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कविता

लाओ
महेश वर्मा


कोई चीज़ लाओ
जिसको कोई न जानता हो
जिसके बारे में कुछ बताने की असफलता
को भी कोई समझ न पाए

वह ज्ञान, तर्क, अनुभूति और अध्यात्म
सबको धता बताती हुई
पहली बार की तरह आए
जब वह आए तो कोई परिपाटी न हो उसकी

उसकी आराधना करने
उसकी हत्या करने
उससे डरने, प्यार करने, नफ़रत करने की
कोई वज़ह ही नहीं हो पहले से

समय उसके बाद शुरू हो या न हो

फिर चाहे तो भाषा आए

उसे इस तरह लाओ कि उसे लाने का कोई तरीका
तुम्हें मालूम नहीं था, वज़ह भी नहीं
उसकी कोई देह थी या नहीं किसी को मालूम नहीं था
इंद्रियों से उसके संबंध भी अज्ञात ही थे

उस ऐसे लाओ कि कोई उपमा न दे पाए
वह कहीं से भी लाई जाए या कहीं नहीं से भी
वह कण हो या अंतरिक्ष,
आंतरिक हो या बाह्य
कुछ भी हो ना हो

उसे लाओ।

 

 


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