष्कर्षों तक नहीं पहुँचा जा सकता है। अतः यह आवश्यक है कि प्रेमचंद की भाषा का, चाहे वह उर्दू हो या हिन्दी, मूल रूप की रक्षा होनी चाहिए।"2

1. गुप्त धन, भाग-1,

2. प्रेमचंद की अप्राप्य कहानियाँ, 

डा. गोयनका का उपर्युक्त कथन इस सीमा तक तो ठीक है कि यह अनुवाद अथवा रूपान्तरण प्रेमचंद की मूल भाषा नहीं है और इसका स्पष्टीकरण पूर्व पंक्तियों में दिया भी जा चुका है, लेकिन प्रेमचंद की उर्दू भाषा के विकास क्रम का उनकी हिन्दी के विकास क्रम से क्या सम्बन्ध है, यह समझ में आने वाली बात नहीं है। जहाँ तक उनकी उर्दू भाषा के विकास क्रम का सम्बन्ध है, इस दिशा में कार्य करना डा. गोयनका जैसे हिन्दी-भाषियों का कार्य नहीं है वरन् उर्दू विद्वानों का कार्य है और वे ही इसकी विवेचना करने के सक्षम अधिकारी हैं। यह कहने की कुछ आवश्यकता नहीं है कि उर्दू साहित्य के विद्वान् उर्दू भाषा तथा लिपि से निश्चित रूप से परिचित होते हैं और उन्हें प्रेमचंद की उर्दू भाषा के देवनागरी लिप्यन्तरण की कुछ भी आवश्यकता नहीं है। डा. गोयनका की इस धारणा की पृष्ठभूमि का निर्माण भी उनकी उर्दू भाषा और लिपि की अज्ञता से ही निर्मित हुआ है। ध्यातव्य है कि उर्दू का वाक्य विन्यास हिन्दी से पृथक् होता है और प्रेमचंद की उर्दू में प्रायः अरबी-फारसी के कठिन शब्दों का प्रयोग दृष्टिगत होता है। ऐसे कठिन शब्दों के अर्थ कोष्ठक में या पद-टिप्पणी में देकर और उर्दू के वाक्य विन्यास को ज्यों का त्यों बनाए रखकर उर्दू से अपरिचित हिन्दी पाठकों की रसानुभूति में बाधा डालकर डा. गोयनका क्या प्रयोजन सिद्ध करना चाहते हैं, कुछ कह पाना कठिन है।

प्रस्तुत संकलन में सम्मिलित रचनाओं के पाठ भिन्न-भिन्न ग्रन्थागारों तथा विद्वानों के कृपापूर्ण सौजन्य से प्राप्त हुए हैं, जिनका विवरण निम्नांकित है -

1. खुदाबख्श ओरियंटल पब्लिक लाइब्रेरी, पटना - ‘सौदा-ए-खाम’, ‘इश्तिहारी शहीद’, ‘जंजाल’, ‘महरी’, ‘अहदे अकबर में हिन्दुस्तान की हालत’, ‘इत्तिफाक ताकत है’, ‘आबशारे न्याग्रा’, ‘कलामे सुरूर’

2. गोपाल कृष्ण माणकटाला, मुम्बई - ‘सौदा-ए-खाम’

3. डा. अलिफ नाजिम, देवरिया - ‘दाराशिकोह का दरबार’

4. आचार्य पं. सीताराम चतुर्वेदीजी का निजी ग्रन्थागार, मुजफ्फरनगर - ‘पद्म सिंह शर्मा के साथ तीन दिन’, ‘साहित्य और सदाचार’

5. डा. सैयद हसन अब्बास (रीडर एवं विभागाध्यक्ष, फारसी विभाग, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय), वाराणसी - ‘शहीदे आजम’

6. सैयद तकी हैदर, उपाध्यक्ष, इंस्टीट्यूट फॉर सोशलिस्ट एजुकेशन, नई दिल्ली - अहमद अली एवं सज्जाद जहीद के नाम लिखे प्रेमचंद के पत्र

7. विद्यावाचस्पति वेदप्रकाश गर्गजी का निजी ग्रन्थागार, मुजफ्फरनगर - पं. देवीदत्त शुक्ल के नाम लिखे प्रेमचंद के पत्र

8. नेहरु स्मारक संग्रहालय एवं पुस्तकालय, नई दिल्ली - प्रेमचंद-महताबराय पत्राचार

9. कृष्ण कुमार राय, वाराणसी - पण्डित जी के नाम लिखा प्रेमचंद का पत्र।

इन सभी विद्वानों तथा ग्रन्थागारों के प्रति मैं हार्दिक कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ, जिनके सहयोग के अभाव में यह संकलन तैयार कर पाना असम्भव था।

साहित्यिक शोध के क्षेत्र में मेरी अभिरुचि को परिष्कृत करने का महनीय कार्य हिन्दी साहित्य के शलाका पुरुष पूज्यपाद गुरुवर श्रद्धेय आचार्य पं. सीताराम चतुर्वेदीजी और मेरे पी-एच्.डी. के शोध निर्देशक डा. पवन कुमारजी जैन ने सम्पादित किया। इस संकलन के प्रकाशन के अवसर पर मैं इन गुरुजनों की अक्षय स्मृतियों को अपने विनम्र कृतज्ञतापूर्ण प्रणाम निवेदित करता हूँ।

भारतीय ज्ञानपीठ के तत्कालीन प्रबन्ध न्यासी कीर्तिशेष साहू रमेशचंद जी जैन के प्रति आभार व्यक्त करने के लिये मैं अपना शब्दकोश रिक्त पाता हूँ, जिन्होंने 1990 के आसपास मुझे प्रेमचंद के समस्त लेखन का एक प्रामाणिक सन्दर्भ ग्रन्थ तैयार करने की आज्ञा दी थी। उनकी आज्ञा ही प्रेमचंद साहित्य पर मेरे समूचे कार्य की अन्तःप्रेरणा है।

मुम्बई के प्रेमचंद-विशेषज्ञ गोपालकृष्ण माणकटाला का आभार किस प्रकार व्यक्त किया जाय जिन्होंने प्रेमचंद साहित्य पर शोध करने की दिशा में अपना उत्तराधिकारी बनाते हुए मुझे मुम्बई बुलाकर 12 अप्रैल 2008 को निस्संकोच अपना समस्त संग्रह सौंप दिया। इस संकलन के प्रकाशन से उन्हें तनिक भी प्रसन्नता मिल सकी तो मैं अपना श्रम सार्थक समझूँगा।

संस्कृति मन्त्रालय, भारत सरकार के प्रति आभार व्यक्त किए बिना यह कृतज्ञता प्रकाश अपूर्ण ही रहेगा जिसने ‘प्रेमचंद की रचनाओं का प्रकाशन-काल : पुनर्विचार’ विषय पर शोध के लिए वर्ष 2007-09 की वरिष्ठ फैलोशिप प्रदान करके मुझे व्यापक रूप से शोध करने की सहज सुविधा प्रदान कर दी।

मेरी शोध यात्रा में अनेक विद्वानों का सहयोग रहा है, जिनमें से प्रमुख हैं हास्य-व्यंग्य के समर्थ शायर मास्टर शौकत फहमी - जो मेरे सहपाठी होने के साथ-साथ मेरे उर्दू के गुरु भी हैं; आधी सदी से भी अधिक समय से उपाधि-निरपेक्ष शोध में संलग्न सुप्रसिद्ध साहित्य-संशोधक विद्यावाचस्पति वेदप्रकाश गर्ग - जिन्होंने मुझे प्रेमचंद साहित्य पर गहन शोध करने की प्रेरणा दी; ‘आजकल’, उर्दू के सम्पादक डा. अबरार रहमानी - जिन्होंने न केवल मेरा उर्दू-साहित्य-संसार से प्रथम परिचय कराया वरन् मुझे निरन्तर प्रोत्साहन भी देते रहते हैं; उर्दू साहित्य के सुप्रसिद्ध आलोचक प्रो. डा. कमर रईस (अब दिवंगत) - जिन्होंने प्रेमचंद साहित्य पर शोध करने के लिए हर सम्भव सहायता देने का आश्वासन देकर मेरा साहस बढ़ाया; अन्जुमन तरक्की उर्दू (हिन्द) के जनरल सेक्रेट्री डा. खलीक अंजुम - जिन्होंने मेरे अनेक शोधपरक लेखों को प्रमुखता से प्रकाशित करके मुझे उर्दू-संसार में दूर-दूर तक पहुँचाया; और साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित सुप्रसिद्ध शायर मखमूर सईदी (अब दिवंगत) - जिन्होंने प्रेमचंद की दुर्लभ रचनाएँ तलाश करने और गहन-गम्भीर शोध करने की मुझे निरन्तर प्रेरणा दी। इनके अतिरिक्त मैं डा. प्रभाकर श्रोत्रिय (पूर्व निदेशक, भारतीय ज्ञानपीठ), विष्णु नागर (पूर्व सम्पादक, कादम्बिनी), कुबेर दत्त (पूर्व चीफ प्रोड्यूसर, दूरदर्शन), डा. धनंजय सिंह (वरिष्ठ साहित्यकार तथा पूर्व मुख्य उपसम्पादक, कादम्बिनी), एस.के. अहमद (सासाराम), प्रो. डा. अली अहमद फातमी (उर्दू विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, इलाहाबाद), प्रो. राजेन्द्र जिज्ञासु (अबोहर), प्रवीण उपाध्याय (उपनिदेशक, प्रकाशन विभाग), प्रो. डा. नवीन चन्द्र लोहनी (हिन्दी विभागाध्यक्ष, चौ.च.सिं. विश्वविद्यालय, मेरठ), प्रो. डा. असलम जमशेदपुरी (उर्दू विभागाध्यक्ष, चौ.च.सिं. विश्वविद्यालय, मेरठ), डा. मुमताज अर्शी (रामपुर), डा. उमाकान्त शुक्ल (पूर्व संस्कृत विभागाध्यक्ष, सनातन धर्म महाविद्यालय, मुजफ्फरनगर), डा. आशुतोष पार्थेश्वर (हाजीपुर) आदि सब विद्वानों के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त करता हूँ, जिन्होंने मुझे समय-समय पर नानाविध सहयोग प्रदान करके उपकृत किया है।

मैं जिनेन्द्र कुमार जैन एडवोकेट, राजेन्द्र कुमार गर्ग एडवोकेट, आनन्द स्वरूप चौधरी, डा. रेणु जैन, पूजा-विशाल जैन (अमरीका), अरुण शर्मा, कविवर प्रकाश सूना, तरुण गोयल एडवोकेट, सुनील गर्ग, आरती जैन, नीति जैन आदि अनेकानेक आत्मीय सुहृदों का भी आभारी हूँ जिनकी शुभकामनाएँ सदा मेरे साथ रहीं।

प्रस्तुत संकलन की विद्वत्तापूर्ण भूमिका लिखने के लिए मैं प्रेमचंद के अनुज महताबराय के परम सुयोग्य सुपुत्र और प्रेमचंद परिवार के वरिष्ठतम जीवित सदस्य श्री कृष्ण कुमार राय के समक्ष नतमस्तक हूँ, जिन्होंने छियासी वर्ष की परिपक्वावस्था में समस्त प्रकार की शारीरिक प्रतिकूलताओं के विद्यमान रहते हुए भी मेरे विनम्र निवेदन की रक्षा करते हुए इस गुरुतर दायित्व को वहन करना सहर्ष स्वीकार कर लिया। उनके लिए मात्र यही कहना पर्याप्त होगा - त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पये।

काशी के श्रीरामरत्न पुस्तक भवन के अधिष्ठाता श्री मुरारी लाल केडिया के पत्रों को अपनी महत्त्वपूर्ण टिप्पणी से संवलित करके संकलन में सम्मिलित करने की अनुज्ञा प्रदान करने के लिये मैं प्राचीन एवं मध्यकालीन हिन्दी साहित्य के विशेषज्ञ श्री उदयशंकर दुबे जी के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने के लिए शब्द नहीं खोज पा रहा हूँ जिनके कृपापूर्ण सौजन्य से मैं इन पत्रों को पहली बार साहित्य संसार के समक्ष लाने में सफल हो सका।

प्रेमचंद स्मारक सम्बन्धी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण दस्तावेजों की अनुकृतियाँ उपलब्ध कराने के लिये मैं श्री कृष्ण कुमार राय; और तत्कालीन महामहिम राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद द्वारा प्रेमचंद स्मारक का शिलान्यास किए जाने के अवसर के दुर्लभ छायाचित्र उपलब्ध कराने के लिए डा. कौशल किशोर राय और डा. विजय राय के प्रति हार्दिक कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ।

संकलन के परिशिष्ट के रूप में अपने-अपने लेख सम्मिलित करके प्रकाशित कर देने की अनुमति प्रदान करने के लिए मैं प्रेमचंद परम्परा के सशक्त कहानीकार श्री कृष्ण कुमार राय और श्रीरामरत्न पुस्तक भवन, वाराणसी के अधिष्ठाता कीर्तिशेष मुरारी लालजी केडिया के सुपुत्र और वर्तमान संचालक श्री गगनेन्द्र कुमार केडिया के प्रति हार्दिक कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ।

किसी भी शोधकर्ता के लिए यह सम्भव नहीं हो पाता कि वह अपना कार्य गृह-मन्दिर के अनुकूल वातावरण की अनुपस्थिति में पूर्णता को पहुँचा सके। सौभाग्य से मुझे अपना समस्त शोध कार्य करने के लिए पितृतुल्य अग्रज श्री नरेश चन्द जैन, एडवोकेट और उनके समूचे परिवार ने पारिवारिक एवं सामाजिक दायित्वों से सर्वथा मुक्त रखते हुए समस्त अनुकूलताएँ सहज ही उपलब्ध करा दीं। इनका अयाचित स्नेह तथा वात्सल्य ही शोध-यात्रा में सदा मेरा पाथेय रहा और रहेगा।

राष्ट्रभाषा हिन्दी को वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठित करने में महात्मा गांधी अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा की भूमिका असंदिग्ध है, अतः अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय साहित्य का पर्याय बन चुके मुंशी प्रेमचंद की सम्प्रति अज्ञात रचनाओं को प्रकाश में लाने का अधिकार भी नैसर्गिक रूप से इसी महनीय विश्वविद्यालय का ही है। प्रस्तुत संकलन के त्वरित प्रकाशन हेतु विश्वविद्यालय के कुलपति डा. विभूति नारायण राय और प्रकाशन प्रभारी डा. बीर पाल सिंह यादव ने जो सार्थक पहल की है, उसके प्रति आभार व्यक्त करने के लिये मैं अपना शब्दकोश अपर्याप्त समझता हूँ। मुझे आशा ही नहीं अपितु पूर्ण विश्वास है कि प्रस्तुत संकलन के प्रकाशनोपरान्त मैं प्रेमचंद की जो अन्य अज्ञात रचनाएँ खोजने में सफल हो सकूँगा उनका संकलन प्रकाशित करने में भी महात्मा गांधी अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा ऐसी ही अभिरुचि एवं त्वरा का सुपरिचय अवश्य प्रदान करेगा।

संकलन के सुन्दर, शुद्ध एवं सुरुचिपूर्ण अक्षर संयोजन के लिए प्रियवर मामचंद गर्ग के प्रति आभार व्यक्त करना मात्र औपचारिकता ही नहीं वरन् कर्त्तव्य भी है।

46-बी, नई मण्डी                                                          डॉ. प्रदीप जैन
मुजफ्फरनगर-२५१००१
8 अक्टूबर, 2011


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