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निबंध

सूना
भगवतशरण उपाध्याय


सूना, भयानक सूना, जैसे विश्व सिमटकर इन चट्टानों की सीमाओं में आ गया हो, और उनमें मैं अकेला हूँ। जैसे अँधेरा होता है, घुप अँधेरा, वैसा ही यह सूना है। एक पत्ता नहीं, जो हिले, खड़खड़ाये, और गति का, जीवन का बोध हो। प्रकृति सूने में व्यभिचार नहीं उत्पन्न करना चाहती, इससे गोलाम्बर के नीचे , क्षितिज तक सूना है। एक परिन्दा नहीं, चिड़िया का पूत नहीं, शायद हवा तक नहीं।

सालों, दशकों के सपने सही करने आया था। मित्र ने समान मित्र से कहा था,''बस, आपका काम उन्हें गिरफ्तार कर लाना है, मेरा उन्हें कैद में डाल देना।'' और मेरे उस प्यारे दोस्त ने मुझे उस खुली कैद में डाल ही दिया। काम बन्द, इस बड़े नगर में अनजाने देश में दोस्तों के अभाव में मिलना बन्द। गेस्ट-हाउस के ये लगातार चले गये ठोस-बड़े-गहरे-ऊँचे कमरे, जिनकी फर्श पत्थर की पट्टियों से ढकी, छत पत्थर की पट्टियों से ढकी, जोगिया रंग से रँगी मोटी दीवारें प्रभावत: जैसे जैसे पत्थर की पट्टियों से ढकी।

और ये कमरे, कुर्सियों, आराम-कुर्सियों, मेजों, छपरखटों, पलंगों, दरियों, गलीचों-गद्दियों से भरे, छतों से झाड़-फानूस लटकाये, और इन सब में अकेला मैं , फकत मैं, इन सारे कमरों में मैं अकेला। वसन्त निपट गया। पतझड़ आया। मार्च अप्रैल में खोया, पर अप्रैल एक डग न सरके, जैसे अभिशप्त मन्त्रजड़ सर्प।

सूने से दिन में डर लगने लगा। हाँ, लग सकता है डर दिन के सूने में भी, लगता है, लगने लगा था। लगता जैसे कुर्सियों पर कोई बैठ उठेगा, जैसे उनकी जड़ता सचेत हो उठेगी। और यह पलंग जिस पर सोता हूँ, दिन में पड़ा रहता हूँ, बेबस। और चुपचाप इसके ऊँचे सिरहाने-पैताने पर नजर डालता हूँ, बेचैनी में कभी पैताने सिर करता हूँ, कभी सिरहाने। पर वह डर जैसे घेरे-घेरे रहता है। ऊँचाई दोनों ओर की बराबर है, काले आबनूस की चिकनाहट स्याही के साथ अपना डरावना साया डाल देती है। लगता है, पलंग पर नहीं, ताबूत में सोया हूँ। आबनूसी ठोस सपाट सिरहाना-पैताना ताबूत का ही असर पैदा करते हैं। तूतनखामन जैसे जिन्दा पड़ा है, जिन्दा दरगोर , इस स्याही-पुते पलंग की गहरी चहारदीवारी में कैद, जिसकी ऊँची छत को आबनूस के ही खम्भे उठाये हुए हैं। काहिरा के अजायब घर की सहसा याद आ जाती है, उस ठोस सोने, ठोस लकड़ी के कमरानुमा ताबूत की, और तूतनखामन की 'ममी ' पर उसकी सोलह साल की प्यारी सुन्दर बीबी के छोड़े हार की, जिसके फूल कुम्हला गये थे। और यहाँ भी तो सामने उस तसवीर पर एक गजरा पड़ा है, जिसके फूल कुम्हला गये हैं, विवर्ण हो गये हैं।

और ये झाड़-फानूस, बेशकीमती झाड़-फानूस, जो एक गुजरी हुई दुनिया की याद दिलाते हैं। उस दुनिया के अँधेरे को इनकी हजार-हजार शमाएँ भी दूर न कर पाती थीं। पर जिन पर परिन्दे टूटते थे, शेर-गजलें-रुबाइयाँ पढ़ते थे। पर आज ये झाड़-फानूस भी जैसे मजार के सिंगार हो गये हैं , बुझे चिराग की लौ, अपनी बेबसी के शिकार। काश, उनके पैर होते! फिर इन कमरों के जंगल, कुर्सियों फूलदार मेजों के जाले भी उन्हें नहीं रोक पाते। झमझम करते उन्हें तोड़ते, खुद टूटते, चले जाते, इस कैद से दूर, जहाँ उन्हें कोई नहीं जानता, कोई न समझ पाता, उनके असमय की लँगड़ी रौनक पर जहाँ कोई मुसकराता नहीं।

और उन्हीं की तरह मैं भी कहीं नहीं जा पाता। इन्हीं कमरों की कतार में, जिस पर मैं भी जैसे बेबस टँक गया हूँ, छपरखट के ताबूत की गहराइयों में, और लगता है, उसी में दबा रहूँगा, कयामत तक। फिर यह कयामत भी कुछ आज नहीं आने वाली है! कोई शोख अँगड़ा भी नहीं पड़ता कि जिस्म की सारी रगें खिंच जायँ, कि ताबूतों में सदियों से पड़े तूतनखामन करवट ले लें, कि कब्रों की उभरी छाती दरक जाय।

दिन का साया साँझ के धुँधलके में खो जाता है। फिर साँय-साँय करती रात आती है, रात, चोर और चाँद लिये। चाँद कम ही आता है , चोर अधिक। रग-रग की सीवन में अँगड़ा कर सीवन जैसे तोड़ देता है, घाव हरे हो आते हैं। यादें बिसूरने लगती हैं। रात कटती नही। उल्लू पुकार उठता है। कुर्सियाँ, मेजें, पलंग जैसे जी उठते हैं। लगता है, उनमें कोई बैठा है , हर-एक में छायाएँ जैसे चलने लगती हैं। ताबूतों से भरा पिरामिड विकराल स्वर से रो उठता है।

बत्ती जलाता हूँ, सभी आधार बदस्तूर हैं, कुर्सी, पलंग खाली, सूने। बत्ती बुझा लेता हूँ , दिल को हाथोंमें भर करकोई मसल देता है। जिस्म का रोआँ-रोआँ खड़ा है। अपनी ही साँस तूफान भर लेती है। अकेली साँस, हवा का साजिश-भरा फितूर, ग्यारहों प्रान लिए फुस-फुसाती है। आँखें बन्द कर लेता हूँ, गोया अँधेरे में कुछ दीखता था, जो अब न दिखेगा।

और बेरौनक दिन निकल आता है, दिन, जिसकी सुबह तक जलाती है, जिस सुबह की किरन चमकते तीर की तरह आँखों को चीरती चली जाती है। जलती दुपहरी,यद्यपि इतनी नहीं जितनी हिंदुस्तान की। यह दकन है, हैदराबाद, जिसकी आसफजाही दुनिया गो आज बेरौनक है, कभी सूरज पर थूकती थी।

दुपहरी साँय-साँय, आधी रात-सी। पास के कमरे में एक कलाकार दो दिन से आ ठहरे हैं। साथ ही उनके कलावन्ती बीबी भी हैं। कभी-कभी महल के उन बच्चों की हँसी हवा के साथ इधर उड़ आती है, जो उनके पास आ जाते हैं। जब-तब-कुछ टख-टख की आवाज आती है, कैरम की मारी गयी गोट की आवाज-सी, और जब-तब कुछ खस-खसी आवाज, जब शायद कलावन्त-कला-वन्ती नये चित्र बनाने के लिए रंग फेटने लगते हैं। साथ ही मेरे मानस-चित्र भी बनने-बिगड़ने लगते हैं। कमरे के एकाकीपन से ऊब कर ऊपर चला जाता हूँ, छत पर। छत लम्बी है, बेइन्तहा लम्बी। सूना जैसे बिखर जाता है, क्योंकि वह कमरे का सूनापन नहीं है, दीवारों से बँधा-बँधा। पर है यह भी बँधा-ही-बँधा, गो इसकी दीवारें दूर के क्षितिज तक फैली हैं।

दाहिने वह अकेली सूखी पहाड़ी, जो दिन में सूरज की चमक लौटा कर मारती है, जिसके डर से कमरे की खिड़कियाँ दिन में बराबर बन्द रखता हूँ। वह अकेली पहाड़ी, जिसकी चोटी पर नीम गंगा खड़ा है। सामने बंजारा-हिल की पहाड़ियाँ बगैर सिलसिले के टूटती-बिखरती चली गयी हैं। दूर तक बियाबाँ फैला है। प्रकृति जैसे मुर्दा हो गयी है, निर्जीव। यह पास सामने किसी का बनता हुआ ऊँचा मकान है, मकबरे-सा सिर उठाता ही चला जा रहा है। रोज देखता हूँ, एक ईंट ऊपर चढ़ जाती है, आसमान की छाती में। किसी ने बताया, जिन्दा मुर्दों का गारा लगा है उसमें, हड्डियों की ईंटें लगी हैं।

दूर सामने चट्टानी ऊँचाई पर, चट्टानी बुनियाद पर भी वह अनेक बुर्जियों-वाली, अनगिनत कँगूरोंवाली इमारत है। उसमें आज दफ्तर भरे हैं, तुर्की पाशाओं की इमारत-सी उस आलीशान मंजिल में। पर हटा दो उसे भी मेरे सामने से। मेरी कैद पर वह हँसती है। मैं उधर से नजर फेर लेता हूँ। फेर कर उसी दाहिनेवाली पहाड़ी पर डालता हूँ, जिस पर ठूँठा नीम नंगा खड़ा है और जिसकी एक दीवार प्रधान मंत्री के निवास, शाहमंजिल की उघाड़ ढकती है।

और फिर बायें अनेक-अनेक पेड़ों पर नजर डालता हूँ जो सभी नंगे हैं। विशाल, पर नंगे, पीपल से सेमल तक। पीपल के अनेक दरख्त हैं, पर आज वे सभी बगैर पत्तों के ताज के ठूँठ खड़े हैं। पीपल को अश्वत्थ कहते हैं, सोचता हूँ। शायद कभी उसकी जड़ से , डाल से घोड़े बँधते थे। आज उन पर घंट बँधते हैं, उनकी डालियों से प्रेत झूलते हैं, उनकी छाया में पितर सोते हैं। विकराल ऊँचे पीपल, जो स्वंय भूत-से खड़े हैं, मादरजात नंगे। दी होगी इस पीपल ने गौतम को 'सम्यक् सम्बोधी', मुझे तो यह आक्रान्त करता है, इसकी दूर तक फैली डालियाँ, सब प्रेत की तरह मुझे जैसे दबोच लेती हैं।

सामने की पहाड़ियों की ओर निगाह लौटा लेता हूँ। नंगे पेड़ों से नंगी पहाड़ियों की ओर, नंगी पहाड़ियों से नंगे पेड़ों की ओर। चट्टानों से क्या मोह? पर पत्थर से भी कभी-कभी मोह हो जाता है। किसी ने कभी मुझसे कहा भी था, दर्द-भरी आह के साथ, किसी हसीना ने। नाम भी याद है, पर नाम जबान पर लाना मना है, न लाऊँगा। याद आयी जा रही है, जब इस दूर देश में अपनी सूनी कैद में इन चट्टानों को देखता हूँ, पत्थर को प्यार करने लग जाता हूँ। तो उसने कहा था-"देख इस अभागे को, इस मगरूर आलिम को ,दुनिया रंग-बिरंगे महकते फूलों से आबाद है, मह-मह कर रही है, और यह बुतों से इश्क करता है। यह कम्बख्त बुतपरस्त।"

आह, मेरी हसीन जालिम बुतशिकन! काश, तुम्हारे नाम का तारा टूट न गया होता! तुम अपनी टहनी पर होती और मैं अपनी इस कैद से लाचार न होता! पर तब कैद की लाचारी आड़े न आती। पत्थर की दीवारों को मैं तब तोड़ देता, पत्थर को प्यार न कर लौट पड़ता चमन की ओर, उन टहनियों की ओर , जिनकी बुलन्दी में वह मस्त टहनी नाचती होती, जिस पर तुम खिली थीं।

पर क्या पत्थर से, बुत से प्यार करना प्यार करना नहीं है? और मेरा मन इस हैदराबादी दुनिया से उचट पड़ता है, इसके सागरों-सरोवरों को लाँघ, जंगलों-पहाड़ों को लाँघ, मिस्र की ओर लपक जाता है, जहाँ की रेत में नील सात धारों में सोती है, जहाँ के मुर्दों के मुल्क में क्लियोपात्रा ने अपना अमर लोक बसाया था। कहाँ जा पहुँचा दिमाग? खाली सूनेपन को वही भरता जा रहा है। इसलिए क्लियोपात्रा। और क्लियोपात्रा क्यों? क्लियोपात्रा तो साधन-सहारा-मात्र थी। बात तो पत्थर की थी।

हाँ तो, पत्थर से प्यार की। और क्या पत्थर से कोई प्यार नहीं करता, जब नाजुक दिल संगमरमर बन जाता है? पर वह तो उत्प्रेक्षा की बात है। उसकी जाने दो, उसकी सुनो, उस मनचले ग्रीक की,जिसे बेआबरू कर दिया था। वह इतिहास की बात है, रोमांचक इतिहास की। क्लियोपात्रा ने, एक के बाद एक, रोमन जनरल को अपने रूप-जाल में डाल भोगा था, पाम्पे को दस बरस की आयु में, सीजर को बारह की आयु में। और अब यह अन्तोनी था, हमउम्र बाँका दिलेर अन्तोनी, जिसकी खुली छाती में उसने अपनी नुकीली ठुड्डी की चोट की थी। खुशी में ऐलान किया था - "कोई प्यार को ठुकरा नहीं सकता, न पशु, न मानव, न जड़, न चेतन।'' और उस तरुण ने अफ्रोदोती की मूरत को बेआबरू कर दिया!

फिर क्यों सोचता हूँ उस क्लियोपात्रा को? क्यों उसके जार को? क्योंकि तनहाई है, सूनापन है, जिसे भरना है और जिसे दूर नहीं कर पाता। और घने जाता हूँ। मन बेबस है, उड़ा जा रहा है सिकन्दरिया के उन महलों में, जहाँ से अन्तोनी अभी-अभी घोड़े पर उड़ गया है। पूछती है दासी से, "कैसे जा रहा है?" दासी कहती है, "उड़ा जा रहा है घोड़े पर''। फिर रानी जैसे शेक्सपियर उगल पड़ती है - "हैपी द हार्स टु बेयर द वेट ऑव ऐन्टनी।" कितना फूहड़, पर कितना पुरअसर , कितना सही।

रोम और सिकन्दरिया। सीजर और क्लियोपात्रा। क्लियोपात्रा रोम में। सीजर के 'विला' में। डायरी लिखती है - "रोम मुझ जादूगरनीरानी को देखने उमड़ पड़ा है। यह कौन है? चित्रा। यह दूसरा? कैसियस। और ये कतार में आखिरी ? ओक्तेवियस और उसका साथी अग्रिप्पा। ओक्तेवियस के चेहरे पर घृणा है, अग्रिप्पा अपनी गिद्ध की-सी आँखें मेरी छाती के उभार में घुमाये जा रहा है। जी चाहता है, कह दूँ, छेद दे, औरत की शक्ल के मर्द, मेरी छाती , पर मुझे मजबूर न कर।" क्लियोपात्रा डायरी में लिखती जाती है - "वरना कह दूँगी, तेरे करम, कि तू इस अपने साथी के साथ सोता है, इस ओक्तेवियस के साथ, जैसे अन्तोनी सीजर के साथ सोया, जैसे सीजर बिथूनिया के साथ सोया , जैसे सिसेरो ग्राचस के साथ सोया, और कि गुलाम स्पार्ता-कस की चोट अभी तुम्हारी पीठों पर है।" पर यह क्लियोपात्रा की डायरी की बात है, चाहे उस ओक्तेवियस के सम्बन्ध की ही क्यों न हो, जो बाद में ओगस्तस बना, चाहे उस अग्रिप्पा के सम्बन्ध की ही क्यों न हो, जो बाद में विश्वविजयी बना।

और वह दूर पहाड़ियों के पीछे सूरज यकायक डूब जाता है। उसका बिखेरा सोना क्षितिज को रंग देता है। मैं अभी देख रहा हूं उधर ही। उस रासेलस की तरह जिसकी कहानी डाक्टर जानसन ने लिखी है। बहुत दिनों पहले पढ़ी थी। सही-सही याद भी नहीं है, शायद रासेलस ही नाम था, शायद वह अबीसीनिया का शाहजादा था, पत्थर की दीवारों के पीछे कैद था, जैसे मैं भी आज कैद हूँ। उस रासेलस की याद बहुत आती है। बास्तिल के उस कैदी की भी, जो क्रान्ति के बाद जेल में लाये जाने पर अन्धा हो गया था। आँखें फाड़-फाड़ जब-तब मैं भी देख लिया करता हूँ, दुरुस्त तो हैं आँखें, कहीं मैं भी तो अन्धा नहीं हो गया।

अँधेरा छा आता है। सीढ़ियों के नीचे उतर जाता हूँ। अँधेरा है। सम्हलकर उतरता हूँ, कहीं चूक न हो जाय। खाना आ जाता है। नौकर खड़ा है। खा लेता हूँ। कुछ बोलता नहीं भरसक, गो वही जीवन का एहसास कराता है। केवल कभी-कभी अनावश्यक पूछ लेता हूँ - "दिन कौन है?" जिससे जान लूँ कि जबान अपना काम अभी करती है, आवाज मरी नहीं, कान सुन लेते हैं। कुछ जानकारी के लिए नहीं, क्योंकि एक दिन दूसरे दिन से भिन्न अर्थ नहीं रखता, क्योंकि आज और हजार साल पहले की तारीखों में अब कोई भेद न रहा।

गजब की मायूसी है। दिल बैठा जाता है। मनोरथ मिट गये हैं, चेतना मूढ़ हो चली है, कल्पना का रथ चूर-चूर है।

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इस मायूसी को रोकना होगा। मायूसी भी ऐसी नहीं कि आस को पलने दे। मुरझायी आस पनप उठती है, जैसे मुरझायी पौध। जिन्दगी मौत की है जरूर , पर मरना भी कुछ आसान नहीं। जिन्दगी जीकर रहती है मौत के डंकंऔर जहर के बावज़ूद। मायूसी को जीतना होगा।

उसी तरह जिस तरह नीचे सूखे बाग के उस कोने में चम्पा ने सुखानेवाली गर्म लू को जीता है, जिसकी जीने की मस्ती से मौत को इस अप्रैल में पाला मार गया है। सूखे और गरमी के आलम ने पीपल और पाकड़ को बेपर्द कर दिया है, पर चम्पा सदा की तरह आज भी नौबहार के हरे राज में खड़ा है। उसकी हरी पत्तियों के घने छ्त्र में लाल कलियाँ चिटख रही हैं, उसके गहरे सुर्ख फूल पंजे की झुकी उँगलियों की तरह जिस्म को काँटा बनाए हुए हैं , जिससे गर्मी उनका दामन नहीं छू पाती, जैसे उनकी तेज महक रस चूसनेवाले शोषक भौंरे को पास नहीं फटकने देती। उसके छत्र के नीचे तरी सिमटकर जैसे आ बैठी है।

पीपल-सेमल को जैसे फालिज मार गया, पर यह चम्पा आज भी सरस है, मायूसी से दूर, मौत से दूर्। मौत की ही तरह जिन्दगी की छूत भी है, उससे भी अधिक संक्रामक। सोते से निकली एक पतली अकिंचन धारा चट्टानों की रुकावट पर सात-सात धाराओं में उबल पड़ती है। हजार धाराओं में फूटकर बह चलती है, उद्दाम अविकल धारा, जीवन का नाम सार्थक करती, सूखे को हरा करती , मुरझाये में प्रान भरती।

मादक मायूसी दूर करनी होगी। चिट्ठियों से मेज ढकी है। चिट्ठियाँ, जो शक्ति और प्रेरणा के लिए आयी हैं। उस लड़की की चिट्ठी, जो हजार मुसीबतों में गुरबत के साये से उठ, मौत से लड़कर जीत चुकी है और लड़खड़ाते पैरों मायूसी से लड़ रही है। और उस साहित्यकार की , जिसका फौलादी जिस्म संघर्ष से कमजोर पड़ गया है, पर जिसकी कलम धुवाँधार चल रही है और चलती जायेगी, जब तक वह सारा, जिसने ईमानवालों को बेगैरत कर दिया है, उसकी नोक के नीचे सिमट कर चलनी न हो जाय। फिर उस गरीब की, जिसका खींसें निपोर कर लोकप्रिय बनने वाला अफसर अपने सुलूक की तेज सुइयों से उसके मर्म को छेद रहा है। जानता हूँ, ऐसे अफसर को, जो अपने अफसरों के सामने भीगी बिल्ली बन जाते हैं, अपने मातहतों के सामने गुर्राते भेड़िये। पर यह सारे अलग-अलग नहीं , एक ही साबुत शक्ल के अनेक-अनेक चेहरे हैं, मुसल्लम के अनगिनत टुकड़े।

तुम अकेले नहीं हो, तुम्हारा मायूस होना इन्सानियत के प्रति कृतघ्नता है, चाहे तुम कैद में ही क्यों न हो। याद आती है कवि की पंक्ति - "तुमने बहुत सहा जीवन में, लेकिन और सहो।" सहना होगा, मनवता के प्रति कृतज्ञ होकर, उसकी रक्षा का पहरुआ बनकर।

और सहसा जैसे जमाना बदल जाता है। क्लियोपात्रा की विलासिता की याद नहीं आती, उस गुलाम की आती है, हेरास की। आक्तेवियस के साथ अन्तोनी मेडिटरेनियन में लड़ रहा है। उसकी प्रेयसी के सैकड़ों नीले पालों वाले जहाज रोम के जहाजों से टकरा रहे हैं। सहसा क्लियोपात्रा का सोया विलास जाग उठता है। उसके खो जाने का डर उसे दहशत से भर देता है। रानी भागती है, उसके जहाज भागते हैं, उसका जार अन्तोनी भागता है। अन्तोनी , वह अजेय सिपाही, जिसकी पीठ यूरोप ने नहीं देखी थी, और ग्लानि-भरा सिपाही घुटनों पर अपनी तलवार तोड़ देता है। गुलाम आता है, सिपाही कहता है - "हेरास, मैंने कभी तुम्हारी जान बचाकर तुम्हें आजाद किया था, आज उसका बदला चुका दो।" नमकहलाल गुलाम की आँखें खुशी से हुक्म बजा लाने के लिए फैल जाती हैं। कान हुक्म सुनने के लिए आतुर हो उठते हैं। वह सुनता है -"हेरास , ले यह खंजर और मेरे जिगर में भोंक मुझे जिन्दगी बख्श दे।" हेरास चुप है। स्वामी बार-बार इसरार करता है। हेरास मजबूर हो जाता है। कहता है - "अच्छा, मुँह फेर लो, मालिक। वरना तुम्हें मारते तुम्हारे उस खूबसूरत चेहरे को कैसे देख सकूँगा, जिसने मुझे कभी आजाद किया था और जिसके बाल-बाल पर हजार-हजार हेरास कुर्बान हैं? और अपने हाथों को इधर फैला दो, जिन पर तुम्हारा सिर गिरे।" मालिक अंजली फैलाकर मुँह फेर लेता है। आवाज होती 'खप्प'। अन्तोनी के हाथों पर कुछ गिरता है। अन्तोनी सहसा घूम जाता है। गुलाम का धड़ जमीन पर तड़प रहा है, सिर मालिक के हाथों पर मुस्करा रहा है। मानवता के प्रति यह कृतज्ञता है। उसके लिए बन्धन तोड़ना है।

और सामने की पहाड़ियाँ जैसे नजर से ओझल हो उठती हैं। उनके ऊपर घनीभूत धुएँ की तरह एक आवाज उठती आ रही है, उमड़ती घुमड़ती आवाज। उस जुलूस की आवाज, जिसे महादेवसिंह लिये जा रहा है, जो धारा-सभा की ओर बढ़ता जा रहा है। और बाजू में, सामने रिसाला है , चट्टानों-सा खड़ा । 'हाली' (हैदराबादी सिक्के) की बदलती तकदीर मजदूरों की मजूरी से टकरा गयी है। मजदूरों का जुलूस बढ़ चलता है। लाठियाँ उठ पड़ती हैं, आँसू-बम फट पड़ते हैं। महादेवसिंह लड़खड़ा कर गिर जाता है। जन-कवि मंजीत की आवाज मजदूरों की आवाज के ऊपर उठ हवा के परों पर चढ़ चलती है। लाठी की चोट से वह गिर जाता है, बेहोश हो जाता है। पर आवाज बुलन्द है, क्योंकि आवाज कभी नहीं मरती। वह हवा के डैनों पर है। सामने पहाड़ियों पर, उनकी बिखरी चोटियों पर वह आवाज धुएँ-सी छायी हुई है। जिंदगी अस्मत के लिए लड़ रही है।

उसी तरह जैसे खून की तरह चम्पा का वह लाल फूल। और मैं छ्त पर खड़ा उसे देख रहा हूँ। मेरा सूना भर उठता है। मेरी कैद की प्राचीरें गिर जाती हैं। देखता हूँ , छ्त की मुँडेर को छेद पौध का अकेला, साँस से भी कोमल, पत्ता ललक रहा है। अभी उसकी दालें भी नहीं मरीं और वह जीवित मौत को ललकार रहा है, पत्थर की छाती फोड़कर निकला है। लगता है, कहीं कुछ हो गया है।

दाहिने की पहाड़ी का वह ठूँठ नीम हरा हो चला है। उसके नीचे बकरी अपने नन्हें परिवार को लिये चल रही है, और ढोर के रखवाले ने कान पर हाथ धर , तान छेड़ दी है। अभी हाल रिमझिम हुई थी। मेह के स्पर्श से धरा से सुरभि उठी। पवन उसे तरंगित डैनों पर ले उड़ा। दिगन्त गमक उठा। वसुधा ने अपने खजाने की गाँठें खोल दीं, उसका पोर-पोर सब्ज उगम उठा। नीलाम्बर दूर पहाड़ियों के पीछे, क्षितिज की संधि पर झुका , लजाती धरा को चूम रहा था।

क्या कुछ हो गया? जैसे देवताओं का मौसम जो मौसमी आसारों से अलग है। देवता हँसा कि नन्दन में पराग बरस पड़ा, देवता रोया कि दुर्दिन छा गया। पीपल जो ठूँठ विकराल खड़ा था, प्रेतों का भार लिये, आज गा रहा है। छिन भर में वह हरा हो उठा है। नन्हें-नन्हें करोड़ों पत्ते चाँदी की महीन वरकों की तरह डालों से हिल रहे हैं। अनन्त टहनियाँ लहलहा उठी हैं। पीपल से पीपल पर नजर जाती है, वही राज है, यकसाँ लहलहाते चाँदी के वरक। हरियाली जवानी पर है। जिन्दगी तीर मारती चली गयी है।

मायूसी स्याह चादर फेंक काफूर हो चुकी है, जिन्दगी डालों पर पेंग मार रही है - दरबे के वे अड़ियल कबूतर, उधर अपने नीड़ों से बाहर अजब मस्ती में मचल रहे हैं। कबूतर काम के वाहन हैं, जीवन के प्रतीक। कबूतरी के पीछे उड़ रहा है वह कबूतर। तार-तार पर वह बैठती है, तार-तार वह उसका पीछा करता है, फिर पकड़ लेता है। कबूतरी जैसे हँसकर कबूतर के डैनों की आड़ में आ जाती है। निरालस , जागरूक कबूतर विजय में 'गुटर-गूँ।' कर उठता है, स्नेह-सिक्त कबूतरी अपने कबूतर की गरदन में चोंचें चुभाये जा रही है, चुभाये जा रही है।


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