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निबंध

बबूल की बगल में खड़े होकर
श्रीराम परिहार


गाँव की चौपाल पर पचासी वर्ष के बूढ़े दादा के पास बैठा हूँ। पास में गाँव का माँग्या भाई भी बैठा है। दादा से बतिया रहा है। उसके साथ आए दो बच्चे पास में खेल रहे हैं। माँग्या बातों-बातों में गाँव का समाजशास्त्र सुना देता है। खेतों का भूगोल बता देता है। पीढ़ियों का इतिहास कह देता है। झोपड़ी-झोपड़ी का अर्थशास्त्र साफ-साफ सामने रख देता है। कहता है - भैय्या युद्ध हो, बाढ़ हो, अकाल हो, मरण तो गरीब का ही है। बुझे चूल्हे और औंधी परात की बात किससे कहूँ? तुम्हारी भाभी चैत करने गई थी। एक बोरा गेहूँ कटनी-बँधनी करने के बदले में लेकर आई है। मैं सेठ के घर बरसूद (बँधी मजदूरी) करता हूँ। उतने गेहूँ साल भर वार-त्यौहार पुर जाएँगे। उसके पाँव में एक रकम (जेवर) है, उसे गिरवी रखकर चार महीना बारिश का बाजार गुड़, तेल, नमक ले आऊँगा। बाजार का नाम सुनते ही उसकी कमीज को खींचकर मुँह की ओर ताकते बच्चे कहते हैं - ''काकाजी बाजार सी दाल लई आवजो, गंज दिन हुई गया दाय खाया ख।'' एक झनझनाहट माँग्या और मुझमें एक साथ होती है। वह सपाटे से बाहर निकल जाता है। मेरी आँखों में बबूल के लंबे-लंबे काँटे उभर आते हैं और प्रकृति की व्यवस्था के बीच बबूल की सार्थकता समझ में आने लगती है।

जेठ-आषाढ़ आते-आते नदी-नालों में चिलम की स्यापी भिगोने को भी पानी नहीं रहता। धरती की गरमगट छाती को खूँदता हुआ माँग्या बाजार जा रहा है। उसकी आँखों में दोनों बच्चे बैठे हुए हैं। किलोल करते बच्चे। आँखों में ऊधम मचाते बच्चे। सपनों से अनजाने बच्चे। गर्मी को ठेंगा दिखाते बच्चे। बबूल की छाया में खड़े होकर दूर से सेठ के खेत में पेड़ पर पकते आमों को देखते बच्चे। सूखे टिक्कड़ों पर पलते बच्चे। सिर्फ दाल-रोटी की चाहत में जीते बच्चे। उस रोटी के साथ भी दाल नहीं। देखते-देखते तमतमाते घाम में माँग्या की आँखें लाल हो जाती हैं। फद्दक-फद्दक पाँव धूल भरी गड़वाट और जोर से गिरने लगते हैं। उसे पच्चीस साल पहले के अपने बचपन और अपने बच्चों के बचपन में राई-रत्ती फर्क नजर नहीं आता है।

ग्रीष्म के ताप और आतिश से जख्मी धरती की देह पर आकाश बादलों के फाहे रख देता है, पर गरीबी से अधजली जिंदगियों को तो ताउम्र अरंडी के पेड़ की छाया भी नसीब नहीं होती। आजादी के सड़सठ सालों में तथा पुरानी शिक्षा-नई शिक्षा का ढोल पीटने के बाद भी यह सच है कि माँग्या के बच्चों की आँख ढोर चराते-चराते खुलती है। किशोर अवस्था आते ही उसे चार दाँत के नारिया की तरह काम में जोत दिया जाता है और अंत में भाड़े के बैल की तरह जुता-जुता ही दम तोड़ देता है। जिनके पल्ले में अणात बँधी है, उन्हें टूटी टापरी और फूटी खापरी का दर्शन समझ में नहीं आता। लेकिन जिस वर्ग की समझ में आया वह नैतिकता, धर्म, पुनर्जन्म और भाग्य के औजारों से उसे सदा हराता रहा है। निकम्मे लोगों ने पोची दलीलों से अपनी तोंद और तिजोरी की हिफाजत कर रखी है। अशिक्षा और असुविधा से बने कोंठवाड़े में एक बड़े ईमानदार और कर्मशील वर्ग को कोंड रखा है। इस बाड़े में वह दिखता स्वतंत्र है, लेकिन उसकी स्वतंत्रता का सिरा पूँजी और सत्ता के पाँव के नीचे दबा है। ऐसी आजादी मात्र शाब्दिक होती है, जो व्यक्ति को छलावे की खंदक में पटक कर मुस्कुराती है।

ताड़ी के झाड़ की कोती छाँह में हाँफती गाय-भैंस की तरह ही सागौन के पत्ते से छायी टापरी के चितकबरे आसरे में माँग्या, बच्चे और माँग्या की लुगाई हाँफती है। तब उसे बिलकुल संपट नहीं बैठती कि उसकी पत्नी का शरीर गर्मी की मार से गरम है या बुखार से। बावजूद इसके राहत कार्य में बन रही सड़क पर वह मिट्टी फेंकता है। काम के बदले मिले अनाज का बना दलिया सरपंच के घर से माँगकर लाए हुए छाछ के साथ परोसती है, तो बच्चे थाली को देखकर सूखे कुएँ की दीवार से टकराती बाल्टी की तरह जमीन पर अपना सिर ठोंक-ठोंककर बगावत करते हैं। माँग्या की पत्नी भाग्य को कोसती है और माँग्या के मन में आता है - यह जो शरीर में कमीजनुमा चिथड़ा है, उसे जिंदा कर डालूँ या इस झोपड़े को फूँक कर चौराहे पर खड़ा हो जाऊँ और जोर से चिल्लाऊँ कि सारे झोपड़े वालों बाहर आ जाओ, हमें अब सारे झोपड़े खतम कर देना है। या गरीबी का 'सास्तर' लिखने वाले उस चालाक को मुट्ठी में मसलकर बंजर धरती में गाड़ दूँ।

किसी आदमी का बालपन, जवानी अैर बुढ़ापा तीनों ही बट्टे खाते में चले जाएँ तो वह सूने घर का पावणा सरीखा ही दुनिया में आया है। अपनी निष्ठुर दया को तोकने में सक्षम समझकर समाजवादी व्यवस्था में माँग्या जैसे कई लोगों के नाम जमीन के पट्टे कर दिए हैं। ये पट्टे गोचर भूमि में से दिए गए हैं। जहाँ गाँव के सारे बगेरू ढोर चरते थे। यदि बारिश टोटा की हुई तो उसमें से चार भुट्टे भी जुवार या मक्का के घर नहीं आ सकते। इसके बाद भी उम्मीदों की फसल तो हर साल बो ही दी जाती है। लेकिन गरीब की उम्मीदों का कोई अर्थ नहीं होता। वह ब्लाक से मिले बीजों की उस थैली के समान होती है, जिस पर लेबल तो चालू वर्ष का लगा होता है, लेकिन अंदर बीज बरसो पुराने भरे होते हैं, जो पोचे हो चुके होते हैं। फिर भी कूँथ-कराँजकर इक्के-दुक्के बीज मरियल पौधे बनते भी हैं, तो गाँव के बड़े आसामी के ढोर चर जाते हैं। वह जकड़ा आसामी तुर्रेदार मूँछों में कहता है - यह क्या कर लेगा? माँग्या तब कहीं महसूस करता है कि खेत की हिफाजत के लिए बाड़ और जीवन के बचाव के लिए काँटे बहुत जरूरी है। उसके भीतर एक बबूल अँखुवाने लगता है।

उसने भाँय-भाँय दोपहरी और साँय-साँय चलती लू में सूरज की आग के खिलाफ लंबी लड़ाई लड़ी है। सारी उमर दूसरे के घर काम करते-करते थक गई। जिस सेठ के यहाँ वह काम करता है, उसके खेत में नदी से पाईप लाईन द्वारा पानी माँग्या के पट्टे (जमीन का टुकड़ा) में से होकर जाता है। पाईप में उसकी इच्छाएँ चूर-चूर होकर पानी में घुलकर बहती है। वह अपने खेत की हद में पाईप को बार-बार सँभालता है - कहीं पाईप फूट ना जाए, पाईप में से पाईप अलग न हो जाए, नहीं तो बनिया डपटेगा - अपने खेत में पानी ले लिया। दहशत उसके पाँवों से चिपक गई है। फिर भी मन से वह चाहता है कि भगवान करे पाईप फूट जाए और तुवर के दो-चार गोड़ में पानी चला जाए, ताकि बच्चों को कह सकूँ कि अपना भी खेत है, उसमें भी फसल होती है और यह उसी खेत की तुवरदाल है। ऐसा नहीं होने पर, पाईप के न फूटने पर वह घर जाते समय सेठ के खेत से अंगोछा भिंगोकर लाता है। और नजर बचाकर अपने खेत के तुवर-पौधे की जड़ों में निचो देता है, परंतु चींटी के मूतने से नदी में बाढ़ नहीं आती।

माँग्या की राह आदमियों की उस बाढ़ में गुम जाती है, जिसे भाषा ने बाजार कहा है। पत्नी की रकम को गिरवी रखते हुए संकल्प करता है - दाल जरूर ले जाऊँगा। दाल की दुकान पर जाकर मोल-भाव करता और उसकी जेब कट जाती है। खीसे से हाथ आर-पार निकल जाता है। कभी लेवी के रूप में, कभी ब्याज के रूप में, कभी कुरकी के रूप में और कभी बेगार के रूप में जेब कटती रहती है। लेकिन अबकी बार का हादसा सरेआम हो गया। गिरवी के बदले में प्राप्त रोकड़ा लुट गया। बच्चों की परात में बमुश्किल जुटाई दाल हरामखोर सुकड़ गया। उसकी आँखों में बच्चों का भूखा और लहूलुहान चेहरा उभर आता है। वह जेब काटकर भागने वाले अप-टू-डेट जीवन के पीछे भागता है। बाजार उसका साथ नहीं देता है। वह अकेला चिल्लाता हुआ बेतहासा भागता है। जीवन के बचाव की शक्ति के चुकने की सीमा तक भागता है और आदमखोर को गली के मोड़ पर धर दबोचता है। उसका फनफनाता चाकू देख माँग्या उस पर बिफरे साँड़ की तरह टूट पड़ता है। बदमाश का सिर दीवार में घुसेड़कर चाकू से बाएँ हाथ की पाँचों अँगुलियाँ साफ कर देता है और चाकू उसकी जेब में रखकर चला आता है। हवा का एक झोंका आता है और गली के मोड़ का बबूल अपने छोटे-छोटे, पीले-पीले छतरीनुमा फूल माँग्या पर बरसा देता है। उसके नथुनों में बबूल के फूलों की गंध तेज हो जाती है। पत्नी पूछती है - ''गुड़, तेल, नमक नहीं लाए?'' माँग्या कहता है - ''दाल लेकर आया हूँ।'' फिर गुफा का सन्नाटा छा जाता है। उसे महसूस होता है उसके भीतर का बबूल धीरे-धीरे बड़ा हो रहा है। वह उसकी जड़ों में मिट्टी चढ़ाने लगता है।


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