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निबंध

बबूल और कैक्टस
रामदरश मिश्र


उस दिन अपने मित्र के यहाँ ड्राइंगरूप में जब बबूल की एक टहनी को लगे देखा, तो देखता ही रह गया। न जाने कैसा लगने लगा। जैसे एक भरे-पूरे, जीवंत वन्य पुरुष की एक बाँह काटकर फूलदान में खोंस दी गई हो या एक लंबे-चौड़े हरे-भरे मैदान का एक कोना नोंचकर कमरे के एक कोने में डाल दिया गया हो। मित्र के कमरे में एक ओर कैक्टस शोभित था, दूसरी ओर बबूल की टहनी, और मित्र अपनी चमत्कारी सूझ-बूझ पर खुश होकर दाद पाना चाहते थे। मैंने दाद दी उनके नए सौंदर्य-बोध की, जिसने कैक्टस के साथ ही बबूल को कमरे में सजाकर सजावट को नया आयाम दिया था। किंतु जब मैं वहाँ से चला, तो बबूल उस कमरे से निकलकर मेरे साथ हो लिया, और समय की दूरियों में फैलता-फैलता, अजब-अजब तरह की अनुभूतियाँ बनकर मुझ पर छा गया।

बबूल को कमरे में देखना मेरे लिए एक नया अनुभव था। कमरे में कैक्टस देखा था, गुलाब देखा था, बेला देखा था, तरह-तरह के देशी-विदेशी फूल, कागज और प्लास्टिक के फूल देखे थे, सुकुमार लाजवंती लतिकाएँ देखी थीं, और मैंने कभी भी असहजता या अन्यमनस्कता नहीं अनुभव की। मुझे अक्सर यही लगा था कि फूल, ये लताएँ चाहे कमरे में रहें चाहे बाहर, क्या फर्क पड़ता है! उन्हें थोड़ी-सी मिट्टी चाहिए। थोड़ा पानी चाहिए। यह कहीं भी मिल सकता है, और ये सुख से रहते हैं। ...लेकिन बबूल ...बबूल को कमरे में देखने का बोध मेरे मन में अँटता ही नहीं था। ...कमरे में लगा हुआ कैक्टस कितना सुखी और निर्द्वंद्व था, और बबूल की टहनी एक ही घंटे में मुरझा गई थी।

बबूल कमरे में नहीं रह सका और मेरे सामने फैलता गया। खुले मैदानों में... सीमाहीन रेतीले विस्तारों में, धू-धू जलती हुई दोपहरियों की वीरान घाटियों में, बादलों की छाँह में काँपते-भीगते सीमाहीन कछारों में... बबूल को मैंने देखा है। देखा ही नहीं, जिया है, उसके फूलों और काँटों के साथ...। वह एक टहनी नहीं है, वह एक पेड़ है, समुचा पेड़-जीवन की विराट्ता से जुड़ा, विशाल भू-भाग और समय में उगा हुआ। मैंने उसे इसी विराट्ता में जिया है। कमरे का बबूल मेरे लिए एक नया बबूल था, जो मेरे मन के अनुभवों में कहीं समा नहीं पा रहा था। कैक्टस! उसे हमेशा घेरे में जीते हुए पाया है, घिरते और घेरते हुए...।

बबूल मेरे जीवन के अनेक जीवित संदर्भों और अनुभवों से गुँथा है। एक दृश्य उभरता है बचपन का - मैं अपने खेतों को पहचानने में अक्सर भटक जाया करता था, लेकिन बबूल के पेड़ खड़े थे, उन्हें फौरन पहचान लेता था। उन बबूलों को अनेक मौसमों में, अनेक फसलों में, अनेक मनःस्थितियों में देखा है। फसल जवानी में होती, हम बबूल नीचे के बैठकर रखवाली करते, चिड़ियों को उड़ाते और दोस्तों को इकट्ठा कर कहानियाँ सुनते-सुनाते - राजा-रानी की कहानियाँ, हिरन और चूहे की दोस्ती की कहानियाँ, अनाथ ईमानदार बच्चों की कहानियाँ, जंगल की कहानियाँ, खेत की कहानियाँ, दया, न्याय और सत्य की कहानियाँ...। बबूल अपनी छाँह फैलाए सब सुनता रहता, और बया बड़े विश्वास के साथ उस पर अपना घोंसला बनाया करती। हम लोग बया के लटके हुए सुंदर-मजबूत घोंसलों को देखते और समझ नहीं पाते कि बया ऐसे सुंदर घोंसले बबूल पर ही क्यों बनाती है! ...खेलते-खेलते मैंने कई बार बबुरी की माला बनायी थी, और बचपन के मासूम गले में पहनाई थी। खेलते-खेलते उसके काँटे तलवों में गड़े हैं, जिन्हें लिए हुए घर आया हूँ और माँ ने बड़े प्यार भरे हाथों से धीरे-धीरे निकाला है। माँ नहीं है आज, लेकिन उसके स्पर्श हर काँटे के साथ तलवों में सरसरा रहे हैं। आज पाँव में काँटे नहीं गड़ते। हमेशा जमीन और पाँव के बीच एक दूरी बनी रहती है, जूते की। कोई किसी का काँटा नहीं निकाल सकता। अपने-अपने टूटे काँटे लिए सभी बंद कमरों की तरह घूमते रहते हैं। अजनबी अपने से, दूसरों से।

मेरे खेतों के बबूलों ने मुझे कई बार रुलाया है, कई बार मेरे कपड़े फाड़े हैं, मेरे अंग नोचे हैं - लेकिन वह हमेशा मेरे करीब होते गए हैं, मुझमें खुलते गए हैं। जब बरसात में मेरे खेत पानी से भर जाते, धान के पौधे भीगी हवा के झोंकों में काँपने लगते, तो पीले-पीले फूलों से लदे बबूल की छाया पानी में झरती रहती, और मैं देखता रहता। यह देखना, अनजाने मेरे गीतों की कितनी पंक्तियों की रचना करता रहता -

'भीगी-भीगी हवा बबूलों को छू-छू
    बह जाती,
    पीली-पीली छाया जल में काँप-काँप
    रह जाती,
    काँटों में फूले प्राणों को तू आ-आ परसे
    न माने बादरवा बरसे'
    और
    'ऊँची-ऊँची ताड़-शिखाएँ
    फैले-फैले वन शालों के,
    झरते फूल बबूल, चीड़ की वे चोटियाँ
    पार ढालों के
    छूट रहे नीचे पुकारते
    ऊपर पंख पसारे बादल चले जा रहे'

और गर्मियों में अवधूत की तरह ये बबुरियों से लदे खड़े रहते। जब कहीं हरियाली नहीं होती, तो चरवाहे इन बबुरियों को तोड़-तोड़कर बकरियों को खिलाया करते। बंदर आम के फलहीन बगीचों से मारे-मारे आते, और इन बबुरियों पर भूख से टूट पड़ते। निचाट खेतों में फावड़े चलाते मजदूर थककर, इन्हीं की अवधूत छाँह में बैठकर बल संचित करते थे। जलती हुई दोपहरी के अंधड़ में अकेले खड़े ये पेड़ मस्ती से हिलते रहते जिन्हें जो कुछ लेना हो, ले जाए इनके पास से!

मैंने अपने खेतों के इन बबूलों की डालियों को कई बार कटते हुए देखा है - दादी मरी हैं, दादा मरे हैं माँ मरी है, बहन मरी है; और हर बार इस हमदर्द साथी ने अपनी डालियाँ लुटाई हैं। कटकर आधा हुआ है, फिर पनपा है। कटकर कभी मुरझाया नहीं है, चुका नहीं है; बल्कि अपने को हमारे जीवन में व्याप्त कर व्यापक बनाया है - एक-एक संवेदना को छुआ है - कभी काँटों से, कभी फूलों से। इन सारे खेतों में वह डूबा है, फैला है। फावड़ा खेतों की जड़ता तोड़ रहा है, फसल उगाने को। फावड़े में बेंट बनकर बबूल उगा है। हँसिए फसलें बटोर रहे हैं, बबूल उनकी बाँह बनकर उन्हें पकड़े हुए हैं। छोटे-छोटे खटोले, जो मेरी कितनी ही नींद और स्वप्नों के साक्षी हैं, बबूल से ही बने हुए हैं। पता नहीं वे बबूल अब खेतों में हैं कि नहीं? याद आ रहा है, अपने गाँव का स्कूल। तब मैं कैक्टस को नहीं जानता था, नागफनी को जानता था। अब ज्ञात हुआ है कि नागफनी कैक्टस का ही देशी दादा-परदादा है। स्कूल नागफनी से घिरा होता था, शायद हाताबंदी के लिए, शायद इसीलिए कि लड़के इधर-उधर से भागने न पाएँ। हम लोगों के वस्त्रों और कपड़ों से नागफनी के काँटे बार-बार उलझे हैं, रक्त में उसके दंश परपराए हैं, लेकिन हम लोग नागफनी के घेरों को अक्सर तोड़ते ही रहते हैं। आज याद आता है कि नागफनी के साथ हमारा कोई मौसम बँधा नहीं है, कोई ऋतु इसके पास ठहरी नहीं है, गर्मी की दोपहरियों में स्कूल से छूटने पर हम घरों को भागते थे नंगे पाँव, नंगे सिर, और रह-रहकर हम तड़पते थे। बीच-बीच में मस्ती से खड़े बबूल हमें अपने पास बुलाते और प्यार से हमारे सिरों पर हाथ फेर दिया करते थे।

हम आस-पास के सारे बबूलों को जानते उनके नाम से, गुण से। आवश्यकता होने पर खुरपा लेकर किसी की छाल काट आते थे, और बबूल पिता की तरह बूँद-बूँद रस स्रवित करता था। उस रस को निकालकर हम लाते थे, स्याही बनाते थे। जिससे पता नहीं कितने अक्षर, कितनी पंक्तियाँ लिखी होंगी, कितने पन्ने रँगे होंगे, जीवन की सीढ़ियाँ चढ़ी होंगी। इनके रस ने पता नहीं कितनी चिट्ठियों का राज सँभालकर कोसों दूर पहुँचाया होगा।

निचाट... दूर-दूर तक फैली हुई रेती... रेती... लू के झोंको में उड़ती हुई जेठ की दोपहरी... रेती के पार रेखा-सी चमचमाती एक नदी। इस रास्ते कई बार गुजरा हूँ - कभी बाहर से घर की ओर, कभी घर से बाहर की ओर, कभी कुछ खोजने के लिए बाहर जाता हुआ, कभी खोज से थका-हारा वापस घर आता हुआ...।

कहीं कोई छाँह नहीं, वीरान रेती, बेपरवाह झूमते हुए केवल बबूल के पेड़, पत्तियाँ आधी झड़ी हुई, थोड़ी-थोड़ी छाया जलती रेत पर हिलती हुई। बार-बार लपक कर इस छाँह में खड़ा होता था, थोड़ा-सा पसीना सूखता था, तन को राहत मिलती थी। रेती पार होते ही नदी आती थी। नदी के इस पार बबूलों का एक जंगल-सा आता था, और उस पार आमों का घना बगीचा, और कुछ दूर बाद गाँव। आमों की घनी छाँह नदी पार होते ही ऊपर आ जाती थी; लेकिन गाँव के पास की यह छाया मुझे देर तक विलमा नहीं पाती थी। मैं मुड़कर एक बार फिर देखता था... पीछे मीलों फैली रेत पर फैले हुए बबूल, भटके यात्रियों के साथी... और देखता था, इस वीरान विस्तार में बनते और उड़ते हुए अपने पदचिह्न जो बबूलों की छाँह में आ-आकर ठहरे होते।

नदी के इस पार जो बबूलों का जंगल है, वहाँ चरवाहे अपने ढोरों को पानी में छोड़कर अलसाए लेटे रहते, और गाते रहते कोई विरह का गीत। यह गीत उदास-सा, उजड़ी दोपहरी में भटकता रहता। यह कँटीला-ठूँठ बबूल का पेड़ विरह-गीत क्या समझता होगा? विरह-गीत, प्रेम-गीत तो समझते हैं - आम, अशोक, बकुल, गुलाब, कमल, मालती। यह काँटेदार नीरस बबूल और विरह के गीत? मगर मैं देखता था कि बबूल रह-रहकर हवा में सनसना उठते थे और गीतों की उदासी गाढ़ी हो जाती थी। और मुझे याद आती थी, अपने गाँव के एक बाबा की, जिनकी घनी-घनी मूँछें थीं, छाती पर घने-घने बाल थे - करिया-भुजंग पूरी देह पर बड़े-बड़े बाल फैले हुए, देखने में एकदम रीछ लगते थे। मगर जब गाते थे तो उनकी आँखें तरल हो जाती थीं और आसपास का समस्त परिवेश पिघल कर बहने लगता था...। मुझे याद है, बाढ़ के दिनों में इन बबूलों ने कई बार बहती हुई नावों को रोका है, इनके तनों से नावों की रस्सियों को कई बार सहारा मिला है।

आज हम कमरों में बंद हो गए और कैक्टस अपने स्वभाव के अनुसार हमारा कमरे का साथी हो गया है। कमरे के घेरे में उगनेवाले फूल और काँटों को, उनकी आपसी दूरियों को, उनकी आपस में काटती रेखाओं को कैक्टस उगाता है। कैक्टस भाग्यशाली है कि वह कहीं भी जा सकता है, उसकी डालें काटकर कहीं भी उगाई जा सकती हैं, कमरे में, कमरे के बाहर, क्योंकि उसे किसी खास जमीन और मौसम से लगाव नहीं होता। वह गमले की थोड़ी-सी मिट्टी में, और कमरे में बंद सदाबहार मौसम में बड़ी आसानी से जी सकता है, खुश रह सकता है, बाहर बहती हुई आँधियों, वासंती हवाओं, बरसाती झड़ियों, फसलों के अलमस्त विस्तार पर लोट-लोटकर रंगीन होती धूप और दूर-दूर घाटियों तक अनेक धुआँ-भरी गलियों, मकानों, चौराहों, पगडंडियों, झोंपड़ियों की टूटती-जुड़ती नींद के स्वर सुनती रातों से बेखबर। लेकिन अभागा बबूल अपनी जमीन छोड़कर नहीं जा सकता, वह मौसम की आवाजों से अलग नहीं हो सकता। वह समूचा जीता है, अंश-अंश नहीं। उसकी डालें काटकर कहीं भी नहीं लगाई जा सकतीं, वह भला बैठक - कक्ष के फूलदान में कैसे अँट सकता है? दिल्ली-जैसे आधुनिक नगर की आधुनिक बस्तियों में भी, बबूलों को बनाव-सिंगार से दूर, झाड़-झंखाड़ों में ही जीते, फलते-फूलते देखा है। इस कमबख्त को आज भी, आज का जीवन जीना नहीं आया। मैं मित्र के कमरे में देख रहा था कि कैक्टस खिलती हुई आधुनिक रंगत फूलदान में मुरझाते हुए गँवार बबूल पर बहुत ही आधुनिक ढंग से मुस्करा उठती थी। ...मगर कौन जाने, कल बबूल भी जीना सीख ले!


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