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विमर्श

दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रह का इतिहास
द्वितीय खंड

मोहनदास करमचंद गांधी

अनुक्रम

अनुक्रम 1. जनरल स्‍मट्स का विश्‍वासघात (?)     आगे

पाठकों ने हमारी आंतरिक मुसीबतों का थोड़ा दर्शन किया। उनका वर्णन करने में मुझे अधिकतर अपनी आत्‍मकथा ही देनी पड़ी। परंतु यह अनिवार्य था, क्‍योंकि सत्‍याग्रह से संबंधित मेरी मुसीबतें सत्‍याग्रहियों की भी मुसीबतें हो गई थीं। अब हम फिर से बाहरी मुसीबतों का विचार करें।

इस प्रकरण का शीर्षक लिखते हुए मुझे शर्म आई है और यह प्रकरण लिखते समय भी शर्म आती हैं, क्‍योंकि इसमें मानव-स्‍वभाव की वक्रता का वर्णन हुआ है। सन 1908 में भी जनरल स्‍मट्स दक्षिण अफ्रीका के सबसे होशियार नेता माने जाते थे। और आज वे सारी दुनिया में न सही परंतु ब्रिटिश साम्राज्‍य में तो ऊँची श्रेणी के कार्यकुशल पुरुष माने जाते हैं। उनकी महान शक्तियों और योग्‍यताओं के बारे में मुझे कोई शंका नहीं है। वे जितने कुशल वकील है उतने ही कुशल सेनापति हैं और उतने ही कुशल शासक हैं। दक्षिण अफ्रीका में दूसरे तो अनेक शासक आए और गए। परंतु सन 1907 से लेकर आज तक यह पुरुष दक्षिण अफ्रीकी सरकार की लगाम अपने हाथ में सँभाले हुए है। और आज भी ऐसा कोई पुरुष दक्षिण अफ्रीका में नहीं है, जो उनकी स्‍पर्धा में खड़ा हो सके। यह प्रकरण लिखते समय मुझे दक्षिण अफ्रीका को छोड़े 9 वर्ष हो चुके हैं। आज जनरल स्‍मट्स के लिए दक्षिण अफ्रीका किस विशेषण का प्रयोग करता है, यह मैं नहीं जानता। उनका अपना (क्रिश्चियन) नाम जेन है और दक्षिण अफ्रीका के लोग उन्‍हें 'स्लिम जेनी' के नाम से पुकारते हैं। यहाँ 'स्लिम' का अर्थ है 'छटक जाए ऐसा', 'पकड़ में न आए ऐसा'। गुजराती भाषा का (और हिंदी भाषा का) इससे मिलता-जुलता शब्‍द है 'धूर्त'; अथवा मीठा विशेषण काम में लें तो उलटे अर्थ में है 'चालाक'। अनेक अँग्रेज मित्रों ने मुझसे कहा था : ''जनरल स्‍मट्स से तुम सावधान रहना। वे बड़े घाघ हैं। उन्‍हें बदल जाने में देर नहीं लगती। उनके शब्दों का अर्थ वे ही समझ सकते हैं। वे प्रायः कुछ ऐसे ढंग से बोलते हैं कि दोनों पक्ष उनके शब्दों का खुद को प्रिय लगनेवाला अर्थ कर सकते हैं। इसके सिवा, मौका आने पर वे स्‍वयं दोनों पक्षों के अर्थ को एक ओर रखकर कोई तीसरा ही अर्थ बताते हैं, उस पर अमल करते हैं और उसके समर्थन में ऐसी चतुराई भरी दलील देते हैं कि दोनों पक्ष थोड़ी देर के लिए तो यही मानने लगते हैं कि उन्‍होंने अर्थ करने में भूल की होगी और जनरल स्‍मट्स अपने शब्दों का जो अर्थ करते हैं वही सच्‍चा है!'' इस प्रकरण में मुझे जिस विषय का वर्णन करना है उसे - यह घटना जब घटी तब - हमने विश्‍वासघात माना और कहा था। आज भी कौम की दृष्टि से मैं उसे विश्‍वासघात ही मानता हूँ। इसके बावजूद शीर्षक में विश्‍वासघात शब्‍द के बाद मैंने प्रश्‍न का चिह्न रखा है। इसका कारण यह है कि वास्‍तव में शायद जनरल समट्स का कार्य जान-बूझ कर किया हुआ विश्‍वासघात न हो; और जहाँ घात का इरादा न हो वहाँ विश्‍वास का भंग कैसे माना जाए? 1913-14 में जनरल स्‍मट्स का मुझे जो अनुभव हुआ था उसे मैंने उस समय कड़वा नहीं माना था और आज भी, जब मैं उस पर अधिक तटस्‍थता से सोच सकता हूँ, मैं उसे कड़वा नहीं मान सकता। यह सर्वथा संभव है कि जनरल स्‍मट्स द्वारा 1908 में हिंदुस्‍तानियों के प्रति किया हुआ व्‍यवहार जानबूझ कर किया हुआ विश्‍वास भंग न हो।

इतनी प्रस्‍तावना जनरल स्‍मट्स के प्रति न्‍याय करने के लिए और फिर भी उनके नाम के साथ मैंने शीर्षक में विश्‍वासघात शब्‍द का जो उपयोग किया है उसका तथा इस प्रकरण में मुझे जो कुछ कहना है उसका बचाव करने के लिए मैंने यहाँ दी है।

पिछले प्रकरण में हमने देखा कि हिंदुस्‍तानियों ने ट्रान्‍सवाल सरकार को संतोष हो इस तरीके से खुद होकर परवाने ले लिए थे। अब उस सरकार को खूनी कानून रद करना चाहिए था; और यदि वह ऐसा करती तो सत्‍याग्रह की लड़ाई बंद हो जाती। इसका अर्थ यह नहीं कि ट्रान्‍सवाल में हिंदुस्‍तानियों के विरुद्ध जो भी कानून अमल में थे वे सब रद हो जाते अथवा हिंदुस्‍तानियों के सारे दुख दूर हो जाते। उन्‍हें दूर कराने के लिए तो पहले की तरह हिंदुस्‍तानियों को वैधानिक लड़ाई चलानी ही थी। सत्‍याग्रह खूनी कानून रूपी नए काले भयंकर बादल को दूर कराने तक ही सीमित था। इस कानून को यदि स्‍वीकार कर लिया जाता, तो कौम के नाम पर कलंक लगता तथा पहले ट्रान्‍सवाल से और अंत में संपूर्ण दक्षिण अफ्रीका से हिंदुस्‍तानियों का अस्तित्‍व ही मिट जाता। लेकिन खूनी कानून रद करने के बजाय जनरल स्‍मट्स ने नया ही कदम उठाया। उन्‍होंने विधानसभा में जो नया बिल पेश किया उसके द्वारा खूनी कानून को बहाल रखा और स्‍वेच्‍छा से लिए गए परवानों को कानूनी करार दिया। साथ ही, उस बिल में यह धारा भी जोड़ी कि जिन हिंदुस्‍तानियों ने स्‍वेच्‍छा से परवाने ले लिए हैं, उन पर खूनी कानून लागू नहीं किया जा सकता। इसका मतलब यह हुआ कि एक ही हेतु सिद्ध करनेवाले दो कानून साथ साथ चलें और ट्रान्‍सवाल में नए आनेवाले हिंदुस्‍तानियों पर या नए परवाने लेनेवाले हिंदुस्‍तानियों पर भी खूनी कानून लागू हो।

इस नए बिल को पढ़कर मैं तो हक्‍का-बक्‍का हो गया। कौम को मैं क्‍या जवाब दूँगा? जिन पठान भाइयों ने जोहानिसबर्ग में हुई मध्‍य रात्रि की सभा में मुझ पर भयंकर आरोप लगाए थे, उन्‍हें कितना बढ़िया भोजन मिल गया? लेकिन मुझे कहना चाहिए कि इस गंभीर आघात से सत्‍याग्रह पर मेरा विश्‍वास शिथिल पड़ने की अपेक्षा अधिक दृढ़ हुआ। मैंने हमारी कमेटी की सभा बुलाई और उसके सदस्‍यों को नई परिस्थिति समझाई। कुछ ने मुझे ताना भी मारा : ''हम तो आपसे कहते ही आए हैं कि आप बड़े भोले हैं। कोई आदमी जो भी कहता है उस पर आप विश्‍वास कर लेते हैं। आप अगर अपने निजी कामकाज में ही इतने भोले रहें, तो हमें उसकी चिंता नहीं। लेकिन आप कौम के काम में भी भोलापन दिखाते हैं, इससे कौम को मुसीबतें भोगनी पड़ती हैं। अब कौम के लोगों में पहले का जोश और उत्‍साह फिर पैदा हो, यह हमें तो बहुत कठिन मालूम होता है। हमारी कौम को तो आप अच्‍छी तरह जानते हैं। वह सोडा वाटर की बोतल जैसी है। उसके भीतर क्षणिक जोश का जो उफान आता है, उसका हमें यथासंभव अच्‍छे से अच्‍छा उपयोग करना चाहिए। वह उफान ठंडा पड़ा कि सब कुछ खतम हुआ।''

इन शब्‍द बाणों में कोई जहर नहीं था। ऐसी बातें मैंने दूसरे अवसरों पर भी सुनी थीं। इसलिए मैंने हँसते हँसते उत्तर दिया : ''आप लोग जिसे मेरा भोलापन कहते हैं, वह तो मेरा अभिन्‍न अंग बन गया है। वह भोलापन नहीं किंतु विश्‍वास है। और मैं मानता हूँ कि अपने मानव-बंधुओं पर विश्‍वास रखना मेरा और आपका भी कर्तव्‍य है। फिर भी अगर आप इसे मेरा दोष समझते हैं और ऐसा मानते हैं कि मेरी सेवा से कौम को कोई लाभ होता है, तो फिर मेरे दोष से होनेवाला नुकसान भी आपको सहन करना चाहिए। इसके सिवा, आपकी तरह मैं यह भी नहीं मानता कि कौम का जोश सोडा वाटर के उफान जैसा है। कौम में आपका और मेरा भी समावेश होता है। मेरे उत्‍साह और जोश के लिए आप ऐसा विशेषण लगाएँ, तो उसे मैं अवश्‍य ही अपना अपमान समझूँगा और मेरा विश्‍वास है कि आप लोग भी अपने को इसका अपवाद ही मानते होंगे। और यदि आप अपने को इसका अपवाद न मानते हों और अपने गज से ही कौम का माप निकालते हों, तो आप कौम का अपमान करते हैं। ऐसी महान लड़ाइयों में उतार-चढ़ाव तो आते ही रहते हैं। आपने विरोधी से चाहे जितनी स्‍पष्‍टता कर ली हो, फिर भी अगर वह विश्‍वास को तोड़ने पर ही तुल जाए, तो आप उसे कैसे रोक सकते हैं? इस मंडल में ऐसे अनेक लोग हैं, जो मेरे पास दावा करने के लिए प्रामिसरी नोट लेकर आते हैं। प्रामिसरी नोट पर अपने दस्‍तखत करके हाथ कटवा देने से अधिक स्‍पष्‍टता और असंदिग्धता दूसरी क्‍या हो सकती है? लेकिन ऐसे लोगों के खिलाफ भी अदालत में लड़ना पड़ता है। ऐसे लोग मुकदमों का विरोध करते हैं, अनेक प्रकार से अपना बचाव करते हैं, उनके खिलाफ फैसले होते हैं और जब्तियाँ निकाली जाती हैं। ऐसी अनुचित और अशोभनीय घटनाओं के लिए क्‍या गारंटी है, जिससे वे दुबारा न हो सकें? इसलिए मेरी तो आपको यही सलाह है कि जो समस्‍या खड़ी हुई है उसे हम धैर्य और शांति से हल करने का प्रयत्‍न करें। हमें इस बात का ही विचार करना चाहिए कि यदि फिर से लड़ाई लड़नी पड़े तो हम क्‍या कर सकते हैं - अर्थात दूसरे लोग क्‍या करेंगे इसका विचार न करके प्रत्‍येक सत्‍याग्रही को यह सोचना चाहिए कि वह स्‍वयं क्‍या करेगा या क्‍या कर सकेगा। मुझे तो लगता है कि यदि हम इतने लोग सच्‍चे रहेंगे तो दूसरे भी सच्‍चे रहेंगे, और यदि कोई कमजोरी उनमें पैदा हुई होगी तो हमारे उदाहरण से वे अपनी कमजोरी को दूर करके बल प्राप्‍त करेंगे।''

मुझे लगता है कि फिर से लड़ाई छिड़ने की संभावना के बारे में जिन लोगों ने शुभ हेतु से ताना मारकर अपनी शंका प्रकट की थी वे समझ गए थे। इस अवसर पर सेठ काछलिया दिनोंदिन अधिक मात्रा में अपना तेज और बल प्रकट कर रहे थे। वे हर प्रश्‍न पर कम से कम बोलकर अपना विश्‍वास बता देते थे और उस पर अटल रहते थे। मुझे ऐसा एक भी अवसर याद नहीं है जब उन्‍होंने कमजोरी दिखाई हो या अंतिम परिणाम के विषय में शंका भी प्रकट की हो। एक समय ऐसा आया जब ईसप मियाँ ने तूफानी समुद्र में कौम का कर्णधार बनने से इनकार कर दिया। उस समय हम सबने एकमत से काछलिया का अपने कर्णधार के रूप में स्‍वागत किया। तब से लेकर लड़ाई की अंतिम घड़ी तक उन्‍होंने अपना हाथ पतवार से कभी हटाया नहीं। और जो मुसीबतें शायद ही कोई मनुष्‍य बरदाश्‍त कर सके, वे सब उन्‍होंने निश्चिंत और निर्भय होकर बरदाश्‍त कीं। जब लड़ाई आगे बढ़ी तब एक समय ऐसा भी आया कि कुछ लोगों के लिए जेल में जाना तो बहुत आसान था - एक तरह का आराम था, जब कि बाहर रहकर सारी बातों की सूक्ष्‍मता से जाँच करना, उनकी व्‍यवस्‍था करना और अनेक तरह के लोगों को समझाना और उनके साथ व्‍यवहार करना बहुत कठिन था।

आगे चलकर गोरे साहूकारों ने काछलिया को अपने शिकंजे में पकड़ा। दक्षिण अफ्रीका में अनेक हिंदुस्‍तानी व्‍यापारी गोरे व्‍यापारियों की पेढ़ियों पर आधार रखते हैं। वे बिना किसी जमानत के लाखों रुपये का माल हिंदुस्‍तानी व्‍यापारियों को उधार देती हैं। हिंदुस्‍तानी व्‍यापारी गोरे व्‍यापारियों का ऐसा विश्‍वास प्राप्‍त कर सके, यह हिंदुस्‍तानियों के व्‍यापार की सामान्‍य प्रामाणिकता का एक सुंदर प्रमाण है। काछलिया सेठ पर भी बहुत सी गोरी पेढ़ियों का कर्ज था। गोरे व्‍यापारियों ने, ट्रान्‍सवाल सरकार के प्रत्‍यक्ष या परोक्ष रूप में भड़काने की वजह से, काछलिया से अपना पैसा तुरंत चुका देने की माँग की। उन्‍होंने काछलिया को बुलाकर कहा भी : ''अगर आप सत्‍याग्रह की लड़ाई से हट जाएँ, तो हमें अपने पैसे की कोई जल्‍दी नहीं है। लेकिन अगर आप लड़ाई से न हटे, तो हमें डर है कि सरकार आपको कभी भी गिरफ्तार कर सकती है। उस हालत में हमारे पैसे का क्‍या होगा? इसलिए आप अगर इस लड़ाई से हट ही न सकें, तो हमारे पैसे आपको तुरंत चुका देने चाहिए।'' वीर काछलिया ने उत्तर दिया : ''हिंदुस्‍तानियों की लड़ाई में भाग लेना मेरा व्‍यक्तिगत मामला है। उसका मेरे व्‍यापार के साथ कोई संबंध नहीं। उस लड़ाई में मेरा धर्म, मेरी कौम का सम्‍मान और मेरा अपना स्‍वाभिमान समाया हुआ है। आपने मुझे माल उधार दिया, इसके लिए मैं आपका आभार मानता हूँ। परंतु इस बात को या अपने व्‍यापार को मैं सर्वोपरि नहीं मान सकता। आपके पैसे मेरे पास सोने की मुहरों की तरह सुरक्षित हैं। मैं जिंदा हूँ तब तक खुद बिक कर भी आपके पैसों की भरपाई करूँगा। और मान लीजिए कि मुझे कुछ हो गया, तो भी आप समझ रखें कि मेरा माल और उगाही तो आपके हाथ में ही है। इसलिए मैं चाहता यह हूँ कि जिस तरह आज तक आपने मुझपर विश्‍वास रखा है, उसी तरह आगे भी रखें।'' यद्यपि यह दलील बिलकुल उचित थी और काछलिया की दृढ़ता गोरे व्‍यापारियों के लिए विश्‍वास का एक अधिक कारण थीं, फिर भी उसका प्रभाव उस समय व्‍यापारियों पर नहीं पड़ा। हम सोते आदमी को तो जगा सकते हैं, लेकिन जो आदमी जागते हुए भी सोने का ढोंग करता हो उसे नहीं जगा सकते। यही हाल गोरे व्‍यापारियों का था। उन्‍हें तो काछलिया को दबाना था, झुकाना था; वर्ना उनका पैसा बिलकुल सुरक्षित था।

22 जनवरी, 1909 को मेरे ऑफिस में गोरे साहूकारों की एक सभा हुई। उनसे मैंने स्‍पष्‍ट शब्दों में कहा कि काछलिया पर वे जो दबाव डाल रहे हैं, उसमें व्‍यापार की नीति नहीं परंतु राजनीति है। राजनीतिक चाल व्‍यापारियों को शोभा नहीं देती। लेकिन वे नाराज हो गए। मेरे पास काछलिया सेठ के माल की और उनकी उगाही की फेहरिस्‍त थी। वह मैंने उन लोगों को दिखाई और उसके आधार पर यह सिद्ध कर दिया कि उनका शत-प्रतिशत पैसा उन्‍हें मिल सकता है। और अगर वे का‍छलिया का व्‍यापार किसी दूसरे को बेचना चाहें, तो काछलिया अपना सारा माल और सारी उगाही भी खरीदार को सौंप देने के लिए तैयार हैं। अगर ऐसा न करना चाहें तो गोरे व्‍यापारी जो माल काछलिया की दुकान में है उसे मूल भाव से ले लें; और ऐसा करने पर भी कुछ पैसा कम मिले, तो उसके बदले वे पसंद करें वैसी उगाही ले लें। पाठक समझ सकेंगे कि मेरा यह प्रस्‍ताव स्‍वीकार करने से गोरे व्‍यापारियों को कुछ भी खोना न पड़ता (और मेरे अनेक मुवक्किलों के लिए आर्थिक संकट के समय साहूकारों के साथ मैं ऐसी व्‍यवस्‍था कर सका था)। लेकिन इस अवसर पर गोरे व्‍यापारी न्‍याय नहीं चाहते थे। वे तो काछलिया को झुकाना चाहते थे। पर काछलिया झुके नहीं, इसलिए दिवालिया कर्जदार घोषित कर दिए गए।

यह दिवालियापन काछलिया के लिए कलंक-रूप नहीं था, बल्कि उनका भूषण था। इससे कौम के लोगों में उनकी प्रतिष्‍ठा बढ़ी और उनकी दृढ़ता तथा वीरता के लिए सब लोगों ने उन्‍हें बधाई दी। परंतु इस प्रकार की वीरता अलौकिक कही जाएगी। सामान्‍य मनुष्‍य उसे समझ ही नहीं सकता। दिवालियापन दिवालियापन न रहकर, बदनामी न रहकर, आदर और प्रतिष्‍ठा की वस्‍तु भी बन सकता है, इसकी कल्‍पना भी सामान्‍य मानव को नहीं आ सकती। परंतु काछलिया को यही बात स्‍वाभाविक लगी। अनेक हिंदुस्‍तानी व्‍यापारी केवल दिवालिएपन के डर से ही खूनी कानून के सामने झुक गए थे। काछलिया चाहते तो दिवालिएपन से बच सकते थे। सत्‍याग्रह की लड़ाई से हट जाना तो इससे बचने का उपाय था ही। लेकिन यहाँ मैं उसकी बात नहीं कर रहा हूँ। काछलिया के बहुत से हिंदुस्‍तानी मित्र ऐसे थे, जो इस संकट के समय उन्‍हें पैसे उधार दे सकते थे। लेकिन ऐसी व्‍यवस्‍था करके यदि उन्‍होंने अपने व्‍यापार को बचाया होता, तो उनकी बहादुरी लज्जित होती। जेल जाने का जो खतरा उनके सिर पर था, वह तो सभी सत्‍याग्रहियों के सिर पर था। इसलिए किसी सत्‍याग्रही से पैसे लेकर वे गोरों को चुकाते, तो यह उन्‍हें शोभा न देता। लेकिन जिस प्रकार सत्‍याग्रही व्‍यापारी उनके मित्र थे उसी प्रकार खूनी कानून के सामने झुकनेवाले व्‍यापारी भी उनके मित्र थे। मैं जानता हूँ कि इनकी मदद काछलिया को मिल सकती थी। जहाँ तक मुझे याद है, ऐसे एक-दो मित्रों ने उनसे कहलवाया भी था। लेकिन उनकी मदद लेना यह स्‍वीकार करने के बराबर था कि खूनी कानून के सामने झुकने में बुद्धिमानी है। इसलिए हम दोनों ने यह निर्णय किया कि ऐसी मदद कभी नहीं ली जा सकती। इसके सिवा, हम दोनों ने यह भी सोचा कि अगर काछलिया खुद को दिवालिया घोषित होने दें, तो उनका दिवालियापन दूसरों के लिए एक ढाल का काम करेगा; क्‍योंकि दिवालिएपन के शत-प्रतिशत नहीं तो 99 प्रतिशत मामलों में तो लेनदारों को कुछ न कुछ खोना ही पड़ता है। यदि 50 प्रतिशत रकम भी मिल जाए तो वे खुश होते हैं और 75 प्रतिशत मिल जाए तब तो शतप्रतिशत मिली जैसा ही मान लेते हैं; क्‍योंकि दक्षिण अफ्रीका के बड़े बड़े व्‍यापारी सामान्‍यतः 6.25 प्रतिशत मुनाफा नहीं लेते, परंतु 25 प्रतिशत लेते हैं। इसलिए 75 प्रतिशत रकम मिल जाए तब तक वे उसे घाटे का व्‍यापार मानते ही नहीं। लेकिन दिवालिएपन में शत-प्रतिशत रकम तो शायद ही कभी मिलती है, इसलिए कोई भी लेनदार कर्जदार को दिवालिया बनाने की कभी इच्‍छा नहीं रखता।

इसलिए काछलिया के दिवालिएपन से इस बात की संभावना थी कि गोरे व्‍यापारी दूसरे सत्‍याग्रही व्‍यापारियों को धमकी देना बंद कर दें। और हुआ भी ऐसा ही। गोरे व्‍यापारियों का उद्देश्‍य काछलिया को सत्‍याग्रह की लड़ाई से हटाना था और अगर वे ऐसा न करें तो उनसे शतप्रतिशत नकद पैसा वसूल करना था। लेकिन दोनों में से उनका एक भी उद्देश्‍य पूरा न हुआ, बल्कि उनकी आशा से उलटा ही परिणाम आया। किसी प्रतिष्ठित हिंदुस्‍तानी व्‍यापारी द्वारा दिवालिएपन का स्‍वागत होने का यह पहला उदाहरण देखकर गोरे व्‍यापारी स्‍तब्‍ध रह गए और सदा के लिए शांत हो गए। एक वर्ष के भीतर गोरे व्‍यापारियों को काछलिया सेठ के माल से शत-प्रतिशत पैसा मिल गया। दिवालिएपन में शत-प्रतिशत पैसा मिलने का मेरी जानकारी में तो दक्षिण अफ्रीका में यह पहला ही उदाहरण था। इस कारण से सत्‍याग्रह की हमारी लड़ाई चल रही थी उसी बीच गोरे व्‍यापारियों में भी काछलिया का सम्‍मान खूब बढ़ गया और उन्‍हीं व्‍यापारियों ने लड़ाई के चालू रहते हुए भी काछलिया को चाहे जितना माल उधार देने की तैयारी दिखाई। परंतु काछलिया का बल तो उत्तरोत्तर बढ़ता ही जाता था। सत्‍याग्रह के रहस्‍य को भी वे समझ ही चुके थे। अब तो कोई भी यह नहीं कह सकता था कि लड़ाई कब तक चलेगी; इसलिए दिवालियापन घोषित हो जाने के बाद हमने निश्‍चय कर लिया था कि लड़ाई के दौरान सेठ काछलिया बड़े व्‍यापार में न पड़ें। कोई गरीब आदमी अपना खर्च चला सके इतना ही पैसा पैदा करने लायक व्‍यापार करना और बाकी व्‍यापार लड़ाई के समय में नहीं करना - ऐसा निश्‍चय काछलिया ने किया था। इसलिए गोरे व्‍यापारियों ने जो सुविधाएँ उन्‍हें दीं, उनका उपयोग उन्‍होंने नहीं किया।

पाठक यह बात तो समझ लेंगे कि काछलिया सेठ के जीवन की जिन घटनाओं का वर्णन मैंने यहाँ किया है, वे सब इस प्रकरण में उल्लिखित कमेटी की बैठक के बाद हुईं, ऐसा नहीं है। लेकिन उनका वर्णन एक ही स्‍थान पर देना ठीक होगा, ऐसा मानकर इस प्रकरण में मैंने उन्‍हें स्‍थान दिया है। तारीख के हिसाब से देखा जाए तो सत्‍याग्रह की दूसरी लड़ाई शुरू हुई (10 सितंबर 1908) उसके कुछ समय बाद काछलिया सेठ अध्‍यक्ष बने और उसके लगभग पाँच महीने बाद उन्‍हें दिवालिया घोषित किया गया।

लेकिन अब हम कमेटी की बैठक के परिणामों पर आएँ। उस बैठक के बाद मैंने जनरल स्‍मट्स को पत्र लिखा कि नया बिल सरकार और कौम के बीच हुए समझौते को भंग करता है। अपने पत्र में मैंने जनरल के उस भाषण की ओर भी उनका ध्‍यान खींचा था, जो उन्‍होंने समझौता होने के एक सप्‍ताह के भीतर रिचमंड में दिया था। उस भाषण में उन्‍होंने इन शब्दों का प्रयोग किया था : ''ये लोग (एशियावासी) एशियाटिक कानून रद करने के लिए मुझ से कहते हैं। लेकिन जब तक वे लोग स्‍वेच्‍छा से परवाने न ले लें तब तक वह कानून रद करने से मैंने इनकार कर दिया है।'' राजनीतिज्ञ ऐसी किसी बात का उत्तर नहीं देते, जो उन्‍हें उलझन में डाल दे। और यदि वे उत्तर देते भी हैं, तो वह गोल-गोल होता है। जनरल स्‍मट्स ने इस कला का पूर्ण विकास किया था। उन्‍हें आप चाहे जितना लिखें, चाहे जितने भाषण आप करें, लेकिन जब उनकी इच्‍छा उत्तर देने की न हो तब आप उनसे उत्तर निकलवा ही नहीं सकते। प्राप्‍त होनेवाले पत्रों का उत्तर उन्‍हें देना ही चाहिए, यह सामान्‍य शिष्‍टाचार उनके लिए बंधनकारक नहीं था। इसलिए मेरे लिखे पत्रों का उनकी ओर से मुझे कोई संतोषजनक उत्तर नहीं मिल सका।

मैं श्री आल्‍बर्ट कार्टराइट से मिला, जिन्‍होंने समझौते के समय सरकार के और हमारे बीच मध्‍यस्‍थ का काम किया था। उन्‍हें जनरल स्‍मट्स द्वारा प्रस्‍तुत नए बिल से गहरा आघात लगा। वे बोले : ''सचमुच, मैं इस आदमी को बिलकुल नहीं समझ सकता। मुझे अच्‍छी तरह याद है कि उसने एशियाटिक एक्‍ट रद करने का वचन दिया था। मैं अपनी शक्ति भर सब कुछ करूँगा। परंतु आप जानते हैं कि जब एक बार वह आदमी कोई निश्‍चय कर लेता है तो फिर उसके सामने किसी की कुछ नहीं चलती। अखबारों के लेखों की तो वह जरा भी परवाह नहीं करता। इसलिए मुझे पूरा डर है कि मेरी सहायता से आपको कोई लाभ नहीं होगा।'' मैं श्री हॉस्किन आदि से भी मिला। उन्‍होंने जनरल स्‍मट्स को पत्र लिखा। उन्‍हें भी अत्यंत असंतोषजनक उत्तर मिला। मैंने 'विश्‍वासघात' शीर्षक से 'इंडियन ओपीनियन' में लेख भी लिखे। लेकिन जनरल स्‍मट्स उनकी परवाह क्‍यों करने लगे? तत्वज्ञानी अथवा क्रूर आदमी के लिए आप चाहे जितने कड़वे विशेषणों का प्रयोग करें, उस पर उनका कोई असर नहीं पड़ता। वह तो अपना सोचा हुआ काम करने में जुटा रहता है। मैं नहीं जानता कि जनरल स्‍मट्स के लिए इन दो में से कौन से विशेषण का उपयोग किया जा सकता है। उनकी वृत्ति में एक प्रकार की दार्शनिकता है, यह तो मुझे स्‍वीकार करना ही चाहिए। जिस समय हम दोनों के बीच पत्र-व्‍यवहार चलता था और अखबारों में मेरे लेख छपते थे, उस समय तो मुझे याद है कि मैंने उन्‍हें निर्दय ही माना था। लेकिन उस समय सत्‍याग्रह की लड़ाई की पहली ही मंजिल थी। वह लड़ाई का दूसरा ही वर्ष था, जबकि लड़ाई तो पूरे 8 वर्ष चली थी। इस बीच मैं जनरल स्‍मट्स से कई बार मिला था। बाद की हमारी बातचीत पर से मुझे ऐसा लगने लगा था कि जनरल स्‍मट्स के कांइयाँपन के बारे में जो सामान्‍य मान्‍यता दक्षिण अफ्रीका में प्रचलित है उसमें परिवर्तन होना चाहिए। दो बातें मुझे स्‍पष्‍ट रूप से मालूम हुई : (1) अपनी राजनीति में उन्‍होंने कुछ सिद्धांत अपनाए हैं; और (2) वे सिद्धांत सर्वथा अनीतिमय तो नहीं ही हैं। लेकिन इसके साथ ही मैंने यह भी देखा कि उनके राजनीतिशास्‍त्र में चालाकी के लिए, और अवसर आने पर सत्‍याभास के लिए भी, स्‍थान है।


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