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प्रेमचंद की शेष रचनाएँ
प्रदीप जैन


साहित्य और सदाचार

sahitay-premchand

[दिल्ली में आयोजित प्रान्तीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन में भाग लेने हेतु प्रेमचंद की यात्रा और सम्मेलन के स्थान आदि का विवरण देते हुए डा. कमल किशोर गोयनका लिखते हैं -

"1932 - 23 सितम्बर - हिन्दी साहित्य सम्मेलन, दिल्ली की अध्यक्षता करने के लिये बनारस से दिल्ली पहुँचे। 24 सितम्बर - दिल्ली के रामा थियेटर हाल में प्रातः 9 बजे प्रो. इन्द्र के साथ सम्मेलन की अध्यक्षता करने के लिये पहुँचे। प्रो. इन्द्र एवं सेठ केदारनाथ गोयनका ने प्रेमचंद को पुष्प मालाएँ पहना कर स्वागत किया। प्रो. इन्द्र ने स्वागत भाषण दिया तथा अन्त में प्रेमचंद ने अपना भाषण पढ़ा।"1

इतनी स्पष्ट तथा विस्तृत सूचना देने पर भी डा. गोयनका ने प्रेमचंद के इस भाषण को खोजने का कोई प्रयास किया हो, इसका कोई संकेत प्राप्त नहीं होता।

प्रेमचंद के इस भाषण को पं. बनारसी दास चतुर्वेदी ने ‘विशाल भारत’ के अक्टूबर 1932 के अंक में ‘सम्पादकीय विचार’ स्तम्भ में पृष्ठ संख्या 504-5 पर ‘साहित्य सेवी और सदाचार’ शीर्षक की सम्पादकीय टिप्पणी में समाहित करके प्रकाशित कर दिया था। भाषण के पाठ से पूर्व पं. चतुर्वेदी जी ने अपनी सम्पादकीय टिप्पणी में लिखा था-

"विशाल भारत’ के अप्रैल सन् 1932 के अंक में हमने ‘हिन्दी साहित्य सेवियों के आदर्श’ शीर्षक एक लेख लिखा था। उसका विरोध कई महानुभावों ने किया और इस प्रकार एक वाद-विवाद ही उठ खड़ा हुआ। इसके विषय में श्री प्रेमचंद जी ने दिल्ली प्रान्तीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन के सभापति की हैसियत से जो विचार प्रकट किये हैं, वे मनन करने योग्य हैं।"2

उपर्युक्त टिप्पणी के पश्चात् प्रेमचंद के भाषण का पाठ प्रकाशित किया गया जो प्रथम दृष्ट्या अविकल पाठ प्रतीत नहीं होता।

डा. कमल किशोर गोयनका के उपर्युक्त उद्धृत शब्दों - ‘अन्त में प्रेमचंद ने अपना भाषण पढ़ा’ से यह स्पष्ट होता है कि प्रेमचंद ने अपने अभ्यास के अनुसार दिल्ली प्रान्तीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन में अपना लिखित भाषण ही पढ़ा था। ‘विशाल भारत’ के आगामी मास के अंक में ही इसके प्रकाशित हो जाने से यह अनुमान किया जा सकता है कि प्रेमचंद ने अपने भाषण की लिखित प्रति तत्काल पं. बनारसी दास चतुर्वेदी के पास कलकत्ता भेज दी होगी, जिन्होंने उसे प्रकाशित करने में तनिक भी विलम्ब नहीं किया और पत्रिका के अक्टूबर 1932 के अंक में स्थान दे दिया। भाषण के सम्पादकीय आलेखों में प्रकाशित होने से यह संकेत भी प्राप्त होता है कि जिस समय चतुर्वेदी जी को प्रेमचंद का यह भाषण मिला होगा उस समय तक पत्रिका के सम्बन्धित अंक के लेख आदि का मुद्रण कार्य पूर्ण हो चुका होगा और सम्पादकीय आलेखों का कार्य प्रगति पर होगा। ध्यातव्य है कि ‘विशाल भारत’ में ‘सम्पादकीय विचार’ शीर्षक से सम्पादकीय आलेख प्रत्येक अंक के प्रायः अन्तिम पृष्ठों पर ही प्रकाशित किए जाते थे।

74 वर्षों तक ‘विशाल भारत’ जैसी सुप्रसिद्ध पत्रिका में भी प्रेमचंद का भाषण छिपा पड़ा रहना हिन्दी में प्रेमचंद साहित्य के शोधकर्ताओं तथा स्वनामधन्य प्रेमचंद विशेषज्ञों के प्रमाद का अनुपम उदाहरण है।]

1. प्रेमचंद विश्वकोश, भाग-1, 
2. विशाल भारत, कलकत्ता, अक्टूबर 1932,

इधर साहित्य-संसार में एक नया विवाद उठ खड़ा हुआ। वह यह है कि कलाकारों के लिए सदाचारी होने की जरूरत नहीं है। कुछ विद्वानों का मत है कि सच्चे कलाविद् किसी प्रकार के सामाजिक बन्धनों में नहीं रह सकते! उसके लिए हर एक प्रकार की स्वच्छन्दता परमावश्यक है, अन्यथा बन्धनों में पड़कर उसकी कला कुंठित हो जायगी। इसके विपरीत कुछ विद्वानों का कहना है कि कलाकार के लिए सदाचारी होना अनिवार्य है, नहीं तो वह कलाकार हो ही नहीं सकता। पहला पक्ष अपने समर्थन में ऐसे कलाकारों की मिसालें पेश करता है, जो आचरण-भ्रष्ट होने पर भी अपनी अमर कीर्त्ति छोड़ गये हैं। दूसरा पक्ष जवाब देता है कि यदि वे लोग आचरण-भ्रष्ट न होते, तो उनकी रचना और भी उदात्त होती। वे अपनी आचरण-भ्रष्टता के कारण अच्छे कलाविद् नहीं हुए, बल्कि उसके प्रतिकूल। मैं आपकी अनुमति से इस विषय में अपनी सम्मति प्रकट कर देना चाहता हूँ।

आचरण में कुछ तो सत्य होता है और कुछ असत्य। जिसका आधार सामाजिक प्रथा और मर्यादा है, वह असत्य है। जिसका आधार नैसर्गिक नियम है, वह सत्य है। एक ब्राह्मण कलाकार यदि किसी अन्त्यज के साथ बैठकर भोजन करे, तो वह सामाजिक दृष्टिकोण से आचरण-भ्रष्ट होगा; लेकिन उस नैसर्गिक नियम के अनुसार, जो प्राणीमात्र को बराबर समझता है, उसका यह कृत्य सर्वथा स्तुत्य है। अगर कोई अपने स्वार्थ के लिए किसी की हत्या करे, और अपने कौशल से उसे छिपा भी ले जाय, फिर भी वह आचार-भ्रष्ट है। सम्भव है, कोई आदमी क्षणिक आवेश में ऐसा काम करके फिर उस पर पश्चात्ताप करे, तो यह उसकी आत्मा को और भी चमकायेगा; लेकिन हम यह नहीं मान सकते कि सांसारिक विषय-भोग में लिप्त मनुष्य कभी कलाकार हो सकता है।

कला का प्रधान गुण सुन्दर और सत्य है। जो असुन्दर और असत्य हो, वह अपनी कला में गुण कहाँ से पैदा करेगा। जो मन में है, वही तो कलम से निकलेगा। हो सकता है कि कोई कलाकार नास्तिक होकर भी भक्तिपूर्ण चित्रों की या भक्ति-रस की कविता की रचना करे, पर इस रचना में कदापि वह ओज और प्रभाव नहीं हो सकता, जो एक आस्तिक की रचना में हो सकता है।

सदाचार का उद्देश्य केवल संयम है, संयम में शक्ति है और शक्ति ही आनन्द की बुनियाद है। जिसका पाचन दुर्बल है, वह मलाई का स्वाद क्या जाने! उसे तो मलाई खाने से उदर-विकार का ही अनुभव होगा। जो स्वयं संयमहीन है, वह शक्तिहीन भी होगा, और शक्तिहीन आदमी न आनन्द का अनुभव कर सकता है, न उसकी कल्पना कर सकता है। जब साधारण सांसारिक जीवन को सुखमय बनाने के लिए संयम की आवश्यकता निर्विवाद है, तो सौन्दर्य की सृष्टि के लिए संयम अनावश्यक हो, यह तो हो ही नहीं सकता...

कला की जो मुख्य वस्तु है, सौन्दर्य, उसका रस लेने के लिए साधना की आवश्यकता है। जिस अनुपात से हममें यह साधना कम होगी, उसी अनुपात से हममें सौन्दर्य की भावना भी कम होगी। हमारी तो यह धारणा है कि जिस मनुष्य में सौन्दर्य-भावना पूर्ण रूप से विकसित हो जायगी, उसकी चंचलता आप-ही-आप नष्ट हो जायगी। सच्चा कलाकार वही है, जो हमारे मन की चंचलता को शान्त करके हमें सत्य की ओर ले जाय। जो स्वयं चंचल है, वह दूसरों को अचंचल कैसे बना सकता है? जिन बड़े-बड़े कलाविदों ने दुर्बल चरित्र होकर भी कला की सृष्टि की है, उन्होंने भी अपनी अपूर्णता को स्वीकार किया है। जब अपने अन्दर के सत्य के क्षीण प्रकाश से वे अपने को अमर कर गये, तो हम अनुमान कर सकते हैं कि यदि वह ज्योति अलिप्त होती, तो वे क्या कर जाते?

यह आवश्यक है कि हम जो साहित्य-सेवी बनने की कामना रखते हैं, इस साधना के आदर्श को सम्मुख रखें। साहित्यकार का दरजा ऋषि से कम नहीं है, बल्कि ऋषियों को भी सदुपदेश करने के लिए साहित्य की ही शरण लेनी पड़ती है। हमारे साहित्य की यह हीन दशा विशेषतः इसीलिए हुई है कि हममें साधना की कमी है, संयम की कमी है, और इसलिए तेज की भी कमी है। इसी साधना और तप की यह विभूति है कि महात्मा जी के मुख या कलम से जो कुछ निकलता है, वह अमर साहित्य होता है। हम चारों तरफ रोते फिरते हैं कि हमारी पुस्तकें नहीं बिकतीं, जनता में रुचि नहीं है, जाग्रति नहीं है। अपनी बिक्री बढ़ाने के लिए नाना प्रकार के कृत्रिम साधनों का सहारा लेते हैं। वास्तव में इस अनादर का कारण हमारी रचनाओं की सौन्दर्यहीनता है।

हमने कलाकार बनने के लिए कोई तैयारी नहीं की। जिनमें कुछ थोड़ी सी रचनाशक्ति थी, वह लेखक बन बैठा। जो आदमी सितार बजाना चाहता है, वह बरसों सितार का अभ्यास करता है। जो शारीरिक बल चाहता है, वह बरसों कसरत करता है, अखाड़े में लोटता है, उस्तादों के घूँसे खाता है। हम कलाकार बनना चाहते हैं, पर बिना किसी तैयारी के। ऐसे कलाकारों का अगर कोई पुरसाँ हाल न हो, तो शिकायत का मौका नहीं।

अगर आप जनता को कुछ दे सकते हैं, उसकी बुद्धि का परिमार्जन कर सकते हैं, उसमें रस का संचार कर सकते हैं, उसमें सौन्दर्य-भावना भर सकते हैं, सारांश यह कि अगर आप उसे अस्थिर और असत्य की ओर से हटा कर स्थायी और सत्य की ओर ले जा सकते हैं, तो आपका आदर होगा, आप पढ़े जायँगे, आप पूजे जायँगे! अन्यथा चाहे कोई मनोरंजन के लिए भले ही आपकी रचना पढ़ ले, प्रकाश के लिए, आत्मतुष्टि के लिए, नहीं पढ़ सकता।


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