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निबंध

कृपया गंदा मत कीजिए
देवेंद्रनाथ शर्मा


अभी मैं एक सार्वजनिक स्थान पर खड़ा हूँ। सामने लिखा है - 'कृपया गंदा मत कीजिए'। इस आदेश, निदेश या उपदेश के साथ यदि यह भी लिखा होता कि गंदा शब्द से क्या अभिप्रेत है तो मुझे इसका अर्थ समझने में सहूलियत होती। शब्द और अर्थ का रात-दिन विचार करते-करते मुझे प्रत्येक शब्द के अर्थ में संदेह हो जाता है। जो लोग धड़ल्ले से शब्दों का प्रयोग करते हैं वे सचमुच कितने भाग्यशाली हैं? मैं तो उपर्युक्त वाक्य को लेकर देश, काल, पात्र आदि की उलझन में पड़ गया हूँ। गंदा का जो अर्थ मेरी दृष्टि में है वही बहुतों की दृष्टि में नहीं है। मैं मिट्टी के स्पर्श से बचना चाहता हूँ क्योंकि उसमें मुझे गंदगी दीखती है। कपड़े पर मिट्टी का धब्बा आँखों को खटकने लगता है क्योंकि उससे मेरी नागरिकता और सभ्यता में बट्टा लगता है। किंतु ऐसे करोड़ों लोग हैं जिन्हें मिट्टी से इतना प्यार है कि वे उससे अलग रहने की कल्पना भी नहीं कर सकते। वे तो वस्तुतः मिट्टी में सने रहते हैं और उन्हें मिट्टी का स्पर्श उतना ही सुखद और प्रिय है जितना मुझे चंदन का। मेरी और उनकी दृष्टि में जो भेद है वह गंदगी की धारणा में भी भेद उपस्थित करता है। जो मेरी दृष्टि में गंदा है वह उनकी दृष्टि में गंदा तो नहीं ही है, साफ है और पवित्र भी। स्वभावतः 'गंदा मत कीजिए' - इस सूचना को पढ़कर जो प्रतिक्रिया मेरे मन में उत्पन्न होती है वही उनके मन में नहीं होती। इसलिए वे अपनी दृष्टि से सफाई बरतते हुए भी मेरी दृष्टि से गंदगी पैदा करते हैं।

एक दिन मैं कहीं जा रहा था। स्टेशन पर पहुँचा तो मालूम हुआ कि गाड़ी आधा घंटा लेट है। लाचार, प्लेटफार्म पर टहलने लगा। थोड़ी दूर पर एक सज्जन अपने बिस्तर पर बैठे थे। देखने से देहात के रहनेवाले और धनी लग रहे थे। दो आदमी उनके पास खड़े थे जिनसे वे बात कर रहे थे और प्रायः प्रत्येक वाक्य की समाप्ति पर एक बार थूक देते थे। जब एक दिशा थूक से सरस हो गई तो दूसरी और मुँह कर बैठ गए। पर क्रम चलता ही रहा और आध घंटे के भीतर अपने आस-पास की जमीन को उन्होंने तर कर दिया। मैं उनकी इस चेष्टा को टहलते-टहलते ध्यान से देखता रहा और मेरा निष्कर्ष रहा कि उस शक्ति का व्यक्ति लघु-सिंचाई योजनाओं में बड़े काम का सिद्ध हो सकता है। जिस अनुद्विग्न भाव से आसपास की जमीन को सरसता प्रदान कर रहे थे उसे देखकर ही मैं उद्विग्न हो रहा था। अपने जानते वे कोई काम ऐसा नहीं कर रहे थे जो गंदा कहला सके। यह उनके जीवन का सहज क्रम था। उनके थूक में रंगीनी नहीं थी अर्थात वे तांबूल-सेवी नहीं तंबाकू-सेवी थे। तांबूल-सेवियों की छाप तो और भी गहरी होती है और मुझे कम तांबूल-सेवी ऐसे मिले जो पीक फेंकते समय स्थान-अस्थान का विचार करते हों। यों, सामान्यतः तंबाकू खानेवालों की अपेक्षा पान खानेवाले अधिक संपन्न और सभ्य भी समझे जाते हैं। व्यवसनों में भी वर्ग-भावना है। बीड़ी पीने की अपेक्षा सिगरेट पीना अधिक आभिजात्य का सूचक है और सिगरेटों में भी कीमत के अनुसार नीची और ऊँची जातियाँ होती हैं जिनसे पीनेवाले का सामाजिक स्तर निर्धारित होता है। तो सामाजिक स्तर में चाहे जो भी भेद हो, गंदगी फैलाने में सब समान हैं।

सच पूछिए तो सफाई और गंदगी का संबंध सामाजिक स्तर से उतना नहीं है जितना व्यक्तिगत संस्कार से। कहीं तो यह संस्कार सहज होता है और कहीं सायास अर्जित। पाश्चात्य देशों में सफाई की भावना जितनी व्यापक है, गंदगी की भावना उतनी ही हमारे यहाँ। पश्चिम के सभी लोग जन्मना स्वच्छता-प्रेमी हैं, ऐसा नहीं माना जा सकता किंतु सामाजिकता से प्रेरित होकर उन्होंने स्वच्छता का अपने भीतर विकास कर लिया है। तभी तो पूरा का पूरा देश स्वच्छ दीखता है। हमारे यहाँ एक को गंदगी लगाते देख दूसरे को भी गंदगी लगाने की प्रेरणा मिलती है। हमारी यह धारणा भी है कि हमारा काम गंदा करना है और साफ करना नगरपालिका का। हम भूल जाते हैं कि जहाँ हर आदमी गंदा करने को कटिबद्ध हो वहाँ एक नगरपालिका कितनी सफाई रख सकती है।

संस्कार की बात याद आने पर एक बीती बात याद आ गई। मैं जब विदेश में था तो मेरे एक मित्र भी उसी फ्लैट के दूसरे कमरे में रहते थे। फुर्सत रहने पर अक्सर वह मेरे बैठकखाने में आ जाते और गप का सिलसिला चल पड़ता। वे सिगरेट के शौकीन थे, साथ ही बड़े शिष्ट-सभ्य। वहाँ की सफाई से बड़े प्रभावित भी थे और हमेशा उसकी प्रशंसा किया करते थे। उनके बैठकखाने में जाते ही ऐशट्रे सामने रख दिया जाता जिससे सिगरेट की राख फर्श पर न गिरे। परंतु भूलकर भी वे राख ऐशट्रे में नहीं पड़ने देते। अंग्रेजों की सफाई की तारीफ करते जाते और सिगरेट की राख से कालीन में रंग भरते जाते। उनके जाने के बाद कालीन साफ करना मेरी पत्नी का अनिवार्य कर्तव्य हुआ करता था।

आपने अक्सर रेलगाड़ी की प्रथम श्रेणी के डब्बों में मूँगफली के छिलके या वैसी ही अजीबोगरीब चीजें बिखरी देखी होंगी। प्रथम श्रेणी के यात्री संपन्न तो होते ही हैं, सुरुचि-संपन्न भी होने चाहिए पर उनकी सुरुचि-संपन्नता का संबंध मूँगफली के छिलकों से कैसे बैठाया जाय? इसलिए गंदगी का संबंध गरीबी या अशिक्षा से मानना संगत नहीं है।

मुझे घूमने-फिरने के अवसर काफी मिले हैं - स्वदेश में भी, विदेश में भी और चिंतन का दुरभ्यास होने से प्रायः कुछ न कुछ सोचता-विचारता रहता हूँ। भारत में भावात्मक एकता के प्रश्न पर मैंने कई दृष्टियों से सोचा है। धर्म भावात्मक एकता का आधार नहीं बन सका, यह तो प्रत्यक्ष ही है। उसके चलते देश के दो टुकड़े हो गए। जातियाँ अलगाव का समर्थ साधन रही हैं। भाषा को लेकर जो तू-तू, मैं-मैं मची है, वह कहने की चीज नहीं। वेश-भूषा, रहन-सहन, खान-पान में भी पर्याप्त अंतर है। फिर भावात्मक एकता का आधार क्या हो? और तब मुझे दो ही आधार दिखाई देते हैं - गरीबी और गंदगी। और किसी आधार पर भारत की भावात्मक एकता संभव हो या न हो, इन दोनों आधारों पर वह संभव हो जाती है। कन्याकुमारी से कश्मीर तक और असम से गुजरात तक आप एक जैसी गरीबी और गंदगी देखेंगे।

मैं जब कहीं कोई सूचना देखता हूँ तो उससे मेरे मन में एक ही प्रतिक्रिया उत्पन्न होती है और वह है मनोविनोद की। सूचना को लिखने-लिखाने में निश्चय ही काफी पैसे लगते होंगे और उपयोग उससे सिद्ध होते मुझे शायद ही कभी दिखाई दिया हो। संभव है यह मेरी दृष्टि का दोष हो। यों भी दृष्टि मेरी बहुत अच्छी नहीं है; चश्मा लगाता हूँ। किंतु केवल दृष्टि-दोष ही है ऐसा भी मेरा अहम मानने को तैयार नहीं। 'कृपया गंदा मत कीजिए' - यह वाक्य जिसने लिखा, या यों कहिए कि लिखवाया, उसकी धारणा गंदगी के विषय में धूमिल होने पर भी अवांछनीय नहीं थी। यों, जैसे मैंने कहा कि गंदगी का न तो कोई एक रुप है, न एक स्तर और न एक कारण। फिर भी औचित्यबोध के समान अनौचित्यबोध का भी एक सामान्य स्तर हुआ करता है। वही स्थिति गंदगी की भी है। जिस स्थान पर खड़ा होने में मुझे या कुछ लोगों को जुगुप्सा होती है, वहीं बहुत-सारे लोग इतमीनान से बैठकर क्लब का आनंद उठाते हैं और रात को बिस्तर लगाकर शांति और चैन की नींद सोते हैं। कलकत्ता या बंबई जैसे नगरों में अगणित लोगों का निवास-स्थान फुटपाथ है जिनकी खुशबू और स्वछता से हम भी अपरिचित नहीं है! उनके लिए 'कृपया गंदा मत कीजिए' का अर्थ वही नहीं है जो मेरे लिए। तब मैं यह तय नहीं कर पाता कि इस निदेश को आग्रह मानूँ या व्यंग्य!


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