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निबंध

महत्व
बालकृष्ण भट्ट


हमारे देश की वर्तमान दशा के अनुसार खास कर इस अँगरेजी राज्‍य में महत्‍व केवल धन में आ टिका हैं पर बुद्धिमानों ने जैसा तय कर रखा है उससे सिद्ध होता है कि धन महत्‍व-संपादन का प्रधान अंग नहीं है वरन् उसका एक बहुत छोटा-सा जुज है। कुल 'खानदान' अलबत्ता बड़ा भारी अंग है इसलिए कि कुलीनों में महान् बहुत अधिक होते आये हैं और हो भी सकते हैं। कुल मानों महत्‍व के इत्र बनाने की एक जमीन है जिस पर जैसा चाहो वैसा इत्र खींच ले सकते हो। जिस तरह का महत्व चाहते हैं वैसा इस कुलीनता की भूमिका पर संपादित हो सकता है। दूसरा अंग चरित्र है। पालन में जो सावधान हैं वे काल पाय महान क्‍या बल्कि महत्तर हो सकते हैं। तीसरा अंग औदार्य है। अनेक दोष-दूषित भी दान-शील देने उदार चित्त हो तो उनके दोषों की उपेक्षा कर सभी उसके अनुयायी और प्रशंसा करने वाले होंगे।

किं दातुरखिलैर्दोषै: किंलुब्‍धस्‍याखिलैर्गुणै:।
    न लोभादधिको दोषो न दानादधिको गुण:।।

देने वाले में एक दातृत्‍व गुण के सिवाय सब दोष ही दोष हो उन दोषों से क्‍या और लोभी कदर्य सूम में सब गुण ही गुण हो तो कदर्यता ऐसा भारी दोष है कि उसमें गुणों की कदर नहीं होती तो निश्‍चय हुआ कि लोभ से अधिक कोई दूसरा दोष नहीं और देने से अधिक कोई गुण नहीं। और भी-

''दोषा अपि गुणायंते दातारं समुपाश्रिता:।
    कालिमानं किलालम्‍ब्‍य कालमेघ इतिस्‍तुति:।।''

दाता का आसरा लै दोष भी गुण हो जाते हैं जैसा मेघ में कालापन भी काले मेघ ऐसा स्‍तुति-पक्ष में ग्रहण कर लिया जाता है। यश संसार में चाहता हो तो दानशील हो। सिद्धांत है 'न दाने न बिना यश:।' दृढ़ता, स्थिर निश्‍चय, निराकुलत्‍व, हर्ष-शोक में, एक भाव, सब महत्‍व के चिन्‍ह हैं।

''उदेति सविता रक्तो रक्त एवास्‍तमेतिच-
    संपत्तौच विपत्तौच महतामेकरूपता।।''

सूर्य उदय के समय में रक्त वर्ण होते हैं, वैसा ही अस्‍त में भी। तो निष्‍कर्ष यह हुआ कि बढ़ती और घटती दोनों में एक-सा रहना बड़प्‍पन की निशानी है। सबसे बड़ा महत्‍व उसका है जो परोपकारी है जैसा बंगाल में विद्यासागर महाशय हो गये। नीचा काम, नीचे ख्‍याल की ओर जो कभी प्राणपण के साथ भी मन न दे सच्‍चा महत्‍व उसी का है। महत्‍व का निबहना सहज बात नहीं। अनेक बार की कसौटी में कसे जाने पर जो असिधारावलेहन 'तलवार की धार को जीभ से चाटना' रूप व्रत में पक्‍का ठहरता है उसी को सर्वसाधारण महान् की पदवी देते हैं। सबसे सिरे का महत्‍व उसी का माना जायेगा जो अपनी हानि सह कर भी देश के उद्धार में लग रहा है। पर भारत में इसकी बड़ी त्रुटि है। योरोप के प्रत्‍येक देशों की अपेक्षा यहाँ ऐसे मनुष्‍य बहुत कम हैं। अपना स्‍वार्थ छोड़ परार्थ साधन करने वाले सत्‍पुरुष तो बिरले देश में कोई एक दो हों या न हों। केवल अपना ही पेट न भर 'गेहूँ के साथ बथुआ सींच जाने' वाली कहावत की भाँति भी परार्थ साधक नहीं है। हाँ ऐसे अलबत्ता बहुत हैं जिनके बारे में यह कहावत चरितार्थ होती है-

''काकोपि जीवति चिराय वलिं च भुक्ते''

अगस्‍त, 1899 ई.


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