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निबंध

कहीं मर न जाए, सावन की आँख का पानी
श्रीराम परिहार


नर्मदा का आँगन। विंध्याचल और सतपुड़ा के दो तोरणद्वार। नदियों के दूध से पोषित दग्गड़-पत्थर भरी कछारी धरती। वनखंडों के लुटे कारवाँ की यादों पर बिसूरते स्मृति-शेष जंगल। कोस-कोस पर तपते, छप्पर सुधारते गाँव। धुँधवाते कंडों और चामटी लकड़ी की आँच में घूँघट सँवारती सोनपरी। बिखरी पगड़ी की चिंदियों को माथे पर खोंसकर, आकाश ताकता किसान। ''पानी बाबा आ रे, ककड़ी भुट्टा ला रे'' के निहोरा के साथ ही बादलों की राह बुहारते नंग-धड़ंग बच्चे।

आषाढ़ के आगमन के साथ ही बादल आए और झाँसा देकर चंपत हो गए। धरती की देह अधमहकी रह गई। नदी-तालाबों की अनबुझी प्यास ने उनकी छाती को टूटी स्लेट सरीखी तोड़कर धर दिया। पेड़-पौधे पत्तों की ओक बनाकर आकाश के प्याऊ की ओर टकटकी बाँधकर देख रहे हैं। आठ माह से पपड़ाई प्रकृति की प्यास आकाश के प्याऊ से बादल द्वारा बूँद-बूँद टुंगाने से नहीं बुझेगी। उसे तो झड़ाझड़ झरती बरखा ही तपन से मुक्ति दिला सकेगी।

मेरे सामने अखिल ब्रह्मांड, तीन दृश्यों में सिमटकर आ जाता है - जीवन, जगत और शून्य। जीवन-जगत, शून्य से उत्पन्न हुए हैं और शून्य में लय हो जाएँगे। शून्य का दूसरा रूप आकाश है। आकाश से मेघ बरसते हैं। यह झड़ी सृष्टि की प्रथम ऋतु से आज तक प्राणी और प्रकृति से रक्षार्थ निस्प्रह भाव से जुड़ी है। यह जुड़ाव तीनों में एक सीधी सरल रेखा वाला संतुलन कायम रखता है। जब-जब प्रकृति की वल्गाएँ खींची हैं, उसके जबड़ों को घायल किया है, तब-तब संतुलन का रथ चरमराया है। जीवन की यात्राएँ अधूरी रही हैं। अधूरी यात्राओं का कोई इतिहास नहीं होता।

यह मेघ, यह वर्षा, यह जलधार खेतिहर संस्कृति के विधायक तत्व हैं। निमाड़ में एक लोक मान्यता है - जब आषाढ़ बिन बरसे चला जाता है, सावन की उदास आँखों का पानी मर जाता है। बोनी नहीं होती। या आषाढ़ में बोनी हो जाने के बाद नए-नए पावणा सरीखे बादल रूठ कर चले जाते हैं। नन्हीं-नन्हीं फसल चॉस की चॉस (कतार) खड़ी होकर छोटे-छोटे हाथों से उन्हें बुलाती है। नदी का हृदय बैठने लगता है। सरोवर हंस के किलोल लायक नहीं रह जाता है। वनस्पति के कान ढीले हो जाते हैं। बैल की काँध कसमसाने लगती है। कोय निरंतर गुहार लगाती है। पपीहा के केवल प्राण भर नहीं जाते, बाकी सब कुछ तो वह दो शब्दों के निश्वास में शून्य में फेंक देता है। गौरैया समूह बनाकर तेज और तेज स्वर में पुकारती है। ग्वालन पक्षी 'म केक कहूँ' के दो बोल बोलकर जलधरों से अरदास करता है। फिर भी बादलों के रथ नहीं जुतते। आकाश की गड़वाट में गड़गड़ाहट नहीं होती। तब गाँव की सारी बहू-बेटियाँ-माताएँ समूह में किसी एक खेत में जाती हैं। गाँव की मुखिया की पत्नी या पटलन को पुरुष के वस्त्र पहनाए जाते हैं तथा वह बैलों को टिटकारती हुई खेत में हल चलाती है। शेष स्त्रियाँ जीवन की धड़कन को ऊर्जावान स्वर देकर गाती हैं -

गऊवा ओ बछुआ फिरी रह्या बन-बन

इनख नई मिलती हरी-हरी घास।

सारी जनता तुमख मनई रहीज

तुम हमसी क्यों रूठी रह्या राज?

गाँव का किरसाण झूर रे इंदर राजा

एक दिन आइन वरसो महाराज

यह क्रिया लोक मानस को सीधे-सीधे त्रेता के जनक से जोड़ती है। दुष्काल पड़ने पर उन्होंने भी सपत्नीक हल चलाया था। सीता की प्राप्ति के साथ ही जलवर्षण हुआ था। फिर कभी जनक के राज में अकाल नहीं पड़ा। एक बात उभरकर आती है, वह यह कि हमारे यहाँ प्रजापालक राजा भी जीवन पर गहराते संकट के समय कर्म में प्रवृत्त होने से नहीं हिचकिचाता। कर्म ने तो भाग्य तक बदले हैं। खाकपति को लाखपति बना दिया है। ऐसे ही दुर्दिनों में गाँव की सारी स्त्रियाँ खेतों में इस कर्म-भावना से आकर पुरुष कर्म करती हैं कि अवसर आने पर वह भी पुरुष की ही भाँति जीवन-पथ में संकल्प-शक्ति बनकर खड़ी हो सकती हैं। दूसरे वे बादलों के पुरुषत्व के सामने भी चुनौती बनकर खड़ी होती हैं। जब नारियाँ चूल्हे-चौके से निपटकर हल, बख्खर और कोलपा चलाने लगें, तब तो निसेड़ा बादल पसीजेगा और सहस्त्र बूँदों में धरती की देह में फसलों में फुरफुरी पैदा करेगा। युग-युग का सत्य अनेक स्तरों पर बूँदों की अर्थवत्ता में अभिव्यक्त होता रहा है।

इस देश की माटी का बेटा जब आकाश का 'सास्तर' बाँचता है, तो उसमें से कल्मष-रहित सार निकालता है। इस सार को लोक के दीपक में भरकर जीवन की जोत को अविराम और निष्कंप प्रकाश-ऊर्जा देता है। यह प्रकाश बीज का मार्ग प्रशस्त करता है। बीज की अवधारणा अनंत के ओर-झोर तक फैली है और उसकी जड़े वसुधा के गर्भ में गहराई तक धँसी हैं। ब्रह्म शून्य है। निखिल ब्रह्मांड में स्वयं को अकेला पा शून्य के शून्य में 'एको हं बहुस्यामि' की इच्छा के बादलों की गड़गड़ाहट गूँजी। इस सृष्टि को चराचर से लबरेज करने की बिजली कौंधी। अपने गौत्र को भू-जल-नभ में निर्बाध संचरण करते देखने की इच्छाओं की बरसात झरी। उसी क्षण जीव का बीज में जन्म हुआ और विस्तृत भूमि पर उसे बो दिया। सूरज अँधेरा छाँटने लगा। चाँद नम्र छुवन से विरामदायनी संध्या की कालिमा को तिल-तिल काटने लगा। प्राण के हिलकोरों के लिए वायु बह निकली। जीवन को निरंतर पारिभाषित करते रहने हेतु निर्मल नीर झरने लगा। इसी सृष्टि से समांतर सृष्टि मनुष्य वसुंधरा में बीज बोकर करता है। जीव जन्मता है। दूधो नहाता है। पूतो फलता है। काल-कवलित हो जाता है। सृष्टि शेष रहती है। नए जन्म के रूप में जीवन फिर क्षितिजों को नापने चल पड़ता है। यही क्रम समान स्तर पर बीज, अँकुरण, पौधा, फसल, फूल, बीज और पुनः अंकुरण के रूप में निरवधि चलता है। यह रचना क्षण-क्षण का इतिहास लिखने वाली काल के फलक पर जीवित कविता है।

मानसून की पहली वर्षा के साथ ही बीजों की बुआई शुरू होती है। भारतीय किसान यह कार्य एक यज्ञ की तहर संपन्न करता है। बैलों के कंधों पर कर्म की 'तीफन' रखकर प्रिया सहित यह अनुष्ठान पूरा करता है। पाँव-पाँव सरकते वर्तमान की जमीन पर वह मधुरतम कामनाओं के बीज बोता है। वर्षा की बूँद के साथ ही उसकी देह पिघलती है। अंकुरों के गोड़ में वर्षा का पानी और किसान का पसीना एक साथ गिरते हैं। ताकि भविष्य लहलहाती फसलों के रूप में नाँच सके। रूखे होठों पर हँसी बिरम सके। अभावों के कारण कुड़-मुड़ चेहरों की रंगत बदल सके। गोरी के पाँवों में महावर लग सके। बिटिया को हल्दी चढ़ सके। मुनुवा के बस्ता-पट्टी सज सके। चूल्हा चहके। थाली महके। पहरेदार बने बेईमान बहीखातों के नाशमिटे पन्नों पर लकीर फेर सकें। बारूद-टिकी हवेली के किवाड़ किरचे-किरचे हो सकें।

किसान अपनी फसल को संतान की तरह पालता है। अँगुलियों के पोर-पोर से फसलों के रेशे-रेशे को स्पर्श का सगापन देकर लहू से संवर्धित करता है। फसल के तंतु-तंतु और किसान की रग-रग में श्रोणित की धार एक साथ कल-कल बहती है। धरणी, फसल और कृषक की सम्यक क्रियाओं का समवेत रूप मानवीय संस्कारों में भोली रचनात्मकता घोलता गया। उसी से जन्मी है - यह किसलयवर्णी मानव संस्कृति। सनातन संस्कृति। इस अन्नगंधी जीवन-पद्धति में चंदन की शीतलता है। समय के छलावे के खिलाफ जुझारू वृत्ति के साथ ताबड़तोड़ खड़े होने का अदम्य साहस है। इसलिए आज भी यह बीज संस्कृति, फसल संस्कृति, कृषक संस्कृति, अर्थव्यवस्था और प्राण-पुराण के केंद्र में बैठी है। ये बदरा, ये मेघा, इसके भी प्राण हैं। रसभरी बुंदियाँ पड़ती हैं, तो उसकी पलकें खुलती हैं। फुहारें पड़ती हैं, तो भीगी लटें छितराती हैं। सावन-सेवरे आकर इसके गीले आँचल को आक्षितिज पसार देते हैं। पछुआ और पुरवैया इस संस्कृति के सुर से भू-नभ को जोड़ती है। अतः कृषक बादलों के पंथ बुहारा करता है।

जब मैं ठेठ आषाढ़ और सावन में आसमान को बुढ़भस जोगी-सा हरकतविहीन पाता हूँ तथा सूर्यास्त के बाद देर तक पश्चिमाकाश को लाल और लाल होते देखता हूँ, तो सोचता हूँ सब कुछ कितना अशुभ घट रहा है। पलक झपकते यह रंग सड़कों पर उतर आता है। अँकुर कुचले जाते हैं, फसलें रौंदी जाती हैं। पेड़ों की शाखें काटी जाती हैं। खेत बदरंग हो जाते हैं सड़कें, गली, चौराहे लाल रंग से लथपथ हो उठते हैं। दुबके-दुबके, सहमे-सहमे, नंग-धड़ंग बच्चे हाथ हिला-हिलाकर बादलों को हाँक लगाते हैं - ''बरसो बद्दल बाबा ऐसे बरसो कि यह बेहूदा रंग सफाचट्ट हो जाए। नदी-नहरों में खून की जगह पानी बहे।'' मेरी आँखें आकाश में लिखी विश्वास भरी पंक्ति बाँचती हैं कि कम-से-कम इन निश्छल तथा रंगहीन बच्चों की पुकार पर तो ऐसा कुछ होगा। बादल बरसेंगे। मानवता हँसेगी। सृष्टि सुंदर बनेगी।


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