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उपन्यास

मेरा पता कोई और है
कविता


 

राजेंद्र जी के लिए

जिनका होना

मेरे लिए आश्वस्ति है…

मैं जहाँ हूँ सिर्फ वहीं नहीं, मैं जहाँ नहीं हूँ वहाँ भी हूँ

मुझे यूँ न मुझमें तलाश कर कि मेरा पता कोई और है

 

शीर्षक के लिए प्रसिद्ध शायर राजेश रेड्डी का आभार

आभार साहिर लुधियानवी, कैफी आजमी, धर्मवीर भारती, अज्ञेय और सुधीर सक्सेना का भी जिनकी कविताएँ इस उपन्यास में कहीं-न-कहीं आई हैं।

 

 

1

धूप कमरे की खिड़की से घुस कर उसके शिथिल बदन से अठखेलियाँ करने लगी थी। उसकी किरणें उसका सारा ताप सारी थकन हरे ले रहा था। शरीर, मन सब जैसे हल्का हुआ जा रहा हो। अब उसकी नर्म गर्मी उसे सहलाती, छेड़ती, अंतत: परेशान करने लगी थी। वह थोड़ा सा खिसक लेती, वह थोड़ी दूर और फैल जाता। वह थोड़ा और खिसकती वह थोड़ा और फैलता... जैसे उसके इस आलस से उसे चिढ़ हो रही हो।

नंदिता अभी तक उस बिस्तर से चिपकी पड़ी थी; सुबह के साढ़े नौ हो जाने तक। वसीम को यहाँ से निकले हुए लगभग डेढ़ घंटे हो चुके थे और प्रो. हनीफ कई दिनों से घर आए ही नही थे। घर, हाँ अगर उसे वो घर की संज्ञा से नवाजते हों तो... यों उनका आना न आना हमेशा उनकी मर्जी से ही होता है और उसने कभी कोई प्रतिवाद या प्रतिरोध नहीं किया। उसके लिए यही कम नही था कि प्रो. हनीफ से उसका कोई रिश्ता था। जायज-नाजायज ये शब्द बड़े दुनियावी और तुच्छ थे उस रिश्ते के आगे... उसकी गहराइओं-ऊँचाइयों को छूने के लिए।

यहाँ कोई प्रश्न-प्रतिप्रश्न नहीं था और उत्तरों की श्रृंखला भी नहीं थी, न जवाबदेही ही। प्रो. हनीफ इसी से टिक पाते थे इस घर और रिश्ते पर... वह कृतार्थ हो लेती थी।

उसने कभी सोचा भी नहीं था प्रो. हनीफ की ऊँचाइयों को अपने कंधे से माप सकेगी; वे आकाश-कुसुम थे उसके लिए और वह आकाश-कुसुम अब उसकी झोली में था। वह यकीन करने की खातिर अब भी जब-तब टटोल लेती है अपना दामन। उस रिश्ते की छुअन, उसकी गर्मी क्या मौजूद है वहाँ... वह किसी स्वप्न को तो नहीं जी रही...? उनके टँगे कपड़ों को वह आलमारी में टटोल आती है... टटोलने से याद आता है उसे, उनके गंदे कपड़े अभी धुलने को नहीं गए हैं। आज तो दे ही देना होगा उसे। वह अपनी अस्वस्थता -जन्य आलस को छोड़ चेतन होने लगती है। एक दिन और कितने-कितने तो काम... सामने थीसिस के पन्ने पड़े हैं अस्त-व्यस्त। वह उन्हें तरतीब से फाइल-बंद करके रख लेती है।

पता नहीं आगे कब...

वक्त मुट्ठी से फिसलता जा रहा है चुपचाप। पर उसे वक्त का यूँ बीतना पता ही नहीं चल पाता। उसकी जिंदगी के तो उतने ही दिन बीतते हैं; उतने ही दिन जीती है वह जितने दिन हनीफ उसके साथ होते हैं। शेष दिन प्रतीक्षा और सिर्फ प्रतीक्षा में। हनीफ टोकते हैं उसे अक्सर, ऐसे कैसे बिता देती हो सारा समय। कुछ तो पढा-लिखा करो। थीसिस वहीं की वहीं अटकी पड़ी है। कैसे कटता है तुम से सारा का सारा वक्त।

वह उनके नाक से उतरते चश्मे को फिर से नाक पर चढ़ाती हुई कहती है - 'आपकी याद में।'

'भाड़ में जाए यह याद। पढ़ाई-लिखाई...'

वह छोटे बच्चे की तरह उनके कंधे से लटक पड़ती है - 'कर लूँगी वह भी।'

'कब...? अभी...'

'नहीं, आपके जाने के बाद...'

'नहीं, अभी।'

'नहीं, आपके जाने के बाद...'

'अभी...'

अभी तो मैं आपके साथ बैठूँगी, बातें करूँगी। फिर खाना खाएँगे हम। अ... खाने से याद आया, सब्जी चढ़ा रखी थी गैस पर; कहीं जल न गई हो... कैसे खाएँगे आप... उसकी आँखों में चिंता की लकीरें हैं गहरी... नीली... भूरी...

वे लाड़ से देखते हैं उसे... खा लूँगा... पूरी तरह से न जली हो तो ... नहीं तो बाहर भी...

ट्रिन... ट्रिन... मोबाइल की हल्की सी टिनटिनाहट उसे बाहर धकेलती है स्मृतियों से।

वह एसएमएस पढ़ती है - 'तुम्हारे लिए कोई क्षमा नहीं है स्त्री / स्वर्ग के दरवाजे बंद हैं / कि तुम्हारे कारण ही / धकेला गया पुरुष पृथ्वी पर / नींद में चहलकदमी मत करो स्त्री / कि पाँवों की साँकल बज उठेगी / भूलो मत अभिसार के बाद, अभी-अभी नींद आई है तुम्हारे पुरुष को...' - एमीलिया

यह एमी भी... पता नहीं क्या-क्या लिख कर भेजती रहती है। अभी कल तो उसने... वह दुबारे इस कविता को पढ़ती है और चौंक उठती है। ये पंक्तियाँ कहीं उसी कविता की कड़ी तो नहीं।

वह 'इन बाक्स' में जाती है - 'स्त्री / बचा सको तो बचा लो अपना नमक / नमक के सौदागरों से / वे तुम्हें जमीन पर पाँव न धरने देंगे / कि कहीं तुम्हारे पाँव से झर न जाए रत्ती भर नमक... अगर्चे तुम बच गई स्त्री / लिखेंगे वे धर्मग्रंथों और सुनहरी पोथियों में/ कि दर-दर नमक बाँटती फिरती थी निर्लज्ज स्त्री...'

वह समझना चाहती थी एमी क्या कहना चाहती है, वह समझ रही थी एमी का मतलब क्या है... वह भरोसा नहीं करना चाहती थी एमी के कहने पर। एमी की शुक्रगुजार है वह। वह न होती तो प्रो. हनीफ से वह मिल भी कहाँ पाती। वह एमी ही थी जिसने इंटर की परीक्षाओं के बाद के खाली दिनों में उसे आर्ट्स क्लासेज ज्वाइन करवाया था जबरन। वह बेमन से जुड़ी थी सिर्फ एमी का साथ देने की खातिर। पर फिर... प्रो. हनीफ वहाँ गेस्ट फैकल्टी थे। वह पहली मुलाकात, अगर सिर्फ सुने और देखे जाने को भी मुलाकात कहते हों तो अब भी उसकी स्मृतियों में ज्यों की त्यों है। वह आँखें फाड़-फाड़ कर सुनती रहती उन्हें, देखती रहती उन्हें, एकटक। क्लास कब खत्म हो जाते उसे पता ही नहीं चलता अगर एमी बाजू पकड़ कर उठने को नहीं कहती - 'चल।'

वह प्रो. हनीफ के प्रभामंडल की जद में थी, बुरी तरह। उनकी आँखें, उनका चेहरा, सिर के कुछ सफेद बाल, उनका ऊँचा कद। एमी कहती यह उम्र होती ही है ऐसी जब लोग बुजुर्गों की तरफ आकर्षित होते हैं। फादर सिंड्रोम, पितृ-ग्रंथि कहते हैं इसे। वे बाहर आ खड़ी हुई थीं। मुझे जब पिता से कोई लगाव ही नही रहा फिर पितृ-ग्रंथि क्या...?

वही तो... कभी-कभी जो मिलता नहीं उसे हम तलाशते फिरते हैं बाहर-बाहर। तुम्हारे दिमाग मैं बैठा पिता का रोल माडल...

पिता शब्द उसे चुभता है। वह कहती है अब बस भी कर... पर एमी के अनुभव बोलते हैं, बोलते ही रहते हैं।

उबरने के लिए वह हनीफ सर का पहला एसएमएस निकालती है -

'यूँ तो था पास मेरे बहुत कुछ, जो मैं सब बेच आया।

कहीं ईनाम मिला और कहीं कीमत भी नहीं।

कुछ तुम्हारे लिए इन आँखों में बचा रखा है,

देख लो, और न देखो तो शिकायत भी नहीं।'

उनके लिए हैरत का सवब था यह एसएमएस। वे क्लास में हर लड़के का मोबाइल नंबर पता कर-कर के थक चुकी थीं। उससे ज्यादा शायद एमी...

वे तो शायद भूल भी जातीं एसएमएस की बात, लेकिन उस दिन इन्स्टीच्यूट की डायरेक्टरी मिली थी उन्हें और उसे पलटते-पलटते हनीफ सर के नंबर पर उनकी निगाहें अटक गई थीं...

एमी ने चिकोटा था उसे - तो आग दोनों तरफ लगी हुई है... मैं तो समझी थी... बुड्ढे के बच्चे हों शायद हमारे बराबर... मैं बात करती हूँ उससे... नंदिता ने बाँहें थाम ली थी उसकी - ' नहीं एमी... नहीं... मेरी खातिर...'

बुढ़ापे में आदमी सठिया जाता है, और तू तो... वह उसे गुस्से से घूरती है, घूरती रहती है। फोन करती हूँ मैं तेरे घर, बुलाती हूँ अंकल को... तेरी अक्ल तभी ठिकाने आएगी।

वह उसे मासूम निगाहों से देखती है, आँखों में इल्तिजा भर कर, प्लीज घर फोन नहीं करना एमी। पापा नाराज होंगे, नहीं समझ पाएँगे यह सब कुछ।

यह सब कुछ तू समझ पा रही है? कि यह सब कुछ है क्या सिवाय बेवकूफी और बचपने के। बुढ़िया नानी कहती हैं, तू नहीं समझ पाएगी यह सब कुछ।

क्या है यह सब कुछ तू पहले मुझे समझा कर तो देख। अंकल को बाद में... पहले मुझे ही, चल शुरू कर... वह उसे कंधे से झकझोर रही है।

प्लीज एमी...

प्लीज क्या, हमेशा मरी बकरियों की आँखों की तरह आँखें बना मुझे जीत नहीं सकती तू। मैं तुझे नहीं चलने दूँगी इस राह... और अगर इस राह गई तू तो हमारी दोस्ती यहीं खत्म...

छोड़ देना या छूट जाना इतना आसान होता है क्या; न उससे हनीफ सर का मोह छूटा था न एमी से उसका। पूरे पाँच वर्ष बीत चुके हैं इस बीच। लंबे-लंबे पाँच वर्ष। पर उसे लगता है जैसे अभी की बात है यह सब। अभी तक तो वह भरोसा भी नहीं कर सकी कि वह साथ है हनीफ सर के, किसी लंबे स्वप्न में नहीं जी रही वह। और एमी... जब तब मिलने के बहाने ढूँढ़ती है उससे... एसएमएस और फोन। उसने शायद अभी तक उम्मीद नहीं छोड़ी है और नंदिता ने अपना भरोसा...

एमीलिया, कभी की छात्र नेता, आज की तेज-तर्रार पत्रकार। उसकी इच्छाओं के आगे झुक कैसे लेती है, मान कैसे लेती है उसकी बात। अपनी दलील से सबको परास्त करनेवाली एमीलिया। प्यार सबको पराजित करता है, झुका लेता है, प्रिय की इच्छाओं के आगे। एमीलिया कोई अपवाद तो नहीं...

नंदिता खुद नहीं छोड़ आई इस प्यार के पीछे घर-द्वार, दोस्त-रिश्ते सब। लोगों की आँखों में उगे अपमान को वह नहीं पहचानती हो ऐसा नहीं है पर पहचान कर भी उस पर मिट्टी डाल देती है वह। एक घर-परिवार, अपना घर-परिवार कभी-न-कभी उसने भी तो चाहा होगा। पर अब वह सारी चाहत हनीफ सर के साथ की चाहत में बदल कर रह गई है।

...और खुद हनीफ सर, वे किसी के लिए उत्तरदायी नहीं? उसको हर क्षण किसी की आँखों में उगी नफरत नहीं झेलनी होती पर उन्हें तो उनके पूरे परिवार का सामना करना होता है, पत्नी, बच्चे सबका... छोटा लड़का चाहे न समझता हो उतना कुछ पर वसीम... वसीम तो बड़ा है। लगभग उसी उम्र का है वह जिस उम्र में हनीफ सर से मिली थी वह...

प्यार व्यक्ति को कमजोर बना देता है और लाचार भी... एनी अक्सर कहती थी। उस वक्त तो और भी जब आर्ट क्लासेज खत्म हो चुके थे और इंटर का रिजल्ट आने में अभी वक्त बाकी था। नंदिता तड़पती रहती... एक बार, बस एक बार वह हनीफ सर से मिल पाती। वह एमी से प्रार्थना करती बार-बार। कहती, कोई उपाय... कैसे भी... गजब यह कि हनीफ सर ने इस बीच उसे कभी कोई एसएमएस भी नहीं भेजा था। अपनी पहल पर एसएमएस करनेवाले हनीफ सर की इस चुप्पी का कोई मतलब वह नहीं समझ पा रही थी। या यूँ कहें कि यह चुप्पी जो बतलाना चाह रही थी वह सच उसे स्वीकार्य नहीं था। एमी उसकी तकलीफों से पसीज कर कहती है, फोन कर, एसएमएस कर, बुला कर मिल तो उनसे। उसे हैरत होती है पर नहीं होती है। वह जानती है प्यार व्यक्ति को कमजोर बना देता है, लाचार भी। वह चाहती थी एमी उससे यही कहे पर पर जब उसने कह दिया वही सब कुछ तो उसके हाथ मोबाइल उठाने से इन्कार कर देते हैं...। अजीब है तू भी, यही तो चाहती थी न तू, फिर अब क्या हुआ? कर ले फोन, वह उसे मोबाइल थमाती है। वह चुपचाप रख देती है उसे... पागल लड़की, सँभाल खुद को। इस तरह तो तू... एमी ने उसका सिर अपनी गोद में रख लिया है, वह उसके बाल सहला रही है।

एमी सैंडविच बना कर लाती है, प्लेट उसके सामने कर देती है। वह उठा कर कर खाना चाहती है सैंडविच पर उसके हाथ बेतरह काँप रहे हैं, थर-थर। अपनी हालत पर उसे खुद तरस आ जाता है, कैसी तो हालत बना रखी है उसने खुद की। अगर एमी भी साथ न हो उसके तो... और एमी भी कब तक झेल पाएगी यों उसे। उसने बेतरह काँपते शरीर और हाथ को सहेजा है, तोड़ा है एक ग्रास और मुँह में ठूँस लिया है, नहीं बस और अब नहीं। उसने छोटे-छोटे कौर तोड़ने शुरू किए हैं। सैंडविच बिल्कुल बेस्वाद है, कि स्वाद, रस, गंध ही उसकी जिंदगी से पीछे छूट चले हैं...

बेल बजी है, एमी गई है दौड़ कर। कौन होगा, वह सोचती है कोई नहीं आता उन दोनों के घर। बाहर-बाहर ही वे मिलती हैं लोगों से, जरूरत भर की बातचीत भी कर लेती हैं, पर घर तो सिर्फ उन दोनों का है, उनका एकछ्त्र साम्राज्य। उन्हें कभी किसी तीसरे की जरूरत नहीं पडी, बचपन से अब तक। लोगों को भी उनके इस एकांत में खलल डालने का कोई शौक नहीं था। खास कर इस शहर में। यह शहर उन्हें इसलिए भी बहुत पसंद था। यहाँ उनके लिए झोली भर आजादी थी और सिर पर मुट्ठी भर सपनों की छतरी भी, जिसके साये तले वे धूप, बारिश सबसे बचती-बचाती अपने सुख-दुख आपस में बाँट लेती थीं, बचपन के अपने पुराने शहर के दिनों की तरह ही...

वह कभी-कभी सोचती थी उन दिनों उन दोनों का अपना घर जो कि अब उसे एमी का घर लगने लगा था छोड़ देने से पहले, एमी के स्वरों में जो हनीफ सर के लिए हिकारत है वह कहीं सिर्फ इसलिए तो नहीं कि वह उससे उसका कुछ निजी छीन ले जा रहे थे। वैसा निजी जिसे वह सिर्फ अपना समझ जी रही थी अब तक...। या कि उसके स्वर की पीड़ा-चिंता सब जेनुइन है। खालिस फिक्र और उसके हित से जुड़ी हुई। पर वह जब भी इस मुद्दे पर सोचना शुरू करती उलझ जाती बुरी तरह से। कोई निष्कर्ष न कभी निकला था न अब निकलता। हार-झख कर खयालों के उलझे गुच्छे को वह दूर फेंक देती जैसे माँ अक्सर उलझे पुराने ऊन को सुलझाते-सुलझाते हार जाती तो उठा कर दूर फेंक देती थी... यह अलग बात है कि वह अगले दिन या कि उसी दिन एक-दो घंटे के बाद उसे फिर सुलझाने बैठती...

वह अभी तक वैसी उलझी-उलझी ही बैठी थी, अधकुतरा हुआ सैंडविच का प्लेट उसी तरह सामने रखे हुए। उसके विचार अभी तक उन्ही दोनों ध्रुवों के दो छोर पर तने खडे थे कि एमी ने पूछा था उससे - कौन होगा? फिर उससे जवाब की अपेक्षा न रखते हुए वह गेट की तरफ बढ़ गई थी। पोस्टमैन ने साइन करवाया था एमी से। फिर लिफाफा उसके सामने रख कर उसकी बगल में आ बैठी थी, 'क्या है' की उत्सुकता के साथ।

वह अब तक ऊहापोह में थी, राइटिंग तो बहुत खूबसूरत और पहचानी सी है... किसने भेजा होगा, और क्या...? वह कोइ अंदाजा नहीं लगा पा रही। एमी के सिवा कोई दूसरी सहेली भी नहीं। माँ-पिताजी तो चेक भेज कर ही निवृत हो लेते हैं, अपनी जिम्मेदारियों से। फिर... उसने इशारा किया था खोलो एमी...

एक कागज निकला था लिफाफे से... एक पन्ना मात्र। एमी ने पढ़ना शुरू किया था उसे -

'खलबतो-जलवत में मुझसे तुम मिली हो बारहा

तुमने क्या देखा नहीं, मैं मुस्कुरा सकता नहीं

'मैं' की मायूसी मेरे फितरत में शामिल हो चुकी,

जब्र भी खुद पर करूँ तो गुनगुना सकता नहीं।

मुझमें क्या देखा कि तुम उल्फत का दम भरने लगी

मैं तो खुद अपने भी कोई काम आ सकता नहीं।

किस तरह तुमको बना लूँ मैं शरीके जिंदगी,

मैं खुद अपनी जिंदगी का भार उठा सकता नहीं।

यास की तारीकियों में डूब जाने दो मुझे,

अब मैं शम्मे जिंदगी की लौ बढ़ा सकता नहीं।'

पढ़ने के बाद एमी बुदबुदा रही थी - बुड्ढे में इतनी भी हिम्मत नहीं कि अपनी बात आमने-सामने कह सके। कायर... डरपोक। इधर-उधर की पंक्तियाँ भेजता रहता है, वह भी बिना अपने नाम के। और यह है कि उसी में मार खुशी के मार गम के डूबती-उतराती रहती है...। बल्कि डरपोक नहीं, खेला-खाया हुशियार है वह। सब कुछ इतनी सफाई... अपने दामन को पाक-साफ रखते हुए, हर गँदले छींटे से बचाते हुए...

उसके कान यह सब सुन रहे थे पर वैसे ही जैसे बिना काम की बातें... उसने कागज के उस टुकड़े को छाती से लगा लिया था। जार-जार रोई थी वह। उसने काँपती उँगलियों से उन्हें फोन मिलाया था - सर मैं मिलना चाहती हूँ... बगैर एमी की तरफ देखे... आपसे, अभी इसी वक्त। उधर से कोई पुरजोर मनाही भी नहीं सुनाई दी थी... कहाँ सर? ठीक है... आती हूँ मैं... वह एमी से आँखें चुराती उठी थी। कुछ भी नहीं कहा था उससे, और तैयार होने चली गई थी।

2

रास्ते भर एमी की आँखें उसका पीछा करती रहती हैं, घूरती हुई। वह उन शिकायती नजरों से दूर भागना चाहती है, बहुत दूर। वह आटो रिक्शावाले से कहती है, गाड़ी इतनी धीरे-धीरे क्यों चला रहे हो, तेज चलाओ। अभी मैडम, आटोवाला बहुत कम उम्र का है, उसकी आँखों में एक शरारत भरी चमक है, वह शरारत और गहराती है, नंदिता के कहने से। वह उन शरारत भरी आँखों की अनदेखी करना चाहती है। अब कितनी-कितनी आँखों से उलझे वह। गाड़ी जैसे हवा में उड़ने लगी है, वह हिल रही है बिल्कुल। गनीमत है कि दोपहर है, भीड़ उतनी नहीं सड़कों पर। पर फिर भी ठहरी तो दिल्ली की भीड़ ही। अरे कोई एक्सीडेंट करने का इरादा है क्या, तेज चलाने को कहा था पर इतना तेज भी नहीं, अभी गिरते-गिरते बची मैं। ठीक है मैडम... पर कह वह कुछ इस अंदाज में रहा है जैसे कह रहा हो 'जो हुक्म शाहजादी'। गाड़ी ठीक-ठीक गति से चलने लगी थी। आटोवाले ने कोई गीत लगा दिया है, वह सुनती है उसे ध्यान दे कर -

शबनम कभी, शोला कभी, तूफान है आँखें,

उस मुल्क की सरहद को कोई छू नहीं सकता

जिस मुल्क के सरहद की निगहबान हैं आँखें।

उफ अब यहाँ भी आँखें, एमी की आँखें... निगहबानी का शौक जिन्हें बेइंतहा हैं। इसी चौकसी से भाग कर वह दिल्ली आई थी ताकि जी सके अपनी तरह, अपनी मर्जी से। पर मुश्किल यह कि एक सिपाही वह खुद साथ लेती आई थी, जो तैनात रहता था हरदम उसकी पहरेदारी में। तब तो बहुत खुश थी वह। उसकी सबसे अच्छी दोस्त, उसकी बचपन की सहेली, चौबीस घंटे उसके साथ होगी। उन्हें मिलने, फिल्म देखने और गप्पबाजियों के लिए मौकों और समय की तलाश नहीं करनी होगी। वे साथ होंगी दिन-रात...।

उन्होंने अपने कमरे को भी बहुत प्यार से सजाया था। दो फोल्डिंग, दो बुक रैक्स, एक आल्मारी और एक किचेन। दिन बड़े प्यार से गुजर रहे थे उनके। हनीफ सर के नंदिता की जिंदगी में आने तक।

उसे कोफ्त हो रही है बेइंतहा। वह एमी के बारे में बिल्कुल भी नहीं सोचना चाह रही, रत्ती भर भी नहीं। उसने अपनी पीठ से टँगी उन आँखों की पलकें जबरन बंद कर दी है। फिर भी वे पीछे-पीछे चली आ रही हैं...। चली आ रही हैं। वह एमी के बारे में बिल्कुल भी नहीं सोचना चाहती इस वक्त। अभी वह सिर्फ हनीफ सर के बारे में सोचना चाहती है, अभी उसकी इंतजार में होंगे वह, उसे ऐसा सोच कर अच्छा लग रहा है। इंतजार करने का ढंग भी क्या उनका बिल्कुल अलग होगा... बेचैनी को काबू में करने का ढंग... कि आम आदमी की तरह चहलकदमी कर रहे होंगे वह भी... नहीं, सर आम लोगों जैसे बिल्कुल भी नहीं। उनकी कोई भी आदत आम लोगों जैसी कैसे हो सकती है। वह देखना चाहती है सर को इस हाल में... वह पगली है बिल्कुल।

वह आटोवाले को बरजती है, यह क्या बजा रहे हो तुम। कोई और अच्छा गाना नहीं है तुम्हारे पास। उसकी शरारती आँखें कहती हैं 'अभी बदलता हूँ मैडम'। वह छुपी हुई ध्वनि सुनती है, 'जो हुक्म मल्लिका'। उसने कैसेट पलट दिया है - 'ये रेशमी जुल्फें, ये शरबती आँखें, इन्हें देख कर जी रहे हैं सभी...' लगता है आटो रिक्शावाले के पास जो कैसेट है उसके सारे गाने आँखों से ही संबंधित हैं। वह उसकी आँखों की चमक को इग्नोर करती है, चलेगा, चल जाएगा यह। कम से कम इस गाने में उसे अपने पीछे कौंधती एमी की आँखें तो नहीं दिखेंगी...

वह आँखें मूँद कर प्रतीक्षा करते हनीफ सर की कल्पना करती है। अब मन्ना डे की आवाज गूँज रही है - 'तेरे नैना तलाश करें जिसे वे हैं तुझी में कहीं दीवाने... तेरे नैना...'

सदियों लंबा यह रास्ता भी आखिरकार तय हो ही गया। वह आटोवाले को पैसे थमाती है। पलट कर देखने की जरूरत नहीं है उसे, न बचे हुए खुल्ले पैसे लेने की। वह तेज कदमों से गेट की तरफ बढ़ती है। अगर वे गेट पर ही नहीं मिले तो... वे गेट पर ही थे, सफेद कुर्ते पाजामे में, कानों के पीछे से बहते पसीने को रूमाल से पोंछते। पसीने की बूँदों से चमकता लेकिन धूप से सँवलाया हुआ चेहरा। साँवले लगते चेहरे पर उनकी आँखें और ज्यादा चमकदार और उदास सी... उसे उनके भेजे नज्म की अंतिम पंक्तियाँ याद हो आईं -

'यास की तारीकियों में डूब जाने दो मुझे,

अब मैं शम्मे जिंदगी की लौ बढ़ा सकता नहीं।'

आखिर क्या कहना चाहते थे वह... पूछना था उसे उन्हीं से। वह समझ रही थी कुछ-कुछ पर जैसे उसे अपनी समझ पर विश्वास ही नहीं रह गया था... इसीलिए भागी आई थी वह, पर अब जबकि चली आई थी उसे खुद पर गुस्सा आ रहा था। इस तरह परेशान किया उन्हें, न जाने धूप में ऐसे कब से खड़े होंगे। उसका मन हुआ बढ़े वह और अपने रूमाल से, अपने हाथों से पोंछ दे उनका पसीनाया चेहरा। पर तब हिचक थी और खूब थी। वह चुपचाप उनके सामने जा खड़ी हुई थी, चाभी की गुड़िया सी।

उन्होंने देखा था उसे, पर जैसे देखा नहीं हो। चल रहे थे उसके साथ पर जैसे साथ नहीं चल रहे हों। वे बोल रहे थे कुछ साथ-साथ चलते, उसने अपना ध्यान बटोरा था - 'इस कुतुबमीनार को अलाउद्दीन खिलजी, इससे ढाई गुना बड़ा बनाना चाहता था। पर पहले तल के बनते ही उसकी मृत्यु हो गई। ख्वाहिशों का क्या वे बेइंतहा होती हैं जिंदगी मे और अंत तक पीछा करती रहती हैं हमारा। सब कुछ हमारे ही हाथों में नहीं होता। तुमने सुना है ना, 'हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले, बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले...'

वह समझ रही थी वह जो वे उससे कहना चाह रहे थे; पर वह जो कह रहे थे उसे वह बिल्कुल ही नहीं समझना था... वह यही सब सुनने-समझने तो नहीं आई थी यहाँ।

वे कह रहे थे - 'ऐबक बहुत ही महत्वाकांक्षी इनसान था। वह मुहम्मद गोरी का गुलाम था जिसने गुलाम वंश की स्थापना की और एक गुलाम इल्तुतमिश को ही अपना दामाद चुना। इल्तुतमिश ने ही कुतुबमीनार को पूरा करने का काम अपने शासन काल में किया। दिल्ली सल्तनत की पहली महिला शासक रजिया बेगम इसी इल्तुतमिश की बेटी थी।'

वह धूप से आँखें बचाती पेड़ों की ओट-ओट बढ़ रही थी। वे अब भी कह रहे थे - 'तुम जानती हो कुतुबमीनार और ताजमहल दोनों अर्थक्वेक प्रूफ हैं। सोचो, विज्ञान और कला का विकास उन दिनों कितना हो चुका था।

ऐबक ने जहाँ हिंदू आर्किटेक्ट से काम लिया, इल्तुतमिश ने वहाँ इजिप्ट से कलाकार बुलाए। अलाउद्दीन खिलजी ने जहाँ सफेद संगमरमर का उपयोग किया वहीं इल्तुतमिश ने लाल बलुई पत्थर का। यहाँ चार राजाओं के शासन काल की कला-विशेषताएँ अलग-अलग अंदाज में नजर आती हैं।

कुतुबमीनार का मेन गेट जिसे अलाई दरवाजा कहते हैं देखने में कितना खूबसूरत है कभी गौर से देखा है? दरवाजे पर छोटे-छोटे कमल, राजपूत कला के चिह्न बल्कि कहें तो हिंदू और जैन शैलियों का मिश्रित रूप। छतरियाँ बुद्धिष्ट कला से प्रेरित... मृत्योपरांत ऐबक का क्या हुआ कुछ पता नहीं, कहते हैं वह पोलो खेलते वक्त घोड़े से गिर गया था और उसकी मृत्यु हो गई थी। इसीलिए इल्तुतमिश ने अपने जीवन काल में ही यह मकबरा बनवा लिया था।' वे चलते-चलते आगे आ चुके थे। 'यह जो मकबरा देख रही हो न तुम इसके सेंटर टाप दो तरह के हैं। एक तो ऊपर नकली और दूसरी नीचे मिट्टी में असली।

वह बोलते हुए हनीफ सर का चेहरा गौर से देख रही थी। उसे लग रहा था वे कक्षा में हैं और सर... वह